भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 680 में से

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पृष्ठ 301

द्वितीय उद्योतः २४१ ध्वन्यालोकः इत्यत्र उपमा श्लेषस्य । गृहीतमपि च यमवसरे त्यजति तद्रसानुगुणतयालङ्कारान्तरापेक्षया। यथा— रक्तस्त्वं नवपल्लवैरहमपि श्लाघ्यैः प्रियाया गुणै- स्त्वामायान्ति शिलीमुखाः स्मरधनुर्मुक्तास्तथा मामपि । कान्तापादतलाहतिस्तव मुदे तद्वन्ममाप्यावयोः सर्वं तुल्यमशोक केवलमहं धात्रा सशोकः कृतः ॥ यहां उपमाश्लेष का ( अवसर में ग्रहण है ) । ग्रहण किए हुए भी जिसको उस रस के अनुगुण होने के कारण और अलङ्का- रान्तर की अपेक्षा से अवसर में छोड़ देता है। जैसे— हे अशोक, तू नये पल्लवों से रक्त है और मैं भी प्रिया के श्लाघ्य गुणों के कारण रक्त ( अनुरक्त ) हूँ, तुझ पर शिलीमुख ( भौंरे ) आते हैं और मुझ पर भी कामदेव के धनुष से छूटे शिलीमुख ( बाण ) आते हैं, प्रिया के पैरों का ताड़न तुझे प्रसन्न करता है और उसी प्रकार ( कान्तापादतलाहति = विशेष प्रकार का रतबन्ध ) मुझे भी, हम दोनों का सब बराबर है, केवल विधाता ने मुझे सशोक बना डाला है ! लोचनम् भावः। अभिनयोऽप्यत्र प्राकरणिके प्रतिपदम्। अप्राकरणिके तु वाक्यार्था- भिनयेनोपाङ्गादिना। न तु सर्वथा नाभिनय इत्यलमवान्तरेण। ध्रुवशब्दश्च भावीर्ष्यावकाशप्रदानजीवितम्। रक्तो लोहितः। अहमपि रक्तः प्रबुद्धानुरागः। तत्र च प्रबोधको विभाव- स्तदीयपल्लवराग इति मन्तव्यम्। एवं प्रतिपादमाद्योऽर्थो विभावत्वेन व्याख्येयः। अत एव हेतुश्लेषोऽयम्। सहोक्त्युपमाहेत्वलङ्काराणां हि भूयसा है। ( लता रूप ) प्राकरणिक अर्थ में यहां पद-पद पर अभिनय भी है। ( नारी रूप ) अप्राकरणिक अर्थ में उपाङ्ग आदि वाक्यार्थाभिनय से ( अभिनय है )। न कि सर्वथा अभिनय नहीं है, इस अवान्तर चर्चा से रहने दीजिए। 'ध्रुव' ( 'निश्चय' ) शब्द भावी ईर्ष्या को अवसर देने में प्राणभूत है। रक्त अर्थात् लोहित। मैं भी रक्त अर्थात् प्रबुद्ध अनुराग वाला हूँ। वहाँ प्रबोधक विभाव ( उद्दीपन विभाव ) उस ( अशोक ) का पल्लवराग है, ऐसा मन्तव्य है। इस प्रकार प्रत्येक पाद में पहला अर्थ विभाव रूप से व्याख्या के योग्य है। अतएव यह हेतु¹ श्लेष ( हेतु अलङ्कार सहित श्लेष ) है। सहोक्ति, उपमा और हेतु अलङ्कार १. प्राचीन आलङ्कारिकों ने 'कार्य के साथ कारण के अभेद का कथन' रूप 'हेतु' अलङ्कार भी १६ ध्व०