भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 680 में से

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पृष्ठ 302

२४२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र हि प्रबन्धप्रवृत्तोऽपि श्लेषो व्यतिरेकविवक्षया त्यज्यमानो रसविशेषं पुष्णाति । नात्रालङ्कारद्वयसन्निपातः, किं तर्हि ? अलङ्कारा- न्तरमेव श्लेषव्यतिरेकलक्षणं नरसिंहवदिति चेत्—न, तस्य प्रकारान्त- रेण व्यवस्थापनात् । यत्र हि श्लेषविषय एव शब्दे प्रकारान्तरेण व्यतिरेकप्रतीतिर्जायते स तस्य विषयः । यथा—'स हरिर्नाम्ना देवः यहां प्रबन्ध ( आद्यन्त ) से प्रवृत्त भी श्लेष व्यतिरेक की विवक्षा से छोड़ा जाता हुआ रसविशेष को पुष्ट करता है । यहां दो अलङ्कारों का सन्निपात नहीं है । तो क्या है ? नरसिंह ( आदमी और सिंह ) की भांति श्लेषव्यतिरेक रूप अन्य अलङ्कार ही है तो, ऐसा नहीं; उसकी दूसरे प्रकार से व्यवस्था की गई है । जहां श्लेष के विषयभूत शब्द में प्रकारान्तर से व्यतिरेक की प्रतीति होती है वह उसका विषय है, जैसे— लोचनम् श्लेषानुग्राहकत्वम् । अनेनैवाभिप्रायेण भामहो न्यरूपयत्—'तत्सहोक्त्युपमा- हेतुनिर्देशात्त्रिविधम्' इत्युक्त्या न त्वन्यालङ्कारानुग्रहनिराचिकीर्षया । रसविशेष- मिति विप्रलम्भम् । सशोकशब्देन व्यतिरेकमानयता शोकसहभूतानां निर्वेद- चिन्तादीनां व्यभिचारिणां विप्रलम्भपरिपोषकाणामवकाशो दत्तः । किं तर्हीति । सङ्करालङ्कार एक एवायम् ; तत्र किं त्यक्तं किं वा गृहीतमिति पर- स्याभिप्रायः । तस्येति सङ्करस्य । एकत्र हि विषयेऽलङ्कारद्वयप्रतिभोल्लासः सङ्करः । सहरिशब्द एको विषयः । सः हरिः, यदि वा सह हरिभिः सहरि- बाहुल्येन श्लेष के अनुग्राहक होते हैं । इसी अभिप्राय से भामह ने—'वह ( श्लेष ) सहोक्ति, उपमा और हेतु के निर्देश से तीन प्रकार का होता है' ( २. ३ ४ ) यह कह कर निरूपण किया है, न कि अन्य अलङ्कार के अनुग्रह के निराकरण करने की इच्छा से । रस विशेष अर्थात् विप्रलम्भ । 'सशोक' शब्द से 'व्यतिरेक' को लाते हुए ( कवि ने ) शोक के साथ उत्पन्न निर्वेद, चिन्ता आदि विप्रलम्भ के परिपोषक व्यभिचारी भावों को अवकाश दे दिया है । तो क्या है? सङ्करालङ्कार यह एक ही है, तब वहां क्या त्याग किया, क्या ग्रहण किया, यह दूसरे का अभिप्राय है । उसका अर्थात् संकरण का । एक ही विषय में दो अलङ्कारों की प्रतिभा होना 'सङ्कर' है । 'सहरि' शब्द एक विषय माना है । इस प्रकार प्रस्तुत उदाहरण को 'हेतु' रूप से व्याख्यान करना चाहिए—'जिस कारण स्मरधनुर्मुक्त अर्थात् अन्य पुष्पों को छोड़ कर शिलीमुख ( भौंरे ) तुझ पर आते हैं उस कारण उस प्रकार काम के धनुष से निकले हुए शिलीमुख ( बाण ) मुझ पर भी आते हैं, जिस कारण कान्ता के पैरों का आहनन तेरी प्रसन्नता के लिए है उस कारण उस प्रकार मेरी भी प्रसन्नता के लिए भी है, क्योंकि अपनी प्रियतमा के पैरों से आहत अशोक के पुष्प-विकास को देख कर नायक प्रसन्न होता है।' इस प्रकार लोचनकार के प्रत्येक पाद के अर्थ को उद्दीपन विभाव के रूप में व्याख्यान करने की युक्ति का निर्देश किया है ।