ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 304, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें२४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रकारान्तरेणापि दर्शनात् । यथा— नो कल्पापायवायोरदयरयददलत्क्ष्माधरस्यापि शम्या गाढोद्दीर्णोज्ज्वलश्रीरहनि न रहिता नो तमःकज्जलेन । प्राप्तोत्पत्तिः पतङ्गान्न पुनरुपगता मोषमुष्णत्विषो वो वर्त्तिः सैवान्यरूपा सुखयतु निखिलद्वीपदीपस्य दीप्तिः ॥ यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि व्यतिरेक प्रकारान्तर से भी देखा जाता है। जैसे— सारे द्वीपों के दीप भगवान् सूर्य की दीप्ति रूप कोई लोकोत्तर वर्ति, जो निर्दय वेग से पर्वतों को उखाड़ देने वाले कल्पान्त के वायु से नहीं बुझ पाती, जो दिन में भी अत्यन्त उज्ज्वल प्रकाश फैलाती है और तमरूपी कज्जल से जो नहीं रहित नहीं— होती है, जो पतङ्ग ( सूर्य ) से उत्पन्न होती है, फिर भी पतङ्ग ( अर्थात् कीटविशेष ) से नहीं बुझती, वह आप लोगों को सुखी करे । लोचनम् भवत्युत गम्यमानत्वे । तत्राद्यं पक्षं दूषयति—प्रकारान्तरेणेति । उपमाभिधा- नेन विनापीत्यर्थः । शम्या शमयितुं शक्येत्यर्थः । दीपवर्तिस्तु वायुमात्रेण शमयितुं शक्यते । तम एव कज्जलं तेन । न नो रहिता अपि तु रहितैव । दीपवर्तिस्तु तमसापि युक्ता भवति । अत्यन्तमप्रकटत्वात्कज्जलेन चोपरिचरेण । पतङ्गादर्कात् । दीप- वर्तिः पुनः शलभाद्ध्वंसते नोत्पद्यते । साम्येति । साम्यस्योपमायाः प्रपञ्चेन प्रबन्धेन यत्प्रतिपादनं स्वशब्देन तेन विनापीत्यर्थः । एतदुक्तं भवति—प्रतीय- मानैवोपमा व्यतिरेकस्यानुग्राहिणी भवन्ती नाभिधानं स्वकण्ठेनापेक्षते । तस्मान्न श्लेषोपमा व्यतिरेकस्यानुग्राहित्वेनोपात्ता । ननु यद्यप्यन्यत्र नैवं, तथापीह है या गम्यमान होने पर ? वहां प्रथम पक्ष में दोष देते हैं—प्रकारान्तर से—। अर्थात् उपमा के अभिधान के बिना भी । शम्या अर्थात् जिसका शमन किया जा सकता है । दीपवर्ति वायु मात्र से शान्त हो जाती है । तमस् ही कज्जल, उससे । नहीं रहित नहीं अपितु रहित ही । दीपवर्ति तो तम से भी युक्त रहती है, क्योंकि उसमें अत्यधिक प्रकाश नहीं होता और ऊपर कज्जल बनता रहता है । पतङ्ग अर्थात् अर्क ( सूर्य ) । दीपवर्ति तो शलभ ( फतिङ्गे ) से नष्ट हो जाती है, उत्पन्न नहीं होती । साम्य—। अर्थात् साम्य अर्थात् उपमा का प्रपञ्च अर्थात् प्रबन्ध ( आदि से अन्त तक ) द्वारा जो प्रतिपादन है वह स्वशब्द के बिना भी है। यह कहा गया—प्रतीयमान ही उपमा व्यतिरेक का अनुग्राहक होती हुई कण्ठतः अभिधान की अपेक्षा नहीं करती है । इस कारण श्लेषोपमा व्यतिरेक के अनुग्राहक रूप से