भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

२२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः निःसीमानो विशेषास्तेषामन्योन्यसम्बन्धपरिकल्पने क्रियमाणे कस्यचिद्- न्यतमस्यापि रसस्य प्रकाराः परिसङ्ख्यातुं न शक्यन्ते किमुत सर्वेषाम् । तथा हि शृङ्गारस्याङ्गिनस्तावदाद्यौ द्वौ भेदौ-सम्भोगो विप्रलम्भश्च । सम्भोगस्य च परस्परप्रेमदर्शनसुरतविहरणादिलक्षणाः प्रकाराः । विप्रलम्भस्याप्यभिलाषेर्ष्याविरहप्रवासविप्रलम्भादयः । तेषां च प्रत्येकं अपने आश्रय की अपेक्षा निःसीम विशेष हैं, उनके परस्पर सम्बन्ध की कल्पना करने पर किसी एक भी रस के प्रकार गिनाये नहीं जा सकते, सबों की तो बात क्या ? जैसा कि अङ्गी शृङ्गार के पहले दो भेद हैं—सम्भोग और विप्रलम्भ । सम्भोग के परस्पर प्रेम से दर्शन, सुरत, विहरण आदि रूप प्रकार हैं। विप्रलम्भ के भी अभि- लाष, ईर्ष्या, विरह, प्रवास, विप्रलम्भ आदि (प्रकार) हैं। विभाव, अनुभाव, लोचनम् रप्राप्तसमागमत्वे मन्तव्यः । यथा 'सुखयतीति किमुच्यत' इत्यतः प्रभृति वत्सराजरत्नावत्योः, न तु पूर्वं रत्नावल्याः । तदा हि रत्यभावे कामावस्थामात्रं तत् । ईर्ष्याविप्रलम्भः प्रणयखण्डनादिना खण्डितया सह । विरहविप्रलम्भः पुनः खण्डितया प्रसाद्यमानयापि प्रसादमगृह्णन्त्या ततः पश्चात्तापपरीतत्वेन विरहोत्कण्ठितया सह मन्तव्यः । प्रवासविप्रलम्भः प्रोषितभर्तृकया सहेति विभागः । आदिग्रहणाच्छापादिकृतः, विप्रलम्भ इव च विप्रलम्भः। वञ्च- नायां ह्यभिलषितो विषयो न लभ्यते; एवमत्र । तेषां चेति । एकत्र सम्भोगा- दीनामपरत्र विभावादीनाम् । आश्रयो मलयादिः मारुतादीनां विभावाना- मिति यदुच्यते तद्देशशब्देन गतार्थम् । तस्मादाश्रयः कारणम् । यथा ममैव— माना जाना चाहिए। जैसे, 'सुखयतीति किमुच्यते' इससे लेकर वत्सराज और रत्नावली का, न कि पहले रत्नावली का। क्योंकि उस समय रति नहीं है, वह सिर्फ कामावस्था है। खण्डिता नायिका के साथ प्रणय के खण्डन आदि से 'ईर्ष्याविप्रलम्भ' है । 'खण्डिता' अवस्था में प्रसन्न करने की चेष्टा करने पर भी प्रसन्न न होती हुई, उसके कारण पश्चात्ताप में पड़ी होने से 'विरहोत्कण्ठिता' नायिका के साथ 'विरहविप्रलम्भ' मान जाना चाहिए। 'प्रोषितभर्तृका' नायिका के साथ 'प्रवासविप्रलम्भ' होता है, यह (इनका) विभाग है। आदि ग्रहण से शाप आदि द्वारा किया हुआ। विप्रलम्भ के समान विप्रलम्भ है, क्योंकि वञ्चना में अभिलषित विषय प्राप्त नहीं होता, इसी प्रकार यहाँ (अभिलषित विषय प्राप्त नहीं होता, अतः वञ्चनार्थक 'विप्रलम्भ' शब्द का प्रयोग किया है)। उनका—। एकत्र सम्भोग आदि का, अपरत्र विभाव आदि का। मारुत आदि विभावों का आश्रय मलय आदि जो कहा है वह 'देश' शब्द से गतार्थ है। इसलिए आश्रय अर्थात् कारण। जैसा कि मेरा ही—