ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
द्वितीय उद्योतः २४१ ध्वन्यालोकः इत्यत्र उपमा श्लेषस्य । गृहीतमपि च यमवसरे त्यजति तद्रसानुगुणतयालङ्कारान्तरापेक्षया। यथा— रक्तस्त्वं नवपल्लवैरहमपि श्लाघ्यैः प्रियाया गुणै- स्त्वामायान्ति शिलीमुखाः स्मरधनुर्मुक्तास्तथा मामपि । कान्तापादतलाहतिस्तव मुदे तद्वन्ममाप्यावयोः सर्वं तुल्यमशोक केवलमहं धात्रा सशोकः कृतः ॥ यहां उपमाश्लेष का ( अवसर में ग्रहण है ) । ग्रहण किए हुए भी जिसको उस रस के अनुगुण होने के कारण और अलङ्का- रान्तर की अपेक्षा से अवसर में छोड़ देता है। जैसे— हे अशोक, तू नये पल्लवों से रक्त है और मैं भी प्रिया के श्लाघ्य गुणों के कारण रक्त ( अनुरक्त ) हूँ, तुझ पर शिलीमुख ( भौंरे ) आते हैं और मुझ पर भी कामदेव के धनुष से छूटे शिलीमुख ( बाण ) आते हैं, प्रिया के पैरों का ताड़न तुझे प्रसन्न करता है और उसी प्रकार ( कान्तापादतलाहति = विशेष प्रकार का रतबन्ध ) मुझे भी, हम दोनों का सब बराबर है, केवल विधाता ने मुझे सशोक बना डाला है ! लोचनम् भावः। अभिनयोऽप्यत्र प्राकरणिके प्रतिपदम्। अप्राकरणिके तु वाक्यार्था- भिनयेनोपाङ्गादिना। न तु सर्वथा नाभिनय इत्यलमवान्तरेण। ध्रुवशब्दश्च भावीर्ष्यावकाशप्रदानजीवितम्। रक्तो लोहितः। अहमपि रक्तः प्रबुद्धानुरागः। तत्र च प्रबोधको विभाव- स्तदीयपल्लवराग इति मन्तव्यम्। एवं प्रतिपादमाद्योऽर्थो विभावत्वेन व्याख्येयः। अत एव हेतुश्लेषोऽयम्। सहोक्त्युपमाहेत्वलङ्काराणां हि भूयसा है। ( लता रूप ) प्राकरणिक अर्थ में यहां पद-पद पर अभिनय भी है। ( नारी रूप ) अप्राकरणिक अर्थ में उपाङ्ग आदि वाक्यार्थाभिनय से ( अभिनय है )। न कि सर्वथा अभिनय नहीं है, इस अवान्तर चर्चा से रहने दीजिए। 'ध्रुव' ( 'निश्चय' ) शब्द भावी ईर्ष्या को अवसर देने में प्राणभूत है। रक्त अर्थात् लोहित। मैं भी रक्त अर्थात् प्रबुद्ध अनुराग वाला हूँ। वहाँ प्रबोधक विभाव ( उद्दीपन विभाव ) उस ( अशोक ) का पल्लवराग है, ऐसा मन्तव्य है। इस प्रकार प्रत्येक पाद में पहला अर्थ विभाव रूप से व्याख्या के योग्य है। अतएव यह हेतु¹ श्लेष ( हेतु अलङ्कार सहित श्लेष ) है। सहोक्ति, उपमा और हेतु अलङ्कार १. प्राचीन आलङ्कारिकों ने 'कार्य के साथ कारण के अभेद का कथन' रूप 'हेतु' अलङ्कार भी १६ ध्व०
२४२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र हि प्रबन्धप्रवृत्तोऽपि श्लेषो व्यतिरेकविवक्षया त्यज्यमानो रसविशेषं पुष्णाति । नात्रालङ्कारद्वयसन्निपातः, किं तर्हि ? अलङ्कारा- न्तरमेव श्लेषव्यतिरेकलक्षणं नरसिंहवदिति चेत्—न, तस्य प्रकारान्त- रेण व्यवस्थापनात् । यत्र हि श्लेषविषय एव शब्दे प्रकारान्तरेण व्यतिरेकप्रतीतिर्जायते स तस्य विषयः । यथा—'स हरिर्नाम्ना देवः यहां प्रबन्ध ( आद्यन्त ) से प्रवृत्त भी श्लेष व्यतिरेक की विवक्षा से छोड़ा जाता हुआ रसविशेष को पुष्ट करता है । यहां दो अलङ्कारों का सन्निपात नहीं है । तो क्या है ? नरसिंह ( आदमी और सिंह ) की भांति श्लेषव्यतिरेक रूप अन्य अलङ्कार ही है तो, ऐसा नहीं; उसकी दूसरे प्रकार से व्यवस्था की गई है । जहां श्लेष के विषयभूत शब्द में प्रकारान्तर से व्यतिरेक की प्रतीति होती है वह उसका विषय है, जैसे— लोचनम् श्लेषानुग्राहकत्वम् । अनेनैवाभिप्रायेण भामहो न्यरूपयत्—'तत्सहोक्त्युपमा- हेतुनिर्देशात्त्रिविधम्' इत्युक्त्या न त्वन्यालङ्कारानुग्रहनिराचिकीर्षया । रसविशेष- मिति विप्रलम्भम् । सशोकशब्देन व्यतिरेकमानयता शोकसहभूतानां निर्वेद- चिन्तादीनां व्यभिचारिणां विप्रलम्भपरिपोषकाणामवकाशो दत्तः । किं तर्हीति । सङ्करालङ्कार एक एवायम् ; तत्र किं त्यक्तं किं वा गृहीतमिति पर- स्याभिप्रायः । तस्येति सङ्करस्य । एकत्र हि विषयेऽलङ्कारद्वयप्रतिभोल्लासः सङ्करः । सहरिशब्द एको विषयः । सः हरिः, यदि वा सह हरिभिः सहरि- बाहुल्येन श्लेष के अनुग्राहक होते हैं । इसी अभिप्राय से भामह ने—'वह ( श्लेष ) सहोक्ति, उपमा और हेतु के निर्देश से तीन प्रकार का होता है' ( २. ३ ४ ) यह कह कर निरूपण किया है, न कि अन्य अलङ्कार के अनुग्रह के निराकरण करने की इच्छा से । रस विशेष अर्थात् विप्रलम्भ । 'सशोक' शब्द से 'व्यतिरेक' को लाते हुए ( कवि ने ) शोक के साथ उत्पन्न निर्वेद, चिन्ता आदि विप्रलम्भ के परिपोषक व्यभिचारी भावों को अवकाश दे दिया है । तो क्या है? सङ्करालङ्कार यह एक ही है, तब वहां क्या त्याग किया, क्या ग्रहण किया, यह दूसरे का अभिप्राय है । उसका अर्थात् संकरण का । एक ही विषय में दो अलङ्कारों की प्रतिभा होना 'सङ्कर' है । 'सहरि' शब्द एक विषय माना है । इस प्रकार प्रस्तुत उदाहरण को 'हेतु' रूप से व्याख्यान करना चाहिए—'जिस कारण स्मरधनुर्मुक्त अर्थात् अन्य पुष्पों को छोड़ कर शिलीमुख ( भौंरे ) तुझ पर आते हैं उस कारण उस प्रकार काम के धनुष से निकले हुए शिलीमुख ( बाण ) मुझ पर भी आते हैं, जिस कारण कान्ता के पैरों का आहनन तेरी प्रसन्नता के लिए है उस कारण उस प्रकार मेरी भी प्रसन्नता के लिए भी है, क्योंकि अपनी प्रियतमा के पैरों से आहत अशोक के पुष्प-विकास को देख कर नायक प्रसन्न होता है।' इस प्रकार लोचनकार के प्रत्येक पाद के अर्थ को उद्दीपन विभाव के रूप में व्याख्यान करने की युक्ति का निर्देश किया है ।
द्वितीय उद्योतः २४३ ध्वन्यालोकः सहरिर्वरतुरगनिवहेन' इत्यादौ । अत्र ह्यन्य एव शब्दः श्लेषस्य विषयो- ऽन्यश्च व्यतिरेकस्य । यदि चैवंविधे विषयेऽलङ्कारान्तरत्वकल्पना क्रियते तत्संसृष्टेर्विषयापहार एव स्यात् । श्लेषमुखेनैवात्र व्यतिरेक- स्यात्मलाभ इति नायं संसृष्टेर्विषय इति चेत्-न; व्यतिरेकस्य 'वह देव तो नाममात्र से स हरि हैं (और यह ) राजा तो श्रेष्ठ घोड़ों के समूह से सहरि है'—इत्यादि में । यहां क्योंकि श्लेष का विषय दूसरा ही शब्द है और व्यतिरेक का विषय दूसरा । यदि इस प्रकार के विषय में अलङ्कारान्तरत्व की कल्पना करते हैं, तब 'संसृष्टि' का विषयापहार ही हो जायगा । श्लेष के प्रकार से ही यहां व्यतिरेक आत्मलाभ कर रहा है अतः यह संसृष्टि का विषय नहीं, यदि ऐसा कहो, तो लोचनम् रिति । अत्र हीति । हिशब्दस्तुशब्दस्यार्थे, 'रक्तस्त्व' मित्यत्रेत्यर्थः । अन्य इति रक्त इत्यादिः । अन्यश्च अशोकसशोकादिः । नन्वेकं वाक्यात्मकं विषय- माश्रित्यैकविषयत्वादस्तु सङ्कर इत्याशङ्क्याह—यदीति । एवंविधे वाक्यलक्षणे विषये विषय इत्येकत्वं विवक्षितं बोध्यम् । एकवाक्यापेक्षया यद्येकविषयत्वमु- च्यते तन्न क्वचित्संसृष्टिः स्यात्, सङ्करेण व्याप्तत्वात् । ननूपमागर्भो व्यति- रेकः, उपमा च श्लेषमुखेनैवायातेति श्लेषोऽत्र व्यतिरेकस्यानुग्राहक इति सङ्क- रस्यैवैष विषयः । यत्र त्वनुग्राह्यानुग्राहकभावो नास्ति तत्रैकवाक्यगामित्वेऽपि संसृष्टिरेव; तदेतदाह--श्लेषेति । श्लेषबलानीतोपमामुखेनेत्यर्थः । एतत्परिह- रति—नेति । अयं भावः—किं सर्वत्रोपमायाः स्वशब्देनाभिधाने व्यतिरेको है । 