भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 298

२३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः करौ व्याधुन्वत्याः पिबसि रतिसर्वस्वमधरं वयं तत्त्वान्वेषान्मधुकर हतास्त्वं खलु कृती ॥ अत्र हि भ्रमरस्वभावोक्तिरलङ्कारो रसानुगुणः । 'नाङ्गत्वेने'ति न प्राधान्येन । कदाचिद्रसादितात्पर्येण विवक्षितो- ऽपि ह्यलङ्कारः कश्चिदङ्गत्वेन विवक्षितो दृश्यते । यथा— चक्राभिघातप्रसभाज्ञयैव चकार यो राहुवधूजनस्य । आलिङ्गानोद्दामविलासबन्ध्यं रतोत्सवं चुम्बनमात्रशेषम् ॥ जाकर कोमल आवाज करता है, हाथों को झकझोरती हुई उसके तू रतिसर्वस्व अधर का पान करता है, हम तो तत्त्व के अन्वेषण में मारे गए, परन्तु तू तो चरितार्थ हो गया ।' यहां भ्रमर-स्वभावोक्ति अलङ्कार रस के अनुगुण है । अङ्गीरूप से नहीं, अर्थात् प्रधानरूप से नहीं । क्योंकि कभी रस आदि के तात्पर्य से विवक्षित भी कोई अलङ्कार अङ्गीरूप से विवक्षित देखा जाता है । जैसे— जिस श्रीकृष्ण ने चक्र के प्रहाररूपी अपनी प्रसभ आज्ञा से ही राहु की स्त्रियों के रतोत्सव को आलिङ्गन के उद्दाम विलास से रहित एवं चुम्बनमात्र शेष कर दिया । लोचनम् र्यत्रासकातरायाश्च रतिनिधानभूतं विकसितारविन्दकुवलयामोदमधुरमधरं पिब- तीति भ्रमरस्वभावोक्तिरलङ्कारोऽङ्गतामेव प्रकृतरसस्योपगतः । अन्ये तु भ्रमर- स्वभावे उक्तिर्यस्येति भ्रमरस्वभावोक्तिरत्र रूपकव्यतिरेक इत्याहुः । चक्राभिघात एव प्रसभाज्ञा अलङ्घनीयो नियोगस्तया यो राहुदयितानां भूत, खिले हुए कमल और कुवलय की गन्ध के समान मधुर अधर का पान करता है, इस प्रकार भ्रमर-स्वभावोक्ति अलङ्कार प्रकृत रस का अङ्ग ही है । अन्य टीकाकार कहते हैं कि "भ्रमर के स्वभाव में उक्ति है जिसकी" वह भ्रमरस्वभावोक्ति, यहां रूपक के साथ व्यतिरेक है । चक्राभिघात१ ही प्रसभ आज्ञा अर्थात् अलङ्घनीय नियोग है, उससे जिसने राहु की १. प्रस्तुत पद्य में राहु के कण्ठच्छेद की घटना का निर्देश प्रकारान्तर से कथन रूप 'पर्यायोक्त' अलङ्कार का विषय है । समुद्र-मथन से प्राप्त अमृत के बटवारे में राहु-नामक दैत्य के द्वारा छिप कर पान कर लिए जाने पर मोहिनी रूप भगवान् विष्णु ने सूर्य और चन्द्र से इसका संकेत पा कर राहु का सिर अपने चक्र से काट लिया था, इस पौराणिक प्रसंग का यहाँ चित्रण है । राहु ने अमृत पान कर लिया था, इस लिए सिर मात्र अवशिष्ट हो गया । अब वह अपनी पत्नियों का उद्दाम आलिङ्गन नहीं करता, किन्तु चुम्बन मात्र में ही उसकी पत्नियों के रतोत्सव का पर्यवसान होता था ।