ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
२१० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः एवं ध्वनेरुपमादीनां रसवदलङ्कारस्य च विभक्तविषयता भवति । इस प्रकार ध्वनि, उपमा आदि और रसवद् अलङ्कारों का अलग-अलग विषय लोचनम् एवमिति । अस्मदुक्तेन विषयविभागेनेत्यर्थः । उपमादीनामिति । यत्र रसस्या- लङ्कार्यता रसान्तरं चाङ्गभूतं नास्ति तत्र शुद्धा एवोपमादयः । तेन संसृष्ट्या नोपमादीनां विषयापहार इति भावः । रसवदलङ्कारस्य चेति । अनेन भावाद्य- लङ्कारा अपि प्रेयस्वूर्जस्विसमाहिता गृह्यन्ते । तत्र भावालङ्कारस्य शुद्धस्यो- दाहरणं यथा— तव शतपत्रपत्रमृदुताम्रतलश्चरणश्चलकलहंसनूपुरकलध्वनिना मुखरः । महिषमहासुरस्य शिरसि प्रसभं निहितः कनकमहामहीध्रगुरुतां कथमम्ब गतः ॥ इत्यत्र देवीस्तोत्रे वाक्यार्थीभूते वितर्कविस्मयादिभावस्य चारुत्वहेतुतेति तस्याङ्गत्वान्द्भावालङ्कारस्य विषयः । रसाभासस्यालङ्कारता यथा ममैव स्तोत्रे— समस्तगुणसम्पदः सममलङ्क्रियाणां गणै- र्भवन्ति यदि भूषणं तव तथापि नो शोभसे । शिवं हृदयवल्लभं यदि यथा तथा रञ्जये- स्तदेव ननु वाणि ! ते भवति सर्वलोकोत्तरम् ॥ ङ्कारता वही विषय । इसी के अनुसार पहले वाक्य में भी योजना कर लेनी चाहिए— रसादिकर्तृक अलङ्करण क्रिया का विषय । इस प्रकार—अर्थात् जैसा कि हमने विषय-विभाग कहा है । उपमा आदि—। जहाँ रस की अलङ्कार्यता और रसान्तर अङ्गभूत नहीं होता उपमा आदि शुद्ध ही अलङ्कार हैं । इसलिए भाव यह कि संसृष्टि से उपमा आदि का विषयापहार ( उच्छेद ) नहीं । और रसवद् अलङ्कार का—। इससे प्रेयस्वि, ऊर्जस्वि, समाहित ( आदि ) भावालङ्कार भी गृहीत होते हैं। उनमें शुद्ध 'भावालङ्कार' का उदाहरण, जैसे— 'हे अम्ब, कमल के पत्र के समान कोमल एवं रक्त तलभाग वाला, चंचल कलहंस की भाँति नूपुर की आवाज से मुखर, तुम्हारा चरण महिषासुर के सिर पर बलात् रखा हुआ, कैसे सुमेरु महापर्वत की गुरुता को प्राप्त किया ? यहाँ देवी का स्तोत्र प्रधान वाक्यार्थ है और वितर्क, विस्मय आदि भाव उसके चारुत्व के हेतु हैं, इस प्रकार उस ( वाक्यार्थ रूप स्तोत्र ) के अङ्ग होने के कारण 'भावालङ्कार' का विषय है। 'रसाभास' की अलङ्कारता, जैसे मेरे ही ( रचे ) स्तोत्र में— हे वाणि, अलङ्कारों के साथ समस्त गुणों की सम्पत्तियाँ यदि तुम्हारा भूषण बनें तब भी तुम्हारी शोभा नहीं, यदि तुम जिस-किसी प्रकार मनभाये भगवान् शिव को प्रसन्न करो तभी तुम्हारा सब से लोकोत्तर भूषण हो ।
द्वितीय उद्योतः २११ ध्वन्यालोकः यदि तु चेतनानां वाक्यार्थीभावो रसाद्यलङ्कारस्य विषय इत्युच्यते तर्ह्युपमादीनां प्रविरलविषयता निर्विषयता वाभिहिता स्यात् । यस्मा- दचेतनवस्तुवृत्ते वाक्यार्थीभूते पुनश्चेतनवस्तुवृत्तान्तयोजनया यथाकथ- सिद्ध होता है। अगर यदि चेतन पदार्थों का वाक्यार्थीभाव रसादि-अलङ्कार का विषय है, यह कहते हैं तो उपमा आदि अलङ्कार का जहाँ-कहीं ही (अर्थात् बहुत कम) विषय मिलेंगे, अथवा उनका कोई विषय ही न रह जायगा। क्योंकि जहाँ अचेतन वस्तु का वृत्तान्त मुख्य वाक्यार्थ है वहाँ (विभावादि की प्रक्रिया से) लोचनम् अत्र हि परमेशस्तुतिमात्रं वाचः परमोपादेयमिति वाक्यार्थे शृङ्गाराभासश्चा- रुत्वहेतुः श्लेषसहितः । न ह्ययं पूर्णः शृङ्गारो नायिकाया निर्गुणत्वे निरलङ्कारत्वे च भवति । ‘उत्तमयुवप्रकृतिरुज्ज्वलवेषात्मकः’ इति चाभिधानात् । भावाभा- साङ्गता यथा— स पातु वो यस्य हतावशेषास्तत्तुल्यवर्णाञ्जनरञ्जितेषु । लावण्ययुक्तेष्वपि वित्रसन्ति दैत्याः स्वकान्तानयनोत्पलेषु ॥ अत्र रौद्रप्रकृतीनामनुचितस्त्रासो भगवत्प्रभावकारणकृत इति भावाभासः । एवं तत्प्रशमस्याङ्गत्वमुदाहार्यम् । मे मतिरित्येनेन यत्परमतं सूचितं तद्दूषण- मुपन्यस्यति–यदीत्यादिना । परस्य चायमाशयः--अचेतनानां चित्तवृत्तिरूपर- साद्यसम्भवात्तद्वर्णने रसवदलङ्कारस्यानाशङ्क्यत्वात्तद्विभक्त एवोपमादीनां विषय इति । एतद् दूषयति–तर्हीति । तस्माद्वचनाद्धेतोरित्यर्थः । नन्वचेतन- यहाँ ‘परमेश्वर (शिव जी) की स्तुतिमात्र वाणी का परम उपादेय है’ इस वाक्यार्थ में श्लेष-सहित शृङ्गाराभास चारुत्व का हेतु है। नायिका के निर्गुण और निरलङ्कार होने पर शृङ्गारपूर्ण नहीं है, (अपितु आभासमात्र है), क्योंकि कहा है ‘उज्ज्वल वेषवाले उत्तम प्रकृति के युवति और युवक होते हैं’। ‘भावाभास’ की अङ्गता, जैसे— वह भगवान् कृष्ण आपकी रक्षा करें, जिसके द्वारा मारे जाने से बचे हुए दैत्य उन (कृष्ण) के सदृश कृष्ण वर्ण के अंजन से रञ्जित, अपनी पत्नियों के लावण्ययुक्त भी नेत्रकमलों से डरते रहते हैं। यहाँ रौद्र प्रकृति वाले दैत्यों का त्रास अनुचित है, (किन्तु) वह भगवान् के प्रभाव के कारण है, इस लिए ‘भावाभास’ है। इसी प्रकार ‘भावप्रशम’ का भी उदाहरण कर लेना चाहिए। ‘मेरी मति है’ इस कथन से जो परमत को सूचित किया है उसका दोष उपन्यस्त करते हैं—अगर—इत्यादि द्वारा। दूसरे का यह आशय है—‘अचेतन पदार्थों का चित्तवृत्ति रूप रसादि सम्भव न होने के कारण, उनके वर्णन में रसवद् अलङ्कार के अनाशङ्क्य होने से रसवद् अलङ्कार से अलग ही उपमादि अलङ्कारों का विषय है।’ इसमें दोष देते हैं—तो—। अर्थात् उस कथन के
२१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः श्चिद्भवितव्यम् । अथ सत्यामपि तस्यां यत्राचेतनानां वाक्यार्थीभावो नासौ रसवदलङ्कारस्य विषय इत्युच्यते । तत् महतः काव्यप्रबन्धस्य रसनिधानभूतस्य नीरसत्वमभिहितं स्यात् । यथा— तरङ्गभ्रूभङ्गा क्षुभितविहगश्रेणिरशना विकर्षन्ती फेनं वसनमिव संरम्भशिथिलम् । यथाविद्धं याति स्खलितमभिसन्धाय बहुशो नदीरूपेणेयं ध्रुवमसहना सा परिणता ॥ चेतन वस्तु-वृत्तान्त की योजना किसी प्रकार होनी चाहिए । अगर यदि उस ( चेतन- वृत्तान्त की योजना ) के होने पर भी जहाँ अचेतनों का वाक्यार्थीभाव है, वहाँ रसवदलङ्कार नहीं हो सकता, ऐसा कहते हैं तो बहुत बड़े एवं रस के निधान रूप काव्य-भाग की नीरसता अभिहित होती है । जैसे— तरंगें जिसकी भ्रूभङ्ग हैं, खलबल पक्षि-समुदाय ( की आवाज ) जिसकी काञ्ची है, रगड़ से ढीले पड़े वस्त्र की भाँति फेन को धारण करती हुई एवं बहुत बार स्खलन को प्राप्त कर कुटिल चाल से चलती हुई वह निश्चय ही नदी के रूप से ( मुझ पर ) कोपवती हो गई है । लोचनम् वर्णनं विषय इत्युक्तमित्याशङ्क्य हेतुमाह—यस्मादिति । यथाकथञ्चिदिति विभावादिरूपतया । तस्यामिति । चेतनवृत्तान्तयोजनायाम् । नीरसत्वमिति । यत्र हि रसस्तत्रावश्यं रसवदलङ्कार इति परमतम् । ततो न रसवदलङ्कारश्चेन्नूनं तत्र रसो नास्तीति परमताभिप्रायान्नीरसत्वमुक्तम् । न त्वस्माकं रसवदलङ्का- राभावे नीरसत्वम्, अपि तु ध्वन्यात्मभूतरसाभावे, तादृक्च रसोऽत्रास्त्येव । तरङ्गेति । तरङ्गा एव भ्रूभङ्गा यस्याः । विकर्षन्ती विलम्बमानं बलादाक्षि- कारण । ‘अचेतन का वर्णन विषय है’ यह आशङ्का करके हेतु कहते हैं—जिस कारण—। जिस किसी प्रकार अर्थात् विभावादि के प्रकार से । ‘उसमें’ अर्थात् चेतन पदार्थ के वृत्तान्त की योजना में । नीरसत्व—। दूसरे का यह मत है कि जहाँ रस है वहाँ अवश्य रसवद् अलङ्कार है । ऐसी स्थिति में जहाँ रसवद् अलङ्कार न हो वह रस नहीं है इस दूसरे के मत के अभिप्राय से ‘नीरसत्व’ कहा गया । लेकिन हमारे मत में रसवद् अलङ्कार के अभाव में ‘नीरसत्व’ नहीं है, अपितु ‘ध्वनि’ के आत्मा रूप रस के अभाव में ( नीरसत्व है ), उस प्रकार का रस यहाँ है ही । तरंगें—तरङ्ग ही हैं भ्रूभङ्ग जिसके । विकर्षण करती हुई फैले हुए को बल-
