भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 680 में से

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२५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः येन ध्वस्तमनोभवेन बलिजित्कायः पुरास्त्रीकृतो यश्चोद्वृत्तभुजङ्गहारवलयो गङ्गां च योऽधारयत् । यस्याहुः शशिमच्छिरो हर इति स्तुत्यं च नामामराः पायात्स स्वयमन्धकक्षयकरस्त्वां सर्वदोमाधवः ॥ ( विष्णुपक्ष में ) जिस अभव ( विष्णु ) ने शकट का नाश किया, बली (दानवों) को जीतने वाला अपने शरीर को पुराकाल में स्त्रीरूप बनाया, जिसने उद्वृत्त भुजङ्ग को मारा, जिसका लय ( अकार रूप ) शब्द में है, जिसने अग और पृथ्वी को धारण किया, 'शशी को मन्थन करनेवाले राहु के शिर को काटने वाला' जिसके इस स्तुत्य नाम को ऋषि लोग लिया करते हैं, वह सब कुछ देनेवाला माधव, जिसने अन्धक जनों को ( द्वारका में ) बसाया, तुम्हारी रक्षा करें । ( शिवपक्ष में ) मनोभव को ध्वस्त करने वाले जिसने पुराकाल में बलि को जीतने वाले के शरीर को अस्त्र बनाया, उद्वृत्त भुजङ्ग ही जिसके हार और वलय हैं, गङ्गा को जिसने धारण किया, देवता जिसके शिर को चन्द्रयुक्त कहते हैं 'हर' यह स्तुत्य नाम बताते हैं, वह उमा के धव ( प्रिय ) अन्धक का विनाश करने वाले भगवान् तुम्हारी सर्वदा रक्षा करें । लोचनम् वान् यो जयति तादृग्येन कायो वपुः पुरामृतहरणकाले स्त्रीत्वं प्रापितः । यश्चो- द्वृत्तं समदं कालियाख्यं भुजङ्गं हतवान् । रवे शब्दे लयो यस्य । 'अकारो विष्णुः' इत्युक्तेः । यश्चागं गोवर्धनपर्वतं गां च भूमिं पातालगतामधारयत् । यस्य च नाम स्तुत्यमृषय आहुः किं तत् ? शशिनं मथनातीति क्किप् राहुः, तस्य शिरोहरो मूर्द्धापहारक इति । स त्वां माधवो विष्णुः सर्वदः पायात् । कीदृक् ? अन्धकनाम्नां जनानां येन क्षयो निवासो द्वारकायां कृतः । यदि वा मौसले इषीकाभिस्तेषां क्षयो विनाशो येन कृतः । द्वितीयोऽर्थः—येन ध्वस्त- कामेन सता बलिजितो विष्णोः सम्बन्धी कायः पुरा त्रिपुरनिर्द्दहनावसरेऽस्त्री- उस अपने शरीर को जिसने पुराकाल में अर्थात् अमृत हरण के अवसर में स्त्रीरूप बनाया, जिसने उद्वृत्त अर्थात् गर्वीले कालिय नामक भुजङ्ग को मारा, रव अर्थात् शब्द में जिसका लय है, क्योंकि कहा है—'अकार विष्णु है', जिसने अग अर्थात् गोवर्धन पर्वत को और पाताल में गई पृथ्वी को धारण किया, जिसका स्तुत्य नाम ऋषिलोग कहते हैं, वह क्या ? शशी को मथन करने वाला राहु, उसका शिर हरण करने वाला, अर्थात् मस्तक काट देने वाला' । वह सब कुछ देने वाले माधव विष्णु तुम्हारी रक्षा करें । वह कैसे हैं—जिसने अंधक नाम के लोगों को द्वारका में बसाया, अथवा मौसल पर्व में यादवों का नाश करने वाले हैं । दूसरा अर्थ—काम को नष्ट करने वाले जिसने बलि को जीतने वाले विष्णु के शरीर को पुराकाल में अर्थात् त्रिपुरदाह के अवसर में अस्त्र