ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २०९ ध्वन्यालोकः तस्माद्यत्र रसादयो वाक्यार्थीभूताः स सर्वो न रसादेरलङ्कारस्य विषयः; स ध्वनेः प्रभेदः, तस्योपमादयोऽलङ्काराः । यत्र तु प्राधान्ये- नार्थान्तरस्य वाक्यार्थीभावे रसादिभिश्चारुत्वनिष्पत्तिः क्रियते, स रसा- देरलङ्कारताया विषयः । इस लिए जहाँ रसादि वाक्यार्थ हैं, वह रसादि अलङ्कार का विषय नहीं है, बल्कि वह 'ध्वनि' का प्रभेद है, उसके उपमादि अलङ्कार हैं । और जहाँ प्रधान रूप से अर्थान्तर के वाक्यार्थ हो जाने पर रसादि द्वारा चारुत्व की निष्पत्ति की जाती है, वह रसादि की अलङ्कारता का विषय है । लोचनम् भूतस्य । एतदुक्तं भवति-उपमया यद्यपि वाच्योऽर्थोऽलङ्क्रियते, तथापि तस्य तदेवालङ्करणं यद्व्यङ्ग्यार्थाभिव्यञ्जनसामर्थ्याधानमिति वस्तुतो ध्वन्यात्मैवा- लङ्कार्यः । कटककेयूरादिभिरपि हि शरीरसमवायिभिश्चेतन आत्मैव तत्तच्चित्त- वृत्तिविशेषौचित्यसूचनात्तयालङ्क्रियते । तथाहि-अचेतनं शवशरीरं कुण्ड- लाद्युपेतमपि न भाति, अलङ्कार्यस्याभावात् । यतिशरीरं कटकादियुक्तं हास्या- वहं भवति, अलङ्कार्यस्यानौचित्यात् । न हि देहस्य किञ्चिदनौचित्यमिति वस्तुत आत्मैवालङ्कार्यः, अहमलङ्कृत इत्यभिमानात् । रसादेरलङ्कारताया इति । व्यधिकरणषष्ठ्यौ, रसादेर्यालङ्कारता तस्याः स एव विषयः । एतदनुसारेणैव पूर्वत्रापि वाक्ये योज्यम्, रसादिकर्तृकस्यालङ्करणक्रियात्मनो विषय इति । उसका- । प्रधान, आत्मभूत का । बात यह कही गई-उपमा से यद्यपि वाच्य अर्थ अलङ्कृत होता है तथापि उस वाच्यार्थ का वही अलङ्करण है जो व्यङ्ग्य अर्थ के अभिव्यञ्जन-सामर्थ्य का आधान है, इस प्रकार वस्तुतः ध्वनि रूप ही अलङ्कार्य है ( वाच्यार्थ रूप नहीं ) । क्योंकि शरीर के साथ सम्बन्ध रखने वाले कटक, केयूर आदि अलङ्कार भी उस-उस विशेष चित्तवृत्ति के औचित्य के सूचक होने के कारण ( क्योंकि जैसे किसी युवक के शरीर के अलङ्कार उसके चित्त के रागी होने के औचित्य के सूचक होते हैं, इसी प्रकार किसी साधु के दण्ड-कमण्डल आदि उसके विराग के सूचक होते हैं ) चेतनस्वरूप आत्मा को ही अलंकृत करते हैं । जैसा कि-चेतनारहित शव-शरीर कुण्डल आदि अलङ्कारों से युक्त होकर भी नहीं शोभता, क्योंकि उसमें अलङ्कार्य ( आत्मा ) का अभाव है और साधु का शरीर कटक आदि अलङ्कारों से युक्त होकर खिल्ली का पात्र बनता है, क्योंकि अलङ्कार्य का वहाँ औचित्य नहीं है ( वहाँ तो दण्ड-कमण्डल का ही रहना उचित है ) । शरीर का कोई अनौचित्य नहीं । इस प्रकार वस्तुतः आत्मा ही अलङ्कार्य है, क्योंकि यह अभिमान होता है कि 'मैं अलङ्कृत हूँ' । 'रसादि की अलङ्कारता का' यहाँ व्यधिकरण षष्ठी विभक्ति है अर्थात् रसादि की जो अल- १४ ध्व०