द्वितीय उद्योतः २१३ ध्वन्यालोकः यथा वा— तन्वी मेघजलार्द्रपल्लवतया धौताधरेवाश्रुभिः शून्येवाभरणैः स्वकालविरहाद्विश्रान्तपुष्पोद्गमा । चिन्ता मौनमिवाश्रिता मधुकृतां शब्दैर्विना लक्ष्यते चण्डी मामवधूय पादपतितं जातानुतापेव सा ॥ अथवा जैसे— कोपनशीला वह तन्वी (उर्वशी) पैरों पर गिरे हुए मुझे झटककर मानों उत्पन्न पश्चात्ताप के मारे मेघ के जल से गीले पल्लव के रूप में आँसुओं से धुले अधरवाली, अपने समय के विगत हो जाने पर फूलों का खिलना बन्द हो जाने के रूप में अपने आभरणों से शून्य की भाँति और भौरों के शब्दों के अभाव के रूप में चिन्ता के कारण मौनभाव को प्राप्त-जैसी (लता के समान) प्रतीत होती है। लोचनम् यन्ती । वसनमंशुकम् । प्रियतमावलम्बननिषेधायेति भावः । बहुशो यत्स्खलितं येऽपराधास्तानभिसन्धाय हृदयैनैकीकृत्यासहमाना मानिनीत्यर्थः । अथ च मद्वियोगपश्चात्तापासहिष्णुस्तापशान्तये नदीभावं गतेति । तन्वीति । वियोगकृशाप्यनुतप्ता चाभरणानि त्यजति । स्वकालो वसन्त- ग्रीष्मप्रायः । उपायचिन्तनार्थं मौनं, किमिति पादपतितमपि दयितमवधूतव- त्यहमिति च चिन्तया मौनम् । चण्डी कोपना । एतौ श्लोकौ नदीलतावर्णनपरौ तात्पर्येण पुरूरवस उन्मादाक्रान्तस्योक्तिरूपौ । पूर्वक धारण करती हुई । वसन अर्थात् अंशुक । प्रियतम के अवलम्बन के निषेध के लिए, यह भाव है । अर्थात् बहुत बार के जो स्खलित हैं, जो अपराध हैं, उन्हें अभिसन्धान करके—हृदय के साथ एक करके सहन न करती हुई मानिनी । और भी, यह कि मेरे वियोगजन्य पश्चात्ताप को न सहन कर पा रही वह ताप की शान्ति के लिए नदी के स्वरूप को प्राप्त हुई । तन्वी—। वियोग से कृश होने के कारण भी और पश्चात्ताप से पीड़ित होने के कारण, आभरणों को छोड़ देती है । अपना समय (स्वकाल) अर्थात् प्रायः वसन्त और ग्रीष्म । उपाय ढूँढ़ने की चिन्ता के लिए मौन, क्योंकर मैंने पैरों पर गिरे प्रिय को झटक दिया (तिरस्कृत किया), इस चिन्ता से मौन । चण्डी अर्थात् कोपना (कोपशीला) । ये दोनों नदी और लता के वर्णन के श्लोक तात्पर्य रूप से उन्माद से आक्रान्त पुरूरवस् की उक्तिरूप हैं ।
२१४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा वा— तेषां गोपवधूविलाससुहृदां राधारहःसाक्षिणां क्षेमं भद्र कलिन्दशैलतनयातीरे लतावेश्मनाम् । विच्छिन्ने स्मरतल्पकल्पनमृदुच्छेदोपयोगेऽधुना ते जाने जरठीभवन्ति विगलन्नीलत्विषः पल्लवाः ॥ अथवा, जैसे— हे भद्र, गोपियों के विलास-सुहृद् और राधा के एकान्त के साक्षी उन यमुना-तट के लतागृहों का कल्याण तो है ! अथवा, अब तो काम-शय्या के निर्माण के लिए कोमल किसलयों के तोड़ने का प्रयोजन न रहने के कारण वे पल्लव श्यामल कान्ति से रहित होकर झर हो जाते होंगे । लोचनम् तेषामिति । हे भद्र ! तेषामिति ये ममैव हृदये स्थितास्तेषाम् । गोपवधूनां गोपीनां ये विलाससुहृदो नर्मसचिवास्तेषाम् । प्रच्छन्नानुरागिणीनां हि नान्यो नर्मसुहृद्भवति । राधायाश्च सातिशयं प्रेमस्थानमित्याह—राधासम्भोगानां ये साक्षाद् द्रष्टारः, कलिन्दशैलतनया यमुना तस्यास्तीरे लतागृहाणां क्षेमं कुशल- मिति काका प्रश्नः । एवं तं पृष्ट्वा गोपदर्शनप्रबुद्धसंस्कार आलम्बनोद्दीपनविभा- वस्मरणात्प्रबुद्धरतिभावमात्मगतमौत्सुक्यगर्भमाह द्वारकागतो भगवान् कृष्णः— स्मरतल्पस्य मदनशय्यायाः कल्पनार्थं मृदु सुकुमारं कृत्वा यश्छेदस्त्रोटनं स एवोपयोगः साफल्यम् । अथ च स्मरतल्पे यत्कल्पनं कॢप्तिः स एव मृदुः सुकुमार उत्कृष्टश्छेदोपयोगस्त्रोटनफलं तस्मिन्र्विच्छिन्ने । मय्यनासीने का स्मरतल्पकल्पनेति भावः । अत एव परस्परानुरागनिश्चयगर्भमेवाह—ते जान हे भद्र—। उन (लतागृहों) का जो मेरे ही हृदय में स्थित हैं, उनका। गोप- बन्धुओं अर्थात् गोपियों के जो विलास-सुहृद् अर्थात् नर्मसचिव, उनका । प्रच्छन्न (लुक-छिप कर) अनुराग करने वालियों का नर्मसुहृद कोई दूसरा नहीं होता । राधा का प्रेम बढ़कर है, अतः कहते हैं—राधा के सम्भोगों को जो साक्षात् देखने वाले हैं, कलिन्दशैलतनया अर्थात् यमुना, उसके तीर पर लतागृहों का क्षेम या कुशल है, यह काकु द्वारा प्रश्न है। इस प्रकार उस (उद्धव) से पूछ कर द्वारका में पहुंचे एवं गोपों के देखने से प्रबुद्ध संस्कारवाले भगवान् कृष्ण ने आलम्बन और उद्दीपन विभाव के स्मरण से अपने में उत्पन्न औत्सुक्य से युक्त प्रबुद्ध रतिभाव को प्रकट करते हैं—स्मरतल्प अर्थात् मदनशय्या का जो कल्पन या निर्माण वही है मृदु या सुकुमार अर्थात् उत्कृष्ट छेदोपयोग अर्थात् तोड़ना रूप फल, उसके विच्छिन्न होने पर । भाव यह कि मेरे न रहते स्मरतल्प का निर्माण कैसा ? अतएव (अपने और
