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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

२२० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः त एव दीप्तिरित्युच्यते । तत्प्रकाशनपरः शब्दो दीर्घसमासरचनाल- ङ्कृतं वाक्यम् । यथा— लक्षणा से उन्हें ही 'दीप्ति' कही जाती है । उसका प्रकाशन करनेवाला शब्द दीर्घ समास की रचना से अलङ्कृत वाक्य है । जैसे— लोचनम् प्रतिपत्तृहृदये विकासविस्तारप्रज्वलनस्वभावा । सा च मुख्यतया ओजश्शब्द- वाच्या । तदास्वादमया रौद्राद्याः, तया दीप्त्या आस्वादविशेषात्मिकया कार्य- रूपया लक्ष्यन्ते रसान्तरात्पृथक्तया । तेन कारणे कार्योपचाराद्रौद्रादिरेवौजः- शब्दवाच्यः । ततो लक्षितलक्षणया तत्प्रकाशनपरः शब्दो दीर्घसमासरचन- वाक्यरूपोऽपि दीप्तिरित्युच्यते । यथा 'चञ्चदि'त्यादि । तत्प्रकाशनपरश्चार्थः प्रसन्नैर्गमकैर्वाचकैरभिधीयमानः समासानपेक्ष्यपि दीप्तिरित्युच्यते । यथा— और १अद्भुत का भी ग्रहण है । दीप्ति प्रतिपत्ता या सहृदय के हृदय में विकास, विस्तार और प्रज्वलन की अवस्था को आहित करती है। वह मुख्य रूप से 'ओजस्' शब्द से कही जाती है। रौद्र आदि उस दीप्ति के आस्वाद से युक्त हैं । आस्वाद विशेष एवं कार्य रूप उस दीप्ति से ( वे रौद्र आदि रस ) अन्य रसों से पृथक् रूप में लक्षित होते हैं । इस लिए कारण में कार्य के उपचार से 'रौद्र' आदि ही 'ओजस्' शब्द के वाच्य हैं । इस लिए 'लक्षित लक्षणा' के द्वारा रौद्र आदि का प्रकाशक शब्द दीर्घसमास की रचना का वाक्य रूप होकर भी 'दीप्ति' कहलाता है । जैसे— १. 'रौद्र आदि' में 'आदि' पद को लोचनकार ने प्रकार या सादृश्य के अर्थ में माना है और इससे 'वीर और अद्भुत का भी ग्रहण' किया है। अर्थात् रौद्र के सदृश रस वीर आदि दीप्ति से लक्षित होते हैं। यहाँ 'बालप्रिया' में यह शङ्का उठाई गई है कि जब कि स्वयं लोचनकार क्रोधादि को दीप्ति का जनक लिख कर इसी क्रम में और विस्मय, हास आदि को रागित्व या विक्षेप का जनक बताते हैं, ऐसी स्थिति में दीप्ति के जनक होने के कारण क्रोधादि के 'आदि' शब्द से अद्भुत या विस्मय का ग्रहण हो ही जाता है फिर 'विस्मय' का रागित्व या विक्षेप के जनक के रूप में पुनः उल्लेख करने की आवश्यकता क्या थी ? इससे तो यहीं विदित होता है कि 'क्रोधादि' से 'वीर' को ही ग्रहण किया जा सकता है 'अद्भुत' को नहीं। इस प्रकार प्रस्तुत में भी जब 'लोचन' में 'रौद्रादि' से वीर और अद्भुत के ग्रहण का उल्लेख है तो पूर्व ग्रन्थ से इस ग्रन्थ का विरोध स्पष्ट है, ऐसी स्थिति में प्रस्तुत 'अद्भुत' पद के स्थान में 'बीभत्स' यह पाठ होना चाहिए । किन्तु यहाँ 'दिव्याञ्जना' में मेरे गुरु जी का कहना है कि यहाँ 'अद्भुत' से वीर के विभाव से उत्पन्न 'अद्भुत' के ग्रहण करने पर कोई शङ्का उदित नहीं होगी। २. लक्षितलक्षणा अर्थात् लक्षित में लक्षणा । कुछ लोगों ने लक्षित अर्थ से लक्षणा को 'लक्षित- लक्षणा' माना और कुछ ने शक्यार्थ के परम्परा सम्बन्ध को लक्षितलक्षणा माना है। अस्तु, यहाँ 'ओजस्' शब्द का मुख्य अर्थ है दीप्ति । रौद्रादि से दीप्ति उत्पन्न होती है, इस लिए रौद्र आदि भी 'ओजस्' शब्द से लक्षित होते हैं और इस प्रकार दीर्घ समास की रचना से अलंकृत वाक्य रौद्रादि का

द्वितीय उद्योतः २२१ ध्वन्यालोकः चञ्चद्भुजभ्रमितचण्डगदाभिघात- सञ्चूर्णितोरुयुगलस्य सुयोधनस्य । स्त्यानावबद्धघनशोणितशोणपाणि- रुत्तंसयिष्यति कचांस्तव देवि भीमः ॥ हे देवि, आवर्तन करती हुई दोनों भुजाओं से घुमाई गई प्रचण्ड गदा के अभिघात से सम्यक् प्रकार से चूर्णित ऊरुयुगल वाले सुयोधन के निकल कर जमे हुए घने शोणित से लाल हाथोंवाला भीम तेरे बालों को सँवारेगा । लोचनम् 'यो यः' इत्यादि । चञ्चदिति । चञ्चद्भ्यां वेगादावर्त्तमानाभ्यां भुजाभ्यां भ्रमिता येयं चण्डा दारुणा गदा तया योऽभितः सर्वत ऊर्वोर्घातस्तेन सम्यक् चूर्णितं पुनरनुत्थानोपहतं कृतमूरुयुगलं युगपदेवोरुद्वयं यस्य तं सुयोधनमनादृत्यैव स्त्यानेनाश्यानतया न तु कालान्तरशुष्कतयावबद्धं हस्ताभ्यामविगलद्रूपमत्यन्त- 'माभ्यन्तरतया घनं न तु रसमात्रस्वभावं यच्छोणितं रुधिरं तेन शोणौ लोहितौ पाणी यस्य सः । अत एव स भीमः कातरत्रासदायी । तवेति । यस्यास्तत्तदपमानजातं कृतं देव्यनुचितमपि तस्यास्तव कचानुत्तंसयिष्यत्यु- त्संसवतः करिष्यति, वेणीत्वमपहरन् करविच्युतशोणितशकलैर्लोहितकुसुमा- पीडेनेव योजयिष्यतीत्युत्प्रेक्षा । देवीत्यनेन कुलकलत्रखिलीकारस्मरणकारिणा 'चञ्चत्०' इत्यादि । रौद्र आदि का प्रकाशक अर्थ प्रसन्न एवं बोधक वाचकों द्वारा अभिहित होता हुआ, समास की अपेक्षा न करके भी 'दीप्ति' कहलाता है। जैसे— 'यो यः शस्त्रम्०' इत्यादि । वेग से आवर्तन करती हुई भुजाओं से घुमाई गई जो यह चण्ड गदा, उसके द्वारा सब ओर जो जांघों पर प्रहार है उसके कारण सम्यक् चूर्णित अर्थात् फिर से उठने के नाकाबिल बना दिया एक ही समय ऊरुयुगल है जिसका, उस सुयोधन को अनादर करके ही घनीभूत हो जाने से, न कि कालान्तर में सूख जाने से, बंधा हुआ अर्थात् हाथों से छुड़ाया न जाता हुआ, पकड़ लेने के कारण घना, न कि रस ( द्रव ) रूप जो शोणित या रुधिर उससे लाल हाथ हैं जिसके ऐसा वह । अतएव वह कातर ( डरपोंक ) लोगों को त्रस्त करने वाला भीम । तेरा— । जिस देवी के लिए अनुचित होने पर भी उन-उन अपमानों को किया, उस तेरे बालों को उत्तंसित करेगा—उत्तंसयुक्त करेगा। उत्प्रेक्षा यह है कि एकलट बने हुए बालों को अलग-अलग करके हाथ से टपकते हुए खून के बिन्दुओं के रूप में लाल फूलों के बने आभूषण से मानों युक्त करेगा। कुलांगना के अपकार की याद दिलाने वाले 'देवि' प्रकाशक होता है अतः 'ओजस्' शब्द से वह भी लक्षित होता है। इस प्रकार यहाँ लक्षित में लक्षणा ( लक्षितलक्षणा ) है ।