'सः हरिः', यदि वा हरियों (अश्वों) के साथ सहरि । यहां क्योंकि—। 'हि' (क्योंकि) शब्द 'तु' शब्द के अर्थ में है, अर्थात् 'रक्तस्त्वं०' इस स्थल में । दूसरे— अर्थात् 'रक्त' इत्यादि और दूसरे अर्थात् 'अशोक', 'सशोक' इत्यादि । यह आशङ्का करके कि एक वाक्यात्मक विषय को आश्रयण करके एक विषय होने के कारण 'सङ्कर' (एकाश्रयानुप्रवेश रूप) हो, कहते हैं—यदि—। इस प्रकार के वाक्य रूप विषय में 'विषय' यह एकत्व विवक्षित समझना चाहिए । यदि एक वाक्य की अपेक्षा करके 'एकविषयत्व' कहते हैं तो कहीं 'संसृष्टि' नहीं होगी, क्योंकि 'सङ्कर' व्याप्त हो जायगा । (शङ्का करते हैं कि) उपमागर्भ व्यतिरेक है, और उपमा श्लेष के प्रकार से आई है, इसलिए श्लेष यहां व्यतिरेक का अनुग्राहक है, अतः यह सङ्कर (अनुग्राह्यानुग्राहकभाव रूप) का ही विषय है । जहां अनुग्राह्यानुग्राहक भाव नहीं है, वहां एकवाक्यगामी होने पर भी 'संसृष्टि' ही है, उस (शङ्का) को कहते हैं—श्लेष-। अर्थात् श्लेष के बल से लाई गई उपमा के प्रकार से । इसका परिहार करते हैं—नहीं-। भाव यह है—क्या सब जगह उपमा के स्वशब्द द्वारा ('इवा'दि द्वारा) अभिधान करने पर व्यतिरेक होता
२४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रकारान्तरेणापि दर्शनात् । यथा— नो कल्पापायवायोरदयरयददलत्क्ष्माधरस्यापि शम्या गाढोद्दीर्णोज्ज्वलश्रीरहनि न रहिता नो तमःकज्जलेन । प्राप्तोत्पत्तिः पतङ्गान्न पुनरुपगता मोषमुष्णत्विषो वो वर्त्तिः सैवान्यरूपा सुखयतु निखिलद्वीपदीपस्य दीप्तिः ॥ यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि व्यतिरेक प्रकारान्तर से भी देखा जाता है। जैसे— सारे द्वीपों के दीप भगवान् सूर्य की दीप्ति रूप कोई लोकोत्तर वर्ति, जो निर्दय वेग से पर्वतों को उखाड़ देने वाले कल्पान्त के वायु से नहीं बुझ पाती, जो दिन में भी अत्यन्त उज्ज्वल प्रकाश फैलाती है और तमरूपी कज्जल से जो नहीं रहित नहीं— होती है, जो पतङ्ग ( सूर्य ) से उत्पन्न होती है, फिर भी पतङ्ग ( अर्थात् कीटविशेष ) से नहीं बुझती, वह आप लोगों को सुखी करे । लोचनम् भवत्युत गम्यमानत्वे । तत्राद्यं पक्षं दूषयति—प्रकारान्तरेणेति । उपमाभिधा- नेन विनापीत्यर्थः । शम्या शमयितुं शक्येत्यर्थः । दीपवर्तिस्तु वायुमात्रेण शमयितुं शक्यते । तम एव कज्जलं तेन । न नो रहिता अपि तु रहितैव । दीपवर्तिस्तु तमसापि युक्ता भवति । अत्यन्तमप्रकटत्वात्कज्जलेन चोपरिचरेण । पतङ्गादर्कात् । दीप- वर्तिः पुनः शलभाद्ध्वंसते नोत्पद्यते । साम्येति । साम्यस्योपमायाः प्रपञ्चेन प्रबन्धेन यत्प्रतिपादनं स्वशब्देन तेन विनापीत्यर्थः । एतदुक्तं भवति—प्रतीय- मानैवोपमा व्यतिरेकस्यानुग्राहिणी भवन्ती नाभिधानं स्वकण्ठेनापेक्षते । तस्मान्न श्लेषोपमा व्यतिरेकस्यानुग्राहित्वेनोपात्ता । ननु यद्यप्यन्यत्र नैवं, तथापीह है या गम्यमान होने पर ? वहां प्रथम पक्ष में दोष देते हैं—प्रकारान्तर से—। अर्थात् उपमा के अभिधान के बिना भी । शम्या अर्थात् जिसका शमन किया जा सकता है । दीपवर्ति वायु मात्र से शान्त हो जाती है । तमस् ही कज्जल, उससे । नहीं रहित नहीं अपितु रहित ही । दीपवर्ति तो तम से भी युक्त रहती है, क्योंकि उसमें अत्यधिक प्रकाश नहीं होता और ऊपर कज्जल बनता रहता है । पतङ्ग अर्थात् अर्क ( सूर्य ) । दीपवर्ति तो शलभ ( फतिङ्गे ) से नष्ट हो जाती है, उत्पन्न नहीं होती । साम्य—। अर्थात् साम्य अर्थात् उपमा का प्रपञ्च अर्थात् प्रबन्ध ( आदि से अन्त तक ) द्वारा जो प्रतिपादन है वह स्वशब्द के बिना भी है। यह कहा गया—प्रतीयमान ही उपमा व्यतिरेक का अनुग्राहक होती हुई कण्ठतः अभिधान की अपेक्षा नहीं करती है । इस कारण श्लेषोपमा व्यतिरेक के अनुग्राहक रूप से
द्वितीय उद्योतः २४५ ध्वन्यालोकः अत्र हि साम्यप्रपञ्चप्रतिपादनं विनैव व्यतिरेको दर्शितः । नात्र श्लेषमात्राच्चारुत्वप्रतीतिरस्तीति श्लेषस्य व्यतिरेकाङ्गत्वेनैव विवक्षित- त्वात् न स्वतोऽलङ्कारतैत्यपि न वाच्यम् । यत एवंविधे विषये साम्यमात्रादपि सुप्रतिपादिताच्चारुत्वं दृश्यत एव । यथा— यहां साम्य-प्रपञ्च के प्रतिपादन के बिना ही व्यतिरेक दिखाया गया है। यहां ( 'रक्तस्त्वं० में ) श्लेषमात्र से चारुत्व की प्रतीति नहीं है इसलिए श्लेष की व्यतिरेक के अङ्गरूप से विवक्षा होने के कारण ( उसका ) स्वयं अलङ्कारत्व नहीं है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि इस प्रकार के विषय में साम्यमात्र के सम्यक् प्रतिपादन से भी, चारुत्व देखा ही जाता है । जैसे— लोचनम् तत्प्रावण्येनैव सोपात्ता; तदप्रावण्ये स्वयं चारुत्वहेतुत्वाभावादिति श्लेषोप- मात्र पृथगलङ्कारभावमेव न भजते । तदाह—नात्रेति । एतदसिद्धं स्वसंवेदन- बाधितत्वादिति हृदये गृहीत्वा स्वसंवेदनमपह्नुवानं परं श्लेषं विनोपमामात्रेण चारुत्वसम्पन्नमुदाहरणान्तरं दर्शयन्निरुत्तरीकरोति—यत इत्यादिना । उदाह- रणश्लोके तृतीयान्तपदेषु तुल्यशब्दोऽभिसम्बन्धनीयः । अन्यत्सर्वं 'रक्तस्त्वम्' इतिवद्योज्यम् । उपात्त नहीं है। शङ्का करते हैं कि यद्यपि अन्यत्र ऐसा नहीं है तथापि उसके प्रावण्य से ( अर्थात् व्यतिरेक के अनुग्राहक रूप से ) वह उपात्त है, क्योंकि उसके अप्रावण्य की स्थिति में ( अर्थात् श्लेषोपमा को व्यतिरेक का अनुग्राहक नहीं मानने पर ) स्वयं चारुत्वहेतुत्व नहीं होगा, इस लिए यहां श्लेषोपमा अलग से अलङ्कारभाव प्राप्त नहीं करती, उसे ( शङ्का को ) कहते हैं—'यहां नहीं—। 'अपने संवेदन से बाधित होने के कारण यह असिद्ध है ( यह बात नहीं बनती )' इस बात को मन में रख कर अपने संवेदन को छिपाते हुए वादी को श्लेष के बिना उपमा मात्र से चारुत्वसम्पन्न दूसरे उदाहरण के दिखाते हुए निरुत्तर करते हैं—क्योंकि इत्यादि से । उदाहरणश्लोक में तृतीयान्त पदों में 'तुल्य' ( 'सदृश' ) शब्द से सम्बन्धित करना चाहिए । दूसरे सब को 'रक्तस्त्वं०' के समान योजना कर लेनी चाहिए ।¹ १. प्रस्तुत उदाहरण 'रक्तस्त्वं०' गृहीत अलङ्कार का अवसर में त्याग रूप चतुर्थ 'समीक्षा' का है । यहां व्यतिरेक की अपेक्षा से श्लेष या श्लेषोपमा का त्याग किया गया ! इस प्रकार यह दो अलङ्कारों के परस्पर अनपेक्षा से स्थित होने के कारण 'संसृष्टि' का उदाहरण है। इस पर वादी कहता है कि यहां एकाश्रयानुप्रवेश रूप 'संकर' मान लेना चाहिए । इसका खण्डन करते हुए कहते हैं कि जब यहां श्लेष के विषय में ही व्यतिरेक की प्रतीति उत्पन्न होती तब दोनों के मिश्रित रूप तृतीय अलंकार 'संकर' को पाया जा सकता था । यहां श्लेष का विषय और व्यतिरेक का विषय
