ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 294, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें२३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः म्पूर्वकिया परापतन्ति । यथा कादम्बर्यां कादम्बरीदर्शनावसरे । यथा च मायारामशिरोदर्शनेन विह्वलायां सीतादेव्यां सेतौ । युक्तं चैतत् , यतो रसा वाच्यविशेषैरेवाक्षेप्स्याः । तत्प्रतिपादकैश्च शब्दैस्तत्प्रकाशिनो वाच्यविशेषा एव रूपकादयोऽलङ्काराः । तस्मान्न तेषां बहिरङ्गत्वं रसाभिव्यक्तौ । यमकदुष्करमार्गेषु तु तत्स्थितमेव । यत्तु रसवन्ति कानिचिद्यमकादीनि दृश्यन्ते, तत्र रसादीनामङ्गता यमकादीनां त्वङ्गित्वैव । रसाभासे चाङ्गत्त्वमप्यविरुद्धम् । अङ्गितया तु व्यङ्ग्ये रसे नाङ्गत्त्वं पृथक्प्रयत्ननिर्वर्त्यत्वाद्यमकादेः । अस्यैवार्थस्य सङ्ग्रहश्लोकाः— रसवन्ति हि वस्तूनि सालङ्काराणि कानिचित् । एकेनैव प्रयत्नेन निर्वर्त्यन्ते महाकवेः ॥ समाहित चित्त वाले एवं प्रतिभानसम्पन्न कवि के पास अहमहं करके दौड़ पड़ते हैं । जैसे, 'कादम्बरी' में कादम्बरी के दर्शन के अवसर में । और जैसे, 'सेतु' ('सेतुबन्ध' महाकाव्य ) में माया से बने राम के सिर देखने से सीता देवी के विह्वल होने पर । और यह ठीक है, क्योंकि रस वाच्यविशेष द्वारा ही आक्षिप्त होते हैं । उन (वाच्यविशेष) के प्रतिपादक शब्दों से उनको प्रकाशित करने वाले 'रूपक' आदि अलङ्कार वाच्यविशेष ही हैं, इसलिए रस की अभिव्यक्ति में वे बहिरङ्ग नहीं हैं । 'यमक' और 'दुष्कर' के मार्गों में तो वह बात है ही । जो कि कुछ 'यमक' आदि रसवान् दिखते हैं, वहां रस आदि अङ्ग हैं और 'यमक' आदि का तो अङ्गित्व ही है । रसाभास की स्थिति में (उनका) अङ्गत्व भी विरुद्ध नहीं । अङ्गी रूप से रस के व्यङ्ग्य होने पर यमक आदि (अलङ्कार) अङ्ग नहीं होते, क्यों कि वे 'पृथग्यत्ननिर्वर्त्य' होते हैं । इसी अर्थ (विषय) के सङ्ग्रह-श्लोक हैं— कुछ अलङ्कारयुक्त रसवान् वस्तुएं महाकवि के एक ही प्रयत्न से निर्वृत्त हो जाती हैं। लोचनम् इत्यर्थः । अहमादावहमादौ प्रवर्त्त इत्यर्थः । अहम्पूर्व इत्यस्य भावोऽहम्पूविका । अहमिति निपातो विभक्तिप्रतिरूपकोऽस्मदर्थवृत्तिः । एतदिति । अहंपूर्विकया परापतनमित्यर्थः । कानिचिदिति । कालिदासादिकृतानीत्यर्थः । शक्तस्यापि अगिला । अर्थात् मैं पहले, मैं पहले होऊंगा । अहम्पूर्व का भाव अहम्पूविका । 'अहम्' यह 'अस्मत्' अर्थ में विभक्तिप्रतिरूपक निपात है । यह—। अर्थात् अहम्पूर्वभाव से पराप- तन । कुछ—। अर्थात् कालिदास आदि के द्वारा कृत । सम्बन्ध यह है कि समर्थ होने