ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २३७ ध्वन्यालोकः काले च ग्रहणत्यागौ नातिनिर्वहणैषिता ॥ १८ ॥ निर्व्यूढावपि चाङ्गत्वे यत्नेन प्रत्यवेक्षणम् । रूपकादिरलङ्कारवर्गस्याङ्गत्वसाधनम् ॥ १९ ॥ रसबन्धेष्वादृतमनाः कविर्यमलङ्कारं तदङ्गतया विवक्षति । यथा— चलापाङ्गां दृष्टिं स्पृशसि बहुशो वेपथुमतीं रहस्याख्यायीव स्वनसि मृदु कर्णान्तिकचरः । रूप से (विवक्षा) न हो, समय से ग्रहण हो, और त्याग भी हो, दूर तक निर्वाह करने की इच्छा न हो, (उस प्रकार) निर्वाह हो जाने पर यत्नपूर्वक अङ्गरूप में ही देखना, यही रूपक आदि अलङ्कारवर्ग के अङ्ग होने का साधन है ॥ १८-१९ ॥ रस के निबन्धन में आदरयुक्त चित्त वाला कवि जिस अलङ्कार को उसके अङ्ग के रूप में विवक्षा करता है। जैसे— 'हे मधुकर, तू चंचल अपाङ्गों वाली और कांपती हुई (प्रिया की) दृष्टि को बहुत वार स्पर्श करता है, रहस्य की बात कहने वाले की भांति (उसके) कान के पास लोचनम् चलापाङ्गामिति । हे मधुकर, वयमेवंविधाभिलाषचाटुप्रवणा अपि तत्त्वा- न्वेषणाद्वस्तुवृत्तेऽन्विष्यमाणे हता आयासमात्रपात्रीभूता जाताः । त्वं खल्विति निपातेनायत्नसिद्धं तवैव चरितार्थत्वमिति शकुन्तलां प्रत्यभिलाषिणो दुष्यन्त- स्येयमुक्तिः । तथाहि—कथमेतदीय कटाक्षगोचरा भूयास्म, कथमेषास्मदभि- प्रायव्यञ्जकं रहोवचनमाकर्ण्यात्, कथं नु हठादनिच्छन्त्या अपि परिचुम्बनं विधेयास्मेति यदस्माकं मनोराज्यपदवीमधिशेते तत्तवायत्नसिद्धम् । भ्रमरो हि नीलोत्पलधिया तदाशङ्काकरीं दृष्टिं पुनः पुनः स्पृशति । श्रवणावकाशपर्य- न्तत्वाच्च नेत्रयोरुत्पलशङ्कानपगमात्तत्रैव दन्ध्वन्यमान आस्ते । सहजसौकुमा- चञ्चल अपाङ्गों वाली—। हे मधुकर, इस प्रकार की इच्छा रखने वाले एवं चाटु- वचन में कुशल होकर भी तत्त्व के अन्वेषण से अन्विष्यमाण वस्तु के सम्बन्ध में हत हो गए (मारे गए) आयासमात्र के पात्र बने । (श्लोक में) 'खलु' इस निपात के प्रयोग से बिना यत्न के सिद्ध तुम्हारी ही चरितार्थता है, इस प्रकार शकुन्तला की अभिलाषा करने वाले दुष्यन्त की यह उक्ति है। जैसा कि कैसे हम इसके कटाक्षों के गोचर हों, कैसे यह हमारे अभिप्रायव्यञ्जक रहस्यवचन सुन ले, कैसे न चाहती हुई भी इसका हठपूर्वक परिचुम्बन हम करें, जो यह सब हमारे मनोराज्य में ही था, वह तेरे लिए अयत्नसिद्ध है। क्योंकि भौंरा उसकी दृष्टि को नीलोत्पल समझ कर बार-बार स्पर्श करता है, कानों तक खिंचे हुए नेत्रों में उसे उत्पल की शङ्का हो जाती है, इस कारण वह वहीं गुंजार कर रहा है, सहज सौकुमार्य के कारण उत्पन्न त्रास से कातर (प्रिया के) रतिनिधान-