२२२ | सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्प्रकाशनपरश्चार्थोऽनपेक्षितदीर्घसमासरचनः प्रसन्नवाचका- भिधेयः । यथा— यो यः शस्त्रं बिभर्ति स्वभुजगुरुमदः पाण्डवीनां चमूनां यो यः पाञ्चालगोत्रे शिशुरधिकवया गर्भशय्यां गतो वा । और उस ( ओज ) का प्रकाशक, दीर्घ समास की अपेक्षा न करनेवाला, प्रसन्न ( प्रसाद-युक्त ) वाचकों द्वारा अभिहित अर्थ है, जैसे— पाण्डवी सेनाओं में अपनी भुजाओं पर अधिक गर्व करनेवाला जो-जो ( व्यक्ति ) शस्त्र धारण करता है, पाञ्चाल के गोत्र में जो-जो बड़ा-छोटा अथवा अभी गर्भ में लोचनम् क्रोधस्यैवोद्दीपनविभावत्वं कृतमिति नात्र शृङ्गारशङ्का कर्तव्या । सुयोधनस्य चानादरं द्वितीयगदाघातदानाद्यनुद्यमः । स च सञ्चूर्णितोरुत्वादेव । स्त्यान- ग्रहणेन द्रौपदीमन्युप्रक्षालने त्वरा सूचिता । समासेन च सन्ततवेगवहनस्व- भावात् तावत्येव मध्ये विश्रान्तिमलभमाना चूर्णितोरुद्वयसुयोधनानादरणप- र्यन्ता प्रतीतिरेकत्वेनैव भवतीत्यौद्धत्यस्य परं परिपोषिका । अन्ये तु सुयोध- नस्य सम्बन्धि यत्स्त्यानावबद्धं घनं शोणितं तेन शोणपाणिरिति व्याचक्षते । य इति । स्वभुजयोर्गुरुर्मदो यस्य चमूनां मध्येऽर्जुनादिरित्यर्थः । पाञ्चा- लराजपुत्रेण धृष्टद्युम्नेन द्रोणस्य व्यापादनात्तत्कुलं प्रत्यधिकः क्रोधावेशोऽश्व- त्थाम्नः । तत्कर्मसाक्षीति कर्णप्रभृतिः । रणे सङ्ग्रामे कर्तव्ये यो मयि सद्विपये इस सम्बोधन से क्रोध का ही उद्दीपन विभाव रूप का सम्पादन किया है, ऐसी स्थिति में यहाँ 'शृङ्गार' की शंका नहीं करनी चाहिए । दूसरी बार गदा का आघात देने का उद्योग न करना, यह सुयोधन का अनादर है । वह अनुद्योग उसके ऊरुयुगल के सञ्चूर्णित हो जाने से ही स्पष्ट हो जाता है । 'स्त्यान' ( 'घनीभूत' ) कहने से द्रौपदी के क्रोध के प्रक्षालन में त्वरा सूचित की है । और समास के द्वारा निरन्तर वेग से बहने के स्वभाव के कारण तब तक मध्य में विश्राम न प्राप्त करती हुई, चूर्णित ऊरुयुगल वाले सुयोधन के अनादरण तक पर्यवसित प्रतीति एकरूप से होती है, इस प्रकार वह ( भीम के ) औद्धत्य का पूर्ण रूप से परिपोष करती है। दूसरे लोग व्याख्या करते हैं कि 'सुयोधन का जो स्त्यानावबद्ध ( जोर से निकल कर घनीभूत ), घन ( अर्थात् गाढ़ा ) जो शोणित, उससे लाल हाथ वाला' । पाण्डवी सेनाओं में—सेनाओं के बीच अपनी भुजाओं पर अधिक मद है जिसका, अर्थात् अर्जुन आदि । पाञ्चाल नरेश के पुत्र धृष्टद्युम्न ने द्रोण का वध किया, अतः उसके कुल के प्रति अश्वत्थामा का क्रोधावेश अधिक है । उस ( द्रोणवध रूप ) कर्म के साक्षी, ( आंखों के सामने द्रोण का वध देखने वाले ) कर्ण प्रभृति । मेरे द्वारा कर्तव्य

द्वितीय उद्योतः २२३ ध्वन्यालोकः यो यस्तत्कर्मसाक्षी चरति मयि रणे यश्च यश्च प्रतीपः क्रोधान्धस्तस्य तस्य स्वयमपि जगतामन्तकस्यान्तकोऽहम् ॥ पड़ा है, और जो-जो उस कर्म (द्रोण के वध) का साक्षी है और जो-जो मेरे युद्ध- भूमि में विचरण करते समय विरोधी होगा, उस-उस का क्रोध से अंधा मैं अन्त कर डालूँगा, वह चाहे स्वयं भी सब जगत् का अन्त करनेवाला (यमराज) ही क्यों न हो। लोचनम् प्रतीपं चरति समरविघ्नमाचरति । यद्वा मयि चरति सति सङ्ग्रामे यः प्रतीपं प्रतिकूलं कृत्वास्ते स एवंविधो यदि सकलजगदन्तको भवति तस्याप्यहम- न्तकः किमुतान्यस्य मनुष्यस्य देवस्य वा । अत्र पृथग्भूतैरेव क्रमाद्विमृश्यमा- नैैरथैः पदात्पदं क्रोधः परां धारामाश्रित इत्यसमस्ततैव दीप्तिनिबन्धनम् । एवं माधुर्यदीप्ती परस्परप्रतिद्वन्द्वितया स्थिते शृङ्गारादिरौद्रादिगते इति प्रदर्शयता तत्समावेशवैचित्र्यं हास्यभयानकबीभत्सशान्तेषु दर्शितम् । हास्यस्य शृङ्गा- राङ्गतया माधुर्यं प्रकृष्टं विकासधर्मतया चौजोऽपि प्रकृष्टमिति साम्यं द्वयोः । भयानकस्य भग्नचित्तवृत्तिस्वभावत्वेऽपि विभावस्य दीप्ततया ओजः प्रकृष्टं संग्राम में जो मेरे प्रति प्रतीप आचरण करेगा अर्थात् समर में विघ्न करेगा। अथवा, मेरे संग्राम में विचरण करते समय जो प्रतीप या प्रतिकूल करके रहेगा, ऐसा वह यदि सारे संसार का अन्तक है तो उसका भी मैं अन्तक हूँ, फिर दूसरे मनुष्य या देवता की बात क्या ? यहाँ अलग-अलग हुए ही एवं क्रम से विमृश्यमान अर्थों द्वारा क्रोध एक पद से दूसरे पद में उत्कृष्ट धारा पर आश्रित है (उत्कर्ष पर चढ़ता जाता है), इस प्रकार असमस्त (समास-रहित) होना ही दीप्ति का कारण (निबन्धन) है। इस प्रकार माधुर्य और दीप्ति दोनों एक दूसरे के विरोधी रूप में स्थित हो शृङ्गार आदि और रौद्र आदि रसों में होते हैं, यह दिखाते हुए (ग्रन्थकार ने) उनके समावेश का वैचित्र्य हास्य, भयानक, बीभत्स¹ और शान्त रसों में दिखाया है। विभाग यह है कि हास्य शृङ्गार का अंग है, इस लिए उसमें माधुर्य प्रकृष्ट होता है, एवं विकास- धर्मी होने के कारण ओज भी उसमें प्रकृष्ट होता है, इस प्रकार दोनों का साम्य है। भयानक में चित्तवृत्ति भग्न हो जाती है, फिर भी उसका विभाव दीप्त (ओजस्वी) होता है, अतः ओज प्रकृष्ट है और माधुर्य अल्प । इसी प्रकार बीभत्स में भी। १. 'बालप्रिया' में दोनों स्थानों में 'बीभत्स' के स्थान पर 'अद्भुत' पाठ माना है। क्योंकि 'रौद्रादि' में 'आदि' पद से बीभत्स का परिग्रह हो चुका है, अतः उसमें केवल 'दीप्ति' होती है, माधुर्य नहीं।

ध्वन्यालोकः इत्यादौ द्वयोरोजस्त्वम् ॥ ९ ॥ समर्पकत्वं काव्यस्य यत्तु सर्वरसान् प्रति । स प्रसादो गुणो ज्ञेयः सर्वसाधारणक्रियः ॥ १० ॥ इत्यादि उदाहरणों में दोनों (शब्द और अर्थ) ओजस् गुण से युक्त हैं ॥ ९ ॥ काव्य का सब रसों के प्रति जो समर्पकत्व है, सभी रसों और रचनाओं में साधारण (सामान्य) रूप से अवस्थित उसे 'प्रसाद गुण' समझना चाहिए ॥ १० ॥ लोचनम् माधुर्यमल्पम् । बीभत्सेऽप्येवम् । शान्ते तु विभाववैचित्र्यात्कदाचिदोजः प्रकृष्टं कदाचिन्माधुर्यमिति विभागः ॥ ६ ॥ समर्पकत्वं सम्यगर्पकत्वं हृदयसंवादेन प्रतिपत्तॄन् प्रति स्वात्मावेशेन व्यापा- रकत्वं झटिति शुष्ककाष्ठाग्निदृष्टान्तेन । अकलुषोदकदृष्टान्तेन च तदकालुष्यं प्रसन्नत्वं नाम सर्वरसानां गुणः । उपचारात्तु तथाविधे व्यङ्ग्येऽर्थे यच्छब्दा- र्थयोः समर्पकत्वं तदपि प्रसादः । तमेव व्याचष्टे—प्रसादेति । ननु रसगतो गुणस्तत्कथं शब्दार्थयोः स्वच्छतेत्याशङ्क्याह—स चेति । चशब्दोऽवधारणे । सर्वरससाधारण एव गुणः । स एव च गुण एवंविधः । सर्वा येयं रचना शब्दगता चार्थगता च समस्ता चासमस्ता च तत्र साधारणः । मुख्यतयेति । अर्थस्य तावत्समर्पकत्वं व्यङ्ग्यं प्रत्येव सम्भवति नान्यथा । शब्दस्यापि स्ववाच्यार्पकत्वं नाम कियदलौकिकं येन गुणः स्यादिति भावः । एवं माधुर्यो- जःप्रसादा एव त्रयो गुणा उपपन्ना भामहाभिप्रायेण । ते च प्रतिपत्त्रास्वाद- शान्त में विभाव के वैचित्र्य से कभी ओज प्रकृष्ट होता है तो कभी माधुर्य ॥ ९ ॥ समर्पकत्व अर्थात् सम्यक् प्रकार से अर्पणकर्तृत्व; जिस प्रकार सूखे काठ में आग झट से व्याप्त हो जाती है उसी प्रकार हृदय के एक-रूप होने (हृदयसंवाद) के कारण जानकारों (प्रतिपत्ताओं) के प्रति (अर्थात् उनके हृदयों को) स्वस्वरूप से व्याप्त कर लेना (अथवा), जिस प्रकार कालुष्यरहित (स्वच्छ) वस्त्र को झट से जल व्याप्त कर लेता है, इस ढंग से वह अकालुष्य प्रसन्नत्व (प्रसाद) सभी रसों का गुण है। उपचार (लक्षणा) से, उस प्रकार के (रस रूप) व्यंग्य अर्थ के सम्बन्ध में भी जो शब्द और अर्थ का 'समर्पकत्व' है, वह भी 'प्रसाद' है। उसी की व्याख्या करते हैं—प्रसाद—। जब कि गुण रसगत धर्म है तब शब्द और अर्थ की स्वच्छता कैसे ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और वह—। 'और' शब्द अवधारणार्थक है; सभी रसों में साधारण रूप से ही रहने वाला गुण है और वही गुण इस प्रकार का है। शब्दगत और अर्थगत एवं समस्त और असमस्त इन सब प्रकार की रचनाओं में साधारण रूप से रहने वाला है। मुख्य रूप से—। भाव यह कि अर्थ का समर्पकत्व व्यंग्य के प्रति ही सम्भव होगा, अन्यथा नहीं; शब्द का भी अपने वाच्य का अर्पकत्व कितना अलौकिक है जिससे गुण माना जाय ? इस प्रकार भामह के अभिप्राय से माधुर्य,

