ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २२१ ध्वन्यालोकः चञ्चद्भुजभ्रमितचण्डगदाभिघात- सञ्चूर्णितोरुयुगलस्य सुयोधनस्य । स्त्यानावबद्धघनशोणितशोणपाणि- रुत्तंसयिष्यति कचांस्तव देवि भीमः ॥ हे देवि, आवर्तन करती हुई दोनों भुजाओं से घुमाई गई प्रचण्ड गदा के अभिघात से सम्यक् प्रकार से चूर्णित ऊरुयुगल वाले सुयोधन के निकल कर जमे हुए घने शोणित से लाल हाथोंवाला भीम तेरे बालों को सँवारेगा । लोचनम् 'यो यः' इत्यादि । चञ्चदिति । चञ्चद्भ्यां वेगादावर्त्तमानाभ्यां भुजाभ्यां भ्रमिता येयं चण्डा दारुणा गदा तया योऽभितः सर्वत ऊर्वोर्घातस्तेन सम्यक् चूर्णितं पुनरनुत्थानोपहतं कृतमूरुयुगलं युगपदेवोरुद्वयं यस्य तं सुयोधनमनादृत्यैव स्त्यानेनाश्यानतया न तु कालान्तरशुष्कतयावबद्धं हस्ताभ्यामविगलद्रूपमत्यन्त- 'माभ्यन्तरतया घनं न तु रसमात्रस्वभावं यच्छोणितं रुधिरं तेन शोणौ लोहितौ पाणी यस्य सः । अत एव स भीमः कातरत्रासदायी । तवेति । यस्यास्तत्तदपमानजातं कृतं देव्यनुचितमपि तस्यास्तव कचानुत्तंसयिष्यत्यु- त्संसवतः करिष्यति, वेणीत्वमपहरन् करविच्युतशोणितशकलैर्लोहितकुसुमा- पीडेनेव योजयिष्यतीत्युत्प्रेक्षा । देवीत्यनेन कुलकलत्रखिलीकारस्मरणकारिणा 'चञ्चत्०' इत्यादि । रौद्र आदि का प्रकाशक अर्थ प्रसन्न एवं बोधक वाचकों द्वारा अभिहित होता हुआ, समास की अपेक्षा न करके भी 'दीप्ति' कहलाता है। जैसे— 'यो यः शस्त्रम्०' इत्यादि । वेग से आवर्तन करती हुई भुजाओं से घुमाई गई जो यह चण्ड गदा, उसके द्वारा सब ओर जो जांघों पर प्रहार है उसके कारण सम्यक् चूर्णित अर्थात् फिर से उठने के नाकाबिल बना दिया एक ही समय ऊरुयुगल है जिसका, उस सुयोधन को अनादर करके ही घनीभूत हो जाने से, न कि कालान्तर में सूख जाने से, बंधा हुआ अर्थात् हाथों से छुड़ाया न जाता हुआ, पकड़ लेने के कारण घना, न कि रस ( द्रव ) रूप जो शोणित या रुधिर उससे लाल हाथ हैं जिसके ऐसा वह । अतएव वह कातर ( डरपोंक ) लोगों को त्रस्त करने वाला भीम । तेरा— । जिस देवी के लिए अनुचित होने पर भी उन-उन अपमानों को किया, उस तेरे बालों को उत्तंसित करेगा—उत्तंसयुक्त करेगा। उत्प्रेक्षा यह है कि एकलट बने हुए बालों को अलग-अलग करके हाथ से टपकते हुए खून के बिन्दुओं के रूप में लाल फूलों के बने आभूषण से मानों युक्त करेगा। कुलांगना के अपकार की याद दिलाने वाले 'देवि' प्रकाशक होता है अतः 'ओजस्' शब्द से वह भी लक्षित होता है। इस प्रकार यहाँ लक्षित में लक्षणा ( लक्षितलक्षणा ) है ।