द्वितीय उद्योतः २१५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः इत्येवमादौ विषयेऽचेतनानां वाक्यार्थीभावेऽपि चेतनवस्तुवृत्ता- न्तयोजनास्त्येव । अथ यत्र चेतनवस्तुवृत्तान्तयोजनास्ति तत्र रसादि- रलंकारः । तदेवं सत्युपमादयो निर्विषयाः प्रविरलविषया वा स्युः । यस्मान्नास्त्येवासावचेतनवस्तुवृत्तान्तो यत्र चेतनवस्तुवृत्तान्तयोजना नास्त्यन्ततो विभावत्वेन । तस्मादङ्गत्वेन च रसादीनामलङ्कारता । यः पुनरङ्गी रसो भावो वा सर्वाकारमलङ्कार्यः स ध्वनेरात्मेति ॥ ५ ॥ इत्यादि प्रकार के विषय में अचेतन पदार्थों के वाक्यार्थ (प्रधान) होने पर भी चेतन वस्तु या पदार्थ की योजना है ही। और जहाँ चेतन वस्तु के वृत्तान्त की योजना है वहाँ रसादि अलङ्कार है । ऐसी स्थिति में उपमा आदि अलङ्कारों का कहीं कोई विषय न रह जायगा, अथवा वे कहीं-कहीं पर ही होंगे (सर्वत्र नहीं) । क्योंकि कोई ऐसा अचेतन वस्तु का वृत्तान्त नहीं ही है जहाँ चेतन वस्तु के वृत्तान्त की योजना नहीं है, अन्ततः विभाव रूप में (उसकी योजना बन ही जायगी) । इस लिए अङ्ग होने के कारण रसादि का अलङ्कारत्व माना गया है। जो फिर अङ्गीरस अथवा भाव है, वह सब प्रकार अलङ्कार्य एवं 'ध्वनि' का आत्मा है ॥ ५ ॥ लोचनम् इति । वाक्यार्थस्यात्र कर्मत्वम् । अधुना जरठीभवन्तीति । मयि तु सन्निहितेऽन- वरतकथितोपयोगान्नेमे जराजीर्णताखिलीकारं कदाचिदवाप्नुवन्तीति भावः । विगलन्ती नीला त्विड्येषामित्यनेन कतिपयकालप्रोषितस्याप्यौत्सुक्यनिर्भरत्वं ध्वनितम् । एवमात्मगतेयमुक्तिर्यदि वा गोपं प्रत्येव संप्रधारणोक्तिः । बहुभिरु- दाहरणैर्महतो भूयसः प्रबन्धस्येति यदुक्तं तत्सूचितम् । अथेत्यादि । नीरसत्व- मत्र मा भूदित्यभिप्रायेणेति शेषः । ननु यत्र चेतनवृत्तस्य सर्वथा नानुप्रवेशः स उपमादेर्विषयो भविष्यतीत्याशङ्कयाह-यस्मादित्यादि । अन्तत इति । गोपियों के) परस्पर अनुराग के निश्चय से गर्भित इस प्रकार कहते हैं—वे मैं जानता हूँ—यहाँ वाक्यार्थ का कर्मत्व है। अब झूर हो गए होंगे—। भाव यह कि मेरे सन्निहित रहने पर निरन्तर कहे हुए (तोड़ने के पूर्वोक्त) उपयोग के कारण कभी भी ये पल्लव जर्जर होने से जीर्ण हो जाने की विद्रूपता को कभी भी प्राप्त नहीं करते हैं। विगलित या अपक्रान्त हो रही है नील कान्ति जिनकी, इससे कुछ ही समय से प्रोषित (बाहर गए) उन भगवान् का अतिशय औत्सुक्य ध्वनित होता है । इस प्रकार यह उक्ति अपने प्रति अथवा गोप के प्रति सम्प्रधारणोक्ति है। बहुत उदाहरणों से कि 'महान् या भूयान् प्रबन्ध का' यह कहा है, उसे सूचित किया है । और—इत्यादि । इस अभिप्राय से, कि यहाँ नीरसत्व न हो । यह आशङ्का करके कि जहाँ चेतन-वृत्तान्त का सर्वथा अनुप्रवेश नहीं वह उपमा आदि का विषय होगा, कहते हैं—क्योंकि— इत्यादि । अन्ततः—। जब कि अचेतन भी वर्ण्यभाव स्तम्भ, पुलक आदि अनुभाव के
२१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः किञ्च— तमर्थमवलम्बन्ते येऽङ्गिनं ते गुणाः स्मृताः । अङ्गाश्रितास्त्वलङ्कारा मन्तव्याः कटकादिवत् ॥ ६ ॥ ये तमर्थं रसादिलक्षणमङ्गिनं सन्तमवलम्बन्ते ते गुणाः शौर्यादि- और भी, जो उस अङ्गीरूप अर्थ को अवलम्बन करते हैं, वह 'गुण' कहलाते हैं और कटक आदि की भाँति अङ्गों पर आश्रित रहनेवालों को 'अलङ्कार' मानना चाहिए। जो रसादि रूप उस अङ्गी अर्थ को अवलम्बन करते हैं शौर्य आदि की भाँति वे लोचनम् स्तम्भपुलकाद्यचेतनमपि वर्ण्यमानमनुभावत्वाच्चेतनमाक्षिप्रत्येव तावत्, किमत्रोच्यते । अतिजडोऽपि चन्द्रोद्यानप्रभृतिः स्वविश्रान्तोऽपि वर्ण्यमानोऽ- वश्यं चित्तवृत्तिविभावतां त्यक्त्वा काव्येऽनाख्येय एव स्यात्; शास्त्रेतिहासयो- रपि वा । एवं परमतं दूषयित्वा स्वमतमेव प्रत्याम्नायेनोपसंहरति—तस्मा- दिति । यतः परोक्तो विषयविभागो न युक्त इत्यर्थः । भावो वेति वाग्रहणात्तदा- भासतत्प्रशमादयः । सर्वाकारमिति क्रियाविशेषणम् । तेन सर्वप्रकारमित्यर्थः । अलङ्कार्य इति । अत एव नालङ्कार इति भावः ॥ ५ ॥ अलङ्कार्यव्यतिरिक्तश्चालङ्कारोऽभ्युपगन्तव्यः, लोके तथा सिद्धत्वात्, यथा गुणिद्व्यतिरिक्तो गुणः । गुणालङ्कारव्यवहारश्च गुणिन्यलङ्कार्ये च सति युक्तः । स चास्मत्पक्ष एवोपपन्न इत्यभिप्रायद्वयेनाह—किञ्चेत्यादि । न केवलमेतावद्- युक्तिजातं रसस्याङ्गित्त्वे, यावदन्यदपीति समुच्चयार्थः । कारिकाप्यभिप्रायद्वयेनैव होने के कारण चेतन का आक्षेप कर लेंगे, ऐसी स्थिति में आप क्या उत्तर देंगे ? चन्द्र, उद्यान प्रभृति अत्यन्त जड़ होकर एवं अपने आप में पर्यवसित होकर भी चित्तवृत्ति के विभाव ( उद्दीपक विभाव ) के वैशिष्ट्य को छोड़ कर काव्य में कहने योग्य नहीं ही होगा, शास्त्र और इतिहास में भी यही स्थिति है। इस प्रकार परमत में दोष देकर स्वमत का ही पुनरुक्ति द्वारा उपसंहार करते हैं—इसलिए—। अर्थात् जो कि दूसरे लोगों ने विषय-विभाग किया है, वह ठीक नहीं। अथवा भाव 'अथवा' के ग्रहण से भावाभास, भावप्रशम आदि संगृहीत हैं। 'सर्वाकार' ( सब प्रकार ) यह क्रिया विशेषण है। अर्थात् सब प्रकार । अलङ्कार्य—। भाव यह कि अलङ्कार नहीं ॥ ५ ॥ अलङ्कार को अलङ्कार्य से पृथक् मानना चाहिए, क्योंकि लोक में उस प्रकार सिद्ध है, जैसे गुणी से पृथक् गुण को माना जाता है। गुण और अलङ्कार का व्यवहार भी गुणी अलङ्कार्य के रहने पर ही ठीक है। और वह ( बात ) हमारे पक्ष में ही उपपन्न होती है, इन दोनों अभिप्रायों से कहते हैं—और भी—। ये ही युक्तियां केवल रस के अङ्गी होने में ही नहीं; बल्कि और दूसरी भी सम्भव है; यह समुच्चयार्थ है। कारिका को भी इन दोनों अभिप्रायों से लगाना चाहिए। केवल पहले अभिप्राय में प्रथम
द्वितीय उद्योतः २१७ ध्वन्यालोकः वत्। वाच्यवाचकलक्षणान्यङ्गानि ये पुनस्तदाश्रितास्तेऽलङ्कारा मन्तव्याः कटकादिवत् ॥ ६ ॥ तथा च— शृङ्गार एव मधुरः परः प्रह्लादनो रसः। तन्मयं काव्यमाश्रित्य माधुर्यं प्रतितिष्ठति ॥ ७ ॥ ‘गुण’ हैं। और जो वाच्य-वाचक रूप अङ्गों पर आश्रित होते हैं, वे कटक आदि की भाँति ‘अलङ्कार’ माने जाने चाहिए। और उस प्रकार—शृङ्गार ही मधुर एवं परम आह्लादकारी रस है, तन्मय (शृङ्गारमय) काव्य को आश्रयण करके 'माधुर्य' प्रतिष्ठित होता है ॥ ७ ॥ लोचनम् योज्या। केवलं प्रथमाभिप्राये प्रथमं कारिकार्धं दृष्टान्ताभिप्रायेण व्याख्येयम्। एवं वृत्तिग्रन्थोऽपि योज्यः ॥ ६ ॥ ननु शब्दार्थयोर्माधुर्यादयो गुणाः, तत्कथमुक्तं रसादिकमङ्गिनं गुणा आश्रिता इत्याशङ्क्याह—तथा चेत्यादि। तेन वक्ष्यमाणेन बुद्धिस्थेन परिहार- प्रकारेणोपपद्यते चैतदित्यर्थः। शृङ्गार एवेति। मधुर इत्यत्र हेतुमाह—परः प्रह्लादन इति। रतौ हि समस्तदेवतिर्यङ्नरादिजातिष्वविच्छिन्नैव वासनास्त इति न कश्चित्तत्र तादृग्यो न हृदयसंवादमयः, यतेरपि हि तच्चमत्कारोऽस्त्येव। अत एव मधुर इत्युक्तम्। मधुरो हि शर्करादिरसो विवेकिनोऽविवेकिनो वा स्वस्थस्यातुरस्य वा झटिति रसनानिपतितस्तावदभिलषणीय एव भवति। तन्मयमिति। स शृङ्गार आत्मत्वेन प्रकृतो यत्र व्यङ्ग्यतया। काव्यमिति कारिकार्ध भाग को दृष्टान्त के अभिप्राय से व्याख्या करनी चाहिए। इसी प्रकार वृत्तिग्रन्थ को भी लगाना चाहिए ॥ ६ ॥ जब कि माधुर्य आदि गुण शब्द और अर्थ दोनों के हैं, तब कैसे कहा कि अङ्गी रसादि पर गुण आश्रित होते हैं ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और उस प्रकार—। अर्थात् अभी जो बुद्धि में स्थित परिहार का प्रकार कहने वाले हैं, उससे यह उपपन्न हो जायगा। शृङ्गार ही—। 'मधुर' होने का कारण कहते हैं—परम आह्लादकारी—। क्योंकि रति ( शृङ्गार रस का स्थायी भाव) के सम्बन्ध में सारे देवता, पक्षी, मनुष्य आदि जातियों में वासना अविच्छिन्न रूप से विद्यमान रहती है; इस प्रकार कोई वैसा नहीं जो हृदयसंवाद धारण नहीं करता, क्योंकि यति (साधु-संन्यासी) को भी उस (रति) में चमत्कार (हृदयसंवाद) होता ही है। इसीलिए 'मधुर' यह कहा है। शक्कर आदि का मधुर रस विवेकी अथवा अविवेकी, स्वस्थ और रोगी की जीभ पर पड़ते ही अभिलषणीय हो जाता है। तन्मय—। वह 'शृङ्गार' व्यंग्य होने से आत्मा