द्वितीय उद्योतः २२५ ध्वन्यालोकः प्रसादस्तु स्वच्छता शब्दार्थयोः । स च सर्वरससाधारणो गुणः सर्वरचनासाधारणश्च व्यङ्ग्यार्थापेक्षयैव मुख्यतया व्यवस्थितो मन्तव्यः । श्रुतिदुष्टादयो दोषा अनित्या ये च दर्शिताः । ध्वन्यात्मन्येव शृङ्गारे ते हेया इत्युदाहृताः ॥ ११ ॥ प्रसाद शब्द और अर्थ की स्वच्छता है, और वह सभी रसों और रचनाओं में सामान्य रूप से रहनेवाला एवं मुख्य रूप से व्यङ्ग्य अर्थ की अपेक्षा से ही ( उसके ही समर्पक रूप में ) व्यवस्थित मानना चाहिए ॥ १० ॥ जो श्रुतिदुष्ट आदि अनित्य दोष दिखाए गए हैं वे ध्वनिरूप शृङ्गार में ही त्याज्य कहे गए हैं ॥ ११ ॥ लोचनम् मया मुख्यतया तत आस्वाद्ये उपचरिता रसे ततस्तद्व्यञ्जकयोः शब्दार्थयोरिति तात्पर्यम् ॥ १० ॥ एवमस्मत्पक्ष एव गुणालङ्कारव्यवहारो विभागेनोपपद्यत इति प्रदर्श्य नित्यानित्यदोषविभागोऽप्यस्मत्पक्ष एव सङ्गच्छत इति दर्शयितुमाह- श्रुतिदुष्टादय इत्यादि। वान्तादयोऽसभ्यस्मृतिहेतवः। श्रुतिदुष्टा अर्थदुष्टा वाक्यार्थ- बलादश्लीलार्थप्रतिपत्तिकारिणः । यथा- 'छिन्द्रान्वेषी महांस्तब्धो घातायैवोप- ओज, प्रसाद ये १तीन ही गुण हैं। वे मुख्य रूप से प्रतिपत्ता ( जानकार अर्थात् सहृदय ) के आस्वाद स्वरूप हैं तब लक्षण से आस्वाद्य रस में उपचरित हैं, तब उस ( रस ) के व्यञ्जक शब्द और अर्थ में उपचरित हैं, यह तात्पर्य है ॥ १० ॥ इस प्रकार हमारे पक्ष में ही गुण और अलंकार का व्यवहार विभागपूर्वक बनता है, यह बताकर दोषों का नित्यानित्य-विभाग भी हमारे पक्ष में ही सङ्गत होता है, यह दिखाने के लिए कहते हैं - जो श्रुतिदुष्ट आदि इत्यादि । 'वान्त' ( उगला हुआ ) आदि असभ्य स्मृति को उत्पन्न करने वाले । श्रुतिदुष्ट और वाक्यार्थ के बल से अश्लील अर्थ की प्रतीति कराने वाले अर्थदुष्ट; जैसे- 'बड़ा स्तब्ध और छिद्र का अन्वेषण करने वाला, घात ही के लिए पहुँच जाता है'। दो पदों की कल्पना से 'कल्पनादुष्ट' होते १. गुण और अलङ्कार का भेद, एवं गुण के भेद के सम्बन्ध में विचार साहित्य-शास्त्र का मुख्य प्रकरण है। ध्वन्यालोक और लोचन के अनुसार इन तीनों का विचार हो चुका। काव्यप्रकाश, साहित्य-दर्पण आदि परवर्ती ग्रन्थों में ध्वन्यालोक-लोचन के ही विचारों का अनुसरण हुआ है। गुण और अलङ्कार का भेद करते हुए 'वामन' ने कहा है- 'काव्यशोभायाः कर्तारो धर्मा गुणाः, तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः, अर्थात् काव्य की शोभा को उत्पन्न करने वाले धर्म गुण हैं और शोभा की वृद्धि करने वाले धर्म अलङ्कार हैं। 'काव्यप्रकाश' में इसका खण्डन मिलता है। और, भट्ट उद्भट ने तो गुण और अलङ्कार का कोई भेद ही नहीं माना है, उनके अनुसार ओजस् प्रभृति १५ ध्व०

२२६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अनित्या दोषाश्च ये श्रुतिदुष्टादयः सूचितास्तेऽपि न वाच्ये अर्थ- मात्रे, न च व्यङ्ग्ये शृङ्गारव्यतिरेकिणि शृङ्गारे वा ध्वनेरनात्मभूते । किं तर्हि ? ध्वन्यात्मन्येव शृङ्गारेऽङ्गितया व्यङ्ग्ये ते हेया इत्युदाहृताः । अन्यथा हि तेषामनित्यदोषतैव न स्यात् । एवमयमसंलक्ष्यक्रमद्योतो ध्वनेरात्मा प्रदर्शितः सामान्येन ॥ ११ ॥ अनित्य दोष जो श्रुतिदुष्ट आदि सूचित किए गए हैं वे भी न अर्थमात्र वाच्य में और न शृङ्गाररहित व्यङ्ग्य में अथवा न ध्वनि के अनात्मभूत शृङ्गार में होते हैं । तब क्या होते हैं ? अङ्गीरूप व्यङ्ग्य ध्वन्यात्मा शृङ्गार में ही वे त्याज्य कहे गए हैं। ऐसा न माना जाय तो उनका अनित्य दोष होना ही नहीं बनेगा । इस प्रकार सामान्य रूप से यह असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रूप ध्वनि का आत्मा बताया गया ॥ ११ ॥ लोचनम् सर्पति' इति । कल्पनादुष्टास्तु द्वयोः पदयोः कल्पनया । यथा 'कुरु रुचिम्' इत्यत्र क्रमव्यत्यासे । श्रुतिकष्टस्तु अधाक्षीत् अक्षोत्सीत् तृणेढि इत्यादि । शृङ्गार इत्युचितरसोपलक्षणार्थम् । वीरशान्ताद्भुतादावपि तेषां वर्जनात् । सूचिता इति । न त्वेषां विषयविभागप्रदर्शनेनानित्यत्वं भिन्नवृत्तादिदोषेभ्यो विविक्तं प्रदर्शितम्। नापि गुणेभ्यो व्यतिरिक्तत्वम् । बीभत्सहास्यरौद्रादौ त्वेषामस्माभिरुपगमात् शृङ्गारादौ च वर्जनादनित्यत्वं च दोषत्वं च समर्थितमेवेति भावः ॥ ११ ॥ हैं, जैसे 'कुरु रुचिम्' इस क्रम को बदल देने पर । 'श्रुतिकष्ट' है, 'अधाक्षीत्' 'अक्षोत्सीत्', 'तृणेढि' इत्यादि । उचित रस के उपलक्षण के लिए 'शृङ्गार' का प्रयोग किया है । वीर, शान्त, अद्भुत आदि रसों में भी उन (दोषों) का वर्जन है । सूचित—। न कि विषय-विभाग दिखाने से इन के अनित्यत्व को भिन्नवृत्त आदि दोषों से अलग दिखाया गया है । और न कि इनका गुणों से व्यतिरिक्तत्व भी बताया है । बीभत्स, हास्य और रौद्र आदि में इन दोषों को हमने स्वीकार किया है और शृङ्गार आदि में इनका वर्जन किया है, अतः इनके अनित्यत्व और दोषत्व का समर्थन ही किया है ॥ ११ ॥


गुण और अनुप्रासादि अलङ्कार दोनों ही समवाय सम्बन्ध से रहते हैं। लौकिक गुण और अलङ्कार में भेद अवश्य है, किन्तु काव्य के गुण और अलङ्कार में भेद की कल्पना गड्डुलिका-प्रवाह (भेड़चाल) है। आलोक और लोचन में गुण को रसनिष्ठ धर्म एवं अलङ्कार को शब्द-अर्थनिष्ठ धर्म माना है, इस प्रकार आश्रयभेद से भेद है। प्रस्तुत ग्रन्थ में माधुर्य, ओजस् और प्रसाद ये तीन ही गुण माने हैं। जो कि प्राचीन ग्रन्थों में दस शब्द-गुण और दस अर्थ-गुणों का उल्लेख मिलता है उसका अन्तर्भाव, जैसा कि 'काव्यप्रकाश' में बताया गया है इन्हीं तीन गुणों में हो जाता है। यह विषय 'काव्य-प्रकाश' (अष्टम उल्लास) से विदित कर लेना चाहिए ।

