ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २२९ ध्वन्यालोकः विभावानुभावव्यभिचारिभेदः । तेषां च देशकालाद्याश्रयावस्थाभेद इति स्वगतभेदापेक्षयैकस्य तस्यापरिमेयत्वम्, किं पुनरङ्गप्रभेदकल्प- नायाम् । ते ह्यङ्गप्रभेदाः प्रत्येकमङ्गिप्रभेदसम्बन्धपरिकल्पने क्रियमाणे सत्यानन्त्यमेवोपयान्ति ॥ १२ ॥ दिङ्मात्रं तूच्यते येन व्युत्पन्नानां सचेतसाम् । बुद्धिरासादितालोका सर्वत्रैव भविष्यति ॥ १३ ॥ व्यभिचारी के अनुसार उनका अलग-अलग भेद है । उनका भी देश, काल आदि आश्रय एवं अवस्था के अनुसार भेद है, इस प्रकार स्वगत भेद की अपेक्षा से ही उसका एक ( भेद ) अपरिमेय हो जाता है, फिर अङ्गों के प्रभेद की कल्पना की बात क्या ? अङ्गों के वे प्रभेद अलग-अलग अङ्गी के प्रभेदों के सम्बन्ध की कल्पना की जाने पर आनन्त्य ही को प्राप्त करते हैं ॥ १२ ॥ केवल दिङ्मात्र कहते हैं, जिससे व्युत्पन्न सचेतस जनों की बुद्धि सर्वत्र ही प्राप्तालोक हो जायगी ॥ १३ ॥ लोचनम् दयितया ग्रथिता स्रगियं मया हृदयधामनि नित्यनियोजिता । गलति शुष्कतयापि सुधारसं विरहदाहरुजां परिहारकम् ॥ तस्येति शृङ्गारस्य। अङ्गिनां रसादीनां प्रभेदस्तत्सम्बन्धकल्पनेत्यर्थः ॥१२॥ येनेति । दिङ्मात्रोक्तेनेत्यर्थः । सचेतसामिति । महाकवित्वं सहृदयत्वं च प्रेप्सूनामिति भावः । सर्वत्रेति । सर्वेषु रसादिष्वासादित आलोकोऽवगमः सम्यग्व्युत्पत्तिर्ययेति सम्बन्धः ॥ १३ ॥ प्रिया के द्वारा गूथी गई इस माला को मैंने अपने हृदय पर रख लिया है, ( विरह- ताप के कारण ) यह सूख जाने पर भी विरह के दाह को दूर करने वाले सुधारस को स्रावित कर रही है । उसका शृङ्गार का ! अङ्गी रस आदि का प्रभेद अर्थात् उनके सम्बन्ध की कल्पना ॥ १२ ॥ जिससे—अर्थात् 'दिङ्मात्र' कहने से । सचेतस जनों की—। भाव यह कि महा- कवित्व और सहृदयत्व प्राप्त करने की इच्छा वालों की । सर्वत्र—। सभी रसों में प्राप्त किया है आलोक या अवगम अर्थात् सम्यक् व्युत्पत्ति को जिसने ॥ १३ ॥