२१८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शृङ्गार एव रसान्तरापेक्षया मधुरः प्रह्लादहेतुत्वात् । तत्प्रकाशन- परशब्दार्थतया काव्यस्य स माधुर्यलक्षणो गुणः । श्रव्यत्वं पुनरोज- सोऽपि साधारणमिति ॥ ७ ॥ शृङ्गारे विप्रलम्भाख्ये करुणे च प्रकर्षवत् । माधुर्यमार्द्रतां याति यतस्तत्राधिकं मनः ॥ ८ ॥ शृङ्गार ही दूसरे रसों की अपेक्षा आह्लादक होने के कारण मधुर है । शब्द और अर्थ शृङ्गाररस के प्रकाशन में तत्पर होते हैं अतः (शब्दार्थमय) काव्य का वह 'माधुर्य' रूप गुण है । श्रव्यत्व ओजस् का भी साधारण लक्षण है ॥ ७ ॥ विप्रलम्भ नाम के शृङ्गार में और करुण में माधुर्य प्रकर्षयुक्त होता है, क्योंकि वहाँ मन अधिक आर्द्रभाव प्राप्त करता है ॥ ८ ॥ लोचनम् शब्दार्थावित्यर्थः । प्रतितिष्ठतीति । प्रतिष्ठां गच्छतीति यावत् । एतदुक्तं भवति—वस्तुतो माधुर्यं नाम शृङ्गारादे रसस्यैव गुणः । तन्मधुररसाभिव्यञ्ज- कयोः शब्दार्थयोरुपचरितं मधुरशृङ्गाररसाभिव्यक्तिसामर्थ्यता शब्दार्थयोर्माधुर्य- मिति हि लक्षणम् । तस्माद्युक्तमुक्तं 'तमर्थमि'त्यादि । कारिकार्थं वृत्त्याह— शृङ्गार इति । ननु 'श्रव्यं नातिसमस्तार्थशब्दं मधुरमिष्यते' इति माधुर्यस्य लक्षणम् । नेत्याह—श्रव्यत्वमिति । सर्वं लक्षणमुपलक्षितम् । ओजसोऽपीति । 'यो यः शस्त्रम्' इत्यत्र हि श्रव्यत्वमसमस्तत्वं चास्त्येवेति भावः ॥ ७ ॥ सम्भोगशृङ्गारान्मधुरतरो विप्रलम्भः, ततोऽपि मधुरतमः करुण इति तदभिव्यञ्जनकौशलं शब्दार्थयोर्मधुरतरत्वं मधुरतमत्वं चेत्यभिप्रायेणाह— रूप से जहाँ हो रहा हो । काव्य अर्थात् शब्द और अर्थ । प्रतिष्ठित होता है—प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है । बात यह कही गई—वास्तव में 'माधुर्य' शृङ्गार आदि रस का ही गुण है । वह (माधुर्य) मधुररस के अभिव्यञ्जक शब्द और अर्थ में उपचरित (आरोपित) होता है, फलतः 'शब्द और अर्थ की जो मधुर शृङ्गाररस की अभि- व्यक्ति की सामर्थ्य है, वही माधुर्य है' यह लक्षण है । इसलिए ठीक कहा है 'उस अर्थ को०' इत्यादि । कारिका के अर्थ को वृत्ति से कहते हैं—शृङ्गार—। शङ्का— जैसा कि (भामह ने) 'माधुर्य' का लक्षण किया है 'श्रवणीय और जिसमें शब्द अधिक समासयुक्त अर्थ वाले न हों, वह मधुर' कहलाता है'; यह 'नहीं' यह कहते हैं— श्रव्यत्व—। (इतने से 'मधुर' का) पूरा लक्षण उपलक्षित कर लिया है । ओजस् का भी—। भाव यह है कि 'यो यः शस्त्रं बिभर्ति०' इस (ओजस् के) स्थल में श्रव्यत्व और असमस्तत्व दोनों ही हैं ॥ ७ ॥ सम्भोग शृङ्गार से मधुरतर विप्रलम्भ शृङ्गार है, उससे भी मधुरतम करुण है, उस रस के अभिव्यञ्जन का कौशल शब्द-अर्थ का मधुरतरत्व और दूसरे का मधुरतमत्व
द्वितीय उद्योतः २१९ ध्वन्यालोकः विप्रलम्भशृङ्गारकरुणयोस्तु माधुर्यमेव प्रकर्षवत् । सहृदयहृदया- वर्जनातिशयनिमित्तत्वादिति ॥ ८ ॥ रौद्रादयो रसा दीप्त्या लक्ष्यन्ते काव्यवर्तिनः । तद्व्यक्तिहेतू शब्दार्थावाश्रित्यौजो व्यवस्थितम् ॥ ९ ॥ रौद्रादयो हि रसाः परां दीप्तिमुज्ज्वलतां जनयन्तीति लक्षणया विप्रलम्भ शृङ्गार और करुण में माधुर्य ही प्रकर्षयुक्त होता है, क्योंकि ( वह माधुर्य ) सहृदय के हृदय को खींचने का अतिशय ( उत्कृष्ट ) निमित्त है ॥ ८ ॥ काव्य में रहनेवाले रौद्र आदि रस दीप्ति के कारण लक्षित होते हैं, उस दीप्ति के व्यञ्जक शब्द और अर्थ को आश्रयण करके ओजस् गुण व्यवस्थित है ॥ ९ ॥ रौद्र आदि रस अत्यन्त दीप्ति या उज्ज्वलता को उत्पन्न करते हैं, इसलिए लोचनम् शृङ्गार इत्यादि । करुणे चेति चशब्दः क्रममाह । प्रकर्षवदिति । उत्तरोत्तरं तरतमयोगेनेति भावः । आर्द्रतामिति । सहृदयस्य चेतः स्वाभाविकमनाविष्ट- त्वात्मकं काठिन्यं क्रोधादिदीप्तरूपत्वं विस्मयहासादिरागित्वं च त्यजतीत्यर्थः । अधिकमिति । क्रमेणेत्याशयः । तेन करुणेऽपि सर्वथैव चित्तं द्रवतीत्युक्तं भवति । ननु करुणेऽपि यदि मधुरिमास्ति, तर्हि पूर्वकारिकायां शृङ्गार एवे- त्येवकारः किमर्थः । उच्यते—नानेन रसान्तरं व्यवच्छिद्यते; अपि त्वात्म- भूतस्य रसस्यैव परमार्थतो गुणा माधुर्यादयः, उपचारेण तु शब्दार्थयोरित्येव- कारेण द्योत्यते । वृत्त्यार्थमाह—विप्रलम्भेति ॥ ८ ॥ रौद्रेत्यादि । आदिशब्दः प्रकारे । तेन वीराद्भुतयोरपि ग्रहणम् । दीप्तिः है, इस अभिप्राय से कहते हैं—विप्रलम्भ शृङ्गार०—इत्यादि । और करुण में यहाँ 'और' शब्द क्रम को बताता है । प्रकर्षयुक्त--। भाव यह कि उत्तरोत्तर ज्यादा और ज्यादातर के होने से । आर्द्रभाव--। अर्थात् सहृदय का चित्त स्वाभाविक अनावेश- युक्तता रूप काठिन्य को, क्रोध आदि के कारण दीप्तरूपता को और विस्मय और हास के कारण विक्षेप की स्थिति को छोड़ देता है । अधिक--। 'क्रम से' यह आशय है । इससे यह कहा गया कि करुण में भी सर्वथा ही चित्त पिघल पड़ता है । ( शङ्का करते हैं कि ) यदि करुण में भी मधुरिमा है, तो पहली कारिका में 'शृङ्गार ही' यह 'एव' ( 'ही' ) का प्रयोग किस लिए ? उत्तर में कहते हैं—इस 'एव' के प्रयोग से दूसरे रस का व्यवच्छेद या निराकरण नहीं किया गया है, बल्कि 'एव'कार से द्योतित होता है कि 'माधुर्य' आदि परमार्थ रूप से आत्मभूत रस के ही गुण हैं, केवल उपचार ( आरोप ) से शब्द और अर्थ के भी गुण हो जाते हैं । वृत्ति से अर्थ कहते हैं— विप्रलम्भ० ॥ ८ ॥ रौद्र०—इत्यादि । 'आदि' शब्द 'प्रकार' ( सादृश्य ) के अर्थ में है । इससे वीर
