ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished680 पृष्ठ
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द्वितीय उद्योतः २३९
ध्वन्यालोकः
अत्र हि पर्यायोक्तस्याङ्गित्वेन विवक्षा रसादितात्पर्ये सत्यपीति ।
अङ्गत्वेन विवक्षितमपि यमवसरे गृह्णाति नानवसरे । अवसरे
गृहीतिर्यथा—
यहां रसादि के तात्पर्य होने पर भी पर्यायोक्त अलङ्कार की अङ्गीरूप से
विवक्षा है ।
अङ्गरूप से विवक्षित भी जिसको अवसर में ग्रहण करता है, अनवसर में नहीं ।
अवसर में ग्रहण, जैसे—
लोचनम्
रतोत्सवं चुम्बनमात्रशेषं चकार । यत आलिङ्गनमुद्दामं प्रधानं येषु विलासेषु
तैर्वन्ध्यः शून्योऽसौ रतोत्सवः । अत्राह कश्चित्—'पर्यायोक्तमेवात्र कवेः प्राधा-
न्येन विवक्षितं, न तु रसादि । तत्कथमुच्यते रसादितात्पर्ये सत्यपी'ति ।
मैवम् ; वासुदेवप्रतापो ह्यत्र विवक्षितः । स चात्र चारुत्वहेतुतया न चकास्ति,
अपि तु पर्यायोक्तमेव । यद्यपि चात्र काव्ये न काचिद्दोषशङ्का, तथापि दृष्टा-
न्तवदेतत्—यत्प्रकृतस्य पोषणीयस्य स्वरूपतिरस्कारकोऽङ्गभूतोऽप्यलङ्कारः
सम्पद्यते । ततश्च क्वचिदनौचित्यमागच्छतीत्ययं ग्रन्थकृत आशयः । तथा च
ग्रन्थकार एवमग्रे दर्शयिष्यति । महात्मनां दूषणोद्घोषणमात्मन एव दूषणमिति
नेदं दूषणोदाहरणं दत्तम् ।
स्त्रियों का रतोत्सव चुम्बनमात्रशेष कर दिया । क्यों कि वह रतोत्सव आलिङ्गन उद्दाम
अर्थात् प्रधान है जिन विलासों में, उनसे वन्ध्य अर्थात् शून्य (रहित) हो गया ।
यहां कोई कहता है—"पर्यायोक्त अलङ्कार ही यहां कवि का प्रधान रूप से विवक्षित
है, न कि रसादि, ऐसी स्थिति में 'रसादि के तात्पर्य होने पर भी' यह क्यों कहते हैं ?"
ऐसी बात नहीं; यहां वासुदेव (श्रीकृष्ण) का प्रताप विवक्षित है, परन्तु वह यहां
चारुत्वके हेतु रूप में प्रकाशित नहीं हो रहा है, अपितु 'पर्यायोक्त' ही प्रकाशित हो रहा
है । यद्यपि इस काव्य में कोई दोष की आशंका नहीं है, तथापि यह एक प्रकार का
दृष्टान्त है । ग्रन्थकार का यह आशय है कि अङ्गभूत भी अलङ्कार पोषणीय प्रस्तुत के
स्वरूप का तिरस्कारक हो जाता है, इस कारण कुछ अनौचित्य आ जाता है । जैसा
कि ग्रन्थकार इस प्रकार दिखाएंगे, कि महात्माओं (बड़े लोगों) के दोष कहना
अपना ही दोष हो जाता है, इसलिए यह दोष का उदाहरण नहीं दिया है ।
यहाँ अङ्गी रूप से पर्यायोक्त अलङ्कार ही विवक्षित है । यद्यपि रस में कवि का तात्पर्य प्रतीत होता है, क्योंकि श्रीकृष्ण का प्रताप यहाँ विवक्षित है, किन्तु वह देवविषय रति के व्यञ्जक होने के कारण यहाँ विशेष चारुत्वहेतु नहीं है, बल्कि पर्यायोक्त से ही यहाँ चारुता है । लोचनकार का कहना है कि इसे दोष का उदाहरण नहीं समझना चाहिए, क्योंकि ग्रन्थकार स्वयं आगे चल कर