ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २२३ ध्वन्यालोकः यो यस्तत्कर्मसाक्षी चरति मयि रणे यश्च यश्च प्रतीपः क्रोधान्धस्तस्य तस्य स्वयमपि जगतामन्तकस्यान्तकोऽहम् ॥ पड़ा है, और जो-जो उस कर्म (द्रोण के वध) का साक्षी है और जो-जो मेरे युद्ध- भूमि में विचरण करते समय विरोधी होगा, उस-उस का क्रोध से अंधा मैं अन्त कर डालूँगा, वह चाहे स्वयं भी सब जगत् का अन्त करनेवाला (यमराज) ही क्यों न हो। लोचनम् प्रतीपं चरति समरविघ्नमाचरति । यद्वा मयि चरति सति सङ्ग्रामे यः प्रतीपं प्रतिकूलं कृत्वास्ते स एवंविधो यदि सकलजगदन्तको भवति तस्याप्यहम- न्तकः किमुतान्यस्य मनुष्यस्य देवस्य वा । अत्र पृथग्भूतैरेव क्रमाद्विमृश्यमा- नैैरथैः पदात्पदं क्रोधः परां धारामाश्रित इत्यसमस्ततैव दीप्तिनिबन्धनम् । एवं माधुर्यदीप्ती परस्परप्रतिद्वन्द्वितया स्थिते शृङ्गारादिरौद्रादिगते इति प्रदर्शयता तत्समावेशवैचित्र्यं हास्यभयानकबीभत्सशान्तेषु दर्शितम् । हास्यस्य शृङ्गा- राङ्गतया माधुर्यं प्रकृष्टं विकासधर्मतया चौजोऽपि प्रकृष्टमिति साम्यं द्वयोः । भयानकस्य भग्नचित्तवृत्तिस्वभावत्वेऽपि विभावस्य दीप्ततया ओजः प्रकृष्टं संग्राम में जो मेरे प्रति प्रतीप आचरण करेगा अर्थात् समर में विघ्न करेगा। अथवा, मेरे संग्राम में विचरण करते समय जो प्रतीप या प्रतिकूल करके रहेगा, ऐसा वह यदि सारे संसार का अन्तक है तो उसका भी मैं अन्तक हूँ, फिर दूसरे मनुष्य या देवता की बात क्या ? यहाँ अलग-अलग हुए ही एवं क्रम से विमृश्यमान अर्थों द्वारा क्रोध एक पद से दूसरे पद में उत्कृष्ट धारा पर आश्रित है (उत्कर्ष पर चढ़ता जाता है), इस प्रकार असमस्त (समास-रहित) होना ही दीप्ति का कारण (निबन्धन) है। इस प्रकार माधुर्य और दीप्ति दोनों एक दूसरे के विरोधी रूप में स्थित हो शृङ्गार आदि और रौद्र आदि रसों में होते हैं, यह दिखाते हुए (ग्रन्थकार ने) उनके समावेश का वैचित्र्य हास्य, भयानक, बीभत्स¹ और शान्त रसों में दिखाया है। विभाग यह है कि हास्य शृङ्गार का अंग है, इस लिए उसमें माधुर्य प्रकृष्ट होता है, एवं विकास- धर्मी होने के कारण ओज भी उसमें प्रकृष्ट होता है, इस प्रकार दोनों का साम्य है। भयानक में चित्तवृत्ति भग्न हो जाती है, फिर भी उसका विभाव दीप्त (ओजस्वी) होता है, अतः ओज प्रकृष्ट है और माधुर्य अल्प । इसी प्रकार बीभत्स में भी। १. 'बालप्रिया' में दोनों स्थानों में 'बीभत्स' के स्थान पर 'अद्भुत' पाठ माना है। क्योंकि 'रौद्रादि' में 'आदि' पद से बीभत्स का परिग्रह हो चुका है, अतः उसमें केवल 'दीप्ति' होती है, माधुर्य नहीं।