२४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः आक्रन्दाः स्तनितैर्विलोचनजलान्यश्रान्तधाराम्बुभि- स्तद्विच्छेदभुवश्च शोकशिखिनस्तुल्यास्तडिद्विभ्रमैः । अन्तर्मे दयितामुखं तव शशी वृत्तिः समैवावयो- स्तत्किं मामनिशं सखे जलधर त्वं दग्धमेवोद्यतः ॥ इत्यादौ । रसनिर्वहणैकतानहृदयो यं च नात्यन्तं निर्वोढुमिच्छति । यथा— हे मित्र मेघ, मेरे आक्रन्द ( वियोगजनित आक्रन्दन ) तुम्हारे गर्जनों के, मेरे आंखों के जल तुम्हारे निरन्तर धाराजलों के एवं उस ( प्रिया ) के विच्छेद से उत्पन्न हुए ( मेरे ) शोकाग्नि ( तुम्हारे ) विद्युद्विलासों के सदृश हैं, मेरे हृदय में प्रिया का मुख है, तुम्हारे भीतर चन्द्रमा है, इस प्रकार मेरी और तुम्हारी वृत्ति बराबर है, फिर क्यों तुम निरन्तर मुझे जला डालने के लिए तत्पर हो ? इत्यादि में । रसनिर्वाह में एकाग्र-हृदय (कवि) और जिसका अत्यन्त ( आदि से अन्त तक ) निर्वाह करना नहीं चाहता । जैसे— लोचनम् एवं ग्रहणत्यागौ समर्थ्य 'नातिनिर्वहणैषिता' इति भागं व्याचष्टे— रसेति । चकारः समीक्षाप्रकारसमुच्चयार्थः । बाहुलतिकाया बन्धनीयपाशत्वेन रूपणं यदि निर्वाहयेत् , दयिता व्याधवधूः, वासगृहं कारागारपञ्जरादीति पर- इस प्रकार ग्रहण और त्याग का समर्थन करके 'दूर तक निर्वाह करने की इच्छा न हो' इस भाग की व्याख्या करते हैं—रस०—। 'और' ( 'च' ) समीक्षा के प्रकारों के समुच्चयार्थ है । बाहुलतिका का बन्धनीय पाश के रूप में रूपण को यदि निर्वाह करता, प्रिया को व्याध की पत्नी एवं वासगृह को कारागार-पञ्जर बनाता तो यह अधिक भिन्न हैं । यदि ऐसी स्थिति में भी संकर ही मानते हैं तब 'संसृष्टि' का विषय समाप्त हो जायगा । इस पर संकर-वादी पुनः कहता है कि यहां माना कि एकाश्रयानुप्रवेश रूप संकर नहीं है, किन्तु अङ्गाङ्गिभाव या अनुग्राह्यानुग्राहक भाव रूप संकर तो अनिवार्य है, क्योंकि यहां श्लेष के द्वारा ही व्यतिरेक आत्मलाभ कर रहा है । इस पर कहते हैं कि 'नो कल्पापाय०' में बिना उपमा के व्यतिरेक पाया जाता है, ऐसी स्थिति में श्लेष को व्यतिरेक का अनुग्राहक नहीं माना जा सकता । तब वादी कहता है कि 'रक्तस्त्वं०' में श्लेष मात्र से चारुत्व की प्रतीति नहीं है अतः उसे व्यतिरेक का अङ्ग मानना ही होगा । तब वादी को निरुत्तर करते हुए 'आक्रन्दाः०' इस उदाहरण में श्लेष के बिना उपमा और व्यतिरेक दिखाया । इस प्रकार यह सिद्धान्तित किया कि प्रस्तुत उदाहरण में श्लेष और व्यतिरेक दोनों की संसृष्टि है और व्यतिरेक की विवक्षा से प्रबन्धप्रवृत्त भी श्लेष त्यक्त होता हुआ रसविशेष ( विप्रलम्भ शृङ्गार ) का पोषक है ।
द्वितीय उद्योतः २४७ ध्वन्यालोकः कोपात्कोमललोलबाहुलतिकापाशेन बद्ध्वा दृढं नीत्वा वासनिकेतनं दयितया सायं सखीनां पुरः । भूयो नैवमिति स्खलत्कलगिरा संसूच्य दुश्चेष्टितं धन्यो हन्यत एव निह्नुतिपरः प्रेयान्रुदत्या हसन् ॥ अत्र हि रूपकमाक्षिप्तमनिर्व्यूढं च परं रसपुष्टये । निर्वोढुमिष्टमपि यं यत्नादङ्गत्वेन प्रत्यवेक्षते यथा- कोप के कारण अपनी कोमल और चंचल बाहुलता के पाश में जोर से बांध कर, सखियों के सामने वासगृह में ले जाकर, (उस नायक के परस्त्रीगमन आदि) दुश्चेष्टित को सूचित करके 'फिर ऐसा नहीं' यह लड़खड़ाती अव्यक्त आवाज में कहते हुए रुदन करती हुई नायिका के द्वारा अपने नखक्षत आदि को छिपाने में संलग्न हंसता हुआ धन्य प्रियतम मार खाता है। यहां रूपक आक्षिप्त एवं पूरा निर्वाह नहीं किया गया है, फिर भी रस का पोष करता है। निर्वाह के इष्ट भी जिसे यत्न से अङ्ग के रूप में देखता है। जैसे- लोचनम् मनौचित्यं स्यात् । सखीनां पुर इति । भवत्योऽनवरतं ब्रुवते नायमेवं करो- तीति तत्पश्यन्त्विदानीमिति भावः । स्खलन्ती कोपावेशेन कला मधुरा च गीर्यस्याः सा । कासौ गीरित्याह-भूयो नैवमित्येवंरूपा । एवमिति यदुक्तं तत्किमित्याह-दुश्चेष्टितं नखपदादि संसूच्य अङ्गुल्यादिनिर्देशेन । हन्यत एवेति । न तु सख्यादिकृतोऽनुनयोऽनुरुध्यते । यतोऽसौ हसनं निमित्तीकृत्य निह्नुतिपरः प्रियतमश्च तदीयं व्यलीकं का सोढुं समर्थेति । निर्वोढुमिति । निःशेषेण परिसमापयितुमित्यर्थः । अनौचित्य हो जाता । सखियों के सामने-। भाव यह है कि तुम सब हमेशा कहती हो 'यह ऐसा नहीं करता' तो अब देखो। स्खलित होती हुई कोपावेश से लड़खड़ाती हुई और कल अर्थात् मधुर वाणी है जिसकी। कौन वह वाणी है-'फिर ऐसा नहीं' इस प्रकार कि । 'इस प्रकार' जो यह कहा है वह क्या है, कहते हैं-नखक्षतादि दुश्चेष्टित को संसूचन अर्थात् अङ्गुलि आदि से निर्देश करके। ताड़न किया जाता ही है-। न कि सखी आदि का किया हुआ अनुनय (कि इसे छोड़ दो, अब ऐसा अपराध नहीं करेगा आदि) मानती है, क्यों कि वह हंसी को निमित्त करके (अपना दुश्चेष्टित) छिपा रहा है, और प्रियतम है, उसके व्यलीक को कौन सहन करने के लिए समर्थ है ? निर्वाह के०-। अर्थात् पूर्ण रूप से परिसमाप्त करने के लिए।
२४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः श्यामास्वङ्गं चकितहरिणीप्रेक्षणे दृष्टिपातं गण्डच्छायां शशिनि शिखिनां बर्हभारेषु केशान् । उत्पश्यामि प्रतनुषु नदीवीचिषु भ्रूविलासान् हन्तैकस्थं क्वचिदपि न ते भीरु सादृश्यमस्ति ॥ इत्यादौ । स एवमुपनिबध्यमानोऽलङ्कारो रसाभिव्यक्तिहेतुः कवेर्भवति । उक्तप्रकारातिक्रमे तु नियमेनैव रसभङ्गहेतुः सम्पद्यते । लक्ष्यं च हे भीरु, श्यामा लताओं में तेरे अङ्ग को, चकचिहाई हिरनी की निगाह में तेरे दृष्टिपात को, चन्द्र में तेरे गालों की कान्ति को, मयूरों के पुच्छभार में तेरे बालों को और नदी की पतली तरङ्गों में तेरे भ्रूविलासों को देखता फिरता हूँ, हन्त तेरा सादृश्य कहीं एक जगह नहीं है। इत्यादि में । वह इस प्रकार कवि का उपनिबध्यमान अलङ्कार रसाभिव्यक्ति का हेतु होता है, उक्त प्रकारों के अतिक्रमण करने पर, नियमतः रसभङ्ग का हेतु हो जाता है । उस लोचनम् श्यामासु सुगन्धिप्रियङ्गुलतासु पाण्डिम्ना तनिम्ना कण्टकितत्वेन च योगात् । शशिनीति पाण्डुरत्वात् । उत्पश्यामीति यत्नेनोत्प्रेक्षे । जीवितसन्धारणायेत्यर्थः । हन्तेति कष्टम्, एकस्थसादृश्याभावे हि दोलायमानोऽहं सर्वत्र स्थितो न कुत्रचिदेकत्र धृतिं लभ इति भावः । भीर्विति । यो हि कातरहृदयो भवति नासौ सर्वस्वमेकस्थं धारयतीत्यर्थः । अत्र ह्युत्प्रेक्षायास्तद्भावाध्यारोपरूपाया अनुप्राणकं सादृश्यं यथोपक्रान्तं, तथा निर्वाहिरतमपि विप्रलम्भरसपोषकमेव जातम् । तत्तु लक्ष्यं न दर्शितमिति सम्बन्धः । प्रत्युदाहरणे ह्यदर्शितेऽप्युदाहरणानुशीलनदिशा श्यामा अर्थात् शोभन गन्ध वाली प्रियङ्गु लताओं में, पाण्डुता, कृशता और कण्टकित- भाव के योग के कारण । शशी में पाण्डुर होने के कारण । देखता फिरता हूँ, यत्नपूर्वक उत्प्रेक्षण करता हूँ, अर्थात् जीवन धारण के लिए । 