ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ | सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः निष्पत्तावाश्चर्यभूतोऽपि यस्यालङ्कारस्य रसाक्षिप्ततयैव बन्धः शक्यक्रियो भवेत्सोऽस्मिन्नलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्ये ध्वनावलङ्कारो मतः। तस्यैव रसाङ्गत्वं मुख्यमित्यर्थः। · यथा— कपोले पत्राली करतलनिरोधेन मृदिता निष्पत्ति में आश्चर्यभूत होने पर भी जिस अलङ्कार का निबन्धन रसाक्षिप्त रूप से ही किया जा सके वह इस अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि में अलङ्कार माना गया है, अर्थात् उसीका रसाङ्गत्व मुख्य है। जैसे— कपोल में बनी पत्रावली को हाथ की रगड़ से मसल डाला है, निश्वासों ने अमृत के लोचनम् नान्यः। तेन वीराद्भुतादिरसेष्वपि यमकादि कवेः प्रतिपत्तुश्च रसविघ्नकार्य्येव सर्वत्र। गड्डुरिकाप्रवाहोपहतसहृदयधुराधिरोहणविहीनलोकावर्जनाभिप्रायेण तु मया शृङ्गारे विप्रलम्भे च विशेषत इत्युक्तमिति भावः। तथा च 'रसेऽ- ङ्गत्वं तस्मादेषां न विद्यते' इति सामान्येन वक्ष्यति। निष्पत्ताविति। प्रति- भानुग्रहात्स्वयमेव सम्पत्तौ निष्पादनानपेक्षायामित्यर्थः। आश्चर्यभूत इति। कथमेष निबद्ध इत्यद्भुतस्थानम्। करकिसलयन्यस्तवदना श्वासतान्ताधरा प्रवर्तमानबाष्पभरनिरुद्धकण्ठी अविच्छिन्नरुदितचञ्चत्कुचतटा रोषमपरित्यजन्ती चाटूक्त्या यावत्प्रसाद्यते तावदीर्ष्याविप्रलम्भगतानुभावचर्वणावहितचेतस एव वक्तुः श्लेषरूपकव्यतिरेकाद्या अयत्ननिष्पन्नाश्चर्वयितुरपि न रसचर्वणाविघ्नमा- अन्य नहीं। इस लिए वीर, अद्भुत आदि रसों में ही सर्वत्र यमक आदि कवि के और प्रतिपत्ता (जानकार) सहृदय के रसविघ्न करने वाला ही है। भाव यह कि मैंने भेड़ के पीछे गमन करने वाली भेड़ों की पंक्ति के प्रवाह (परम्परा) के शिकार और सहृदय की मर्यादा तक न पहुंचे हुए लोगों के आवर्जन के अभिप्राय से 'शृङ्गार में और विशेष रूप से विप्रलम्भ में' यह कहा है। और इस लिए 'रस में अङ्गत्व इस कारण इनका नहीं सम्भव है' यह सामान्य रूप से कहेंगे। निष्पत्ति में—। प्रतिभा के अनुग्रह से स्वयमेव (बिना किसी यत्न के) सम्पन्न होने में, अर्थात् निष्पन्न करने की अपेक्षा के न होने पर। आश्चर्यभूत—। कैसे यह निबद्ध हो गया, इस प्रकार अद्भुत का स्थान। अपने करकिसलय पर मुख रखे, श्वास से मुर्झाए अधर वाली, उत्पन्न बाष्पसमूह से रुंधे गले वाली, निरन्तर रोते रहने से कांपते हुए स्तनों वाली, रोष का त्याग न करती हुई नायिका को चाटुवचन से जब तक प्रसन्न करते हैं, तब तक ईर्ष्याविप्रलम्भ के अनुभावों की चर्वणा (पुनः पुनः अनुसन्धान) में अवहित चित्त वाले वक्ता के श्लेष, रूपक, व्यतिरेक आदि अयत्ननिष्पन्न अलङ्कार चर्वणा करने वाले के