भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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२३० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः दिङ्मात्रकथनेन हि व्युत्पन्नानां सहृदयानामेकत्रापि रसभेदे सहालङ्कारैरङ्गाङ्गिभावपरिज्ञानादासादितालोका बुद्धिः सर्वत्रैव भविष्यति । तत्र— शृङ्गारस्याङ्गिनो यत्नादेकरूपानुबन्धवान् । सर्वेष्वेव प्रभेदेषु नानुप्रासः प्रकाशकः ॥ १४ ॥ अङ्गिनो हि शृङ्गारस्य ये उक्ताः प्रभेदास्तेषु सर्वेष्वेकप्रकारानु- बन्धितया प्रबन्धेन प्रवृत्तोऽनुप्रासो न व्यञ्जकः । अङ्गिन इत्यनेनाङ्ग- भूतस्य शृङ्गारस्यैकरूपानुबन्ध्यनुप्रासनिबन्धने कामचारमाह ॥ १४ ॥ ध्वन्यात्मभूते शृङ्गारे यमकादिनिबन्धनम् । शक्तावपि प्रमादित्वं विप्रलम्भे विशेषतः ॥ १५ ॥ 'दिङ्मात्र' कह देने से व्युत्पन्न सहृदय जनों की बुद्धि एक भी रसभेद में अलङ्कारों के साथ अङ्गाङ्गिभाव के परिज्ञान से सर्वत्र ही प्राप्तालोक हो जायगी ॥ १३ ॥ वहाँ— अङ्गी शृङ्गार के सभी प्रभेदों में यत्नपूर्वक एक प्रकार के अनुबन्ध वाला अनुप्रास प्रकाशक नहीं होता ॥ १४ ॥ अङ्गी शृङ्गार के जो प्रभेद कहे गए हैं उन सभी में एक प्रकार के अनुबन्धी रूप से प्रवृत्त अनुप्रास व्यञ्जक नहीं होता । 'अङ्गी' इससे अङ्गभूत शृङ्गार एक प्रकार के अनुबन्ध वाले अनुप्रास के निबन्धन में स्वेच्छाचार कहा है ॥ १४ ॥ ध्वनि के आत्मभूत शृङ्गार में यमक आदि का निबन्धन शक्ति होने पर भी प्रमादित्व का सूचक है, विशेष रूप से विप्रलम्भ में ॥ १५ ॥ लोचनम् तत्रेति । वक्तव्ये दिङ्मात्रे सतीत्यर्थः । यत्नादिति । यत्नतः क्रियमाणत्वा- दिति हेत्वर्थोऽभिप्रेतः । एकरूपं त्वनुबन्धं त्यक्त्वा विचित्रोऽनुप्रासो निबध्य- मानो न दोषायेत्येकरूपग्रहणम् ॥ १४ ॥ यमकादीत्यादिशब्दः प्रकारवाची । दुष्करं मुरजचक्रबन्धादि । शब्दभङ्ग- वहाँ—। अर्थात् दिङ्मात्र वक्तव्य के होने पर । यत्नपूर्वक—। अर्थात् यत्नपूर्वक किए जाने होने के कारण, यह हेत्वर्थ अभिप्रेत है । एक प्रकार का अनुबन्ध छोड़ कर निबध्यमान विचित्र अनुप्रास दोषावह नहीं होता, इसलिए 'एक प्रकार' का ग्रहण किया ॥ १४ ॥ 'यमकादि' यहां 'आदि' शब्द प्रकार (सादृश्य) के अर्थ में है । दुष्कर, अर्थात् मुरजबन्ध, चक्रबन्ध आदि । शब्दभङ्गश्लेष—। 'अर्थश्लेष' दोषावह नहीं होता,