भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 280

२२० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः त एव दीप्तिरित्युच्यते । तत्प्रकाशनपरः शब्दो दीर्घसमासरचनाल- ङ्कृतं वाक्यम् । यथा— लक्षणा से उन्हें ही 'दीप्ति' कही जाती है । उसका प्रकाशन करनेवाला शब्द दीर्घ समास की रचना से अलङ्कृत वाक्य है । जैसे— लोचनम् प्रतिपत्तृहृदये विकासविस्तारप्रज्वलनस्वभावा । सा च मुख्यतया ओजश्शब्द- वाच्या । तदास्वादमया रौद्राद्याः, तया दीप्त्या आस्वादविशेषात्मिकया कार्य- रूपया लक्ष्यन्ते रसान्तरात्पृथक्तया । तेन कारणे कार्योपचाराद्रौद्रादिरेवौजः- शब्दवाच्यः । ततो लक्षितलक्षणया तत्प्रकाशनपरः शब्दो दीर्घसमासरचन- वाक्यरूपोऽपि दीप्तिरित्युच्यते । यथा 'चञ्चदि'त्यादि । तत्प्रकाशनपरश्चार्थः प्रसन्नैर्गमकैर्वाचकैरभिधीयमानः समासानपेक्ष्यपि दीप्तिरित्युच्यते । यथा— और १अद्भुत का भी ग्रहण है । दीप्ति प्रतिपत्ता या सहृदय के हृदय में विकास, विस्तार और प्रज्वलन की अवस्था को आहित करती है। वह मुख्य रूप से 'ओजस्' शब्द से कही जाती है। रौद्र आदि उस दीप्ति के आस्वाद से युक्त हैं । आस्वाद विशेष एवं कार्य रूप उस दीप्ति से ( वे रौद्र आदि रस ) अन्य रसों से पृथक् रूप में लक्षित होते हैं । इस लिए कारण में कार्य के उपचार से 'रौद्र' आदि ही 'ओजस्' शब्द के वाच्य हैं । इस लिए 'लक्षित लक्षणा' के द्वारा रौद्र आदि का प्रकाशक शब्द दीर्घसमास की रचना का वाक्य रूप होकर भी 'दीप्ति' कहलाता है । जैसे— १. 'रौद्र आदि' में 'आदि' पद को लोचनकार ने प्रकार या सादृश्य के अर्थ में माना है और इससे 'वीर और अद्भुत का भी ग्रहण' किया है। अर्थात् रौद्र के सदृश रस वीर आदि दीप्ति से लक्षित होते हैं। यहाँ 'बालप्रिया' में यह शङ्का उठाई गई है कि जब कि स्वयं लोचनकार क्रोधादि को दीप्ति का जनक लिख कर इसी क्रम में और विस्मय, हास आदि को रागित्व या विक्षेप का जनक बताते हैं, ऐसी स्थिति में दीप्ति के जनक होने के कारण क्रोधादि के 'आदि' शब्द से अद्भुत या विस्मय का ग्रहण हो ही जाता है फिर 'विस्मय' का रागित्व या विक्षेप के जनक के रूप में पुनः उल्लेख करने की आवश्यकता क्या थी ? इससे तो यहीं विदित होता है कि 'क्रोधादि' से 'वीर' को ही ग्रहण किया जा सकता है 'अद्भुत' को नहीं। इस प्रकार प्रस्तुत में भी जब 'लोचन' में 'रौद्रादि' से वीर और अद्भुत के ग्रहण का उल्लेख है तो पूर्व ग्रन्थ से इस ग्रन्थ का विरोध स्पष्ट है, ऐसी स्थिति में प्रस्तुत 'अद्भुत' पद के स्थान में 'बीभत्स' यह पाठ होना चाहिए । किन्तु यहाँ 'दिव्याञ्जना' में मेरे गुरु जी का कहना है कि यहाँ 'अद्भुत' से वीर के विभाव से उत्पन्न 'अद्भुत' के ग्रहण करने पर कोई शङ्का उदित नहीं होगी। २. लक्षितलक्षणा अर्थात् लक्षित में लक्षणा । कुछ लोगों ने लक्षित अर्थ से लक्षणा को 'लक्षित- लक्षणा' माना और कुछ ने शक्यार्थ के परम्परा सम्बन्ध को लक्षितलक्षणा माना है। अस्तु, यहाँ 'ओजस्' शब्द का मुख्य अर्थ है दीप्ति । रौद्रादि से दीप्ति उत्पन्न होती है, इस लिए रौद्र आदि भी 'ओजस्' शब्द से लक्षित होते हैं और इस प्रकार दीर्घ समास की रचना से अलंकृत वाक्य रौद्रादि का