भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

द्वितीय उद्योतः २०७

ध्वन्यालोकः
इत्यत्र त्रिपुररिपुप्रभावातिशयस्य वाक्यार्थत्वे ईर्ष्याविप्रलम्भस्य
श्लेषसहितस्याङ्गभाव इति, एवंविध एव रसवदाद्यलङ्कारस्य न्याय्यो
यहाँ त्रिपुर-शत्रु (शिवजी) का अतिशय प्रभाव वाक्यार्थ (अङ्गी) है, और
श्लेषसहित ईर्ष्या विप्रलम्भ का अङ्गभाव है । इस प्रकार ही रसवद् आदि अलङ्कार का
लोचनम्
योत्प्रेक्षितं दृढीकर्तुमाह-एवंविध एवेति । अत एवेति । यतोऽत्र विप्रलम्भस्याल-
ङ्कारत्वं न तु वाक्यार्थता, अतो हेतोरित्यर्थः । न दोष इति । यदि ह्यन्यतरस्य
रसस्य प्राधान्यमभविष्यन्न द्वितीयो रसः समाविशेत् । रतिस्थायिभावत्वेन तु
सापेक्षभावो विप्रलम्भः, स च शोकस्थायिभावत्वेन निरपेक्षभावस्य करुणस्य
(कहा है)। अपूर्व ढंग से उत्प्रेक्षित इस बात को दृढ़ करने के लिए कहते हैं—इस
प्रकार ही— । इसी लिए— । अर्थात् जिस कारण यहाँ विप्रलम्भ का अलङ्कारत्व है,
न कि वाक्यार्थत्व है उस कारण । दोष नहीं है— । क्योंकि यदि दो में से किसी एक
रस का प्राधान्य होता तो दूसरा रस समावेश प्राप्त नहीं करता । ‘रति’ जिसका
स्थायिभाव है, इस कारण विप्रलम्भ सापेक्षभाव है और ‘शोक’ जिसका स्थायी है,
ऐसा करुण निरपेक्षभाव है, अतः करुण विप्रलम्भ से विरुद्ध ही है । इस प्रकार
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करते हैं। इन लोगों का पक्ष है कि ‘अलङ्कार’ का प्रधान कार्य है सुन्दरता का सम्पादन, ऐसी स्थिति
में रसादि को भी वस्तु की भाँति अलङ्कार मानने में कोई विरोध नहीं ।
फिर, ध्वनिकार की दृष्टि में गुणीभूतव्यङ्ग्य और रसवदादि के भेद के समन्वय के लिए यह
कहा जा सकता है कि रसादि ध्वनि के अपराङ्ग होने पर रसवत् और प्रेयोऽलङ्कार होंगे और वस्तु
या अलङ्कार ध्वनि के अपराङ्ग होने पर गुणीभूतव्यङ्ग्य होगा ।
द्वितीय मतभेद के अनुसार चेतन के वाक्यार्थीभूत होने पर रसादि-अलङ्कार का विषय और
अचेतन के वाक्यार्थीभाव में उपमादि अलङ्कार का विषय है। रसादि, चूँकि चित्तवृत्ति रूप होते
हैं, इसलिए अचेतन के वाक्यार्थीभाव की स्थिति में रसवदलङ्कार का विषय नहीं बन सकता। इस
मत के विरुद्ध ध्वनिकार ने आगे की पंक्तियों में स्वयं स्पष्ट कर दिया है ।
१. त्रिपुरदाह के वर्णन रूप प्रस्तुत पद्य में प्रधान रूप से शिवजी के प्रति कवि की भक्ति प्रकट
होती है, यद्यपि शिवजी का उत्साह त्रिपुरदाह के कार्य में प्रतीत होता है । किन्तु वह अनुभाव-
विभाव से परिपोष न प्राप्त करने के कारण ‘वीररस’ की स्थिति नहीं प्राप्त कर सका है। कामी
के उपमान से यहाँ श्लेषोपमा के साथ ईर्ष्याविप्रलम्भ रूप शृङ्गार की प्रतीति अङ्गरूप से होती है,
और साथ ही करुणरस भी प्रतीत होता है । ‘लोचन’ में ये सभी बातें स्पष्ट हो चुकी हैं । शृङ्गार
और करुण दोनों विरोधी रस हैं, अतः इनका एकत्र अवस्थान यद्यपि दोषपूर्ण माना गया है, परन्तु
प्रस्तुत में दोनों अङ्गरूप में अवस्थित हैं अतः यहाँ उनका विरोध अकिञ्चित्कर है । रसों के परस्पर
विरोध-अविरोध का विचार अन्यत्र ‘साहित्यदर्पण’ आदि ग्रन्थों से अवगत कर लेना चाहिए ।
शृङ्गार सर्वथा सापेक्ष-भाव है, क्योंकि इसका स्थायीभाव ‘रति’ दूसरे जन के विद्यमान रहने पर
ही हो सकती है और करुणरस का स्थायीभाव ‘शोक’ है उसमें प्रिय के विद्यमान रहने की अपेक्षा
नहीं, अतः निरपेक्ष-भाव है, अतएव दोनों का परस्पर विरोध माना जाता है । चूँकि स्वयं