ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished680 पृष्ठ
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२०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
सङ्कीर्णो रसादिरङ्गभूतो यथा—
क्षिप्तो हस्तावलग्नः प्रसभमभिहतोऽप्याददानोंऽशुकान्तं
गृह्णन् केशेष्वपास्तश्चरणनिपतितो नेक्षितः सम्भ्रमेण ।
आलिङ्गन् योऽवधूतस्त्रिपुरयुवतिभिः साश्रुनेत्रोत्पलाभिः
कामीवार्द्रापराधः स दहतु दुरितं शाम्भवो वः शराग्निः ॥
सङ्कीर्ण रसादि अङ्गभूत, जैसे—
आर्दापराध कामी की भांति वह भगवान् शङ्कर का बाणाग्नि आप के पाप का
दहन करे, जो सजलनेत्रकमलों वाली त्रिपुरयुवतियों द्वारा झटकने पर हाथ में लग
गया, जोर से पीटने पर कपड़े के अन्त-भाग को पकड़ने लगा, तिरस्कृत होकर बाल
पकड़ पड़ा, नहीं देखने पर चरणों पर धड़फड़ा कर पड़ गया, और आलिङ्गन करता
हुआ तिरस्कार पाया ।
लोचनम्
क्षिप्त इति । कामिपक्षेऽनादृतः, इतरत्र धुतः । अवधूत इति न प्रतीप्सितः
प्रत्यालिङ्गनेन, इतरत्र सर्वाङ्गधूननेन विशरारूकृतः । साश्रुत्वमेकत्रेष्यया अन्यत्र
निष्प्रत्याशतया । कामीवेत्यनेनोपमानेन श्लेषानुगृहीतेनेर्ष्याविप्रलम्भो य
आकृष्टस्तस्य श्लेषोपमासहितस्याङ्गत्त्वम्, न केवलस्य । यद्यप्यत्र करुणो रसो
वास्तवोऽप्यस्ति तथापि स तच्चारुत्वप्रतीतौ न व्यापियत इत्यनेनाभिप्रायेण
श्लेषसहितस्येत्येतावदेवावोचत्, न तु करुणसहितस्येत्यपि । एतमर्थमपूर्वत्-
क्षिप्त— । कामी के पक्ष में अनादृत और अन्यत्र ( बाणाग्नि के पक्ष में ) झटका
गया । अवधूत, अर्थात् प्रत्यालिङ्गन द्वारा प्रत्यभिलषित न हुआ, अन्यत्र पक्ष में सभी
अङ्गों के झकझोरने से विशीर्ण किया गया । सजल नेत्र होना, एक जगह ईर्ष्या के
कारण और अन्यत्र प्रत्याशारहित होने के कारण । ‘कामी की भांति’ इस श्लेष
अलङ्कार-द्वारा अनुगृहीत उपमान से ईर्ष्याविप्रलम्भ, जो खिंचकर आता है, श्लेषोपमा
सहित वह ‘ईर्ष्याविप्रलम्भ’ यहाँ अङ्ग बन रहा है, अकेला नहीं। यद्यपि यहाँ करुणरस
भी वास्तव में है, लेकिन वह उस (विप्रलम्भ) के चारुत्व की प्रतीति के लिए, नहीं
लगता है, इस अभिप्राय से ‘श्लेषसहित’ इतना ही कहा है न कि ‘करुणसहित’ यह भी
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कर दिया है तब रसोपकारक होने मात्र से उसमें गौण ‘अलङ्कार’ का व्यवहार कथञ्चित्
मान लेना चाहिए ।
दूसरे लोग इसका समाधान यह देते हैं कि अलङ्कार का मुख्य लक्षण रसोपकारकत्व मात्र है
अतः रसवदलङ्कार में गौणरूप से ‘अलङ्कार’ का व्यवहार नहीं ।
‘काव्यप्रकाश’ में रसवदलङ्कारों को अलङ्कारों के प्रसंग में न रखकर गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रसंग
में निर्दिष्ट किया है ।
किन्तु ध्वनिकार और लोचनकार दोनों रसवदलङ्कारों को अलङ्कार के ही रूप में स्वीकार