ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २२५ ध्वन्यालोकः प्रसादस्तु स्वच्छता शब्दार्थयोः । स च सर्वरससाधारणो गुणः सर्वरचनासाधारणश्च व्यङ्ग्यार्थापेक्षयैव मुख्यतया व्यवस्थितो मन्तव्यः । श्रुतिदुष्टादयो दोषा अनित्या ये च दर्शिताः । ध्वन्यात्मन्येव शृङ्गारे ते हेया इत्युदाहृताः ॥ ११ ॥ प्रसाद शब्द और अर्थ की स्वच्छता है, और वह सभी रसों और रचनाओं में सामान्य रूप से रहनेवाला एवं मुख्य रूप से व्यङ्ग्य अर्थ की अपेक्षा से ही ( उसके ही समर्पक रूप में ) व्यवस्थित मानना चाहिए ॥ १० ॥ जो श्रुतिदुष्ट आदि अनित्य दोष दिखाए गए हैं वे ध्वनिरूप शृङ्गार में ही त्याज्य कहे गए हैं ॥ ११ ॥ लोचनम् मया मुख्यतया तत आस्वाद्ये उपचरिता रसे ततस्तद्व्यञ्जकयोः शब्दार्थयोरिति तात्पर्यम् ॥ १० ॥ एवमस्मत्पक्ष एव गुणालङ्कारव्यवहारो विभागेनोपपद्यत इति प्रदर्श्य नित्यानित्यदोषविभागोऽप्यस्मत्पक्ष एव सङ्गच्छत इति दर्शयितुमाह- श्रुतिदुष्टादय इत्यादि। वान्तादयोऽसभ्यस्मृतिहेतवः। श्रुतिदुष्टा अर्थदुष्टा वाक्यार्थ- बलादश्लीलार्थप्रतिपत्तिकारिणः । यथा- 'छिन्द्रान्वेषी महांस्तब्धो घातायैवोप- ओज, प्रसाद ये १तीन ही गुण हैं। वे मुख्य रूप से प्रतिपत्ता ( जानकार अर्थात् सहृदय ) के आस्वाद स्वरूप हैं तब लक्षण से आस्वाद्य रस में उपचरित हैं, तब उस ( रस ) के व्यञ्जक शब्द और अर्थ में उपचरित हैं, यह तात्पर्य है ॥ १० ॥ इस प्रकार हमारे पक्ष में ही गुण और अलंकार का व्यवहार विभागपूर्वक बनता है, यह बताकर दोषों का नित्यानित्य-विभाग भी हमारे पक्ष में ही सङ्गत होता है, यह दिखाने के लिए कहते हैं - जो श्रुतिदुष्ट आदि इत्यादि । 'वान्त' ( उगला हुआ ) आदि असभ्य स्मृति को उत्पन्न करने वाले । श्रुतिदुष्ट और वाक्यार्थ के बल से अश्लील अर्थ की प्रतीति कराने वाले अर्थदुष्ट; जैसे- 'बड़ा स्तब्ध और छिद्र का अन्वेषण करने वाला, घात ही के लिए पहुँच जाता है'। दो पदों की कल्पना से 'कल्पनादुष्ट' होते १. गुण और अलङ्कार का भेद, एवं गुण के भेद के सम्बन्ध में विचार साहित्य-शास्त्र का मुख्य प्रकरण है। ध्वन्यालोक और लोचन के अनुसार इन तीनों का विचार हो चुका। काव्यप्रकाश, साहित्य-दर्पण आदि परवर्ती ग्रन्थों में ध्वन्यालोक-लोचन के ही विचारों का अनुसरण हुआ है। गुण और अलङ्कार का भेद करते हुए 'वामन' ने कहा है- 'काव्यशोभायाः कर्तारो धर्मा गुणाः, तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः, अर्थात् काव्य की शोभा को उत्पन्न करने वाले धर्म गुण हैं और शोभा की वृद्धि करने वाले धर्म अलङ्कार हैं। 'काव्यप्रकाश' में इसका खण्डन मिलता है। और, भट्ट उद्भट ने तो गुण और अलङ्कार का कोई भेद ही नहीं माना है, उनके अनुसार ओजस् प्रभृति १५ ध्व०