द्वितीय उद्योतः २२७ ध्वन्यालोकः तस्याङ्गानां प्रभेदा ये प्रभेदाः स्वगताश्च ये । तेषामा build... तेषामानन्त्यमन्योन्यसम्बन्धपरिकल्पने ॥ १२ ॥ अङ्गितया व्यङ्ग्यो रसादिर्विवक्षितान्यपरवाच्यस्य ध्वनेरेक आत्मा य उक्तस्तस्याङ्गानां वाच्यवाचकानुपातिनामलङ्काराणां ये प्रभेदा निर- वधयो ये च स्वगतास्तस्याङ्गिनोऽर्थस्य रसभावतदाभासतत्प्रशमलक्षणा विभावा Vig... विभावानुभावव्यभिचारिप्रतिपादनसहिता अनन्ताः स्वाश्रयापेक्षया उसके अङ्गों के जो प्रभेद हैं और जो स्वगत प्रभेद हैं, परस्पर सम्बन्ध की परि- कल्पना करने पर उनका आनन्त्य हो जायगा ॥ १२ ॥ अङ्गी होने के कारण व्यंग्य जो रसादि विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का एक आत्मा कहा गया है, उसके वाच्य-वाचक के कारण होनेवाले अङ्गों के जो अनन्त प्रभेद हैं और जो स्वगत प्रभेद हैं उस अङ्गी रूप अर्थ के रस, भाव, रसाभास, भावा- भास, भावप्रशम रूप विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी के प्रतिपादन के साथ अनन्त, लोचनम् अङ्गानामित्यलङ्काराणाम् । स्वगता इति । आत्मगताः सम्भोगविप्रल- म्भाद्या आत्मीयगता विभावादिगतास्तेषां लोष्टप्रस्तारेणाङ्गाङ्गिभावे का गण- नेति भावः । स्वाश्रयः स्त्रीपुंसप्रकृत्यौचित्यादिः । परस्परं प्रेम्णा दर्शनमित्यु- पलक्षणं सम्भाषणादेरपि । सुरतं चातुःषष्टिकमालिङ्गनादि । विहरणमुद्यान- गमनम् । आदिग्रहणेन जलक्रीडापानकचन्द्रोदयक्रीडादि । अभिलापविप्रलम्भो द्वयोरप्यन्योन्यजीवितसर्वस्वाभिमानात्मिकायां रतावुत्पन्नायामपि कुतश्चिद्धेतो- अङ्गों के अर्थात् अलङ्कारों के । स्वगत—। अर्थात् आत्मगत, सम्भोग, विप्रलम्भ आदि आत्मीयगत, विभावादिगत । भाव यह कि इनके लोष्टप्रस्तार से अङ्गाङ्गिभाव की कल्पना करने पर कोई गणना नहीं। स्वाश्रय (अपना आश्रय), अर्थात् स्त्री, पुरुष की प्रकृति का औचित्य आदि। परस्पर प्रेम से दर्शन; यह सम्भाषण आदि का उपलक्षण है। आलिङ्गन आदि १चौंसठ प्रकार का सुरत । विहरण अर्थात् उद्यानगमन । 'आदि' ग्रहण से जलक्रीडा, पानक, चन्द्रोदयक्रीडा आदि । दोनों (नायक और नायिका) के एक-दूसरे को अपना जीवितसर्वस्व के अभिमान रूप रति के उत्पन्न हो जाने पर भी किसी कारणवश समागम के प्राप्त न होने पर 'अभिलाषविप्रलम्भ' १. वात्स्यायन के 'कामसूत्र' में ६४ प्रकार के सुरत का वर्णन है—आलिङ्गनचुम्बननखच्छेद- दशनच्छेदसंवेशनसीत्कृतपुरुषायितौपरिष्टकानामष्टानामष्टधा विकल्पभेदादष्टावष्टकाश्चतुष्षष्टिरिति वा- भ्रवीयाः' (२. २. ४) । ये आलिङ्गन आदि आठ अपने-अपने आठ-आठ प्रभेदों के द्वारा सब मिल कर ६४ प्रकार के होते हैं। प्रत्येक का कामसूत्र में लक्षण भी निर्दिष्ट है।

२२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः निःसीमानो विशेषास्तेषामन्योन्यसम्बन्धपरिकल्पने क्रियमाणे कस्यचिद्- न्यतमस्यापि रसस्य प्रकाराः परिसङ्ख्यातुं न शक्यन्ते किमुत सर्वेषाम् । तथा हि शृङ्गारस्याङ्गिनस्तावदाद्यौ द्वौ भेदौ-सम्भोगो विप्रलम्भश्च । सम्भोगस्य च परस्परप्रेमदर्शनसुरतविहरणादिलक्षणाः प्रकाराः । विप्रलम्भस्याप्यभिलाषेर्ष्याविरहप्रवासविप्रलम्भादयः । तेषां च प्रत्येकं अपने आश्रय की अपेक्षा निःसीम विशेष हैं, उनके परस्पर सम्बन्ध की कल्पना करने पर किसी एक भी रस के प्रकार गिनाये नहीं जा सकते, सबों की तो बात क्या ? जैसा कि अङ्गी शृङ्गार के पहले दो भेद हैं—सम्भोग और विप्रलम्भ । सम्भोग के परस्पर प्रेम से दर्शन, सुरत, विहरण आदि रूप प्रकार हैं। विप्रलम्भ के भी अभि- लाष, ईर्ष्या, विरह, प्रवास, विप्रलम्भ आदि (प्रकार) हैं। विभाव, अनुभाव, लोचनम् रप्राप्तसमागमत्वे मन्तव्यः । यथा 'सुखयतीति किमुच्यत' इत्यतः प्रभृति वत्सराजरत्नावत्योः, न तु पूर्वं रत्नावल्याः । तदा हि रत्यभावे कामावस्थामात्रं तत् । ईर्ष्याविप्रलम्भः प्रणयखण्डनादिना खण्डितया सह । विरहविप्रलम्भः पुनः खण्डितया प्रसाद्यमानयापि प्रसादमगृह्णन्त्या ततः पश्चात्तापपरीतत्वेन विरहोत्कण्ठितया सह मन्तव्यः । प्रवासविप्रलम्भः प्रोषितभर्तृकया सहेति विभागः । आदिग्रहणाच्छापादिकृतः, विप्रलम्भ इव च विप्रलम्भः। वञ्च- नायां ह्यभिलषितो विषयो न लभ्यते; एवमत्र । तेषां चेति । एकत्र सम्भोगा- दीनामपरत्र विभावादीनाम् । आश्रयो मलयादिः मारुतादीनां विभावाना- मिति यदुच्यते तद्देशशब्देन गतार्थम् । तस्मादाश्रयः कारणम् । यथा ममैव— माना जाना चाहिए। जैसे, 'सुखयतीति किमुच्यते' इससे लेकर वत्सराज और रत्नावली का, न कि पहले रत्नावली का। क्योंकि उस समय रति नहीं है, वह सिर्फ कामावस्था है। खण्डिता नायिका के साथ प्रणय के खण्डन आदि से 'ईर्ष्याविप्रलम्भ' है । 'खण्डिता' अवस्था में प्रसन्न करने की चेष्टा करने पर भी प्रसन्न न होती हुई, उसके कारण पश्चात्ताप में पड़ी होने से 'विरहोत्कण्ठिता' नायिका के साथ 'विरहविप्रलम्भ' मान जाना चाहिए। 'प्रोषितभर्तृका' नायिका के साथ 'प्रवासविप्रलम्भ' होता है, यह (इनका) विभाग है। आदि ग्रहण से शाप आदि द्वारा किया हुआ। विप्रलम्भ के समान विप्रलम्भ है, क्योंकि वञ्चना में अभिलषित विषय प्राप्त नहीं होता, इसी प्रकार यहाँ (अभिलषित विषय प्राप्त नहीं होता, अतः वञ्चनार्थक 'विप्रलम्भ' शब्द का प्रयोग किया है)। उनका—। एकत्र सम्भोग आदि का, अपरत्र विभाव आदि का। मारुत आदि विभावों का आश्रय मलय आदि जो कहा है वह 'देश' शब्द से गतार्थ है। इसलिए आश्रय अर्थात् कारण। जैसा कि मेरा ही—

द्वितीय उद्योतः २२९ ध्वन्यालोकः विभावानुभावव्यभिचारिभेदः । तेषां च देशकालाद्याश्रयावस्थाभेद इति स्वगतभेदापेक्षयैकस्य तस्यापरिमेयत्वम्, किं पुनरङ्गप्रभेदकल्प- नायाम् । ते ह्यङ्गप्रभेदाः प्रत्येकमङ्गिप्रभेदसम्बन्धपरिकल्पने क्रियमाणे सत्यानन्त्यमेवोपयान्ति ॥ १२ ॥ दिङ्मात्रं तूच्यते येन व्युत्पन्नानां सचेतसाम् । बुद्धिरासादितालोका सर्वत्रैव भविष्यति ॥ १३ ॥ व्यभिचारी के अनुसार उनका अलग-अलग भेद है । उनका भी देश, काल आदि आश्रय एवं अवस्था के अनुसार भेद है, इस प्रकार स्वगत भेद की अपेक्षा से ही उसका एक ( भेद ) अपरिमेय हो जाता है, फिर अङ्गों के प्रभेद की कल्पना की बात क्या ? अङ्गों के वे प्रभेद अलग-अलग अङ्गी के प्रभेदों के सम्बन्ध की कल्पना की जाने पर आनन्त्य ही को प्राप्त करते हैं ॥ १२ ॥ केवल दिङ्मात्र कहते हैं, जिससे व्युत्पन्न सचेतस जनों की बुद्धि सर्वत्र ही प्राप्तालोक हो जायगी ॥ १३ ॥ लोचनम् दयितया ग्रथिता स्रगियं मया हृदयधामनि नित्यनियोजिता । गलति शुष्कतयापि सुधारसं विरहदाहरुजां परिहारकम् ॥ तस्येति शृङ्गारस्य। अङ्गिनां रसादीनां प्रभेदस्तत्सम्बन्धकल्पनेत्यर्थः ॥१२॥ येनेति । दिङ्मात्रोक्तेनेत्यर्थः । सचेतसामिति । महाकवित्वं सहृदयत्वं च प्रेप्सूनामिति भावः । सर्वत्रेति । सर्वेषु रसादिष्वासादित आलोकोऽवगमः सम्यग्व्युत्पत्तिर्ययेति सम्बन्धः ॥ १३ ॥ प्रिया के द्वारा गूथी गई इस माला को मैंने अपने हृदय पर रख लिया है, ( विरह- ताप के कारण ) यह सूख जाने पर भी विरह के दाह को दूर करने वाले सुधारस को स्रावित कर रही है । उसका शृङ्गार का ! अङ्गी रस आदि का प्रभेद अर्थात् उनके सम्बन्ध की कल्पना ॥ १२ ॥ जिससे—अर्थात् 'दिङ्मात्र' कहने से । सचेतस जनों की—। भाव यह कि महा- कवित्व और सहृदयत्व प्राप्त करने की इच्छा वालों की । सर्वत्र—। सभी रसों में प्राप्त किया है आलोक या अवगम अर्थात् सम्यक् व्युत्पत्ति को जिसने ॥ १३ ॥