'हन्त' अर्थात् कष्टम् । भाव यह कि एक जगह सादृश्य के न मिलने से दोलायमान मैं सब जगह जाता हूँ, कहीं एक जगह मुझे धीरज नहीं मिलता है। भीरु—। अर्थात् जो कातर हृदय वाला होता है वह सब कुछ एक जगह नहीं रखता है ( क्योंकि कोई चुरा न ले जाय ) । यहां तद्भावाध्यारोप रूप ( अर्थात् जिसमें जो न हो उसका आहार्य आरोप रूप, जैसे श्यामा अर्थात् प्रियङ्गु लताओं में अङ्ग का अध्यारोप ) उत्प्रेक्षा को अनुप्राणित करने वाला सादृश्य जैसे उपक्रान्त है, निर्वाह किया गया भी विप्रलम्भरस का पोषक ही बना है । 'वह तो अर्थात् लक्ष्य नहीं दिखाया है' यह सम्बन्ध है । प्रत्युदाहरण के न दिखाने पर भी उदाहरण के अनुशीलन
द्वितीय उद्योतः २४९ ध्वन्यालोकः तथाविधं महाकविप्रबन्धेष्वपि दृश्यते बहुशः । तत्तु सूक्तिसहस्रद्योति- तात्मनां महात्मनां दोषोद्घोषणमात्मन एव दूषणं भवतीति न विभज्य दर्शितम् । किं तु रूपकादेरलङ्कारवर्गस्य येयं व्यञ्जकत्वे रसादिविषये लक्षणदिग्दर्शिता तामनुसरन् स्वयं चान्यल्लक्षणमुत्प्रेक्षमाणो यद्यलक्ष्य- क्रमप्रतिभमनन्तरोक्तेनेमं ध्वनेरात्मानमुपनिबध्नाति सुकविः समाहित- चेतास्तदा तस्यात्मलाभो भवति महीयानिति ॥ १८-१९ ॥ प्रकार का लक्ष्य महाकवियों के प्रबन्धों में भी बहुत देखा जाता है । परन्तु वह हजारों सूक्तियों से उद्योतित महात्मा जनों का दोष प्रकटन अपना ही दूषण होगा । इसलिए विभाग करके नहीं दिखाया । किन्तु रूपक आदि अलङ्कारों का जो कि यह रसादि विषय के व्यञ्जकत्व में लक्षण का प्रकार दिखाया है उसका अनुसरण करता हुआ और स्वयं अन्य लक्षण का उत्प्रेक्षण करता हुआ, समाहितचित्त सुकवि यदि पूर्वोक्त अलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्यसदृश ध्वनि के आत्मा का उपनिबन्धन करता है तो उसे बड़ा आत्मलाभ होता है ॥ १८-१९ ॥ लोचनम् कृतकृत्यतेति दर्शयति - किं त्विति । अन्यल्लक्षणमिति । परीक्षाप्रकारमित्यर्थः । तद्यथावसरे त्यक्तस्यापि पुनर्ग्रहणमित्यादि । यथा ममैव— शीतांशोरमृतच्छटा यदि कराः कस्मान्मनो मे भृशं संप्लुष्यन्त्यथ कालकूटपटलीसंवाससंदूषिताः । किं प्राणान्न हरन्त्युत प्रियतमासङ्कल्पमन्त्राक्षरै- रक्ष्यन्ते किमु मोहमेमि हहहा नो वेद्मि केयं गतिः ॥ इत्यत्र हि रूपकसन्देहनिदर्शनास्त्यक्त्वा पुनरुपात्ता रसपरिपोषायेत्यलम् ॥ की दिशा से अपनी कृतकृत्यता दिखाते हैं—किन्तु— । अन्य लक्षण— । अर्थात् परीक्षा का प्रकार । जैसे अवसर में छोड़े गए का भी फिर से ग्रहण, इत्यादि । जैसा मेरा ही— यदि चन्द्र की किरणें अमृतरूप हैं तो किस कारण मेरे मन को अत्यन्त सन्तप्त करती हैं ? यदि ये किरणें विषसमूह के साथ रहने से दूषित हो गई हैं तो प्राणों को क्यों नहीं हर लेती हैं ? अगर प्रियतमा के साथ बातचीत रूप मन्त्राक्षरों से प्राणों की रक्षा हो जाती है तो फिर क्यों मूर्च्छित हो जाता हूँ ? हा, हा, समझ में नहीं आता, यह कौन गति है ! यहां रूपक, सन्देह और निदर्शना अलङ्कारों को छोड़ कर पुनः उपादान किया गया १ है । अधिक कहना आवश्यक नहीं ॥ १८–१९ ॥ १. 'चन्द्र की किरणें अमृत रूप हैं' यहां रूपक का ग्रहण किया और 'किस कारण' इत्यादि से त्याग किया, 'यदि' इत्यादि से पुनः रूपक का उपादान किया; विषसमूह से दूषितत्व का 'संदेह'
२५० सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
क्रमेण प्रतिभात्यात्मा योऽस्यानुस्वानसन्निभः ।
शब्दार्थशक्तिमूलत्वात्सोऽपि द्वेधा व्यवस्थितः ॥ २० ॥
अस्य विवक्षितान्यपरवाच्यस्य ध्वनेः संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यत्त्वादनुर-
णनप्रख्यो य आत्मा सोऽपि शब्दशक्तिमूलोऽर्थशक्तिमूलश्चेति द्विप्रकारः ॥
ननु शब्दशक्त्या यत्रार्थान्तरं प्रकाशते स यदि ध्वनेः प्रकार
इसका जो आत्मा ( स्वरूप ) अनुस्वान ( घंटा के अनुरणन ) के सदृश क्रम से
प्रतीत होता है वह शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल होने के कारण दो प्रकार से
व्यवस्थित है ॥ २० ॥
इस विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का संलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य होने के कारण ( क्रम से
व्यङ्ग्य के संलक्षित होने के कारण ) अनुरणन रूप जो आत्मा ( स्वरूप ) है वह भी
दो प्रकार का होता है—शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल ।
( शङ्का करते हैं कि ) जहां शब्दशक्ति से अर्थान्तर प्रकाशित होता है उसे यदि
लोचनम्
एवं विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनेः प्रथमं भेदमलक्ष्यक्रमं विचार्य द्वितीयं भेदं
विभक्तुमाह—क्रमेणेत्यादि । प्रथमपादोऽनुवादभागो हेतुत्वेनोपात्तः । घण्टाया
अनुरणनमभिघातजशब्दापेक्षया क्रमेणैव भाति । सोऽपीति । न केवलं मूलतो
ध्वनिद्विविधः । नापि केवलं विवक्षितान्यपरवाच्यो द्विविधः । अयमपि द्विविध
एवेत्यपिशब्दार्थः ॥ २० ॥
इस प्रकार विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के प्रथम भेद अलक्ष्यक्रम का विचार
करके दूसरे भेद को विभाजनार्थ कहते हैं—इसका जो० इत्यादि । प्रथम पाद अनुवाद
भाग हेतु रूप में उपात्त है । ( अर्थात् जिस कारण क्रम से प्रतीत होता है, उसी कारण
'अनुस्वान के सदृश' है ) घण्टा का अनुरणन अभिघातजनित शब्द की अपेक्षा से क्रम से
ही प्रतीत होता है । वह भी—। 'भी' शब्द का अर्थ है कि न केवल मूलतः ध्वनि दो
प्रकार का है, और न केवल विवक्षितान्यपरवाच्य दो प्रकार का है, यह ( संलक्ष्यक्रम-
व्यङ्ग्य ध्वनि )१ भी दो प्रकार का ही है ॥ २० ॥
किया और 'प्राणों को क्यों' इत्यादि से त्याग कर दिया, फिर 'अगर' इत्यादि से उपादान किया;
इसी प्रकार 'प्रियया' इत्यादि से निदर्शना का उपादान किया और 'क्यों मूर्च्छित हो जाता हूँ'
से त्याग किया, फिर 'क्या गति है' इत्यादि से उसका पुनः उपादान किया । अथवा 'सन्तप्त करती
हैं' इससे रूपक का, 'हर लेती हैं' इससे सन्देह का और 'मूर्च्छित हो जाता हूँ' इससे निदर्शना का
