भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 680 में से

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पृष्ठ 270

२१० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः एवं ध्वनेरुपमादीनां रसवदलङ्कारस्य च विभक्तविषयता भवति । इस प्रकार ध्वनि, उपमा आदि और रसवद् अलङ्कारों का अलग-अलग विषय लोचनम् एवमिति । अस्मदुक्तेन विषयविभागेनेत्यर्थः । उपमादीनामिति । यत्र रसस्या- लङ्कार्यता रसान्तरं चाङ्गभूतं नास्ति तत्र शुद्धा एवोपमादयः । तेन संसृष्ट्या नोपमादीनां विषयापहार इति भावः । रसवदलङ्कारस्य चेति । अनेन भावाद्य- लङ्कारा अपि प्रेयस्वूर्जस्विसमाहिता गृह्यन्ते । तत्र भावालङ्कारस्य शुद्धस्यो- दाहरणं यथा— तव शतपत्रपत्रमृदुताम्रतलश्चरणश्चलकलहंसनूपुरकलध्वनिना मुखरः । महिषमहासुरस्य शिरसि प्रसभं निहितः कनकमहामहीध्रगुरुतां कथमम्ब गतः ॥ इत्यत्र देवीस्तोत्रे वाक्यार्थीभूते वितर्कविस्मयादिभावस्य चारुत्वहेतुतेति तस्याङ्गत्वान्द्भावालङ्कारस्य विषयः । रसाभासस्यालङ्कारता यथा ममैव स्तोत्रे— समस्तगुणसम्पदः सममलङ्क्रियाणां गणै- र्भवन्ति यदि भूषणं तव तथापि नो शोभसे । शिवं हृदयवल्लभं यदि यथा तथा रञ्जये- स्तदेव ननु वाणि ! ते भवति सर्वलोकोत्तरम् ॥ ङ्कारता वही विषय । इसी के अनुसार पहले वाक्य में भी योजना कर लेनी चाहिए— रसादिकर्तृक अलङ्करण क्रिया का विषय । इस प्रकार—अर्थात् जैसा कि हमने विषय-विभाग कहा है । उपमा आदि—। जहाँ रस की अलङ्कार्यता और रसान्तर अङ्गभूत नहीं होता उपमा आदि शुद्ध ही अलङ्कार हैं । इसलिए भाव यह कि संसृष्टि से उपमा आदि का विषयापहार ( उच्छेद ) नहीं । और रसवद् अलङ्कार का—। इससे प्रेयस्वि, ऊर्जस्वि, समाहित ( आदि ) भावालङ्कार भी गृहीत होते हैं। उनमें शुद्ध 'भावालङ्कार' का उदाहरण, जैसे— 'हे अम्ब, कमल के पत्र के समान कोमल एवं रक्त तलभाग वाला, चंचल कलहंस की भाँति नूपुर की आवाज से मुखर, तुम्हारा चरण महिषासुर के सिर पर बलात् रखा हुआ, कैसे सुमेरु महापर्वत की गुरुता को प्राप्त किया ? यहाँ देवी का स्तोत्र प्रधान वाक्यार्थ है और वितर्क, विस्मय आदि भाव उसके चारुत्व के हेतु हैं, इस प्रकार उस ( वाक्यार्थ रूप स्तोत्र ) के अङ्ग होने के कारण 'भावालङ्कार' का विषय है। 'रसाभास' की अलङ्कारता, जैसे मेरे ही ( रचे ) स्तोत्र में— हे वाणि, अलङ्कारों के साथ समस्त गुणों की सम्पत्तियाँ यदि तुम्हारा भूषण बनें तब भी तुम्हारी शोभा नहीं, यदि तुम जिस-किसी प्रकार मनभाये भगवान् शिव को प्रसन्न करो तभी तुम्हारा सब से लोकोत्तर भूषण हो ।