२३० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः दिङ्मात्रकथनेन हि व्युत्पन्नानां सहृदयानामेकत्रापि रसभेदे सहालङ्कारैरङ्गाङ्गिभावपरिज्ञानादासादितालोका बुद्धिः सर्वत्रैव भविष्यति । तत्र— शृङ्गारस्याङ्गिनो यत्नादेकरूपानुबन्धवान् । सर्वेष्वेव प्रभेदेषु नानुप्रासः प्रकाशकः ॥ १४ ॥ अङ्गिनो हि शृङ्गारस्य ये उक्ताः प्रभेदास्तेषु सर्वेष्वेकप्रकारानु- बन्धितया प्रबन्धेन प्रवृत्तोऽनुप्रासो न व्यञ्जकः । अङ्गिन इत्यनेनाङ्ग- भूतस्य शृङ्गारस्यैकरूपानुबन्ध्यनुप्रासनिबन्धने कामचारमाह ॥ १४ ॥ ध्वन्यात्मभूते शृङ्गारे यमकादिनिबन्धनम् । शक्तावपि प्रमादित्वं विप्रलम्भे विशेषतः ॥ १५ ॥ 'दिङ्मात्र' कह देने से व्युत्पन्न सहृदय जनों की बुद्धि एक भी रसभेद में अलङ्कारों के साथ अङ्गाङ्गिभाव के परिज्ञान से सर्वत्र ही प्राप्तालोक हो जायगी ॥ १३ ॥ वहाँ— अङ्गी शृङ्गार के सभी प्रभेदों में यत्नपूर्वक एक प्रकार के अनुबन्ध वाला अनुप्रास प्रकाशक नहीं होता ॥ १४ ॥ अङ्गी शृङ्गार के जो प्रभेद कहे गए हैं उन सभी में एक प्रकार के अनुबन्धी रूप से प्रवृत्त अनुप्रास व्यञ्जक नहीं होता । 'अङ्गी' इससे अङ्गभूत शृङ्गार एक प्रकार के अनुबन्ध वाले अनुप्रास के निबन्धन में स्वेच्छाचार कहा है ॥ १४ ॥ ध्वनि के आत्मभूत शृङ्गार में यमक आदि का निबन्धन शक्ति होने पर भी प्रमादित्व का सूचक है, विशेष रूप से विप्रलम्भ में ॥ १५ ॥ लोचनम् तत्रेति । वक्तव्ये दिङ्मात्रे सतीत्यर्थः । यत्नादिति । यत्नतः क्रियमाणत्वा- दिति हेत्वर्थोऽभिप्रेतः । एकरूपं त्वनुबन्धं त्यक्त्वा विचित्रोऽनुप्रासो निबध्य- मानो न दोषायेत्येकरूपग्रहणम् ॥ १४ ॥ यमकादीत्यादिशब्दः प्रकारवाची । दुष्करं मुरजचक्रबन्धादि । शब्दभङ्ग- वहाँ—। अर्थात् दिङ्मात्र वक्तव्य के होने पर । यत्नपूर्वक—। अर्थात् यत्नपूर्वक किए जाने होने के कारण, यह हेत्वर्थ अभिप्रेत है । एक प्रकार का अनुबन्ध छोड़ कर निबध्यमान विचित्र अनुप्रास दोषावह नहीं होता, इसलिए 'एक प्रकार' का ग्रहण किया ॥ १४ ॥ 'यमकादि' यहां 'आदि' शब्द प्रकार (सादृश्य) के अर्थ में है । दुष्कर, अर्थात् मुरजबन्ध, चक्रबन्ध आदि । शब्दभङ्गश्लेष—। 'अर्थश्लेष' दोषावह नहीं होता,

द्वितीय उद्योतः २३१ ध्वन्यालोकः ध्वनेरात्मभूतः शृङ्गारस्तात्पर्येण वाच्यवाचकाभ्यां प्रकाश्यमान- स्तस्मिन्द्यमकादीनां यमकप्रकाराणां निबन्धनं दुष्करशब्दभङ्गश्लेषादीनां शक्तावपि प्रमादित्वम् । 'प्रमादित्व' मित्यनेनैतद्दर्शयते—काकतालीयेन कदाचित्कस्यचिदेकस्य यमकादेर्निष्पत्तावपि भृशमलङ्कारान्तरवद्र- साङ्गत्वेन निबन्धो न कर्तव्य इति । 'विप्रलम्भे विशेषत' इत्यनेन विप्रलम्भे सौकुमार्यातिशयः ख्याप्यते । तस्मिन्द्योत्ये यमकादेरङ्गस्य निबन्धो नियमान्न कर्तव्य इति ॥ १५ ॥ अत्र युक्तिरभिधीयते— रसाक्षिप्ततया यस्य बन्धः शक्यक्रियो भवेत् । अपृथग्यत्ननिर्वर्त्यः सोऽलङ्कारो ध्वनौ मतः ॥ १६ ॥ ध्वनि का आत्मभूत शृङ्गार तात्पर्य रूप से शब्द और अर्थ द्वारा प्रकाशित होता है, उसमें यमक आदि यमक के प्रकारों का निबन्धन दुष्कर, शब्द-भङ्गश्लेष आदि की शक्ति होने पर भी प्रमादित्व का सूचक है । 'प्रमादित्व' से यह दिखाते हैं— काकतालीय के प्रकार से कभी किसी एक 'यमक' आदि की निष्पत्ति होने जाने पर भी बाहुल्यपूर्वक दूसरे अलङ्कारों की भांति रस के अङ्ग रूप से निबन्ध नहीं करना चाहिए । 'विशेष रूप से विप्रलम्भ में' इस ( कथन ) से विप्रलम्भ में अतिशय सौकुमार्य व्यक्त किया है। जब कि उसका ( विप्रलम्भ का ) द्योतन किया जाय, तब यमक आदि अङ्ग का निबन्धन नियमतः नहीं करना चाहिए ॥ १५ ॥ यहां युक्ति कहते हैं— ध्वनि में वह अलङ्कार माना गया है, जिसका प्रयोग रसाक्षिप्त रूप से किया जा सके और जो बिना किसी अलग यत्न के प्राप्त हो जाय ॥ १६ ॥ लोचनम् श्लेष इति । अर्थश्लेषो न दोषाय 'रक्तस्त्वम्' इत्यादौ; शब्दभङ्गोऽपि क्लिष्ट एव दुष्टः, न त्वशोकादौ ॥ १५ ॥ युक्तिरिति । सर्वव्यापकं वस्तुत्वत्यर्थः । रसेति । रससमवधानेन विभावा- दिघटनामेव कुर्वंस्तन्नान्तरीकतया यमासादयति स एवात्रालङ्कारो रसमार्गे, 'रक्तस्त्वं०' इत्यादि में; शब्दभङ्ग भी क्लिष्ट होकर ही दोषयुक्त होता है, न कि 'अशोक' इत्यादि में ॥ १५ ॥ युक्ति—। अर्थात् सर्वव्यापक वस्तु । रस—। रस में सम्यक् अवधानपूर्वक विभाव आदि की घटना ही करता हुआ उस ( विभावादि की घटना ) के नान्तरीयक ( अर्थात् व्याप्त ) रूप से जिसको प्राप्त करता है वही इस रस के मार्ग में अलङ्कार होता है,