त्याग है और 'समझ में नहीं आता' इत्यादि से उनका उपादान है । यह टिप्पणी 'लोचन' की
'बालप्रिया' में निर्दिष्ट है ।
१. ध्वनि पहले दो प्रकार का बताया जा चुका अविवक्षित वाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य ।
द्वितीय उद्योतः २५१ ध्वन्यालोकः उच्यते तदिदानीं श्लेषस्य विषय एवापहृतः स्यात्, नापहृत इत्याह— आक्षिप्त एवालङ्कारः शब्दशक्त्या प्रकाशते । यस्मिन्ननुक्तः शब्देन शब्दशक्त्युद्भवो हि सः ॥ २१ ॥ यस्मादलङ्कारो न वस्तुमात्रं यस्मिन् काव्ये शब्दशक्त्या प्रकाशते स शब्दशक्त्युद्भवो ध्वनिरित्यस्माकं विवक्षितम् । वस्तुद्वये च शब्द- शक्त्या प्रकाश्यमाने श्लेषः । यथा— ध्वनि का प्रकार कहते हैं तब तो अब श्लेष का विषय ही अपहृत हो जायगा । इस पर कहते हैं कि अपहृत न होगा— क्योंकि, जहां शब्द से अनुक्त ( साक्षात् संकेतित नहीं ) अलङ्कार आक्षेप-सामर्थ्य से ही शब्दशक्ति द्वारा प्रकाशित होता है, वह 'शब्द-शक्त्युद्भव ध्वनि' है ॥ २१ ॥ क्योंकि, अलङ्कार, न कि वस्तुमात्र, जिस काव्य में शब्दशक्ति से प्रकाशित होता है वह 'शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि' है, यह हमारा विवक्षित है । और दो वस्तुओं के शब्दशक्ति द्वारा प्रकाशित होने पर 'श्लेष' होता है । जैसे— लोचनम् कारिकागतं हिशब्दं व्याचष्टे—यस्मादिति । अलङ्कारशब्दस्य व्यवच्छेद्यं दर्शयति—न वस्तुमात्रमिति । वस्तुद्वये चेति । चशब्दस्तुशब्दस्यार्थे । येनेति । येन ध्वस्तं बालक्रीडायामनः शकटम् । अभवेनाजेन सता । बलिनो दान- कारिका में आए 'क्योंकि' ( हि ) शब्द की व्याख्या करते हैं—क्योंकि—। 'अलङ्कार' शब्द का व्यवच्छेद्य दिखलाते हैं—न कि वस्तुमात्र—। और दो वस्तुओं के—। 'और' का अर्थ 'तो' है । जिसने— । जिसने बचपन के खेल में शकट ( नाम के असुर ) का नाश किया । अभव अर्थात् अज या अजन्मा रूप में विद्यमान । बली दानवों को जो जीतने वाला है, अविवक्षितवाच्य को लक्षणामूल ध्वनि और विवक्षितान्यपरवाच्य को अभिधामूल ध्वनि भी कहते हैं । अविवक्षितवाच्य ध्वनि के भी दो भेद हैं—अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य । फिर विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के भी दो भेद निर्दिष्ट होते हैं—शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्ति- मूल । बहुत लोगों ने उभयशक्तिमूल भी एक और भेद माना है। वस्तु और अलङ्कार ध्वनि के भेद से शब्दशक्तिमूल के भी दो भाग हैं। अर्थशक्तिमूल के १२ भेद आगे निर्दिष्ट होंगे । इस प्रकार संलक्ष्यक्रम के १५ भेद और असंलक्ष्य क्रम व्यङ्ग्य के एक भेद को मिला कर विवक्षितान्यपरवाच्य या अभिधामूल ध्वनि के १६ भेद होते हैं और उपर्युक्त दो भेद अविवक्षितवाच्य या लक्षणामूल ध्वनि के हैं। इस प्रकार सब मिल कर १८ भेद हैं जो आगे और भी विस्तृत होते हैं । प्रस्तुत में संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य के शब्दशक्तिमूल ध्वनि और श्लेष अलङ्कार के विषय-भेद का विचार करते हैं ।
२५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः येन ध्वस्तमनोभवेन बलिजित्कायः पुरास्त्रीकृतो यश्चोद्वृत्तभुजङ्गहारवलयो गङ्गां च योऽधारयत् । यस्याहुः शशिमच्छिरो हर इति स्तुत्यं च नामामराः पायात्स स्वयमन्धकक्षयकरस्त्वां सर्वदोमाधवः ॥ ( विष्णुपक्ष में ) जिस अभव ( विष्णु ) ने शकट का नाश किया, बली (दानवों) को जीतने वाला अपने शरीर को पुराकाल में स्त्रीरूप बनाया, जिसने उद्वृत्त भुजङ्ग को मारा, जिसका लय ( अकार रूप ) शब्द में है, जिसने अग और पृथ्वी को धारण किया, 'शशी को मन्थन करनेवाले राहु के शिर को काटने वाला' जिसके इस स्तुत्य नाम को ऋषि लोग लिया करते हैं, वह सब कुछ देनेवाला माधव, जिसने अन्धक जनों को ( द्वारका में ) बसाया, तुम्हारी रक्षा करें । ( शिवपक्ष में ) मनोभव को ध्वस्त करने वाले जिसने पुराकाल में बलि को जीतने वाले के शरीर को अस्त्र बनाया, उद्वृत्त भुजङ्ग ही जिसके हार और वलय हैं, गङ्गा को जिसने धारण किया, देवता जिसके शिर को चन्द्रयुक्त कहते हैं 'हर' यह स्तुत्य नाम बताते हैं, वह उमा के धव ( प्रिय ) अन्धक का विनाश करने वाले भगवान् तुम्हारी सर्वदा रक्षा करें । लोचनम् वान् यो जयति तादृग्येन कायो वपुः पुरामृतहरणकाले स्त्रीत्वं प्रापितः । यश्चो- द्वृत्तं समदं कालियाख्यं भुजङ्गं हतवान् । रवे शब्दे लयो यस्य । 'अकारो विष्णुः' इत्युक्तेः । यश्चागं गोवर्धनपर्वतं गां च भूमिं पातालगतामधारयत् । यस्य च नाम स्तुत्यमृषय आहुः किं तत् ? शशिनं मथनातीति क्किप् राहुः, तस्य शिरोहरो मूर्द्धापहारक इति । स त्वां माधवो विष्णुः सर्वदः पायात् । कीदृक् ? अन्धकनाम्नां जनानां येन क्षयो निवासो द्वारकायां कृतः । यदि वा मौसले इषीकाभिस्तेषां क्षयो विनाशो येन कृतः । द्वितीयोऽर्थः—येन ध्वस्त- कामेन सता बलिजितो विष्णोः सम्बन्धी कायः पुरा त्रिपुरनिर्द्दहनावसरेऽस्त्री- उस अपने शरीर को जिसने पुराकाल में अर्थात् अमृत हरण के अवसर में स्त्रीरूप बनाया, जिसने उद्वृत्त अर्थात् गर्वीले कालिय नामक भुजङ्ग को मारा, रव अर्थात् शब्द में जिसका लय है, क्योंकि कहा है—'अकार विष्णु है', जिसने अग अर्थात् गोवर्धन पर्वत को और पाताल में गई पृथ्वी को धारण किया, जिसका स्तुत्य नाम ऋषिलोग कहते हैं, वह क्या ? शशी को मथन करने वाला राहु, उसका शिर हरण करने वाला, अर्थात् मस्तक काट देने वाला' । वह सब कुछ देने वाले माधव विष्णु तुम्हारी रक्षा करें । वह कैसे हैं—जिसने अंधक नाम के लोगों को द्वारका में बसाया, अथवा मौसल पर्व में यादवों का नाश करने वाले हैं । दूसरा अर्थ—काम को नष्ट करने वाले जिसने बलि को जीतने वाले विष्णु के शरीर को पुराकाल में अर्थात् त्रिपुरदाह के अवसर में अस्त्र
