भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 680 में से

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पृष्ठ 300

२४० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः उद्दामोत्कलिकां विपाण्डुरुचं प्रारब्धजृम्भां क्षणा- दायासं श्वसनोद्गमैरविरलैरातन्वतीमात्मनः । अद्योद्यानलतामिमां समदनां नारीमिवान्यां ध्रुवं पश्यन् कोपविपाटलद्युति मुखं देव्याः करिष्याम्यहम् ॥ प्रबल उत्कण्ठा से युक्त (लतापक्ष में निकली हुई कलियों से युक्त), पाण्डुवर्ण (लतापक्ष में कलियों के कारण सफेद लगती हुई), क्षण में जंभाई लेती हुई (लता- पक्ष में उसी समय विकसित होती हुई), अपने निरन्तर श्वास के वायु से आयास प्रकट करती हुई (लता पक्ष, में वायु के कारण विकम्पित होती हुई) मदन से युक्त (लता पक्ष में 'मदन' नामक वृक्ष से लिपटी हुई) परकीय नारी की भांति इस उद्यानलता को देखता हुआ मैं आज निश्चय ही देवी (वासवदत्ता) के मुख को क्रोध से लाल कर दूंगा । लोचनम् उद्दामा उद्गताः कलिका यस्याः । उत्कलिकाश्च रुरुहिकाः । क्षणात्तस्मि- न्नेवावसरे प्रारब्धा जृम्भा विकासो यया । जृम्भा च मन्मथकृतोऽङ्गमर्दः । श्वसनोद्गमैर्वसन्तमारुतोल्लासैरात्मनो लतालक्षणस्यायासमायासनमान्दोलनय- त्नातन्वतीम् । निःश्वासपरम्पराभिश्चात्मन आयासं हृदयस्थितं सन्तापमात- न्वतीं प्रकटीकुर्वाणाम् । सह मदनाख्येन वृक्षविशेषेण मदनेन कामेन च । अत्रोपमाश्लेष ईर्ष्याविप्रलम्भस्य भाविनो मार्गपरिशोधकत्वेन स्थितस्तच्चर्वणा- भिमुख्यं कुर्वन्नवसरे रसस्य प्रमुखीभावदशायां पुरःसरायमाणो गृहीत इति उद्दाम अर्थात् उद्गत कलिकाएं हैं जिसकी। और उत्कलिका अर्थात् रुरुहिका (उत्कण्ठा)। क्षण में अर्थात् उसी अवसर में प्रारम्भ किया है जृम्भा अर्थात् विकास को जिसने। और जृम्भा अर्थात् कामकृत अङ्गमर्द (जम्भाई)। श्वसनोद्गम अर्थात् वसन्तकालीन मारुत के उल्लास से लतारूप अपने आयास (आयासन) अर्थात् आन्दोलनयत्न को फैलाती हुई। और निःश्वासपरम्पराओं से आयास अर्थात् हृदयस्थितं सन्ताप को प्रकट करती हुई। 'मदन' नामक वृक्ष के साथ और मदन अर्थात् काम के साथ। भाव यह कि यहां उपमाश्लेष भावी ईर्ष्याविप्रलम्भ का मार्गपरिशोधक रूप में स्थित होकर उनकी (सहृदयों की)—चर्वणा का आभिमुख्य (आनुकूल्य) करता हुआ, अवसर में अर्थात् रस के प्रमुख होने की दशा में अग्रसर होता हुआ, ग्रहण किया गया बड़े लोगों के दोष कहना अपना ही दोष का कहना लिखते हैं। फिर भी इतना इस उदाहरण से स्पष्ट करना ग्रन्थकार का तात्पर्य है कि अङ्गभूत अलङ्कार भी प्रकृत पोषणीय अलङ्कार्य के स्वरूप का तिरस्कारक हो जाता है, अतः यह प्रकार कहीं अनुचित लग सकता है।