२३२ | सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः निष्पत्तावाश्चर्यभूतोऽपि यस्यालङ्कारस्य रसाक्षिप्ततयैव बन्धः शक्यक्रियो भवेत्सोऽस्मिन्नलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्ये ध्वनावलङ्कारो मतः। तस्यैव रसाङ्गत्वं मुख्यमित्यर्थः। · यथा— कपोले पत्राली करतलनिरोधेन मृदिता निष्पत्ति में आश्चर्यभूत होने पर भी जिस अलङ्कार का निबन्धन रसाक्षिप्त रूप से ही किया जा सके वह इस अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि में अलङ्कार माना गया है, अर्थात् उसीका रसाङ्गत्व मुख्य है। जैसे— कपोल में बनी पत्रावली को हाथ की रगड़ से मसल डाला है, निश्वासों ने अमृत के लोचनम् नान्यः। तेन वीराद्भुतादिरसेष्वपि यमकादि कवेः प्रतिपत्तुश्च रसविघ्नकार्य्येव सर्वत्र। गड्डुरिकाप्रवाहोपहतसहृदयधुराधिरोहणविहीनलोकावर्जनाभिप्रायेण तु मया शृङ्गारे विप्रलम्भे च विशेषत इत्युक्तमिति भावः। तथा च 'रसेऽ- ङ्गत्वं तस्मादेषां न विद्यते' इति सामान्येन वक्ष्यति। निष्पत्ताविति। प्रति- भानुग्रहात्स्वयमेव सम्पत्तौ निष्पादनानपेक्षायामित्यर्थः। आश्चर्यभूत इति। कथमेष निबद्ध इत्यद्भुतस्थानम्। करकिसलयन्यस्तवदना श्वासतान्ताधरा प्रवर्तमानबाष्पभरनिरुद्धकण्ठी अविच्छिन्नरुदितचञ्चत्कुचतटा रोषमपरित्यजन्ती चाटूक्त्या यावत्प्रसाद्यते तावदीर्ष्याविप्रलम्भगतानुभावचर्वणावहितचेतस एव वक्तुः श्लेषरूपकव्यतिरेकाद्या अयत्ननिष्पन्नाश्चर्वयितुरपि न रसचर्वणाविघ्नमा- अन्य नहीं। इस लिए वीर, अद्भुत आदि रसों में ही सर्वत्र यमक आदि कवि के और प्रतिपत्ता (जानकार) सहृदय के रसविघ्न करने वाला ही है। भाव यह कि मैंने भेड़ के पीछे गमन करने वाली भेड़ों की पंक्ति के प्रवाह (परम्परा) के शिकार और सहृदय की मर्यादा तक न पहुंचे हुए लोगों के आवर्जन के अभिप्राय से 'शृङ्गार में और विशेष रूप से विप्रलम्भ में' यह कहा है। और इस लिए 'रस में अङ्गत्व इस कारण इनका नहीं सम्भव है' यह सामान्य रूप से कहेंगे। निष्पत्ति में—। प्रतिभा के अनुग्रह से स्वयमेव (बिना किसी यत्न के) सम्पन्न होने में, अर्थात् निष्पन्न करने की अपेक्षा के न होने पर। आश्चर्यभूत—। कैसे यह निबद्ध हो गया, इस प्रकार अद्भुत का स्थान। अपने करकिसलय पर मुख रखे, श्वास से मुर्झाए अधर वाली, उत्पन्न बाष्पसमूह से रुंधे गले वाली, निरन्तर रोते रहने से कांपते हुए स्तनों वाली, रोष का त्याग न करती हुई नायिका को चाटुवचन से जब तक प्रसन्न करते हैं, तब तक ईर्ष्याविप्रलम्भ के अनुभावों की चर्वणा (पुनः पुनः अनुसन्धान) में अवहित चित्त वाले वक्ता के श्लेष, रूपक, व्यतिरेक आदि अयत्ननिष्पन्न अलङ्कार चर्वणा करने वाले के

द्वितीय उद्योतः २३३ ध्वन्यालोकः निपीतो निःश्वासैरयममृतहृद्योऽधररसः । मुहुः कण्ठे लग्नस्तरलयति बाष्पस्तनतटीं प्रियो मन्युर्जातस्तव निरनुरोधे न तु वयम् ॥ रसाङ्गत्वे च तस्य लक्षणमपृथग्यत्ननिर्वर्त्यत्वमिति यो रसं बन्धु- मध्यवसितस्य कवेरलङ्कारस्तां वासनामत्यूह्य यत्नान्तरमास्थितस्य निष्पद्यते स न रसाङ्गमिति । यमके च प्रबन्धेन बुद्धिपूर्वकं क्रियमाणे नियमेनैव यत्नान्तरपरिग्रह आपतति शब्दविशेषान्वेषणरूपः । अलङ्कारान्तरेष्वपि तत्तुल्यमिति चेत्—नैवम्; अलङ्कारान्तराणि हि निरूप्यमाणदुर्घटनान्यपि रससमाहितचेतसः प्रतिभानवतः कवेरह- समान मधुर (तेरे) अधररस को पान कर लिया है, (तेरे) कण्ठ का आलिङ्गन किया हुआ बाष्प स्तनभाग को कम्पित कर रहा है, अरी निर्दय, तेरा प्रिय क्रोध हो गया है, हम नहीं ! रस के अङ्ग होने में 'अपृथग्यत्ननिर्वर्त्यत्व' (अलग से यत्न किए बिना ही सम्पन्न हो जाना) उस (अलङ्कार) का लक्षण है। इस प्रकार जो (अलङ्कार) कवि रस के निबन्धनाथं प्रयत्नशील है, उसकी उस वासना को अतिक्रमण करके उसके अतिरिक्त यत्न करने पर निष्पन्न होता है वह रस का अङ्ग नहीं है। बुद्धिपूर्वक प्रबन्ध से (जम कर) यमक के किए जाने पर नियमतः ही यत्नान्तर का ग्रहण, जिसमें विशेष शब्द का अन्वेषण होता है, करना पड़ता है। अन्य अलङ्कारों में भी वह बराबर है, ऐसा नहीं; क्योंकि अन्य अलङ्कार निरूपण की स्थिति में दुर्घटन होने पर भी रस में लोचनम् दधतीति । लक्षणमिति । व्यापकमित्यर्थः । 'प्रबन्धेन क्रियमाण' इति सम्बन्धः । अत एव बुद्धिपूर्वकत्वमवश्यम्भावीति बुद्धिपूर्वकशब्द उपात्तः । रससमवधानादन्यो यत्नो यत्नान्तरम् । निरूप्यमाणानि सन्ति दुर्घटनानि । बुद्धिपूर्वं चिकीर्षितान्यपि कर्तुमशक्यानीत्यर्थः । तथा निरूप्यमाणे दुर्घट- नानि कथमेतानि रचितानीत्येवं विस्मयावहानीत्यर्थः । अहम्पूर्वः अग्रद्य भी रसचर्वणा में विघ्न आधान नहीं करते। लक्षण—। अर्थात् व्यापक । सम्बन्ध यह कि 'प्रबन्ध से (जमकर) करने पर' । इसलिए ही बुद्धिपूर्वक होना अवश्यम्भावी हो जाता है, अतः 'बुद्धिपूर्वक' शब्द का उपादान किया है । रस में समवधान से अतिरिक्त यत्न यत्नान्तर है । निरूप्यमाण होते हुए दुर्घटन, अर्थात् बुद्धिपूर्वक चिकीर्षित होने पर भी नहीं किए जा सकने वाले । उस प्रकार, निरूप्यमाण होने पर दुर्घटन, अर्थात् कैसे ये बन गए. इस प्रकार विस्मय उत्पन्न करने वाले । अहम्पूर्व अर्थात्

२३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः म्पूर्वकिया परापतन्ति । यथा कादम्बर्यां कादम्बरीदर्शनावसरे । यथा च मायारामशिरोदर्शनेन विह्वलायां सीतादेव्यां सेतौ । युक्तं चैतत् , यतो रसा वाच्यविशेषैरेवाक्षेप्स्याः । तत्प्रतिपादकैश्च शब्दैस्तत्प्रकाशिनो वाच्यविशेषा एव रूपकादयोऽलङ्काराः । तस्मान्न तेषां बहिरङ्गत्वं रसाभिव्यक्तौ । यमकदुष्करमार्गेषु तु तत्स्थितमेव । यत्तु रसवन्ति कानिचिद्यमकादीनि दृश्यन्ते, तत्र रसादीनामङ्गता यमकादीनां त्वङ्गित्वैव । रसाभासे चाङ्गत्त्वमप्यविरुद्धम् । अङ्गितया तु व्यङ्ग्ये रसे नाङ्गत्त्वं पृथक्प्रयत्ननिर्वर्त्यत्वाद्यमकादेः । अस्यैवार्थस्य सङ्ग्रहश्लोकाः— रसवन्ति हि वस्तूनि सालङ्काराणि कानिचित् । एकेनैव प्रयत्नेन निर्वर्त्यन्ते महाकवेः ॥ समाहित चित्त वाले एवं प्रतिभानसम्पन्न कवि के पास अहमहं करके दौड़ पड़ते हैं । जैसे, 'कादम्बरी' में कादम्बरी के दर्शन के अवसर में । और जैसे, 'सेतु' ('सेतुबन्ध' महाकाव्य ) में माया से बने राम के सिर देखने से सीता देवी के विह्वल होने पर । और यह ठीक है, क्योंकि रस वाच्यविशेष द्वारा ही आक्षिप्त होते हैं । उन (वाच्यविशेष) के प्रतिपादक शब्दों से उनको प्रकाशित करने वाले 'रूपक' आदि अलङ्कार वाच्यविशेष ही हैं, इसलिए रस की अभिव्यक्ति में वे बहिरङ्ग नहीं हैं । 'यमक' और 'दुष्कर' के मार्गों में तो वह बात है ही । जो कि कुछ 'यमक' आदि रसवान् दिखते हैं, वहां रस आदि अङ्ग हैं और 'यमक' आदि का तो अङ्गित्व ही है । रसाभास की स्थिति में (उनका) अङ्गत्व भी विरुद्ध नहीं । अङ्गी रूप से रस के व्यङ्ग्य होने पर यमक आदि (अलङ्कार) अङ्ग नहीं होते, क्यों कि वे 'पृथग्यत्ननिर्वर्त्य' होते हैं । इसी अर्थ (विषय) के सङ्ग्रह-श्लोक हैं— कुछ अलङ्कारयुक्त रसवान् वस्तुएं महाकवि के एक ही प्रयत्न से निर्वृत्त हो जाती हैं। लोचनम् इत्यर्थः । अहमादावहमादौ प्रवर्त्त इत्यर्थः । अहम्पूर्व इत्यस्य भावोऽहम्पूविका । अहमिति निपातो विभक्तिप्रतिरूपकोऽस्मदर्थवृत्तिः । एतदिति । अहंपूर्विकया परापतनमित्यर्थः । कानिचिदिति । कालिदासादिकृतानीत्यर्थः । शक्तस्यापि अगिला । अर्थात् मैं पहले, मैं पहले होऊंगा । अहम्पूर्व का भाव अहम्पूविका । 'अहम्' यह 'अस्मत्' अर्थ में विभक्तिप्रतिरूपक निपात है । यह—। अर्थात् अहम्पूर्वभाव से पराप- तन । कुछ—। अर्थात् कालिदास आदि के द्वारा कृत । सम्बन्ध यह है कि समर्थ होने

