भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 680 में से

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पृष्ठ 282

२२२ | सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्प्रकाशनपरश्चार्थोऽनपेक्षितदीर्घसमासरचनः प्रसन्नवाचका- भिधेयः । यथा— यो यः शस्त्रं बिभर्ति स्वभुजगुरुमदः पाण्डवीनां चमूनां यो यः पाञ्चालगोत्रे शिशुरधिकवया गर्भशय्यां गतो वा । और उस ( ओज ) का प्रकाशक, दीर्घ समास की अपेक्षा न करनेवाला, प्रसन्न ( प्रसाद-युक्त ) वाचकों द्वारा अभिहित अर्थ है, जैसे— पाण्डवी सेनाओं में अपनी भुजाओं पर अधिक गर्व करनेवाला जो-जो ( व्यक्ति ) शस्त्र धारण करता है, पाञ्चाल के गोत्र में जो-जो बड़ा-छोटा अथवा अभी गर्भ में लोचनम् क्रोधस्यैवोद्दीपनविभावत्वं कृतमिति नात्र शृङ्गारशङ्का कर्तव्या । सुयोधनस्य चानादरं द्वितीयगदाघातदानाद्यनुद्यमः । स च सञ्चूर्णितोरुत्वादेव । स्त्यान- ग्रहणेन द्रौपदीमन्युप्रक्षालने त्वरा सूचिता । समासेन च सन्ततवेगवहनस्व- भावात् तावत्येव मध्ये विश्रान्तिमलभमाना चूर्णितोरुद्वयसुयोधनानादरणप- र्यन्ता प्रतीतिरेकत्वेनैव भवतीत्यौद्धत्यस्य परं परिपोषिका । अन्ये तु सुयोध- नस्य सम्बन्धि यत्स्त्यानावबद्धं घनं शोणितं तेन शोणपाणिरिति व्याचक्षते । य इति । स्वभुजयोर्गुरुर्मदो यस्य चमूनां मध्येऽर्जुनादिरित्यर्थः । पाञ्चा- लराजपुत्रेण धृष्टद्युम्नेन द्रोणस्य व्यापादनात्तत्कुलं प्रत्यधिकः क्रोधावेशोऽश्व- त्थाम्नः । तत्कर्मसाक्षीति कर्णप्रभृतिः । रणे सङ्ग्रामे कर्तव्ये यो मयि सद्विपये इस सम्बोधन से क्रोध का ही उद्दीपन विभाव रूप का सम्पादन किया है, ऐसी स्थिति में यहाँ 'शृङ्गार' की शंका नहीं करनी चाहिए । दूसरी बार गदा का आघात देने का उद्योग न करना, यह सुयोधन का अनादर है । वह अनुद्योग उसके ऊरुयुगल के सञ्चूर्णित हो जाने से ही स्पष्ट हो जाता है । 'स्त्यान' ( 'घनीभूत' ) कहने से द्रौपदी के क्रोध के प्रक्षालन में त्वरा सूचित की है । और समास के द्वारा निरन्तर वेग से बहने के स्वभाव के कारण तब तक मध्य में विश्राम न प्राप्त करती हुई, चूर्णित ऊरुयुगल वाले सुयोधन के अनादरण तक पर्यवसित प्रतीति एकरूप से होती है, इस प्रकार वह ( भीम के ) औद्धत्य का पूर्ण रूप से परिपोष करती है। दूसरे लोग व्याख्या करते हैं कि 'सुयोधन का जो स्त्यानावबद्ध ( जोर से निकल कर घनीभूत ), घन ( अर्थात् गाढ़ा ) जो शोणित, उससे लाल हाथ वाला' । पाण्डवी सेनाओं में—सेनाओं के बीच अपनी भुजाओं पर अधिक मद है जिसका, अर्थात् अर्जुन आदि । पाञ्चाल नरेश के पुत्र धृष्टद्युम्न ने द्रोण का वध किया, अतः उसके कुल के प्रति अश्वत्थामा का क्रोधावेश अधिक है । उस ( द्रोणवध रूप ) कर्म के साक्षी, ( आंखों के सामने द्रोण का वध देखने वाले ) कर्ण प्रभृति । मेरे द्वारा कर्तव्य