ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २३३ ध्वन्यालोकः निपीतो निःश्वासैरयममृतहृद्योऽधररसः । मुहुः कण्ठे लग्नस्तरलयति बाष्पस्तनतटीं प्रियो मन्युर्जातस्तव निरनुरोधे न तु वयम् ॥ रसाङ्गत्वे च तस्य लक्षणमपृथग्यत्ननिर्वर्त्यत्वमिति यो रसं बन्धु- मध्यवसितस्य कवेरलङ्कारस्तां वासनामत्यूह्य यत्नान्तरमास्थितस्य निष्पद्यते स न रसाङ्गमिति । यमके च प्रबन्धेन बुद्धिपूर्वकं क्रियमाणे नियमेनैव यत्नान्तरपरिग्रह आपतति शब्दविशेषान्वेषणरूपः । अलङ्कारान्तरेष्वपि तत्तुल्यमिति चेत्—नैवम्; अलङ्कारान्तराणि हि निरूप्यमाणदुर्घटनान्यपि रससमाहितचेतसः प्रतिभानवतः कवेरह- समान मधुर (तेरे) अधररस को पान कर लिया है, (तेरे) कण्ठ का आलिङ्गन किया हुआ बाष्प स्तनभाग को कम्पित कर रहा है, अरी निर्दय, तेरा प्रिय क्रोध हो गया है, हम नहीं ! रस के अङ्ग होने में 'अपृथग्यत्ननिर्वर्त्यत्व' (अलग से यत्न किए बिना ही सम्पन्न हो जाना) उस (अलङ्कार) का लक्षण है। इस प्रकार जो (अलङ्कार) कवि रस के निबन्धनाथं प्रयत्नशील है, उसकी उस वासना को अतिक्रमण करके उसके अतिरिक्त यत्न करने पर निष्पन्न होता है वह रस का अङ्ग नहीं है। बुद्धिपूर्वक प्रबन्ध से (जम कर) यमक के किए जाने पर नियमतः ही यत्नान्तर का ग्रहण, जिसमें विशेष शब्द का अन्वेषण होता है, करना पड़ता है। अन्य अलङ्कारों में भी वह बराबर है, ऐसा नहीं; क्योंकि अन्य अलङ्कार निरूपण की स्थिति में दुर्घटन होने पर भी रस में लोचनम् दधतीति । लक्षणमिति । व्यापकमित्यर्थः । 'प्रबन्धेन क्रियमाण' इति सम्बन्धः । अत एव बुद्धिपूर्वकत्वमवश्यम्भावीति बुद्धिपूर्वकशब्द उपात्तः । रससमवधानादन्यो यत्नो यत्नान्तरम् । निरूप्यमाणानि सन्ति दुर्घटनानि । बुद्धिपूर्वं चिकीर्षितान्यपि कर्तुमशक्यानीत्यर्थः । तथा निरूप्यमाणे दुर्घट- नानि कथमेतानि रचितानीत्येवं विस्मयावहानीत्यर्थः । अहम्पूर्वः अग्रद्य भी रसचर्वणा में विघ्न आधान नहीं करते। लक्षण—। अर्थात् व्यापक । सम्बन्ध यह कि 'प्रबन्ध से (जमकर) करने पर' । इसलिए ही बुद्धिपूर्वक होना अवश्यम्भावी हो जाता है, अतः 'बुद्धिपूर्वक' शब्द का उपादान किया है । रस में समवधान से अतिरिक्त यत्न यत्नान्तर है । निरूप्यमाण होते हुए दुर्घटन, अर्थात् बुद्धिपूर्वक चिकीर्षित होने पर भी नहीं किए जा सकने वाले । उस प्रकार, निरूप्यमाण होने पर दुर्घटन, अर्थात् कैसे ये बन गए. इस प्रकार विस्मय उत्पन्न करने वाले । अहम्पूर्व अर्थात्