द्वितीय उद्योतः २५३ ध्वन्यालोकः नन्वलङ्कारान्तरप्रतिभायामपि श्लेषव्यपदेशो भवतीति दर्शितं भट्टोद्भटेन, तत्पुनरपि शब्दशक्तिमूलो ध्वनिर्निरवकाश इत्याशङ्क्येदमुक्तम् ‘आक्षिप्तः’ इति । तदयमर्थः—यत्र शब्दशक्त्या साक्षादलङ्कारान्तरं वाच्यं सत्प्रतिभासते स सर्वः श्लेषविषयः । यत्र तु शब्दशक्त्या सामर्थ्याक्षिप्तं वाच्यव्यतिरिक्तं व्यङ्ग्यमेवालङ्कारान्तरं प्रकाशते स ध्वनेर्विषयः । शब्दशक्त्या साक्षादलङ्कारान्तरप्रतिभा यथा— तस्या विनापि हारेण निसर्गादेव हारिणौ । जनयामासतुः कस्य विस्मयं न पयोधरौ ॥ ( शङ्का करते हैं कि ) यह उद्भट ने दिखाया है कि अलङ्कारान्तर की प्रतिभा में भी ‘श्लेष’ का ही व्यपदेश होता है, तब तो फिर शब्दशक्तिमूल ध्वनि का कोई स्थान नहीं रह गया ! यह आशङ्का करके यह कहा है ‘आक्षिप्त’ ( अर्थात् आक्षेप- सामर्थ्य से प्राप्त ) । तो यह अर्थ है—जहां शब्दशक्ति से साक्षात् अलङ्कारान्तर वाच्य होता हुआ प्रतीत होता है, वह सब श्लेष का विषय है । और जहां शब्दशक्ति द्वारा सामर्थ्य से आक्षिप्त और वाच्य से अतिरिक्त व्यङ्ग्य ही अलङ्कारान्तर प्रकाशित होता है, वह ध्वनि का विषय है। शब्दशक्ति द्वारा साक्षात् अलङ्कारान्तर की प्रतिभा; जैसे— उसके दोनों पयोधर हार के बिना भी स्वभाव से ही हारी ( हार धारण करने वाले, परिहार यह कि मनोहर ) किसके विस्मय को उत्पन्न नहीं किए ? लोचनम् कृतः शरत्वं नीतः। उद्द्वृत्ता भुजङ्गा एव हारा वलयाश्च यस्य, मन्दाकिनीं च योऽधारयत् , यस्य च ऋषयः शशिमच्छन्द्रयुक्तं शिर आहुः, हर इति च यस्य नाम स्तुत्याहुः, स भगवान्स्वयमेवान्धकासुरस्य विनाशकारी त्वां सर्वदा सर्वकालमुमाया धवो वल्लभः पायादिति । अत्र वस्तुमात्रं द्वितीयं प्रतीतं नालङ्कार इति श्लेषस्यैव विषयः । आक्षिप्तशब्दस्य कारिकागतस्य व्यव- च्छेद्यं दर्शयितुं चोद्येनोपक्रमते—नन्वलङ्कारेत्यादिना । तस्या विनापीति । अपिशब्दोऽयं विरोधमाचक्षाणोऽर्थद्वयेऽप्यभिधाशक्तिं अर्थात् बाण बनाया, उद्द्वृत्त ( लिपटे हुए ) भुजङ्ग ही हैं हार और वलय जिसके, मन्दा- किनी को जिसने धारण किया, ऋषिलोग जिसके सिर को ‘चन्द्रयुक्त’ बतलाते हैं और ‘हर’ यह जिसका स्तुत्य नाम उच्चारण करते हैं, वह भगवान् स्वयमेव अन्धक असुर के विनाशकारी, उमा के प्रिय सर्वदा तुम्हारी रक्षा करें।’ यहां दूसरा प्रतीत वस्तुमात्र अलङ्कार नहीं है, श्लेष का ही विषय है । कारिका में आए हुए ‘आक्षिप्त’ शब्द व्यवच्छेद्य दिखलाने के लिए पहले से उपक्रम करते हैं—शङ्का करते हैं—इत्यादि से । उसके दोनों०—। यह ‘भी’ शब्द विरोध का अभिधान करता हुआ दोनों अर्थों में
२५४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र शृङ्गारव्यभिचारी विस्मयाख्यो भावः साक्षाद्विरोधालङ्कारश्च प्रतिभासत इति विरोधच्छायानुग्राहिणः श्लेषस्यायं विषयः, न त्वनुस्वा- नोपमव्यङ्ग्यस्य ध्वनेः । अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य तु ध्वनेर्वाच्येन श्लेषेण विरोधेन वा व्यञ्जितस्य विषय एव । यथा ममैव — श्लाघ्याशेषतनुं सुदर्शनकरः सर्वाङ्गलीलाजित- त्रैलोक्यां चरणारविन्दललितेनाक्रान्तलोको हरिः । यहां शृङ्गार का व्यभिचारी विस्मय नाम का भाव और साक्षात् विरोध अलङ्कार प्रतिभासित हो रहे हैं, इस प्रकार विरोध की छाया के अनुग्राहक श्लेष का यह विषय है, न कि अनुस्वानसदृशव्यङ्ग्यरूप ध्वनि का। वाच्य श्लेष अथवा विरोध से व्यञ्जित अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि का तो विषय ही है। जैसे, मेरा ही— जिनका केवल हाथ ही देखने में सुन्दर है ( अथवा हाथ में सुदर्शन चक्र धारण करने वाले ), जिन्होंने अपने चरणारविन्द से (अथवा चरण के विक्षेप से) तीन लोकों लोचनम् नियच्छति हरतो हृदयमवश्यमिति हारिणौ । हारो विद्यते ययोस्तौ हारिणा- विति । अत एव विस्मयशब्दोऽस्यैवार्थस्योपोलकः । अपिशब्दाभावे तु न तत एवार्थद्वयस्याभिधा स्यात् , स्वसौन्दर्यादेव स्तनयोर्विस्मयहेतुत्वोपपत्तेः । विस्मयाख्यो भाव इति दृष्टान्ताभिप्रायेणोपात्तम् । यथा विस्मयः शब्देन प्रतिभाति विस्मय इत्यनेन शब्देन तथा विरोधोऽपि प्रतिभात्यपीत्यनेन शब्देन । ननु किं सर्वथात्र ध्वनिनीस्तीत्याशङ्क्याह—अलक्ष्येति । विरोधेन वेति । वाग्रहणेन श्लेषविरोधसङ्करालङ्कारोऽयमिति दर्शयति, अनुग्रहयोगादेक- तरत्यागग्रहणनिमित्ताभावो हि वाशब्देन सूच्यते । सुदर्शनं चक्रं करे यस्य । भी अभिधाशक्ति को अर्पित करता है, हृदय को अवश्य हरण करते हैं, इसलिए हारी हैं और जिन दोनों के हार है अतएव हारी । इसी लिए 'विस्मय' शब्द इसी अर्थ का उपोद्वलक है । 'भी' शब्द के अभाव में तो उसीसे दोनों अर्थों का अभिधान नहीं होता, बल्कि स्वगत सौन्दर्य से ही स्तनों का विस्मयहेतुत्व उपपन्न हो जाता । 'विस्मय नाम का भाव' यह दृष्टान्त के अभिप्राय से उपादान किया है। जैसे विस्मय 'विस्मय' शब्द से प्रतीत होता है, 'उस प्रकार विरोध भी' 'भी' ( 'अपि' ) इस शब्द से प्रतीत होता है । क्या सर्वथा यहाँ ध्वनि नहीं है ? यह आशङ्का करके कहते हैं— अलक्ष्य०— । अथवा विरोध से— । 'अथवा' ( वा' ) ग्रहण से 'यह श्लेष और विरोध का सङ्कर अलङ्कार' है, यह दिखाते हैं, अनुग्रह के योग से ( अर्थात् अनुग्राह्यानुग्राहकभाव के कारण ) किसी एक के त्याग और ग्रहण के निमित्त का अभाव 'वा' शब्द से सूचित किया है । सुदर्शन चक्र जिसके हाथ में है । व्यतिरेक-पक्ष में सुदर्शन अर्थात् श्लाघ्य
द्वितीय उद्योतः २५५ ध्वन्यालोकः बिभ्राणां मुखमिन्दुरूपमखिलं चन्द्रात्मचक्षुर्दध- त्स्थाने यां स्वतनोरपश्यदधिकां सा रुक्मिणी वोऽवतात् ॥ अत्र वाच्यतयैव व्यतिरेकच्छायानुग्राही श्लेषः प्रतीयते । यथा च— भ्रमिमरतिमलसहृदयतां प्रलयं मूर्च्छां तमः शरीरसादम् । मरणं च जलदभुजगं प्रसह्य कुरुते विषं वियोगिनीनाम् ॥ यथा वा— का आक्रमण किया है और जो चन्द्र के रूप में नेत्र धारण करते हैं वह हरि भगवान् विष्णु प्रशंसनीय समस्त शरीर वाली, समस्त अङ्गों की लीलामात्र से त्रैलोक्य को जीत लेने वाली और समग्र चन्द्र रूप मुख को धारण करने वाली जिस रुक्मिणी को अपने शरीर से उचित ही अधिक देखा, वह ( रुक्मिणी ) आपलोगों की रक्षा करे । यहां वाच्यरूप से ही व्यतिरेक की छाया का अनुग्राहक श्लेष प्रतीत होता है । और जैसे— जलदरूप भुजग से उत्पन्न विष ( जल और जहर, क्योंकि दोनों 'विष' के वाच्य हैं ) वियोगिनियों के चक्कर, औदासीन्य, दिली नाकामी, बेचैनी, मूर्च्छा, अन्धेरा, शरीर का ऐंठन और मरण हठपूर्वक कर डालता है । अथवा जैसे— लोचनम् व्यतिरेकपदे सुदर्शनौ श्लाघ्यौ करावेव यस्य । चरणारविन्दस्य ललितं त्रिभु- वनाक्रमणक्रीडनम् । चन्द्ररूपं चक्षुर्धारयन् । वाच्यतयैवेति । स्वतनोरधिका- मिति शब्देन व्यतिरेकस्योक्तत्वात् । भुजगशब्दार्थपर्यालोचनाबलादेव विष- शब्दो जलमभिधायापि न विरन्तुमुत्सहते, अपि तु द्वितीयमर्थं हालाहललक्ष- णमाह । तदभिधानेन विनाभिधाया एवासमाप्तत्वात् । भ्रमिप्रभृतीनां तु मरणान्तानां साधारण एवार्थः । निराशीकृतत्वेन खण्डितानि यानि मानसानि दोनों हाथ ही हैं जिसके । चरणारविन्द का त्रिभुवन के आक्रमण का ललित खेल । चन्द्र रूप चक्षु को धारण करता हुआ । वाच्य रूप से ही—। क्योंकि 'अपने शरीर से अधिक' यह कहने से व्यतिरेक उक्त हो गया है । 'भुजग' शब्द के अर्थ की पर्यालोचना के बल से ही 'विष' शब्द 'जल' का अभिधान करके भी विराम लेने के लिए उत्साहित नहीं होता, अपितु हालाहल रूप दूसरे अर्थ को भी अभिधान करता है । क्योंकि उसके अभिधान के बिना अभिधा समाप्त ही नहीं होती । चक्कर आदि से लेकर मरण तक का शब्दों का अर्थ साधारण ही है । निराश होने के कारण खण्डित जो मानस अर्थात्
