ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २२७ ध्वन्यालोकः तस्याङ्गानां प्रभेदा ये प्रभेदाः स्वगताश्च ये । तेषामा build... तेषामानन्त्यमन्योन्यसम्बन्धपरिकल्पने ॥ १२ ॥ अङ्गितया व्यङ्ग्यो रसादिर्विवक्षितान्यपरवाच्यस्य ध्वनेरेक आत्मा य उक्तस्तस्याङ्गानां वाच्यवाचकानुपातिनामलङ्काराणां ये प्रभेदा निर- वधयो ये च स्वगतास्तस्याङ्गिनोऽर्थस्य रसभावतदाभासतत्प्रशमलक्षणा विभावा Vig... विभावानुभावव्यभिचारिप्रतिपादनसहिता अनन्ताः स्वाश्रयापेक्षया उसके अङ्गों के जो प्रभेद हैं और जो स्वगत प्रभेद हैं, परस्पर सम्बन्ध की परि- कल्पना करने पर उनका आनन्त्य हो जायगा ॥ १२ ॥ अङ्गी होने के कारण व्यंग्य जो रसादि विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का एक आत्मा कहा गया है, उसके वाच्य-वाचक के कारण होनेवाले अङ्गों के जो अनन्त प्रभेद हैं और जो स्वगत प्रभेद हैं उस अङ्गी रूप अर्थ के रस, भाव, रसाभास, भावा- भास, भावप्रशम रूप विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी के प्रतिपादन के साथ अनन्त, लोचनम् अङ्गानामित्यलङ्काराणाम् । स्वगता इति । आत्मगताः सम्भोगविप्रल- म्भाद्या आत्मीयगता विभावादिगतास्तेषां लोष्टप्रस्तारेणाङ्गाङ्गिभावे का गण- नेति भावः । स्वाश्रयः स्त्रीपुंसप्रकृत्यौचित्यादिः । परस्परं प्रेम्णा दर्शनमित्यु- पलक्षणं सम्भाषणादेरपि । सुरतं चातुःषष्टिकमालिङ्गनादि । विहरणमुद्यान- गमनम् । आदिग्रहणेन जलक्रीडापानकचन्द्रोदयक्रीडादि । अभिलापविप्रलम्भो द्वयोरप्यन्योन्यजीवितसर्वस्वाभिमानात्मिकायां रतावुत्पन्नायामपि कुतश्चिद्धेतो- अङ्गों के अर्थात् अलङ्कारों के । स्वगत—। अर्थात् आत्मगत, सम्भोग, विप्रलम्भ आदि आत्मीयगत, विभावादिगत । भाव यह कि इनके लोष्टप्रस्तार से अङ्गाङ्गिभाव की कल्पना करने पर कोई गणना नहीं। स्वाश्रय (अपना आश्रय), अर्थात् स्त्री, पुरुष की प्रकृति का औचित्य आदि। परस्पर प्रेम से दर्शन; यह सम्भाषण आदि का उपलक्षण है। आलिङ्गन आदि १चौंसठ प्रकार का सुरत । विहरण अर्थात् उद्यानगमन । 'आदि' ग्रहण से जलक्रीडा, पानक, चन्द्रोदयक्रीडा आदि । दोनों (नायक और नायिका) के एक-दूसरे को अपना जीवितसर्वस्व के अभिमान रूप रति के उत्पन्न हो जाने पर भी किसी कारणवश समागम के प्राप्त न होने पर 'अभिलाषविप्रलम्भ' १. वात्स्यायन के 'कामसूत्र' में ६४ प्रकार के सुरत का वर्णन है—आलिङ्गनचुम्बननखच्छेद- दशनच्छेदसंवेशनसीत्कृतपुरुषायितौपरिष्टकानामष्टानामष्टधा विकल्पभेदादष्टावष्टकाश्चतुष्षष्टिरिति वा- भ्रवीयाः' (२. २. ४) । ये आलिङ्गन आदि आठ अपने-अपने आठ-आठ प्रभेदों के द्वारा सब मिल कर ६४ प्रकार के होते हैं। प्रत्येक का कामसूत्र में लक्षण भी निर्दिष्ट है।