भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 680 में से

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पृष्ठ 284

ध्वन्यालोकः इत्यादौ द्वयोरोजस्त्वम् ॥ ९ ॥ समर्पकत्वं काव्यस्य यत्तु सर्वरसान् प्रति । स प्रसादो गुणो ज्ञेयः सर्वसाधारणक्रियः ॥ १० ॥ इत्यादि उदाहरणों में दोनों (शब्द और अर्थ) ओजस् गुण से युक्त हैं ॥ ९ ॥ काव्य का सब रसों के प्रति जो समर्पकत्व है, सभी रसों और रचनाओं में साधारण (सामान्य) रूप से अवस्थित उसे 'प्रसाद गुण' समझना चाहिए ॥ १० ॥ लोचनम् माधुर्यमल्पम् । बीभत्सेऽप्येवम् । शान्ते तु विभाववैचित्र्यात्कदाचिदोजः प्रकृष्टं कदाचिन्माधुर्यमिति विभागः ॥ ६ ॥ समर्पकत्वं सम्यगर्पकत्वं हृदयसंवादेन प्रतिपत्तॄन् प्रति स्वात्मावेशेन व्यापा- रकत्वं झटिति शुष्ककाष्ठाग्निदृष्टान्तेन । अकलुषोदकदृष्टान्तेन च तदकालुष्यं प्रसन्नत्वं नाम सर्वरसानां गुणः । उपचारात्तु तथाविधे व्यङ्ग्येऽर्थे यच्छब्दा- र्थयोः समर्पकत्वं तदपि प्रसादः । तमेव व्याचष्टे—प्रसादेति । ननु रसगतो गुणस्तत्कथं शब्दार्थयोः स्वच्छतेत्याशङ्क्याह—स चेति । चशब्दोऽवधारणे । सर्वरससाधारण एव गुणः । स एव च गुण एवंविधः । सर्वा येयं रचना शब्दगता चार्थगता च समस्ता चासमस्ता च तत्र साधारणः । मुख्यतयेति । अर्थस्य तावत्समर्पकत्वं व्यङ्ग्यं प्रत्येव सम्भवति नान्यथा । शब्दस्यापि स्ववाच्यार्पकत्वं नाम कियदलौकिकं येन गुणः स्यादिति भावः । एवं माधुर्यो- जःप्रसादा एव त्रयो गुणा उपपन्ना भामहाभिप्रायेण । ते च प्रतिपत्त्रास्वाद- शान्त में विभाव के वैचित्र्य से कभी ओज प्रकृष्ट होता है तो कभी माधुर्य ॥ ९ ॥ समर्पकत्व अर्थात् सम्यक् प्रकार से अर्पणकर्तृत्व; जिस प्रकार सूखे काठ में आग झट से व्याप्त हो जाती है उसी प्रकार हृदय के एक-रूप होने (हृदयसंवाद) के कारण जानकारों (प्रतिपत्ताओं) के प्रति (अर्थात् उनके हृदयों को) स्वस्वरूप से व्याप्त कर लेना (अथवा), जिस प्रकार कालुष्यरहित (स्वच्छ) वस्त्र को झट से जल व्याप्त कर लेता है, इस ढंग से वह अकालुष्य प्रसन्नत्व (प्रसाद) सभी रसों का गुण है। उपचार (लक्षणा) से, उस प्रकार के (रस रूप) व्यंग्य अर्थ के सम्बन्ध में भी जो शब्द और अर्थ का 'समर्पकत्व' है, वह भी 'प्रसाद' है। उसी की व्याख्या करते हैं—प्रसाद—। जब कि गुण रसगत धर्म है तब शब्द और अर्थ की स्वच्छता कैसे ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और वह—। 'और' शब्द अवधारणार्थक है; सभी रसों में साधारण रूप से ही रहने वाला गुण है और वही गुण इस प्रकार का है। शब्दगत और अर्थगत एवं समस्त और असमस्त इन सब प्रकार की रचनाओं में साधारण रूप से रहने वाला है। मुख्य रूप से—। भाव यह कि अर्थ का समर्पकत्व व्यंग्य के प्रति ही सम्भव होगा, अन्यथा नहीं; शब्द का भी अपने वाच्य का अर्पकत्व कितना अलौकिक है जिससे गुण माना जाय ? इस प्रकार भामह के अभिप्राय से माधुर्य,

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