द्वितीय उद्योतः २३५ ध्वन्यालोकः यमकादिनिबन्धे तु पृथग्यत्नोऽस्य जायते । शक्तस्यापि रसेऽङ्गत्वं तस्मादेषां न विद्यते ॥ रसाभासाङ्गभावस्तु यमकादेर्न वार्यते । ध्वन्यात्मभूते शृङ्गारे त्वङ्गता नोपपद्यते ॥ १६ ॥ इदानीं ध्वन्यात्मभूतस्य शृङ्गारस्य व्यञ्जकोऽलङ्कारवर्ग आख्यायते - ध्वन्यात्मभूते शृङ्गारे समीक्ष्य विनिवेशितः । रूपकादिरलङ्कारवर्ग एति यथार्थताम् ॥ १७ ॥ अलङ्कारो हि बाह्यालङ्कारसाम्यादङ्गिनश्चारुत्वहेतुरुच्यते । वाच्या- यमक आदि (अलङ्कारों) के निबन्धन में समर्थ होने पर भी इसका (महाकवि का) अलग यत्न होता है, इस कारण रस में इनका अङ्गत्व नहीं होता है । यमक आदि का रसाभास में अङ्गत्व का वारण नहीं है, परन्तु, ध्वनि के आत्मभूत शृङ्गार में (यमक आदि) का अङ्गत्व उपपन्न नहीं ॥ १६ ॥ अब ध्वनि के आत्मभूत शृङ्गार को व्यञ्जित करने वाला अलङ्कारवर्ग कहते हैं । ध्वनि के आत्मभूत शृङ्गार में, समीक्षा करके निवेशित किया गया रूपक आदि अलङ्कारवर्ग यथार्थता प्राप्त करता है ॥ १७ ॥ अलङ्कार बाह्य अलङ्कारों के समान अङ्गी का चारुत्वहेतु (शोभाधायक) कहा लोचनम् पृथग्यत्नो जायत इति सम्बन्धः । एषामिति । यमकादीनाम् । 'ध्वन्यात्म- भूते शृङ्गारे' इति यदुक्तं तत् प्राधान्येनार्थश्लोकेन सङ्गृहीते ध्वन्यात्मभूत इति ॥ १६ ॥ इदानीमिति । हेयवर्ग उक्तः, उपादेयवर्गस्तु वक्तव्य इति भावः । व्यञ्जक इति । यश्च यथा चेत्यध्याहारः । यथार्थतामिति । चारुत्वहेतुतामित्यर्थः । उक्त इति । भामहादिभिरलङ्कारलक्षणकारैः । वक्ष्यते चेत्यत्र हेतुमाह- पर भी अलग से यत्न होता है । इनका- । यमक आदि का । 'ध्वनि के आत्मभूत शृङ्गार में' यह जो कहा है, वह प्रधानतया आधे श्लोक से संगृहीत 'ध्वनि के आत्मभूत' (शृङ्गार में) ॥ १६ ॥ अब- । भाव यह कि हेय वर्ग कहा जा चुका, उपादेय वर्ग कहना चाहिए । व्यञ्जित करने वाला- । 'जो है और जैसा है' यह अध्याहार है । यथार्थता- । अर्थात् चारुत्वहेतुता । कहा गया है- । भामह आदि अलङ्कारलक्षणकारों द्वारा । 'और

२३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः लङ्कारवर्गश्च रूपकादिर्यावानुक्तो वक्ष्यते च कैश्चित् , अलङ्काराणा- मनन्तत्वात् । स सर्वोऽपि यदि समीक्ष्य विनिवेश्यते तदलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य ध्वनेरङ्गिनः सर्वस्यैव चारुत्वहेतुर्निष्पद्यते ॥ १७ ॥ एषा चास्य विनिवेशने समीक्षा— विवक्षा तत्परत्वेन नाङ्गित्त्वेन कदाचन । जाता है, वाच्यालङ्कारों (अर्थालङ्कारों) का वर्ग रूपक आदि जितना कहा गया है और कुछ लोग कहेंगे, क्योंकि अलङ्कार अनन्त हैं । वह सभी को यदि समीक्षा करके विनिवेशित किया जाय तो सभी अङ्गी अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि का चारुत्वहेतु ( शोभाधायक ) होंगे ॥ १७ ॥ उसके विनिवेशन में यह समीक्षा है— रूपक आदि की विवक्षा तत्परत्वेन (अर्थात् रसपरत्वेन) हो, कभी अङ्गो (प्रधान) लोचनम् अलङ्काराणामनन्तत्वादिति । प्रतिभानन्त्यात् अन्यैरपि भाविभिः कैश्चिदित्यर्थः ॥ समीक्ष्येति । समीक्ष्येत्यनेन शब्देन कारिकायामुक्तेति भावः । श्लोकपादेषु चतुर्षु श्लोकार्थे चाङ्गत्त्वसाधनमिदम्; रूपकादिरिति प्रत्येकं सम्बन्धः । यमल- ङ्कारं तदङ्गतया विवक्षति नाङ्गित्त्वेन, यमवसरे गृह्णाति, यमवसरे त्यजति, यं नात्यन्तं निर्वोढुमिच्छति, यं यत्नादङ्गत्वेन प्रत्यवेक्षते, स एवमुपनिबध्यमानो रसाभिव्यक्तिहेतुर्भवतीति विततं महावाक्यम् । तन्महावाक्यमध्ये चोदाहरणा- वकाशमुदाहरणस्वरूपं तद्योजनं तत्समर्थनं च निरूपयितुं ग्रन्थन्तरमिति वृत्ति- ग्रन्थस्य सम्बन्धः ॥ १७ ॥ कहेंगे' इसमें हेतु बताते हैं—क्यों कि अलङ्कार अनन्त होते हैं—। अर्थात् प्रतिभा के अनन्त होने के कारण अन्य उत्पन्न होने वाले कुछ लोग । समीक्ष्य—। भाव यह कि 'समीक्षा करने' ( 'समीक्ष्य' ) इस शब्द से कारिका में कही गई। श्लोक के चारों पादों में और श्लोकार्थ में यह अङ्गत्व का साधन ( निर्दिष्ट ) है; 'रूपक आदि' का प्रत्येक से सम्बन्ध है। विस्तृत महावाक्य यह हुआ कि जिस अलङ्कार को उसके ( रस के ) अङ्ग के रूप से विवक्षा करता है, अङ्गी के रूप से नहीं, जिसको अवसर में ग्रहण करता है, जिसको अवसर में त्याग करता है, जिसे अत्यन्त निर्वाह करने की इच्छा नहीं करता और जिसे यत्नपूर्वक अङ्ग रूप से देखता है, वह इस प्रकार उपनिबध्यमान होकर रस की अभिव्यक्ति का हेतु होता है । उस महावाक्य के बीच में उदाहरणों के अवकाश का, उनके स्वरूप का, उनकी सङ्गति का और उनके समर्थन का निरूपण करने के लिए शेष ग्रन्थ है, यह वृत्तिग्रन्थ का सम्बन्ध है ॥ १७ ॥

द्वितीय उद्योतः २३७ ध्वन्यालोकः काले च ग्रहणत्यागौ नातिनिर्वहणैषिता ॥ १८ ॥ निर्व्यूढावपि चाङ्गत्वे यत्नेन प्रत्यवेक्षणम् । रूपकादिरलङ्कारवर्गस्याङ्गत्वसाधनम् ॥ १९ ॥ रसबन्धेष्वादृतमनाः कविर्यमलङ्कारं तदङ्गतया विवक्षति । यथा— चलापाङ्गां दृष्टिं स्पृशसि बहुशो वेपथुमतीं रहस्याख्यायीव स्वनसि मृदु कर्णान्तिकचरः । रूप से (विवक्षा) न हो, समय से ग्रहण हो, और त्याग भी हो, दूर तक निर्वाह करने की इच्छा न हो, (उस प्रकार) निर्वाह हो जाने पर यत्नपूर्वक अङ्गरूप में ही देखना, यही रूपक आदि अलङ्कारवर्ग के अङ्ग होने का साधन है ॥ १८-१९ ॥ रस के निबन्धन में आदरयुक्त चित्त वाला कवि जिस अलङ्कार को उसके अङ्ग के रूप में विवक्षा करता है। जैसे— 'हे मधुकर, तू चंचल अपाङ्गों वाली और कांपती हुई (प्रिया की) दृष्टि को बहुत वार स्पर्श करता है, रहस्य की बात कहने वाले की भांति (उसके) कान के पास लोचनम् चलापाङ्गामिति । हे मधुकर, वयमेवंविधाभिलाषचाटुप्रवणा अपि तत्त्वा- न्वेषणाद्वस्तुवृत्तेऽन्विष्यमाणे हता आयासमात्रपात्रीभूता जाताः । त्वं खल्विति निपातेनायत्नसिद्धं तवैव चरितार्थत्वमिति शकुन्तलां प्रत्यभिलाषिणो दुष्यन्त- स्येयमुक्तिः । तथाहि—कथमेतदीय कटाक्षगोचरा भूयास्म, कथमेषास्मदभि- प्रायव्यञ्जकं रहोवचनमाकर्ण्यात्, कथं नु हठादनिच्छन्त्या अपि परिचुम्बनं विधेयास्मेति यदस्माकं मनोराज्यपदवीमधिशेते तत्तवायत्नसिद्धम् । भ्रमरो हि नीलोत्पलधिया तदाशङ्काकरीं दृष्टिं पुनः पुनः स्पृशति । श्रवणावकाशपर्य- न्तत्वाच्च नेत्रयोरुत्पलशङ्कानपगमात्तत्रैव दन्ध्वन्यमान आस्ते । सहजसौकुमा- चञ्चल अपाङ्गों वाली—। हे मधुकर, इस प्रकार की इच्छा रखने वाले एवं चाटु- वचन में कुशल होकर भी तत्त्व के अन्वेषण से अन्विष्यमाण वस्तु के सम्बन्ध में हत हो गए (मारे गए) आयासमात्र के पात्र बने । (श्लोक में) 'खलु' इस निपात के प्रयोग से बिना यत्न के सिद्ध तुम्हारी ही चरितार्थता है, इस प्रकार शकुन्तला की अभिलाषा करने वाले दुष्यन्त की यह उक्ति है। जैसा कि कैसे हम इसके कटाक्षों के गोचर हों, कैसे यह हमारे अभिप्रायव्यञ्जक रहस्यवचन सुन ले, कैसे न चाहती हुई भी इसका हठपूर्वक परिचुम्बन हम करें, जो यह सब हमारे मनोराज्य में ही था, वह तेरे लिए अयत्नसिद्ध है। क्योंकि भौंरा उसकी दृष्टि को नीलोत्पल समझ कर बार-बार स्पर्श करता है, कानों तक खिंचे हुए नेत्रों में उसे उत्पल की शङ्का हो जाती है, इस कारण वह वहीं गुंजार कर रहा है, सहज सौकुमार्य के कारण उत्पन्न त्रास से कातर (प्रिया के) रतिनिधान-

