भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

२०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः विषयः । अत एव चेर्ष्याविप्रलम्भकरणयोरङ्गत्वेन व्यवस्थानात्समा- वेशो न दोषः । यत्र हि रसस्य वाक्यार्थीभावस्तत्र कथमलङ्कारत्वम् ? अलङ्कारो हि चारुत्वहेतुः प्रसिद्धः; न त्वसावात्मैवात्मनश्चारुत्वहेतुः । तथा चायमत्र संक्षेपः— रसभावादितात्पर्यमाश्रित्य विनिवेशनम् । अलङ्कृतीनां सर्वासामलङ्कारत्वसाधनम् ॥ विषय उचित है। इसी लिए ईर्ष्या विप्रलम्भ और करुण के अङ्ग रूप से व्यवस्थित होने से कोई दोष नहीं है। क्योंकि जहाँ रस का वाक्यार्थीभाव ( प्राधान्य ) है वहाँ कैसे ( उसका ) अलङ्कारत्व होगा ? क्योंकि अलङ्कार चारुत्व के हेतु के रूप में प्रसिद्ध है, वह स्वयं अपने से अपने चारुत्व का हेतु नहीं है। और इस प्रकार यहाँ संक्षेप है— रस, भाव आदि के तात्पर्य का आश्रयण करके सभी अलङ्कारों का रखना उनके अलङ्कारत्व का साधन है।

लोचनम् विरुद्ध एव । एवमलङ्कारशब्दप्रसङ्गेन समावेशं प्रसाध्य एवंविध एवेति यदुक्तं तत्रैवकारस्याभिप्रायं व्याचष्टे—यत्र हीति । सर्वासामुपमादीनाम् । अयं भावः—उपमादीनामलङ्कारत्वे यादृशी वार्ता तादृश्येव रसादीनाम् । तदवश्यमन्येनालङ्कार्येण भवितव्यम् । तच्च यद्यपि वस्तुमात्रमपि भवति, तथापि तस्य पुनरपि विभावादिरूपतापर्यवसानाद्रसादितात्पर्यमेवेति सर्वत्र रसध्वनेरेवात्मभावः । तदुक्तं—रसभावादितात्पर्यमिति । तस्येति । प्रधानस्यात्म- 'अलङ्कार' शब्द के प्रसङ्ग से समावेश की बात तय करके 'इस प्रकार ही' यह जो कहा है उसके 'ही' कहने के अभिप्राय की व्याख्या करते हैं—क्योंकि जहाँ— । सभी उपमा आदि का । भाव यह है—उपमा आदि के अलङ्कार होने में जो बात है वही रसादि के ( अलङ्कार होने में है )। इस लिए अवश्य कोई अन्य अलङ्कार्य होना चाहिए। और वह ( अलङ्कार्य ) यद्यपि वस्तुमात्र भी हो सकता है, तथापि उसके पुनः भी विभावादि- रूपता में पर्यवसान होने के कारण, रसादि तात्पर्य ही सिद्ध होता है ऐसी स्थिति में सर्वत्र 'रसध्वनि' का ही आत्मत्व है। इसलिए कहा है—रस, भाव आदि के तात्पर्य० ।

ये दोनों प्रधान न होकर किसी तीसरे के अङ्ग हैं, अतः इनका विरोध एकत्र अवस्थान में भी नहीं है। यहाँ यह बात ध्यान में रखना चाहिए कि शृङ्गार या करुण यहाँ परिपुष्ट न होने के कारण परिपूर्ण रस की स्थिति में नहीं हैं, उनका यहाँ गौण व्यवहार है। यहाँ दोनों भावरूप हैं।