ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २३१ ध्वन्यालोकः ध्वनेरात्मभूतः शृङ्गारस्तात्पर्येण वाच्यवाचकाभ्यां प्रकाश्यमान- स्तस्मिन्द्यमकादीनां यमकप्रकाराणां निबन्धनं दुष्करशब्दभङ्गश्लेषादीनां शक्तावपि प्रमादित्वम् । 'प्रमादित्व' मित्यनेनैतद्दर्शयते—काकतालीयेन कदाचित्कस्यचिदेकस्य यमकादेर्निष्पत्तावपि भृशमलङ्कारान्तरवद्र- साङ्गत्वेन निबन्धो न कर्तव्य इति । 'विप्रलम्भे विशेषत' इत्यनेन विप्रलम्भे सौकुमार्यातिशयः ख्याप्यते । तस्मिन्द्योत्ये यमकादेरङ्गस्य निबन्धो नियमान्न कर्तव्य इति ॥ १५ ॥ अत्र युक्तिरभिधीयते— रसाक्षिप्ततया यस्य बन्धः शक्यक्रियो भवेत् । अपृथग्यत्ननिर्वर्त्यः सोऽलङ्कारो ध्वनौ मतः ॥ १६ ॥ ध्वनि का आत्मभूत शृङ्गार तात्पर्य रूप से शब्द और अर्थ द्वारा प्रकाशित होता है, उसमें यमक आदि यमक के प्रकारों का निबन्धन दुष्कर, शब्द-भङ्गश्लेष आदि की शक्ति होने पर भी प्रमादित्व का सूचक है । 'प्रमादित्व' से यह दिखाते हैं— काकतालीय के प्रकार से कभी किसी एक 'यमक' आदि की निष्पत्ति होने जाने पर भी बाहुल्यपूर्वक दूसरे अलङ्कारों की भांति रस के अङ्ग रूप से निबन्ध नहीं करना चाहिए । 'विशेष रूप से विप्रलम्भ में' इस ( कथन ) से विप्रलम्भ में अतिशय सौकुमार्य व्यक्त किया है। जब कि उसका ( विप्रलम्भ का ) द्योतन किया जाय, तब यमक आदि अङ्ग का निबन्धन नियमतः नहीं करना चाहिए ॥ १५ ॥ यहां युक्ति कहते हैं— ध्वनि में वह अलङ्कार माना गया है, जिसका प्रयोग रसाक्षिप्त रूप से किया जा सके और जो बिना किसी अलग यत्न के प्राप्त हो जाय ॥ १६ ॥ लोचनम् श्लेष इति । अर्थश्लेषो न दोषाय 'रक्तस्त्वम्' इत्यादौ; शब्दभङ्गोऽपि क्लिष्ट एव दुष्टः, न त्वशोकादौ ॥ १५ ॥ युक्तिरिति । सर्वव्यापकं वस्तुत्वत्यर्थः । रसेति । रससमवधानेन विभावा- दिघटनामेव कुर्वंस्तन्नान्तरीकतया यमासादयति स एवात्रालङ्कारो रसमार्गे, 'रक्तस्त्वं०' इत्यादि में; शब्दभङ्ग भी क्लिष्ट होकर ही दोषयुक्त होता है, न कि 'अशोक' इत्यादि में ॥ १५ ॥ युक्ति—। अर्थात् सर्वव्यापक वस्तु । रस—। रस में सम्यक् अवधानपूर्वक विभाव आदि की घटना ही करता हुआ उस ( विभावादि की घटना ) के नान्तरीयक ( अर्थात् व्याप्त ) रूप से जिसको प्राप्त करता है वही इस रस के मार्ग में अलङ्कार होता है,