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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 265

द्वितीय उद्योतः २०५ ध्वन्यालोकः इत्यत्र करुणरसस्य शुद्धस्याङ्गभावात्स्पष्टमेव रसवदलङ्कारत्वम् । एवमेवंविधे विषये रसान्तराणां स्पष्ट एवाङ्गभावः । यहाँ शुद्ध करुण रस के अङ्ग हो जाने के कारण स्पष्ट ही रसवदलङ्कारता है । इस प्रकार ऐसे विषय में दूसरे रसों का भी स्पष्ट ही अङ्गभाव है । लोचनम् ननु रसेन किं कुर्वता प्रकृतोऽर्थोऽलङ्क्रियते ! तर्हि उपमयापि किं कुर्वत्या- लङ्क्रियेत । ननु तयोपमीयते प्रस्तुतोऽर्थः । रसेनापि तर्हि सरसीक्रियते सोऽर्थ इति स्वसंवेद्यमेतत् । तेन यत्केचिच्चूचुदन्-‘अत्र रसेन विभावादीनां मध्ये किमलङ्क्रियते’ इति तदनभ्युपगमपराहतम्; प्रस्तुतार्थस्यालङ्कार्यत्वेना- भिधानात् । अस्यार्थस्य भूयसा लक्ष्ये सद्भाव इति दर्शयति-एवमिति । यत्र राजादेः प्रभावख्यापनं तादृश इत्यर्थः । शङ्का-क्या करता हुआ रस प्रकृत अर्थ को अलङ्कृत करता है ? ( समाधान में प्रश्न करते हैं कि ) क्या करती हुई उपमा अलङ्कृत करती है ? ( यदि कहिए कि ) प्रस्तुत अर्थ उसके द्वारा उपमित किया जाता है ! तब तो यह स्वयं ही समझा जा सकता है कि रस के द्वारा भी वह अर्थ सरस किया जाता है । इसलिए जो कि कुछ लोगों ने कहा है-‘यहाँ रस के द्वारा विभाव आदि के बीच किसे अलङ्कृत किया जाय ?’ वह अमान्य होने के कारण निराकृत है । क्योंकि प्रस्तुत¹ अर्थ को अलङ्कार्य कहा गया है । इस अर्थ का बहुत प्रकार से लक्ष्य में सद्भाव है, यह दिखाते हैं— इस प्रकार- । अर्थात् जहाँ राजा आदि के प्रभाव का ख्यापन हो वैसा । १. यहां ध्वनिकार के ‘रसवदलङ्कार’ को लेकर दो प्रकार के मतभेद उपस्थित हैं, जिनका संकेत कारिका में ‘मे मतिः’ ( मेरी मति या सिद्धान्त है ) तथा वृत्तिग्रन्थ में ‘रसवदलङ्कारस्यान्यै- र्दर्शितो विषयः’ ( अन्य लोगों ने रसवदलङ्कार का विषय दिखाया है ) विदित होता है । प्रथम मतभेद यह है कि तथाकथित ‘रसवदलङ्कार’ को अलङ्कार की कोटि में गणना तभी हो सकती है जब कि ‘अलङ्कार’ का सामान्य लक्षण उसमें संगत हो । जैसा कि अलङ्कार को कहा जाता है कि वह कटक-कुण्डलादि के समान हैं, जिस प्रकार कटक-कुण्डल आदि शरीर के साक्षात् उपकारक होते हुए परम्परया आत्मा के उपकारक हैं उसी प्रकार काव्य-क्षेत्र में वाच्य-वाचक के साक्षात् उपकारक और परम्परया रस के उपकारक को अलङ्कार कहते हैं । ‘काव्यप्रकाश’ में यही कहा है— उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽङ्गद्वारेण जातुचित् । हारादिवदलङ्कारास्तेऽनुप्रासोपमादयः ॥ २०१२ ॥ ‘अलङ्कार’ का यह लक्षण ‘रसवदलङ्कार’ में संगत नहीं होता, क्योंकि रसवदलङ्कार वाच्य- वाचक का उपकारक नहीं होता है बल्कि साक्षात् रस का उपकारक होता है, अतः उसकी गणना अलङ्कारों में न होकर ‘गुणीभूतव्यङ्ग्य’ के ‘अपराङ्ग’ नामक प्रभेद में है । तब प्रश्न उठता है कि जब ‘रसवदलङ्कार’ अलङ्कार नहीं है तो उसे ‘अलङ्कार’ क्यों कहा गया ? इसके समाधान में कुछ लोग कहते हैं कि जब प्राचीनों ने इसे अलङ्कार के रूप में व्यवहार