ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २११ ध्वन्यालोकः यदि तु चेतनानां वाक्यार्थीभावो रसाद्यलङ्कारस्य विषय इत्युच्यते तर्ह्युपमादीनां प्रविरलविषयता निर्विषयता वाभिहिता स्यात् । यस्मा- दचेतनवस्तुवृत्ते वाक्यार्थीभूते पुनश्चेतनवस्तुवृत्तान्तयोजनया यथाकथ- सिद्ध होता है। अगर यदि चेतन पदार्थों का वाक्यार्थीभाव रसादि-अलङ्कार का विषय है, यह कहते हैं तो उपमा आदि अलङ्कार का जहाँ-कहीं ही (अर्थात् बहुत कम) विषय मिलेंगे, अथवा उनका कोई विषय ही न रह जायगा। क्योंकि जहाँ अचेतन वस्तु का वृत्तान्त मुख्य वाक्यार्थ है वहाँ (विभावादि की प्रक्रिया से) लोचनम् अत्र हि परमेशस्तुतिमात्रं वाचः परमोपादेयमिति वाक्यार्थे शृङ्गाराभासश्चा- रुत्वहेतुः श्लेषसहितः । न ह्ययं पूर्णः शृङ्गारो नायिकाया निर्गुणत्वे निरलङ्कारत्वे च भवति । ‘उत्तमयुवप्रकृतिरुज्ज्वलवेषात्मकः’ इति चाभिधानात् । भावाभा- साङ्गता यथा— स पातु वो यस्य हतावशेषास्तत्तुल्यवर्णाञ्जनरञ्जितेषु । लावण्ययुक्तेष्वपि वित्रसन्ति दैत्याः स्वकान्तानयनोत्पलेषु ॥ अत्र रौद्रप्रकृतीनामनुचितस्त्रासो भगवत्प्रभावकारणकृत इति भावाभासः । एवं तत्प्रशमस्याङ्गत्वमुदाहार्यम् । मे मतिरित्येनेन यत्परमतं सूचितं तद्दूषण- मुपन्यस्यति–यदीत्यादिना । परस्य चायमाशयः--अचेतनानां चित्तवृत्तिरूपर- साद्यसम्भवात्तद्वर्णने रसवदलङ्कारस्यानाशङ्क्यत्वात्तद्विभक्त एवोपमादीनां विषय इति । एतद् दूषयति–तर्हीति । तस्माद्वचनाद्धेतोरित्यर्थः । नन्वचेतन- यहाँ ‘परमेश्वर (शिव जी) की स्तुतिमात्र वाणी का परम उपादेय है’ इस वाक्यार्थ में श्लेष-सहित शृङ्गाराभास चारुत्व का हेतु है। नायिका के निर्गुण और निरलङ्कार होने पर शृङ्गारपूर्ण नहीं है, (अपितु आभासमात्र है), क्योंकि कहा है ‘उज्ज्वल वेषवाले उत्तम प्रकृति के युवति और युवक होते हैं’। ‘भावाभास’ की अङ्गता, जैसे— वह भगवान् कृष्ण आपकी रक्षा करें, जिसके द्वारा मारे जाने से बचे हुए दैत्य उन (कृष्ण) के सदृश कृष्ण वर्ण के अंजन से रञ्जित, अपनी पत्नियों के लावण्ययुक्त भी नेत्रकमलों से डरते रहते हैं। यहाँ रौद्र प्रकृति वाले दैत्यों का त्रास अनुचित है, (किन्तु) वह भगवान् के प्रभाव के कारण है, इस लिए ‘भावाभास’ है। इसी प्रकार ‘भावप्रशम’ का भी उदाहरण कर लेना चाहिए। ‘मेरी मति है’ इस कथन से जो परमत को सूचित किया है उसका दोष उपन्यस्त करते हैं—अगर—इत्यादि द्वारा। दूसरे का यह आशय है—‘अचेतन पदार्थों का चित्तवृत्ति रूप रसादि सम्भव न होने के कारण, उनके वर्णन में रसवद् अलङ्कार के अनाशङ्क्य होने से रसवद् अलङ्कार से अलग ही उपमादि अलङ्कारों का विषय है।’ इसमें दोष देते हैं—तो—। अर्थात् उस कथन के