२५६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः चमहिअमाणसकञ्चणपङ्कअनिम्महिअपरिमला जस्स। अखण्डिअदाणपसारा बाहुप्पलिहा ण्विअ गइन्दा॥ (खण्डितमानसकाञ्चनपङ्कजनिर्मथितपरिमला यस्य। अखण्डितदानप्रसरा बाहुपरिघा इव गजेन्द्राः॥ इति छाया) अत्र रूपकच्छायानुग्राही श्लेषो वाच्यतयैवावभासते। स चाक्षिप्तोऽलङ्कारो यत्र पुनः शब्दान्तरेणाभिहितस्वरूपस्तत्र न निराश शत्रुओं के मानसरूपी सुवर्ण कमल को निर्मथित् करने वाले अपने यश रूप सौरभ से युक्त और निरन्तर दान देने वाले जिस (राजा) के बाहुदण्ड मानसरोवर के सुवर्ण कमलों को खण्डित करने से (उनके) सौरभ से सने और निरन्तर दान- जल प्रवाहित करने वाले हाथियों के समान हैं। यहां रूपक की छाया का अनुग्राहक श्लेष वाच्यरूप से ही अवभासित होता है। और वह आक्षिप्त अलङ्कार जहां फिर शब्दान्तर से अभिहित हो जाता है वहां लोचनम् शत्रुहृदयानि तान्येव काञ्चनपङ्कजानि। ससारत्वात् तैर्हेतुभूतैः। णिम्महिअ- परिमला इति। प्रसृतप्रतापसारा अखण्डितवितरणप्रसरा बाहुपरिघा एव यस्य गजेन्द्रा इति। गजेन्द्रशब्दवशाच्च महिअशब्दः परिमलशब्दो दानशब्दश्च त्रोट- नसौरभमदलक्षणानर्थान्प्रतिपाद्यापि न परिसमाप्ताभिधाव्यापारा भवन्तीत्युक्त- रूपं द्वितीयमप्यर्थमभिदधत्येव। एवमाक्षिप्तशब्दस्य व्यवच्छेद्यं प्रदर्श्यैवकारस्य व्यवच्छेद्यं दर्शयितुमाह— स चेति। उभयार्थप्रतिपादनशक्तशब्दप्रयोगे, यत्र तावदेकतरविषयनियमन- कारणमभिधाया नास्ति, यथा—'येन ध्वस्तमनोभवेन' इति। यत्र वा प्रत्युत शत्रुके हृदय वहीं है सुवर्ण कमल। सारयुक्त होने के कारण हेतुभूत उनसे। निर्मथित करने वाले परिमल से युक्त—। जिनके प्रताप बल फैल चुके हैं, अखण्डित दान-प्रसर वाले जिसके बाहुदण्ड ही गजेन्द्र अर्थात् हाथी हैं। 'गजेन्द्र' शब्द के कारण 'चमहिअ' ('खण्डित') शब्द, 'परिमल' शब्द और 'दान' शब्द 'तोड़ना' 'सौरभ' और 'मद' रूप अर्थों को प्रतिपादन करके भी परिसमाप्त अभिधाव्यापार वाले नहीं होते, इस लिए उक्त रूप दूसरे अर्थ का अभिधान करते ही हैं। इस प्रकार 'आक्षिप्त' शब्द के व्यवच्छेद्य को दिखा कर 'एव' कार ('ही') का व्यवच्छेद्य दिखलाने के लिए कहते हैं—और वह—। दो अर्थों के प्रतिपादन में शक्त (समर्थ) शब्द के प्रयोग करने पर, जहां किसी एक विषय में अभिधा के नियमन का कारण नहीं है, जैसे—'येन ध्वस्तमनोभवेन०'—। अथवा जहाँ दूसरे अभिधाव्यापार के
द्वितीय उद्योतः २५७ ध्वन्यालोकः शब्दशक्त्युद्द्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यध्वनिव्यवहारः । तत्र वक्रोक्त्यादि- वाच्यालङ्कारव्यवहार एव । यथा— दृष्ट्या केशव गोपरागहतया किञ्चिन्न दृष्टं मया तेनैव स्खलितास्मि नाथ पतितां किं नाम नालम्बसे । शब्दशक्त्युद्भव अनुरणन रूप ध्वनि का व्यवहार नहीं होता है । वहां वक्रोक्ति आदि वाच्य अलङ्कार का व्यवहार होता है । जैसे— हे केशव, गौओं की ( उड़ाई हुई ) धूल से दृष्टि के ढँप जाने के कारण मैंने कुछ नहीं देखा और गिर पड़ी हूँ, हे नाथ, गिरी हुई मुझे क्यों नहीं आलम्बन करते हो ? लोचनम् द्वितीयाभिधाव्यापारसद्भावावेदकं प्रमाणमस्ति, यथा—‘तस्या विना’ इत्यादौ, तत्र तावत्सर्वथा ‘चमहिअ’ इत्यन्ते । सोऽर्थोऽभिधेय एवेति स्फुटमदः । यत्रा- प्यभिधाया एकत्र नियमहेतुः प्रकरणादिर्विद्यते तेन द्वितीयस्मिन्नर्थे नाभिधा सङ्क्रामति, तत्र द्वितीयोऽर्थोऽसावाक्षिप्त इत्युच्यते; तत्रापि यदि पुनस्तादृ- क्शब्दो विद्यते येनासौ नियामकः प्रकरणादिरपहतशक्तिः सम्पाद्यते । अत एव साभिधाशक्तिर्बाधितापि सती प्रतिप्रसूतेव तत्रापि न ध्वनेर्विषय इति तात्पर्यम् । चशब्दोऽपिशब्दार्थे भिन्नक्रमः आक्षिप्तोऽप्याक्षिप्ततया झटिति सम्भावयितुमारब्धोऽपीत्यर्थः । न त्वसावाक्षिप्तः, किं तु शब्दान्तरेणान्येना- भिधायाः प्रतिप्रसवनादभिहितस्वरूपः सम्पन्नः । पुनर्ग्रहणेन प्रतिप्रसवं व्याख्यातं सूचयति । तेनैवकार आक्षिप्ताभासं निराकरोतीत्यर्थः । हे केशव, गोधूलिहृतया दृष्ट्या न किञ्चिद् दृष्टं मया तेन कारणेन स्खलि- तास्मि मार्गे । तां पतितां सतीं मां किं नाम कः खलु हेतुर्यन्नालम्बसे हस्तेन । सद्भाव का आवेदक प्रमाण है जैसे—तस्या विना०—इत्यादि में, वहाँ सर्वथा ‘चमहिअ०' तक । वह अर्थ अभिधेय ही है, यह बात स्पष्ट है। जहाँ भी एक जगह प्रकरण आदि अभिधा का नियमहेतु है, उसके कारण दूसरे अर्थ में अभिधा सङ्क्रान्त नहीं होती है, वहाँ दूसरा वह अर्थ ‘आक्षिप्त’ कहा जाता है, और वहाँ पर भी यदि फिर उस प्रकार का शब्द है जिससे वह नियामक प्रकरण आदि अपहतशक्ति कर दिया जाता है, अतएव वह अभिधाशक्ति बाधित होकर भी प्रतिप्रसूत की भाँति हो जाती है, वहाँ भी ध्वनि का विषय नहीं है, यह तात्पर्य है। ‘और’ ( ‘च’ ) शब्द ‘भी’ ( ‘अपि’ ) शब्द के अर्थ में भिन्नक्रम है, अर्थात् आक्षिप्त भी, आक्षिप्त रूप भी झटिति सम्भावना किया जाता हुआ भी । ‘फिर’ ( ‘पुनः’ ) ग्रहण से व्याख्यात ‘प्रतिप्रसव’ को सूचित करता है । अर्थात् इससे ‘एवकार’ ( ‘ही’ का प्रयोग ) आक्षिप्ताभास का निराकरण करता है । ‘हे केशव गौओं की ( उड़ाई हुई ) धूल से दृष्टि के अवरुद्ध ( हृत ) हो जाने से मैंने कुछ नहीं देखा, इस कारण मार्ग में गिर पड़ी हूँ । उस पतिता ( गिरी हुई ) मुझे १७ ध्व०
२५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः एकस्त्वं विषमेषु खिन्नमनसां सर्वाबलानां गति- र्गोप्यैवं गदितः सलेशमवताद्गोष्ठे हरिर्वश्चिरम् ॥ एवञ्जातीयकः सर्व एव भवतु कामं वाच्यश्लेषस्य विषयः । यत्र तु क्योंकि ऊँच-खालों (विषम) में खिन्न मन वाले सभी अबलों के एक तुम्हीं गति हो, इस प्रकार गोपी के द्वारा गोष्ठ (गौशाला) में लेश के साथ कहे गए हरि (कृष्ण) आपलोगों की रक्षा करें । इस प्रकार का सभी चाहे जितना वाच्य श्लेष का विषय हो । जहां सामर्थ्य से लोचनम् यतस्त्वमेवैकोऽतिशयेन बलवान्निम्नोन्नतेषु सर्वेषामबलानां बालवृद्धाङ्गनादीनां खिन्नमनसां गन्तुमशक्नुवतां गतिरालम्बनाभ्युपाय इत्येवंविधेऽर्थे यद्यप्येते प्रकरणेन नियन्त्रिताभिधाशक्तयः शब्दास्तथापि द्वितीयेऽर्थे व्याख्यास्यमानेऽ- भिधाशक्तिर्निरुद्धा सती सलेशमित्यनेन प्रत्युज्जीविता । अत्र सलेशं ससूच- नमित्यर्थः, अल्पीभवनं हि सूचनमेव । हे केशव ! गोप स्वामिन् ! रागहृतया दृष्ट्येति । केशवगेन उपरागेण हृतया दृष्ट्येति वा सम्बन्धः । स्खलितास्मि खण्डितचरित्रा जातास्मि । पतितामिति भर्तृभावं मां प्रति । एक इत्यसा- धारणसौभाग्यशाली त्वमेव । यतः सर्वासामबलानां मदनविधुरमनसामीर्ष्या- कालुष्यनिरासेन सेव्यमानः सन् गतिः जीवितरक्षोपाय इत्यर्थः । एवं श्लेषा- लङ्कारस्य विषयमवस्थाप्य ध्वनेराह—यत्र त्विति । कुसुमसमयात्मकं यद्युगं क्यों नहीं, अर्थात् क्या कारण है कि हाथ से अवलम्बन नहीं करते हो ? क्यों कि तुम्हीं एक अतिशय करके बलवान् हो, निम्नोन्नत (ऊंच-खाल) स्थानों में सभी बाल, वृद्ध, अङ्गना आदि सभी खिन्न मन वाले अर्थात् गमन करने में असमर्थ अबलों की गति अर्थात् आलम्बन के उपाय हो ।' इस प्रकार के अर्थ में यद्यपि ये शब्द प्रकरण के द्वारा नियन्त्रित अभिधाशक्ति वाले हैं, तथापि व्याख्यान किए जाने वाले दूसरे अर्थ में अभिधाशक्ति निरुद्ध होकर 'सलेश' इसके द्वारा पुनः उज्जीवित कर दी गई । यहाँ सलेश अर्थात् सूचन, क्यों कि अल्प होना सूचन ही है। 'हे केशव, गोप, स्वामिन्, राग के कारण हरी हुई दृष्टि से'—। अथवा सम्बन्ध यह कि केशव में गए उपराग के कारण हरी हुई (हृत) दृष्टि से । स्खलित हो गई हूँ (गिर पड़ी हूँ) अर्थात् मेरा चरित्र खण्डित हो चुका है । पतिता अर्थात् मेरे प्रति भर्तृभाव । एक अर्थात् असाधारण सौभाग्यशाली तुम्हीं हो । क्यों कि सभी मदन से विधुर मन वाली अबलाओं के ईर्ष्या- कालुष्य का निरास-पूर्वक सेवा किए गए होते हुए (तुम) गति अर्थात् जीवितरक्षा का उपाय हो । इस प्रकार श्लेष अलङ्कार का विषय अवस्थापन करके ध्वनि का विषय कहते हैं—जहां—। पुष्पसमय रूप जो युग अर्थात् (वसन्त के) दो महीने उनका
द्वितीय उद्योतः २५९ ध्वन्यालोकः सामर्थ्याक्षिप्तं सदलङ्कारान्तरं शब्दशक्त्या प्रकाशते स सर्व एव ध्वनेर्विषयः । यथा— ‘अत्रान्तरे कुसुमसमययुगमुपसंहरन्नजृम्भत ग्रीष्माभिधानः फुल्ल- मल्लिकाधवलाट्टहासो महाकालः' । यथा च— उन्नतः प्रोल्लसद्धारः कालागुरुमलीमसः । पयोधरभरस्तन्व्याः कं न चक्रेऽभिलाषिणम् ॥ आक्षिप्त होता हुआ अलङ्कारान्तर शब्दशक्ति से प्रकाशित होता है, वह सभी 'ध्वनि' का विषय है । जैसे— 'इस बीच, दो पुष्पसमयों (वसन्त के महीनों) को उपसंहार करता हुआ विकसित मल्लिकाओं के, अट्टालिकाओं को धवलित करने वाले हास से युक्त ग्रीष्म नाम का महाकाल जम्भाई लिया।' और जैसे— उन्नत, प्रोल्लसित होते हुए हार से (व्यङ्ग्य मेघ के पक्ष में प्रोल्लसित होती हुई धारा—जलधारा से) युक्त और कालागुरु की भांति मलिन, तन्वी के पयोधर भार (स्तनभार, व्यङ्ग्य मेघ अर्थ में मेघभार) ने किसको अभिलाषी (सकाम) नहीं बनाया ? लोचनम् मासद्वयं तदुपसंहरन् । धवलानि हृद्यान्यट्टान्यापणा येन तादृक् फुल्लमल्लि- कानां हासो विकासः सितिमा यत्र । फुल्लमल्लिका एव धवलाट्टहासोऽस्येति तु व्याख्याने 'जलदभुजगञ्जम्' इत्येतत्तुल्यमेतत्स्यात् । महांश्चासौ दिनदैर्ध्यदुर- तिवाहतायोगात्कालः समयः । अत्र ऋतुवर्णनप्रस्तावनियन्त्रिताभिधाशक्तयः, अत एव 'अवयवप्रसिद्धेः समुदायप्रसिद्धिर्बलीयसी' इति न्यायमपाकुर्वन्तो महा- उपसंहार करता हुआ। धवल अर्थात् हृद्य अट्ट अर्थात् आपण (अट्टालिकाएं) हैं जिससे, उस प्रकार का विकसित मल्लिकाओं (जूही के फूलों) का हास अर्थात् विकास (सितिमा) है जहाँ। 'विकसित मल्लिका ही हैं इसका धवल अट्टहास' यह व्याख्यान करने पर 'जलदभुजगञ्ज०' के सदृश यह हो जायगा। दिनों के बड़े होने और दुरतिवाह होने के कारण महान् काल अर्थात् समय। यहाँ ऋतुवर्णन के प्रस्ताव के कारण अभिधाशक्ति के नियन्त्रित हो जाने से, इसी लिए 'अवयव-प्रसिद्धि से समुदाय-प्रसिद्धि बलवान् होती है' इस न्याय को निराकरण करते हुए 'महाकाल' प्रभृति शब्द इसी
२६० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् कालप्रभृतयः शब्दा एतमेवार्थमभिधाय कृतकृत्या एव । तदनन्तरमर्थावगति- र्ध्वननव्यापारादेव शब्दशक्तिमूलात् । अत्र केचिन्मन्यन्ते—'यत एतेषां शब्दानां पूर्वमर्थान्तरेऽभिधान्तरं दृष्टं ततस्तथाविधेऽर्थान्तरे दृष्टतदभिधाशक्तेरेव प्रतिपत्तुर्नियन्त्रिताभिधाशक्तिकेभ्य एतेभ्यः प्रतिपत्तिर्ध्वननव्यापारादेवेति शब्दशक्तिमूलत्वं व्यङ्ग्यत्वं चेत्यविरुद्धम्' इति । अन्ये तु—'साभिधैव द्वितीया अर्थसामर्थ्यं ग्रीष्मस्य भीषणदेवताविशेष- सादृश्यात्मकं सहकारित्वेन यतोऽवलम्बते ततो ध्वननव्यापाररूपोच्यते' इति । एके तु—'शब्दश्लेषे तावद्भेदे सति शब्दस्य, अर्थश्लेषेऽपि शक्तिभेदाच्छ- ब्दभेद इति दर्शने द्वितीयः शब्दस्तत्रानीयते । स च कदाचिदभिधाव्यापा- रात् यथोभयोत्तरदानाय 'श्वेतो धावति' इति; प्रश्नोत्तरादौ वा तत्र वाच्या- लङ्कारता । यत्र तु ध्वननव्यापारादेव शब्द आनीतः, तत्र शब्दान्तरबलादपि तदर्थान्तरं प्रतिपन्नं प्रतीयमानमूलत्वात्प्रतीयमानमेव युक्तम्' इति । इतरे तु-'द्वितीयपक्षव्याख्याने यदर्थसामर्थ्यं तेन द्वितीयाभिधैव प्रतिप्रसू- अर्थ का अभिधान करके कृतकृत्य ही हो जाते हैं । तत्पश्चात् अर्थ का ज्ञान शब्दशक्तिमूल ध्वननव्यापार से ही होता है । यहाँ कुछ लोग मानते हैं—'जिस कारण इन शब्दों का पहले अर्थ में अभिधा देखी गई है, उस कारण उस प्रकार के अर्थान्तर में, उसी प्रतिपत्ता को, जिसने उनकी अभिधाशक्ति का दर्शन किया है, नियन्त्रित अभिधाशक्ति वाले इन (शब्दों) से ध्वनन व्यापार द्वारा ही ज्ञान होता है, इस प्रकार शब्दशक्तिमूलत्व और व्यङ्ग्यत्व दोनों ठीक हैं' । दूसरे तो (मानते हैं)—'वह दूसरी अभिधा ही सहकारी रूप से ग्रीष्म के भीषण देवता विशेष रूपसादृश्यात्मक अर्थ सामर्थ्य को जिस कारण अवलम्बन करती है, उस कारण ध्वनन रूप कही जाती है' । कुछेक लोग तो (मानते हैं)—'शब्दश्लेष में शब्द के भेद होने पर और अर्थश्लेष में भी 'शक्तिभेद से शब्द का भेद होता है' इस दर्शन (सिद्धान्त) के अनुसार दूसरा शब्द वहाँ लाया जाता है । वह (दूसरा शब्द) कभी अभिधा व्यापार से (लाया जाता है), जैसे—दोनों के उत्तर देने के लिये 'श्वेतो धावति' (कौन इधर दौड़ता है, और कैसा गुण वाला इधर दौड़ता है ? इन दोनों प्रश्नों के उत्तर देने के लिए एक ही वाक्य का प्रयोग किया 'श्वेतो धावति' अर्थात् श्वा-कुत्ता-इधर दौड़ता है और उजला दौड़ता है)। अथवा प्रश्न और उत्तर आदि में (श्लेष) वाच्यालङ्कार हो जाता है । परन्तु, जहाँ ध्वनन व्यापार से ही शब्द लाया गया है, वहाँ शब्दान्तर के बल से भी प्रतिपन्न वह अर्थान्तर प्रतीयमानमूल होने के कारण प्रतीयमान ही ठीक है।' इतर लोग तो (मानते हैं)—'दूसरे पक्ष के व्याख्यान में जो अर्थसामर्थ्य है