ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २४५ ध्वन्यालोकः अत्र हि साम्यप्रपञ्चप्रतिपादनं विनैव व्यतिरेको दर्शितः । नात्र श्लेषमात्राच्चारुत्वप्रतीतिरस्तीति श्लेषस्य व्यतिरेकाङ्गत्वेनैव विवक्षित- त्वात् न स्वतोऽलङ्कारतैत्यपि न वाच्यम् । यत एवंविधे विषये साम्यमात्रादपि सुप्रतिपादिताच्चारुत्वं दृश्यत एव । यथा— यहां साम्य-प्रपञ्च के प्रतिपादन के बिना ही व्यतिरेक दिखाया गया है। यहां ( 'रक्तस्त्वं० में ) श्लेषमात्र से चारुत्व की प्रतीति नहीं है इसलिए श्लेष की व्यतिरेक के अङ्गरूप से विवक्षा होने के कारण ( उसका ) स्वयं अलङ्कारत्व नहीं है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि इस प्रकार के विषय में साम्यमात्र के सम्यक् प्रतिपादन से भी, चारुत्व देखा ही जाता है । जैसे— लोचनम् तत्प्रावण्येनैव सोपात्ता; तदप्रावण्ये स्वयं चारुत्वहेतुत्वाभावादिति श्लेषोप- मात्र पृथगलङ्कारभावमेव न भजते । तदाह—नात्रेति । एतदसिद्धं स्वसंवेदन- बाधितत्वादिति हृदये गृहीत्वा स्वसंवेदनमपह्नुवानं परं श्लेषं विनोपमामात्रेण चारुत्वसम्पन्नमुदाहरणान्तरं दर्शयन्निरुत्तरीकरोति—यत इत्यादिना । उदाह- रणश्लोके तृतीयान्तपदेषु तुल्यशब्दोऽभिसम्बन्धनीयः । अन्यत्सर्वं 'रक्तस्त्वम्' इतिवद्योज्यम् । उपात्त नहीं है। शङ्का करते हैं कि यद्यपि अन्यत्र ऐसा नहीं है तथापि उसके प्रावण्य से ( अर्थात् व्यतिरेक के अनुग्राहक रूप से ) वह उपात्त है, क्योंकि उसके अप्रावण्य की स्थिति में ( अर्थात् श्लेषोपमा को व्यतिरेक का अनुग्राहक नहीं मानने पर ) स्वयं चारुत्वहेतुत्व नहीं होगा, इस लिए यहां श्लेषोपमा अलग से अलङ्कारभाव प्राप्त नहीं करती, उसे ( शङ्का को ) कहते हैं—'यहां नहीं—। 'अपने संवेदन से बाधित होने के कारण यह असिद्ध है ( यह बात नहीं बनती )' इस बात को मन में रख कर अपने संवेदन को छिपाते हुए वादी को श्लेष के बिना उपमा मात्र से चारुत्वसम्पन्न दूसरे उदाहरण के दिखाते हुए निरुत्तर करते हैं—क्योंकि इत्यादि से । उदाहरणश्लोक में तृतीयान्त पदों में 'तुल्य' ( 'सदृश' ) शब्द से सम्बन्धित करना चाहिए । दूसरे सब को 'रक्तस्त्वं०' के समान योजना कर लेनी चाहिए ।¹ १. प्रस्तुत उदाहरण 'रक्तस्त्वं०' गृहीत अलङ्कार का अवसर में त्याग रूप चतुर्थ 'समीक्षा' का है । यहां व्यतिरेक की अपेक्षा से श्लेष या श्लेषोपमा का त्याग किया गया ! इस प्रकार यह दो अलङ्कारों के परस्पर अनपेक्षा से स्थित होने के कारण 'संसृष्टि' का उदाहरण है। इस पर वादी कहता है कि यहां एकाश्रयानुप्रवेश रूप 'संकर' मान लेना चाहिए । इसका खण्डन करते हुए कहते हैं कि जब यहां श्लेष के विषय में ही व्यतिरेक की प्रतीति उत्पन्न होती तब दोनों के मिश्रित रूप तृतीय अलंकार 'संकर' को पाया जा सकता था । यहां श्लेष का विषय और व्यतिरेक का विषय