२२० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः त एव दीप्तिरित्युच्यते । तत्प्रकाशनपरः शब्दो दीर्घसमासरचनाल- ङ्कृतं वाक्यम् । यथा— लक्षणा से उन्हें ही 'दीप्ति' कही जाती है । उसका प्रकाशन करनेवाला शब्द दीर्घ समास की रचना से अलङ्कृत वाक्य है । जैसे— लोचनम् प्रतिपत्तृहृदये विकासविस्तारप्रज्वलनस्वभावा । सा च मुख्यतया ओजश्शब्द- वाच्या । तदास्वादमया रौद्राद्याः, तया दीप्त्या आस्वादविशेषात्मिकया कार्य- रूपया लक्ष्यन्ते रसान्तरात्पृथक्तया । तेन कारणे कार्योपचाराद्रौद्रादिरेवौजः- शब्दवाच्यः । ततो लक्षितलक्षणया तत्प्रकाशनपरः शब्दो दीर्घसमासरचन- वाक्यरूपोऽपि दीप्तिरित्युच्यते । यथा 'चञ्चदि'त्यादि । तत्प्रकाशनपरश्चार्थः प्रसन्नैर्गमकैर्वाचकैरभिधीयमानः समासानपेक्ष्यपि दीप्तिरित्युच्यते । यथा— और १अद्भुत का भी ग्रहण है । दीप्ति प्रतिपत्ता या सहृदय के हृदय में विकास, विस्तार और प्रज्वलन की अवस्था को आहित करती है। वह मुख्य रूप से 'ओजस्' शब्द से कही जाती है। रौद्र आदि उस दीप्ति के आस्वाद से युक्त हैं । आस्वाद विशेष एवं कार्य रूप उस दीप्ति से ( वे रौद्र आदि रस ) अन्य रसों से पृथक् रूप में लक्षित होते हैं । इस लिए कारण में कार्य के उपचार से 'रौद्र' आदि ही 'ओजस्' शब्द के वाच्य हैं । इस लिए 'लक्षित लक्षणा' के द्वारा रौद्र आदि का प्रकाशक शब्द दीर्घसमास की रचना का वाक्य रूप होकर भी 'दीप्ति' कहलाता है । जैसे— १. 'रौद्र आदि' में 'आदि' पद को लोचनकार ने प्रकार या सादृश्य के अर्थ में माना है और इससे 'वीर और अद्भुत का भी ग्रहण' किया है। अर्थात् रौद्र के सदृश रस वीर आदि दीप्ति से लक्षित होते हैं। यहाँ 'बालप्रिया' में यह शङ्का उठाई गई है कि जब कि स्वयं लोचनकार क्रोधादि को दीप्ति का जनक लिख कर इसी क्रम में और विस्मय, हास आदि को रागित्व या विक्षेप का जनक बताते हैं, ऐसी स्थिति में दीप्ति के जनक होने के कारण क्रोधादि के 'आदि' शब्द से अद्भुत या विस्मय का ग्रहण हो ही जाता है फिर 'विस्मय' का रागित्व या विक्षेप के जनक के रूप में पुनः उल्लेख करने की आवश्यकता क्या थी ? इससे तो यहीं विदित होता है कि 'क्रोधादि' से 'वीर' को ही ग्रहण किया जा सकता है 'अद्भुत' को नहीं। इस प्रकार प्रस्तुत में भी जब 'लोचन' में 'रौद्रादि' से वीर और अद्भुत के ग्रहण का उल्लेख है तो पूर्व ग्रन्थ से इस ग्रन्थ का विरोध स्पष्ट है, ऐसी स्थिति में प्रस्तुत 'अद्भुत' पद के स्थान में 'बीभत्स' यह पाठ होना चाहिए । किन्तु यहाँ 'दिव्याञ्जना' में मेरे गुरु जी का कहना है कि यहाँ 'अद्भुत' से वीर के विभाव से उत्पन्न 'अद्भुत' के ग्रहण करने पर कोई शङ्का उदित नहीं होगी। २. लक्षितलक्षणा अर्थात् लक्षित में लक्षणा । कुछ लोगों ने लक्षित अर्थ से लक्षणा को 'लक्षित- लक्षणा' माना और कुछ ने शक्यार्थ के परम्परा सम्बन्ध को लक्षितलक्षणा माना है। अस्तु, यहाँ 'ओजस्' शब्द का मुख्य अर्थ है दीप्ति । रौद्रादि से दीप्ति उत्पन्न होती है, इस लिए रौद्र आदि भी 'ओजस्' शब्द से लक्षित होते हैं और इस प्रकार दीर्घ समास की रचना से अलंकृत वाक्य रौद्रादि का
द्वितीय उद्योतः २२१ ध्वन्यालोकः चञ्चद्भुजभ्रमितचण्डगदाभिघात- सञ्चूर्णितोरुयुगलस्य सुयोधनस्य । स्त्यानावबद्धघनशोणितशोणपाणि- रुत्तंसयिष्यति कचांस्तव देवि भीमः ॥ हे देवि, आवर्तन करती हुई दोनों भुजाओं से घुमाई गई प्रचण्ड गदा के अभिघात से सम्यक् प्रकार से चूर्णित ऊरुयुगल वाले सुयोधन के निकल कर जमे हुए घने शोणित से लाल हाथोंवाला भीम तेरे बालों को सँवारेगा । लोचनम् 'यो यः' इत्यादि । चञ्चदिति । चञ्चद्भ्यां वेगादावर्त्तमानाभ्यां भुजाभ्यां भ्रमिता येयं चण्डा दारुणा गदा तया योऽभितः सर्वत ऊर्वोर्घातस्तेन सम्यक् चूर्णितं पुनरनुत्थानोपहतं कृतमूरुयुगलं युगपदेवोरुद्वयं यस्य तं सुयोधनमनादृत्यैव स्त्यानेनाश्यानतया न तु कालान्तरशुष्कतयावबद्धं हस्ताभ्यामविगलद्रूपमत्यन्त- 'माभ्यन्तरतया घनं न तु रसमात्रस्वभावं यच्छोणितं रुधिरं तेन शोणौ लोहितौ पाणी यस्य सः । अत एव स भीमः कातरत्रासदायी । तवेति । यस्यास्तत्तदपमानजातं कृतं देव्यनुचितमपि तस्यास्तव कचानुत्तंसयिष्यत्यु- त्संसवतः करिष्यति, वेणीत्वमपहरन् करविच्युतशोणितशकलैर्लोहितकुसुमा- पीडेनेव योजयिष्यतीत्युत्प्रेक्षा । देवीत्यनेन कुलकलत्रखिलीकारस्मरणकारिणा 'चञ्चत्०' इत्यादि । रौद्र आदि का प्रकाशक अर्थ प्रसन्न एवं बोधक वाचकों द्वारा अभिहित होता हुआ, समास की अपेक्षा न करके भी 'दीप्ति' कहलाता है। जैसे— 'यो यः शस्त्रम्०' इत्यादि । वेग से आवर्तन करती हुई भुजाओं से घुमाई गई जो यह चण्ड गदा, उसके द्वारा सब ओर जो जांघों पर प्रहार है उसके कारण सम्यक् चूर्णित अर्थात् फिर से उठने के नाकाबिल बना दिया एक ही समय ऊरुयुगल है जिसका, उस सुयोधन को अनादर करके ही घनीभूत हो जाने से, न कि कालान्तर में सूख जाने से, बंधा हुआ अर्थात् हाथों से छुड़ाया न जाता हुआ, पकड़ लेने के कारण घना, न कि रस ( द्रव ) रूप जो शोणित या रुधिर उससे लाल हाथ हैं जिसके ऐसा वह । अतएव वह कातर ( डरपोंक ) लोगों को त्रस्त करने वाला भीम । तेरा— । जिस देवी के लिए अनुचित होने पर भी उन-उन अपमानों को किया, उस तेरे बालों को उत्तंसित करेगा—उत्तंसयुक्त करेगा। उत्प्रेक्षा यह है कि एकलट बने हुए बालों को अलग-अलग करके हाथ से टपकते हुए खून के बिन्दुओं के रूप में लाल फूलों के बने आभूषण से मानों युक्त करेगा। कुलांगना के अपकार की याद दिलाने वाले 'देवि' प्रकाशक होता है अतः 'ओजस्' शब्द से वह भी लक्षित होता है। इस प्रकार यहाँ लक्षित में लक्षणा ( लक्षितलक्षणा ) है ।
२२२ | सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्प्रकाशनपरश्चार्थोऽनपेक्षितदीर्घसमासरचनः प्रसन्नवाचका- भिधेयः । यथा— यो यः शस्त्रं बिभर्ति स्वभुजगुरुमदः पाण्डवीनां चमूनां यो यः पाञ्चालगोत्रे शिशुरधिकवया गर्भशय्यां गतो वा । और उस ( ओज ) का प्रकाशक, दीर्घ समास की अपेक्षा न करनेवाला, प्रसन्न ( प्रसाद-युक्त ) वाचकों द्वारा अभिहित अर्थ है, जैसे— पाण्डवी सेनाओं में अपनी भुजाओं पर अधिक गर्व करनेवाला जो-जो ( व्यक्ति ) शस्त्र धारण करता है, पाञ्चाल के गोत्र में जो-जो बड़ा-छोटा अथवा अभी गर्भ में लोचनम् क्रोधस्यैवोद्दीपनविभावत्वं कृतमिति नात्र शृङ्गारशङ्का कर्तव्या । सुयोधनस्य चानादरं द्वितीयगदाघातदानाद्यनुद्यमः । स च सञ्चूर्णितोरुत्वादेव । स्त्यान- ग्रहणेन द्रौपदीमन्युप्रक्षालने त्वरा सूचिता । समासेन च सन्ततवेगवहनस्व- भावात् तावत्येव मध्ये विश्रान्तिमलभमाना चूर्णितोरुद्वयसुयोधनानादरणप- र्यन्ता प्रतीतिरेकत्वेनैव भवतीत्यौद्धत्यस्य परं परिपोषिका । अन्ये तु सुयोध- नस्य सम्बन्धि यत्स्त्यानावबद्धं घनं शोणितं तेन शोणपाणिरिति व्याचक्षते । य इति । स्वभुजयोर्गुरुर्मदो यस्य चमूनां मध्येऽर्जुनादिरित्यर्थः । पाञ्चा- लराजपुत्रेण धृष्टद्युम्नेन द्रोणस्य व्यापादनात्तत्कुलं प्रत्यधिकः क्रोधावेशोऽश्व- त्थाम्नः । तत्कर्मसाक्षीति कर्णप्रभृतिः । रणे सङ्ग्रामे कर्तव्ये यो मयि सद्विपये इस सम्बोधन से क्रोध का ही उद्दीपन विभाव रूप का सम्पादन किया है, ऐसी स्थिति में यहाँ 'शृङ्गार' की शंका नहीं करनी चाहिए । दूसरी बार गदा का आघात देने का उद्योग न करना, यह सुयोधन का अनादर है । वह अनुद्योग उसके ऊरुयुगल के सञ्चूर्णित हो जाने से ही स्पष्ट हो जाता है । 