२३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः करौ व्याधुन्वत्याः पिबसि रतिसर्वस्वमधरं वयं तत्त्वान्वेषान्मधुकर हतास्त्वं खलु कृती ॥ अत्र हि भ्रमरस्वभावोक्तिरलङ्कारो रसानुगुणः । 'नाङ्गत्वेने'ति न प्राधान्येन । कदाचिद्रसादितात्पर्येण विवक्षितो- ऽपि ह्यलङ्कारः कश्चिदङ्गत्वेन विवक्षितो दृश्यते । यथा— चक्राभिघातप्रसभाज्ञयैव चकार यो राहुवधूजनस्य । आलिङ्गानोद्दामविलासबन्ध्यं रतोत्सवं चुम्बनमात्रशेषम् ॥ जाकर कोमल आवाज करता है, हाथों को झकझोरती हुई उसके तू रतिसर्वस्व अधर का पान करता है, हम तो तत्त्व के अन्वेषण में मारे गए, परन्तु तू तो चरितार्थ हो गया ।' यहां भ्रमर-स्वभावोक्ति अलङ्कार रस के अनुगुण है । अङ्गीरूप से नहीं, अर्थात् प्रधानरूप से नहीं । क्योंकि कभी रस आदि के तात्पर्य से विवक्षित भी कोई अलङ्कार अङ्गीरूप से विवक्षित देखा जाता है । जैसे— जिस श्रीकृष्ण ने चक्र के प्रहाररूपी अपनी प्रसभ आज्ञा से ही राहु की स्त्रियों के रतोत्सव को आलिङ्गन के उद्दाम विलास से रहित एवं चुम्बनमात्र शेष कर दिया । लोचनम् र्यत्रासकातरायाश्च रतिनिधानभूतं विकसितारविन्दकुवलयामोदमधुरमधरं पिब- तीति भ्रमरस्वभावोक्तिरलङ्कारोऽङ्गतामेव प्रकृतरसस्योपगतः । अन्ये तु भ्रमर- स्वभावे उक्तिर्यस्येति भ्रमरस्वभावोक्तिरत्र रूपकव्यतिरेक इत्याहुः । चक्राभिघात एव प्रसभाज्ञा अलङ्घनीयो नियोगस्तया यो राहुदयितानां भूत, खिले हुए कमल और कुवलय की गन्ध के समान मधुर अधर का पान करता है, इस प्रकार भ्रमर-स्वभावोक्ति अलङ्कार प्रकृत रस का अङ्ग ही है । अन्य टीकाकार कहते हैं कि "भ्रमर के स्वभाव में उक्ति है जिसकी" वह भ्रमरस्वभावोक्ति, यहां रूपक के साथ व्यतिरेक है । चक्राभिघात१ ही प्रसभ आज्ञा अर्थात् अलङ्घनीय नियोग है, उससे जिसने राहु की १. प्रस्तुत पद्य में राहु के कण्ठच्छेद की घटना का निर्देश प्रकारान्तर से कथन रूप 'पर्यायोक्त' अलङ्कार का विषय है । समुद्र-मथन से प्राप्त अमृत के बटवारे में राहु-नामक दैत्य के द्वारा छिप कर पान कर लिए जाने पर मोहिनी रूप भगवान् विष्णु ने सूर्य और चन्द्र से इसका संकेत पा कर राहु का सिर अपने चक्र से काट लिया था, इस पौराणिक प्रसंग का यहाँ चित्रण है । राहु ने अमृत पान कर लिया था, इस लिए सिर मात्र अवशिष्ट हो गया । अब वह अपनी पत्नियों का उद्दाम आलिङ्गन नहीं करता, किन्तु चुम्बन मात्र में ही उसकी पत्नियों के रतोत्सव का पर्यवसान होता था ।

द्वितीय उद्योतः २३९

ध्वन्यालोकः
अत्र हि पर्यायोक्तस्याङ्गित्वेन विवक्षा रसादितात्पर्ये सत्यपीति ।
अङ्गत्वेन विवक्षितमपि यमवसरे गृह्णाति नानवसरे । अवसरे
गृहीतिर्यथा—
यहां रसादि के तात्पर्य होने पर भी पर्यायोक्त अलङ्कार की अङ्गीरूप से
विवक्षा है ।
अङ्गरूप से विवक्षित भी जिसको अवसर में ग्रहण करता है, अनवसर में नहीं ।
अवसर में ग्रहण, जैसे—
लोचनम्
रतोत्सवं चुम्बनमात्रशेषं चकार । यत आलिङ्गनमुद्दामं प्रधानं येषु विलासेषु
तैर्वन्ध्यः शून्योऽसौ रतोत्सवः । अत्राह कश्चित्—'पर्यायोक्तमेवात्र कवेः प्राधा-
न्येन विवक्षितं, न तु रसादि । तत्कथमुच्यते रसादितात्पर्ये सत्यपी'ति ।
मैवम् ; वासुदेवप्रतापो ह्यत्र विवक्षितः । स चात्र चारुत्वहेतुतया न चकास्ति,
अपि तु पर्यायोक्तमेव । यद्यपि चात्र काव्ये न काचिद्दोषशङ्का, तथापि दृष्टा-
न्तवदेतत्—यत्प्रकृतस्य पोषणीयस्य स्वरूपतिरस्कारकोऽङ्गभूतोऽप्यलङ्कारः
सम्पद्यते । ततश्च क्वचिदनौचित्यमागच्छतीत्ययं ग्रन्थकृत आशयः । तथा च
ग्रन्थकार एवमग्रे दर्शयिष्यति । महात्मनां दूषणोद्घोषणमात्मन एव दूषणमिति
नेदं दूषणोदाहरणं दत्तम् ।
स्त्रियों का रतोत्सव चुम्बनमात्रशेष कर दिया । क्यों कि वह रतोत्सव आलिङ्गन उद्दाम
अर्थात् प्रधान है जिन विलासों में, उनसे वन्ध्य अर्थात् शून्य (रहित) हो गया ।
यहां कोई कहता है—"पर्यायोक्त अलङ्कार ही यहां कवि का प्रधान रूप से विवक्षित
है, न कि रसादि, ऐसी स्थिति में 'रसादि के तात्पर्य होने पर भी' यह क्यों कहते हैं ?"
ऐसी बात नहीं; यहां वासुदेव (श्रीकृष्ण) का प्रताप विवक्षित है, परन्तु वह यहां
चारुत्वके हेतु रूप में प्रकाशित नहीं हो रहा है, अपितु 'पर्यायोक्त' ही प्रकाशित हो रहा
है । यद्यपि इस काव्य में कोई दोष की आशंका नहीं है, तथापि यह एक प्रकार का
दृष्टान्त है । ग्रन्थकार का यह आशय है कि अङ्गभूत भी अलङ्कार पोषणीय प्रस्तुत के
स्वरूप का तिरस्कारक हो जाता है, इस कारण कुछ अनौचित्य आ जाता है । जैसा
कि ग्रन्थकार इस प्रकार दिखाएंगे, कि महात्माओं (बड़े लोगों) के दोष कहना
अपना ही दोष हो जाता है, इसलिए यह दोष का उदाहरण नहीं दिया है ।

यहाँ अङ्गी रूप से पर्यायोक्त अलङ्कार ही विवक्षित है । यद्यपि रस में कवि का तात्पर्य प्रतीत होता है, क्योंकि श्रीकृष्ण का प्रताप यहाँ विवक्षित है, किन्तु वह देवविषय रति के व्यञ्जक होने के कारण यहाँ विशेष चारुत्वहेतु नहीं है, बल्कि पर्यायोक्त से ही यहाँ चारुता है । लोचनकार का कहना है कि इसे दोष का उदाहरण नहीं समझना चाहिए, क्योंकि ग्रन्थकार स्वयं आगे चल कर