ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अनित्या दोषाश्च ये श्रुतिदुष्टादयः सूचितास्तेऽपि न वाच्ये अर्थ- मात्रे, न च व्यङ्ग्ये शृङ्गारव्यतिरेकिणि शृङ्गारे वा ध्वनेरनात्मभूते । किं तर्हि ? ध्वन्यात्मन्येव शृङ्गारेऽङ्गितया व्यङ्ग्ये ते हेया इत्युदाहृताः । अन्यथा हि तेषामनित्यदोषतैव न स्यात् । एवमयमसंलक्ष्यक्रमद्योतो ध्वनेरात्मा प्रदर्शितः सामान्येन ॥ ११ ॥ अनित्य दोष जो श्रुतिदुष्ट आदि सूचित किए गए हैं वे भी न अर्थमात्र वाच्य में और न शृङ्गाररहित व्यङ्ग्य में अथवा न ध्वनि के अनात्मभूत शृङ्गार में होते हैं । तब क्या होते हैं ? अङ्गीरूप व्यङ्ग्य ध्वन्यात्मा शृङ्गार में ही वे त्याज्य कहे गए हैं। ऐसा न माना जाय तो उनका अनित्य दोष होना ही नहीं बनेगा । इस प्रकार सामान्य रूप से यह असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रूप ध्वनि का आत्मा बताया गया ॥ ११ ॥ लोचनम् सर्पति' इति । कल्पनादुष्टास्तु द्वयोः पदयोः कल्पनया । यथा 'कुरु रुचिम्' इत्यत्र क्रमव्यत्यासे । श्रुतिकष्टस्तु अधाक्षीत् अक्षोत्सीत् तृणेढि इत्यादि । शृङ्गार इत्युचितरसोपलक्षणार्थम् । वीरशान्ताद्भुतादावपि तेषां वर्जनात् । सूचिता इति । न त्वेषां विषयविभागप्रदर्शनेनानित्यत्वं भिन्नवृत्तादिदोषेभ्यो विविक्तं प्रदर्शितम्। नापि गुणेभ्यो व्यतिरिक्तत्वम् । बीभत्सहास्यरौद्रादौ त्वेषामस्माभिरुपगमात् शृङ्गारादौ च वर्जनादनित्यत्वं च दोषत्वं च समर्थितमेवेति भावः ॥ ११ ॥ हैं, जैसे 'कुरु रुचिम्' इस क्रम को बदल देने पर । 'श्रुतिकष्ट' है, 'अधाक्षीत्' 'अक्षोत्सीत्', 'तृणेढि' इत्यादि । उचित रस के उपलक्षण के लिए 'शृङ्गार' का प्रयोग किया है । वीर, शान्त, अद्भुत आदि रसों में भी उन (दोषों) का वर्जन है । सूचित—। न कि विषय-विभाग दिखाने से इन के अनित्यत्व को भिन्नवृत्त आदि दोषों से अलग दिखाया गया है । और न कि इनका गुणों से व्यतिरिक्तत्व भी बताया है । बीभत्स, हास्य और रौद्र आदि में इन दोषों को हमने स्वीकार किया है और शृङ्गार आदि में इनका वर्जन किया है, अतः इनके अनित्यत्व और दोषत्व का समर्थन ही किया है ॥ ११ ॥
गुण और अनुप्रासादि अलङ्कार दोनों ही समवाय सम्बन्ध से रहते हैं। लौकिक गुण और अलङ्कार में भेद अवश्य है, किन्तु काव्य के गुण और अलङ्कार में भेद की कल्पना गड्डुलिका-प्रवाह (भेड़चाल) है। आलोक और लोचन में गुण को रसनिष्ठ धर्म एवं अलङ्कार को शब्द-अर्थनिष्ठ धर्म माना है, इस प्रकार आश्रयभेद से भेद है। प्रस्तुत ग्रन्थ में माधुर्य, ओजस् और प्रसाद ये तीन ही गुण माने हैं। जो कि प्राचीन ग्रन्थों में दस शब्द-गुण और दस अर्थ-गुणों का उल्लेख मिलता है उसका अन्तर्भाव, जैसा कि 'काव्यप्रकाश' में बताया गया है इन्हीं तीन गुणों में हो जाता है। यह विषय 'काव्य-प्रकाश' (अष्टम उल्लास) से विदित कर लेना चाहिए ।