'स्त्यान' ( 'घनीभूत' ) कहने से द्रौपदी के क्रोध के प्रक्षालन में त्वरा सूचित की है । और समास के द्वारा निरन्तर वेग से बहने के स्वभाव के कारण तब तक मध्य में विश्राम न प्राप्त करती हुई, चूर्णित ऊरुयुगल वाले सुयोधन के अनादरण तक पर्यवसित प्रतीति एकरूप से होती है, इस प्रकार वह ( भीम के ) औद्धत्य का पूर्ण रूप से परिपोष करती है। दूसरे लोग व्याख्या करते हैं कि 'सुयोधन का जो स्त्यानावबद्ध ( जोर से निकल कर घनीभूत ), घन ( अर्थात् गाढ़ा ) जो शोणित, उससे लाल हाथ वाला' । पाण्डवी सेनाओं में—सेनाओं के बीच अपनी भुजाओं पर अधिक मद है जिसका, अर्थात् अर्जुन आदि । पाञ्चाल नरेश के पुत्र धृष्टद्युम्न ने द्रोण का वध किया, अतः उसके कुल के प्रति अश्वत्थामा का क्रोधावेश अधिक है । उस ( द्रोणवध रूप ) कर्म के साक्षी, ( आंखों के सामने द्रोण का वध देखने वाले ) कर्ण प्रभृति । मेरे द्वारा कर्तव्य
द्वितीय उद्योतः २२३ ध्वन्यालोकः यो यस्तत्कर्मसाक्षी चरति मयि रणे यश्च यश्च प्रतीपः क्रोधान्धस्तस्य तस्य स्वयमपि जगतामन्तकस्यान्तकोऽहम् ॥ पड़ा है, और जो-जो उस कर्म (द्रोण के वध) का साक्षी है और जो-जो मेरे युद्ध- भूमि में विचरण करते समय विरोधी होगा, उस-उस का क्रोध से अंधा मैं अन्त कर डालूँगा, वह चाहे स्वयं भी सब जगत् का अन्त करनेवाला (यमराज) ही क्यों न हो। लोचनम् प्रतीपं चरति समरविघ्नमाचरति । यद्वा मयि चरति सति सङ्ग्रामे यः प्रतीपं प्रतिकूलं कृत्वास्ते स एवंविधो यदि सकलजगदन्तको भवति तस्याप्यहम- न्तकः किमुतान्यस्य मनुष्यस्य देवस्य वा । अत्र पृथग्भूतैरेव क्रमाद्विमृश्यमा- नैैरथैः पदात्पदं क्रोधः परां धारामाश्रित इत्यसमस्ततैव दीप्तिनिबन्धनम् । एवं माधुर्यदीप्ती परस्परप्रतिद्वन्द्वितया स्थिते शृङ्गारादिरौद्रादिगते इति प्रदर्शयता तत्समावेशवैचित्र्यं हास्यभयानकबीभत्सशान्तेषु दर्शितम् । हास्यस्य शृङ्गा- राङ्गतया माधुर्यं प्रकृष्टं विकासधर्मतया चौजोऽपि प्रकृष्टमिति साम्यं द्वयोः । भयानकस्य भग्नचित्तवृत्तिस्वभावत्वेऽपि विभावस्य दीप्ततया ओजः प्रकृष्टं संग्राम में जो मेरे प्रति प्रतीप आचरण करेगा अर्थात् समर में विघ्न करेगा। अथवा, मेरे संग्राम में विचरण करते समय जो प्रतीप या प्रतिकूल करके रहेगा, ऐसा वह यदि सारे संसार का अन्तक है तो उसका भी मैं अन्तक हूँ, फिर दूसरे मनुष्य या देवता की बात क्या ? यहाँ अलग-अलग हुए ही एवं क्रम से विमृश्यमान अर्थों द्वारा क्रोध एक पद से दूसरे पद में उत्कृष्ट धारा पर आश्रित है (उत्कर्ष पर चढ़ता जाता है), इस प्रकार असमस्त (समास-रहित) होना ही दीप्ति का कारण (निबन्धन) है। इस प्रकार माधुर्य और दीप्ति दोनों एक दूसरे के विरोधी रूप में स्थित हो शृङ्गार आदि और रौद्र आदि रसों में होते हैं, यह दिखाते हुए (ग्रन्थकार ने) उनके समावेश का वैचित्र्य हास्य, भयानक, बीभत्स¹ और शान्त रसों में दिखाया है। विभाग यह है कि हास्य शृङ्गार का अंग है, इस लिए उसमें माधुर्य प्रकृष्ट होता है, एवं विकास- धर्मी होने के कारण ओज भी उसमें प्रकृष्ट होता है, इस प्रकार दोनों का साम्य है। भयानक में चित्तवृत्ति भग्न हो जाती है, फिर भी उसका विभाव दीप्त (ओजस्वी) होता है, अतः ओज प्रकृष्ट है और माधुर्य अल्प । इसी प्रकार बीभत्स में भी। १. 'बालप्रिया' में दोनों स्थानों में 'बीभत्स' के स्थान पर 'अद्भुत' पाठ माना है। क्योंकि 'रौद्रादि' में 'आदि' पद से बीभत्स का परिग्रह हो चुका है, अतः उसमें केवल 'दीप्ति' होती है, माधुर्य नहीं।
ध्वन्यालोकः इत्यादौ द्वयोरोजस्त्वम् ॥ ९ ॥ समर्पकत्वं काव्यस्य यत्तु सर्वरसान् प्रति । स प्रसादो गुणो ज्ञेयः सर्वसाधारणक्रियः ॥ १० ॥ इत्यादि उदाहरणों में दोनों (शब्द और अर्थ) ओजस् गुण से युक्त हैं ॥ ९ ॥ काव्य का सब रसों के प्रति जो समर्पकत्व है, सभी रसों और रचनाओं में साधारण (सामान्य) रूप से अवस्थित उसे 'प्रसाद गुण' समझना चाहिए ॥ १० ॥ लोचनम् माधुर्यमल्पम् । बीभत्सेऽप्येवम् । शान्ते तु विभाववैचित्र्यात्कदाचिदोजः प्रकृष्टं कदाचिन्माधुर्यमिति विभागः ॥ ६ ॥ समर्पकत्वं सम्यगर्पकत्वं हृदयसंवादेन प्रतिपत्तॄन् प्रति स्वात्मावेशेन व्यापा- रकत्वं झटिति शुष्ककाष्ठाग्निदृष्टान्तेन । अकलुषोदकदृष्टान्तेन च तदकालुष्यं प्रसन्नत्वं नाम सर्वरसानां गुणः । उपचारात्तु तथाविधे व्यङ्ग्येऽर्थे यच्छब्दा- र्थयोः समर्पकत्वं तदपि प्रसादः । तमेव व्याचष्टे—प्रसादेति । ननु रसगतो गुणस्तत्कथं शब्दार्थयोः स्वच्छतेत्याशङ्क्याह—स चेति । चशब्दोऽवधारणे । सर्वरससाधारण एव गुणः । स एव च गुण एवंविधः । सर्वा येयं रचना शब्दगता चार्थगता च समस्ता चासमस्ता च तत्र साधारणः । मुख्यतयेति । अर्थस्य तावत्समर्पकत्वं व्यङ्ग्यं प्रत्येव सम्भवति नान्यथा । शब्दस्यापि स्ववाच्यार्पकत्वं नाम कियदलौकिकं येन गुणः स्यादिति भावः । एवं माधुर्यो- जःप्रसादा एव त्रयो गुणा उपपन्ना भामहाभिप्रायेण । ते च प्रतिपत्त्रास्वाद- शान्त में विभाव के वैचित्र्य से कभी ओज प्रकृष्ट होता है तो कभी माधुर्य ॥ ९ ॥ समर्पकत्व अर्थात् सम्यक् प्रकार से अर्पणकर्तृत्व; जिस प्रकार सूखे काठ में आग झट से व्याप्त हो जाती है उसी प्रकार हृदय के एक-रूप होने (हृदयसंवाद) के कारण जानकारों (प्रतिपत्ताओं) के प्रति (अर्थात् उनके हृदयों को) स्वस्वरूप से व्याप्त कर लेना (अथवा), जिस प्रकार कालुष्यरहित (स्वच्छ) वस्त्र को झट से जल व्याप्त कर लेता है, इस ढंग से वह अकालुष्य प्रसन्नत्व (प्रसाद) सभी रसों का गुण है। उपचार (लक्षणा) से, उस प्रकार के (रस रूप) व्यंग्य अर्थ के सम्बन्ध में भी जो शब्द और अर्थ का 'समर्पकत्व' है, वह भी 'प्रसाद' है। उसी की व्याख्या करते हैं—प्रसाद—। जब कि गुण रसगत धर्म है तब शब्द और अर्थ की स्वच्छता कैसे ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और वह—। 'और' शब्द अवधारणार्थक है; सभी रसों में साधारण रूप से ही रहने वाला गुण है और वही गुण इस प्रकार का है। शब्दगत और अर्थगत एवं समस्त और असमस्त इन सब प्रकार की रचनाओं में साधारण रूप से रहने वाला है। मुख्य रूप से—। भाव यह कि अर्थ का समर्पकत्व व्यंग्य के प्रति ही सम्भव होगा, अन्यथा नहीं; शब्द का भी अपने वाच्य का अर्पकत्व कितना अलौकिक है जिससे गुण माना जाय ? इस प्रकार भामह के अभिप्राय से माधुर्य,
