ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 303, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २४३ ध्वन्यालोकः सहरिर्वरतुरगनिवहेन' इत्यादौ । अत्र ह्यन्य एव शब्दः श्लेषस्य विषयो- ऽन्यश्च व्यतिरेकस्य । यदि चैवंविधे विषयेऽलङ्कारान्तरत्वकल्पना क्रियते तत्संसृष्टेर्विषयापहार एव स्यात् । श्लेषमुखेनैवात्र व्यतिरेक- स्यात्मलाभ इति नायं संसृष्टेर्विषय इति चेत्-न; व्यतिरेकस्य 'वह देव तो नाममात्र से स हरि हैं (और यह ) राजा तो श्रेष्ठ घोड़ों के समूह से सहरि है'—इत्यादि में । यहां क्योंकि श्लेष का विषय दूसरा ही शब्द है और व्यतिरेक का विषय दूसरा । यदि इस प्रकार के विषय में अलङ्कारान्तरत्व की कल्पना करते हैं, तब 'संसृष्टि' का विषयापहार ही हो जायगा । श्लेष के प्रकार से ही यहां व्यतिरेक आत्मलाभ कर रहा है अतः यह संसृष्टि का विषय नहीं, यदि ऐसा कहो, तो लोचनम् रिति । अत्र हीति । हिशब्दस्तुशब्दस्यार्थे, 'रक्तस्त्व' मित्यत्रेत्यर्थः । अन्य इति रक्त इत्यादिः । अन्यश्च अशोकसशोकादिः । नन्वेकं वाक्यात्मकं विषय- माश्रित्यैकविषयत्वादस्तु सङ्कर इत्याशङ्क्याह—यदीति । एवंविधे वाक्यलक्षणे विषये विषय इत्येकत्वं विवक्षितं बोध्यम् । एकवाक्यापेक्षया यद्येकविषयत्वमु- च्यते तन्न क्वचित्संसृष्टिः स्यात्, सङ्करेण व्याप्तत्वात् । ननूपमागर्भो व्यति- रेकः, उपमा च श्लेषमुखेनैवायातेति श्लेषोऽत्र व्यतिरेकस्यानुग्राहक इति सङ्क- रस्यैवैष विषयः । यत्र त्वनुग्राह्यानुग्राहकभावो नास्ति तत्रैकवाक्यगामित्वेऽपि संसृष्टिरेव; तदेतदाह--श्लेषेति । श्लेषबलानीतोपमामुखेनेत्यर्थः । एतत्परिह- रति—नेति । अयं भावः—किं सर्वत्रोपमायाः स्वशब्देनाभिधाने व्यतिरेको है । 'सः हरिः', यदि वा हरियों (अश्वों) के साथ सहरि । यहां क्योंकि—। 'हि' (क्योंकि) शब्द 'तु' शब्द के अर्थ में है, अर्थात् 'रक्तस्त्वं०' इस स्थल में । दूसरे— अर्थात् 'रक्त' इत्यादि और दूसरे अर्थात् 'अशोक', 'सशोक' इत्यादि । यह आशङ्का करके कि एक वाक्यात्मक विषय को आश्रयण करके एक विषय होने के कारण 'सङ्कर' (एकाश्रयानुप्रवेश रूप) हो, कहते हैं—यदि—। इस प्रकार के वाक्य रूप विषय में 'विषय' यह एकत्व विवक्षित समझना चाहिए । यदि एक वाक्य की अपेक्षा करके 'एकविषयत्व' कहते हैं तो कहीं 'संसृष्टि' नहीं होगी, क्योंकि 'सङ्कर' व्याप्त हो जायगा । (शङ्का करते हैं कि) उपमागर्भ व्यतिरेक है, और उपमा श्लेष के प्रकार से आई है, इसलिए श्लेष यहां व्यतिरेक का अनुग्राहक है, अतः यह सङ्कर (अनुग्राह्यानुग्राहकभाव रूप) का ही विषय है । जहां अनुग्राह्यानुग्राहक भाव नहीं है, वहां एकवाक्यगामी होने पर भी 'संसृष्टि' ही है, उस (शङ्का) को कहते हैं—श्लेष-। अर्थात् श्लेष के बल से लाई गई उपमा के प्रकार से । इसका परिहार करते हैं—नहीं-। भाव यह है—क्या सब जगह उपमा के स्वशब्द द्वारा ('इवा'दि द्वारा) अभिधान करने पर व्यतिरेक होता