द्वितीय उद्योतः २२५ ध्वन्यालोकः प्रसादस्तु स्वच्छता शब्दार्थयोः । स च सर्वरससाधारणो गुणः सर्वरचनासाधारणश्च व्यङ्ग्यार्थापेक्षयैव मुख्यतया व्यवस्थितो मन्तव्यः । श्रुतिदुष्टादयो दोषा अनित्या ये च दर्शिताः । ध्वन्यात्मन्येव शृङ्गारे ते हेया इत्युदाहृताः ॥ ११ ॥ प्रसाद शब्द और अर्थ की स्वच्छता है, और वह सभी रसों और रचनाओं में सामान्य रूप से रहनेवाला एवं मुख्य रूप से व्यङ्ग्य अर्थ की अपेक्षा से ही ( उसके ही समर्पक रूप में ) व्यवस्थित मानना चाहिए ॥ १० ॥ जो श्रुतिदुष्ट आदि अनित्य दोष दिखाए गए हैं वे ध्वनिरूप शृङ्गार में ही त्याज्य कहे गए हैं ॥ ११ ॥ लोचनम् मया मुख्यतया तत आस्वाद्ये उपचरिता रसे ततस्तद्व्यञ्जकयोः शब्दार्थयोरिति तात्पर्यम् ॥ १० ॥ एवमस्मत्पक्ष एव गुणालङ्कारव्यवहारो विभागेनोपपद्यत इति प्रदर्श्य नित्यानित्यदोषविभागोऽप्यस्मत्पक्ष एव सङ्गच्छत इति दर्शयितुमाह- श्रुतिदुष्टादय इत्यादि। वान्तादयोऽसभ्यस्मृतिहेतवः। श्रुतिदुष्टा अर्थदुष्टा वाक्यार्थ- बलादश्लीलार्थप्रतिपत्तिकारिणः । यथा- 'छिन्द्रान्वेषी महांस्तब्धो घातायैवोप- ओज, प्रसाद ये १तीन ही गुण हैं। वे मुख्य रूप से प्रतिपत्ता ( जानकार अर्थात् सहृदय ) के आस्वाद स्वरूप हैं तब लक्षण से आस्वाद्य रस में उपचरित हैं, तब उस ( रस ) के व्यञ्जक शब्द और अर्थ में उपचरित हैं, यह तात्पर्य है ॥ १० ॥ इस प्रकार हमारे पक्ष में ही गुण और अलंकार का व्यवहार विभागपूर्वक बनता है, यह बताकर दोषों का नित्यानित्य-विभाग भी हमारे पक्ष में ही सङ्गत होता है, यह दिखाने के लिए कहते हैं - जो श्रुतिदुष्ट आदि इत्यादि । 'वान्त' ( उगला हुआ ) आदि असभ्य स्मृति को उत्पन्न करने वाले । श्रुतिदुष्ट और वाक्यार्थ के बल से अश्लील अर्थ की प्रतीति कराने वाले अर्थदुष्ट; जैसे- 'बड़ा स्तब्ध और छिद्र का अन्वेषण करने वाला, घात ही के लिए पहुँच जाता है'। दो पदों की कल्पना से 'कल्पनादुष्ट' होते १. गुण और अलङ्कार का भेद, एवं गुण के भेद के सम्बन्ध में विचार साहित्य-शास्त्र का मुख्य प्रकरण है। ध्वन्यालोक और लोचन के अनुसार इन तीनों का विचार हो चुका। काव्यप्रकाश, साहित्य-दर्पण आदि परवर्ती ग्रन्थों में ध्वन्यालोक-लोचन के ही विचारों का अनुसरण हुआ है। गुण और अलङ्कार का भेद करते हुए 'वामन' ने कहा है- 'काव्यशोभायाः कर्तारो धर्मा गुणाः, तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः, अर्थात् काव्य की शोभा को उत्पन्न करने वाले धर्म गुण हैं और शोभा की वृद्धि करने वाले धर्म अलङ्कार हैं। 'काव्यप्रकाश' में इसका खण्डन मिलता है। और, भट्ट उद्भट ने तो गुण और अलङ्कार का कोई भेद ही नहीं माना है, उनके अनुसार ओजस् प्रभृति १५ ध्व०
२२६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अनित्या दोषाश्च ये श्रुतिदुष्टादयः सूचितास्तेऽपि न वाच्ये अर्थ- मात्रे, न च व्यङ्ग्ये शृङ्गारव्यतिरेकिणि शृङ्गारे वा ध्वनेरनात्मभूते । किं तर्हि ? ध्वन्यात्मन्येव शृङ्गारेऽङ्गितया व्यङ्ग्ये ते हेया इत्युदाहृताः । अन्यथा हि तेषामनित्यदोषतैव न स्यात् । एवमयमसंलक्ष्यक्रमद्योतो ध्वनेरात्मा प्रदर्शितः सामान्येन ॥ ११ ॥ अनित्य दोष जो श्रुतिदुष्ट आदि सूचित किए गए हैं वे भी न अर्थमात्र वाच्य में और न शृङ्गाररहित व्यङ्ग्य में अथवा न ध्वनि के अनात्मभूत शृङ्गार में होते हैं । तब क्या होते हैं ? अङ्गीरूप व्यङ्ग्य ध्वन्यात्मा शृङ्गार में ही वे त्याज्य कहे गए हैं। ऐसा न माना जाय तो उनका अनित्य दोष होना ही नहीं बनेगा । इस प्रकार सामान्य रूप से यह असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रूप ध्वनि का आत्मा बताया गया ॥ ११ ॥ लोचनम् सर्पति' इति । कल्पनादुष्टास्तु द्वयोः पदयोः कल्पनया । यथा 'कुरु रुचिम्' इत्यत्र क्रमव्यत्यासे । श्रुतिकष्टस्तु अधाक्षीत् अक्षोत्सीत् तृणेढि इत्यादि । शृङ्गार इत्युचितरसोपलक्षणार्थम् । वीरशान्ताद्भुतादावपि तेषां वर्जनात् । सूचिता इति । न त्वेषां विषयविभागप्रदर्शनेनानित्यत्वं भिन्नवृत्तादिदोषेभ्यो विविक्तं प्रदर्शितम्। नापि गुणेभ्यो व्यतिरिक्तत्वम् । बीभत्सहास्यरौद्रादौ त्वेषामस्माभिरुपगमात् शृङ्गारादौ च वर्जनादनित्यत्वं च दोषत्वं च समर्थितमेवेति भावः ॥ ११ ॥ हैं, जैसे 'कुरु रुचिम्' इस क्रम को बदल देने पर । 'श्रुतिकष्ट' है, 'अधाक्षीत्' 'अक्षोत्सीत्', 'तृणेढि' इत्यादि । उचित रस के उपलक्षण के लिए 'शृङ्गार' का प्रयोग किया है । वीर, शान्त, अद्भुत आदि रसों में भी उन (दोषों) का वर्जन है । सूचित—। न कि विषय-विभाग दिखाने से इन के अनित्यत्व को भिन्नवृत्त आदि दोषों से अलग दिखाया गया है । और न कि इनका गुणों से व्यतिरिक्तत्व भी बताया है । बीभत्स, हास्य और रौद्र आदि में इन दोषों को हमने स्वीकार किया है और शृङ्गार आदि में इनका वर्जन किया है, अतः इनके अनित्यत्व और दोषत्व का समर्थन ही किया है ॥ ११ ॥
गुण और अनुप्रासादि अलङ्कार दोनों ही समवाय सम्बन्ध से रहते हैं। लौकिक गुण और अलङ्कार में भेद अवश्य है, किन्तु काव्य के गुण और अलङ्कार में भेद की कल्पना गड्डुलिका-प्रवाह (भेड़चाल) है। आलोक और लोचन में गुण को रसनिष्ठ धर्म एवं अलङ्कार को शब्द-अर्थनिष्ठ धर्म माना है, इस प्रकार आश्रयभेद से भेद है। प्रस्तुत ग्रन्थ में माधुर्य, ओजस् और प्रसाद ये तीन ही गुण माने हैं। जो कि प्राचीन ग्रन्थों में दस शब्द-गुण और दस अर्थ-गुणों का उल्लेख मिलता है उसका अन्तर्भाव, जैसा कि 'काव्यप्रकाश' में बताया गया है इन्हीं तीन गुणों में हो जाता है। यह विषय 'काव्य-प्रकाश' (अष्टम उल्लास) से विदित कर लेना चाहिए ।
द्वितीय उद्योतः २२७ ध्वन्यालोकः तस्याङ्गानां प्रभेदा ये प्रभेदाः स्वगताश्च ये । तेषामा build... तेषामानन्त्यमन्योन्यसम्बन्धपरिकल्पने ॥ १२ ॥ अङ्गितया व्यङ्ग्यो रसादिर्विवक्षितान्यपरवाच्यस्य ध्वनेरेक आत्मा य उक्तस्तस्याङ्गानां वाच्यवाचकानुपातिनामलङ्काराणां ये प्रभेदा निर- वधयो ये च स्वगतास्तस्याङ्गिनोऽर्थस्य रसभावतदाभासतत्प्रशमलक्षणा विभावा Vig... विभावानुभावव्यभिचारिप्रतिपादनसहिता अनन्ताः स्वाश्रयापेक्षया उसके अङ्गों के जो प्रभेद हैं और जो स्वगत प्रभेद हैं, परस्पर सम्बन्ध की परि- कल्पना करने पर उनका आनन्त्य हो जायगा ॥ १२ ॥ अङ्गी होने के कारण व्यंग्य जो रसादि विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का एक आत्मा कहा गया है, उसके वाच्य-वाचक के कारण होनेवाले अङ्गों के जो अनन्त प्रभेद हैं और जो स्वगत प्रभेद हैं उस अङ्गी रूप अर्थ के रस, भाव, रसाभास, भावा- भास, भावप्रशम रूप विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी के प्रतिपादन के साथ अनन्त, लोचनम् अङ्गानामित्यलङ्काराणाम् । स्वगता इति । आत्मगताः सम्भोगविप्रल- म्भाद्या आत्मीयगता विभावादिगतास्तेषां लोष्टप्रस्तारेणाङ्गाङ्गिभावे का गण- नेति भावः । स्वाश्रयः स्त्रीपुंसप्रकृत्यौचित्यादिः । परस्परं प्रेम्णा दर्शनमित्यु- पलक्षणं सम्भाषणादेरपि । सुरतं चातुःषष्टिकमालिङ्गनादि । विहरणमुद्यान- गमनम् । आदिग्रहणेन जलक्रीडापानकचन्द्रोदयक्रीडादि । अभिलापविप्रलम्भो द्वयोरप्यन्योन्यजीवितसर्वस्वाभिमानात्मिकायां रतावुत्पन्नायामपि कुतश्चिद्धेतो- अङ्गों के अर्थात् अलङ्कारों के । स्वगत—। अर्थात् आत्मगत, सम्भोग, विप्रलम्भ आदि आत्मीयगत, विभावादिगत । भाव यह कि इनके लोष्टप्रस्तार से अङ्गाङ्गिभाव की कल्पना करने पर कोई गणना नहीं। स्वाश्रय (अपना आश्रय), अर्थात् स्त्री, पुरुष की प्रकृति का औचित्य आदि। परस्पर प्रेम से दर्शन; यह सम्भाषण आदि का उपलक्षण है। आलिङ्गन आदि १चौंसठ प्रकार का सुरत । विहरण अर्थात् उद्यानगमन । 'आदि' ग्रहण से जलक्रीडा, पानक, चन्द्रोदयक्रीडा आदि । दोनों (नायक और नायिका) के एक-दूसरे को अपना जीवितसर्वस्व के अभिमान रूप रति के उत्पन्न हो जाने पर भी किसी कारणवश समागम के प्राप्त न होने पर 'अभिलाषविप्रलम्भ' १. वात्स्यायन के 'कामसूत्र' में ६४ प्रकार के सुरत का वर्णन है—आलिङ्गनचुम्बननखच्छेद- दशनच्छेदसंवेशनसीत्कृतपुरुषायितौपरिष्टकानामष्टानामष्टधा विकल्पभेदादष्टावष्टकाश्चतुष्षष्टिरिति वा- भ्रवीयाः' (२. २. ४) । ये आलिङ्गन आदि आठ अपने-अपने आठ-आठ प्रभेदों के द्वारा सब मिल कर ६४ प्रकार के होते हैं। प्रत्येक का कामसूत्र में लक्षण भी निर्दिष्ट है।
२२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः निःसीमानो विशेषास्तेषामन्योन्यसम्बन्धपरिकल्पने क्रियमाणे कस्यचिद्- न्यतमस्यापि रसस्य प्रकाराः परिसङ्ख्यातुं न शक्यन्ते किमुत सर्वेषाम् । तथा हि शृङ्गारस्याङ्गिनस्तावदाद्यौ द्वौ भेदौ-सम्भोगो विप्रलम्भश्च । सम्भोगस्य च परस्परप्रेमदर्शनसुरतविहरणादिलक्षणाः प्रकाराः । विप्रलम्भस्याप्यभिलाषेर्ष्याविरहप्रवासविप्रलम्भादयः । तेषां च प्रत्येकं अपने आश्रय की अपेक्षा निःसीम विशेष हैं, उनके परस्पर सम्बन्ध की कल्पना करने पर किसी एक भी रस के प्रकार गिनाये नहीं जा सकते, सबों की तो बात क्या ? जैसा कि अङ्गी शृङ्गार के पहले दो भेद हैं—सम्भोग और विप्रलम्भ । सम्भोग के परस्पर प्रेम से दर्शन, सुरत, विहरण आदि रूप प्रकार हैं। विप्रलम्भ के भी अभि- लाष, ईर्ष्या, विरह, प्रवास, विप्रलम्भ आदि (प्रकार) हैं। विभाव, अनुभाव, लोचनम् रप्राप्तसमागमत्वे मन्तव्यः । यथा 'सुखयतीति किमुच्यत' इत्यतः प्रभृति वत्सराजरत्नावत्योः, न तु पूर्वं रत्नावल्याः । तदा हि रत्यभावे कामावस्थामात्रं तत् । ईर्ष्याविप्रलम्भः प्रणयखण्डनादिना खण्डितया सह । विरहविप्रलम्भः पुनः खण्डितया प्रसाद्यमानयापि प्रसादमगृह्णन्त्या ततः पश्चात्तापपरीतत्वेन विरहोत्कण्ठितया सह मन्तव्यः । प्रवासविप्रलम्भः प्रोषितभर्तृकया सहेति विभागः । आदिग्रहणाच्छापादिकृतः, विप्रलम्भ इव च विप्रलम्भः। वञ्च- नायां ह्यभिलषितो विषयो न लभ्यते; एवमत्र । तेषां चेति । एकत्र सम्भोगा- दीनामपरत्र विभावादीनाम् । आश्रयो मलयादिः मारुतादीनां विभावाना- मिति यदुच्यते तद्देशशब्देन गतार्थम् । तस्मादाश्रयः कारणम् । यथा ममैव— माना जाना चाहिए। जैसे, 'सुखयतीति किमुच्यते' इससे लेकर वत्सराज और रत्नावली का, न कि पहले रत्नावली का। क्योंकि उस समय रति नहीं है, वह सिर्फ कामावस्था है। खण्डिता नायिका के साथ प्रणय के खण्डन आदि से 'ईर्ष्याविप्रलम्भ' है । 'खण्डिता' अवस्था में प्रसन्न करने की चेष्टा करने पर भी प्रसन्न न होती हुई, उसके कारण पश्चात्ताप में पड़ी होने से 'विरहोत्कण्ठिता' नायिका के साथ 'विरहविप्रलम्भ' मान जाना चाहिए। 'प्रोषितभर्तृका' नायिका के साथ 'प्रवासविप्रलम्भ' होता है, यह (इनका) विभाग है। आदि ग्रहण से शाप आदि द्वारा किया हुआ। विप्रलम्भ के समान विप्रलम्भ है, क्योंकि वञ्चना में अभिलषित विषय प्राप्त नहीं होता, इसी प्रकार यहाँ (अभिलषित विषय प्राप्त नहीं होता, अतः वञ्चनार्थक 'विप्रलम्भ' शब्द का प्रयोग किया है)। उनका—। एकत्र सम्भोग आदि का, अपरत्र विभाव आदि का। मारुत आदि विभावों का आश्रय मलय आदि जो कहा है वह 'देश' शब्द से गतार्थ है। इसलिए आश्रय अर्थात् कारण। जैसा कि मेरा ही—
द्वितीय उद्योतः २२९ ध्वन्यालोकः विभावानुभावव्यभिचारिभेदः । तेषां च देशकालाद्याश्रयावस्थाभेद इति स्वगतभेदापेक्षयैकस्य तस्यापरिमेयत्वम्, किं पुनरङ्गप्रभेदकल्प- नायाम् । ते ह्यङ्गप्रभेदाः प्रत्येकमङ्गिप्रभेदसम्बन्धपरिकल्पने क्रियमाणे सत्यानन्त्यमेवोपयान्ति ॥ १२ ॥ दिङ्मात्रं तूच्यते येन व्युत्पन्नानां सचेतसाम् । बुद्धिरासादितालोका सर्वत्रैव भविष्यति ॥ १३ ॥ व्यभिचारी के अनुसार उनका अलग-अलग भेद है । उनका भी देश, काल आदि आश्रय एवं अवस्था के अनुसार भेद है, इस प्रकार स्वगत भेद की अपेक्षा से ही उसका एक ( भेद ) अपरिमेय हो जाता है, फिर अङ्गों के प्रभेद की कल्पना की बात क्या ? अङ्गों के वे प्रभेद अलग-अलग अङ्गी के प्रभेदों के सम्बन्ध की कल्पना की जाने पर आनन्त्य ही को प्राप्त करते हैं ॥ १२ ॥ केवल दिङ्मात्र कहते हैं, जिससे व्युत्पन्न सचेतस जनों की बुद्धि सर्वत्र ही प्राप्तालोक हो जायगी ॥ १३ ॥ लोचनम् दयितया ग्रथिता स्रगियं मया हृदयधामनि नित्यनियोजिता । गलति शुष्कतयापि सुधारसं विरहदाहरुजां परिहारकम् ॥ तस्येति शृङ्गारस्य। अङ्गिनां रसादीनां प्रभेदस्तत्सम्बन्धकल्पनेत्यर्थः ॥१२॥ येनेति । दिङ्मात्रोक्तेनेत्यर्थः । सचेतसामिति । महाकवित्वं सहृदयत्वं च प्रेप्सूनामिति भावः । सर्वत्रेति । सर्वेषु रसादिष्वासादित आलोकोऽवगमः सम्यग्व्युत्पत्तिर्ययेति सम्बन्धः ॥ १३ ॥ प्रिया के द्वारा गूथी गई इस माला को मैंने अपने हृदय पर रख लिया है, ( विरह- ताप के कारण ) यह सूख जाने पर भी विरह के दाह को दूर करने वाले सुधारस को स्रावित कर रही है । उसका शृङ्गार का ! अङ्गी रस आदि का प्रभेद अर्थात् उनके सम्बन्ध की कल्पना ॥ १२ ॥ जिससे—अर्थात् 'दिङ्मात्र' कहने से । सचेतस जनों की—। भाव यह कि महा- कवित्व और सहृदयत्व प्राप्त करने की इच्छा वालों की । सर्वत्र—। सभी रसों में प्राप्त किया है आलोक या अवगम अर्थात् सम्यक् व्युत्पत्ति को जिसने ॥ १३ ॥