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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

२५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः येन ध्वस्तमनोभवेन बलिजित्कायः पुरास्त्रीकृतो यश्चोद्वृत्तभुजङ्गहारवलयो गङ्गां च योऽधारयत् । यस्याहुः शशिमच्छिरो हर इति स्तुत्यं च नामामराः पायात्स स्वयमन्धकक्षयकरस्त्वां सर्वदोमाधवः ॥ ( विष्णुपक्ष में ) जिस अभव ( विष्णु ) ने शकट का नाश किया, बली (दानवों) को जीतने वाला अपने शरीर को पुराकाल में स्त्रीरूप बनाया, जिसने उद्वृत्त भुजङ्ग को मारा, जिसका लय ( अकार रूप ) शब्द में है, जिसने अग और पृथ्वी को धारण किया, 'शशी को मन्थन करनेवाले राहु के शिर को काटने वाला' जिसके इस स्तुत्य नाम को ऋषि लोग लिया करते हैं, वह सब कुछ देनेवाला माधव, जिसने अन्धक जनों को ( द्वारका में ) बसाया, तुम्हारी रक्षा करें । ( शिवपक्ष में ) मनोभव को ध्वस्त करने वाले जिसने पुराकाल में बलि को जीतने वाले के शरीर को अस्त्र बनाया, उद्वृत्त भुजङ्ग ही जिसके हार और वलय हैं, गङ्गा को जिसने धारण किया, देवता जिसके शिर को चन्द्रयुक्त कहते हैं 'हर' यह स्तुत्य नाम बताते हैं, वह उमा के धव ( प्रिय ) अन्धक का विनाश करने वाले भगवान् तुम्हारी सर्वदा रक्षा करें । लोचनम् वान् यो जयति तादृग्येन कायो वपुः पुरामृतहरणकाले स्त्रीत्वं प्रापितः । यश्चो- द्वृत्तं समदं कालियाख्यं भुजङ्गं हतवान् । रवे शब्दे लयो यस्य । 'अकारो विष्णुः' इत्युक्तेः । यश्चागं गोवर्धनपर्वतं गां च भूमिं पातालगतामधारयत् । यस्य च नाम स्तुत्यमृषय आहुः किं तत् ? शशिनं मथनातीति क्किप् राहुः, तस्य शिरोहरो मूर्द्धापहारक इति । स त्वां माधवो विष्णुः सर्वदः पायात् । कीदृक् ? अन्धकनाम्नां जनानां येन क्षयो निवासो द्वारकायां कृतः । यदि वा मौसले इषीकाभिस्तेषां क्षयो विनाशो येन कृतः । द्वितीयोऽर्थः—येन ध्वस्त- कामेन सता बलिजितो विष्णोः सम्बन्धी कायः पुरा त्रिपुरनिर्द्दहनावसरेऽस्त्री- उस अपने शरीर को जिसने पुराकाल में अर्थात् अमृत हरण के अवसर में स्त्रीरूप बनाया, जिसने उद्वृत्त अर्थात् गर्वीले कालिय नामक भुजङ्ग को मारा, रव अर्थात् शब्द में जिसका लय है, क्योंकि कहा है—'अकार विष्णु है', जिसने अग अर्थात् गोवर्धन पर्वत को और पाताल में गई पृथ्वी को धारण किया, जिसका स्तुत्य नाम ऋषिलोग कहते हैं, वह क्या ? शशी को मथन करने वाला राहु, उसका शिर हरण करने वाला, अर्थात् मस्तक काट देने वाला' । वह सब कुछ देने वाले माधव विष्णु तुम्हारी रक्षा करें । वह कैसे हैं—जिसने अंधक नाम के लोगों को द्वारका में बसाया, अथवा मौसल पर्व में यादवों का नाश करने वाले हैं । दूसरा अर्थ—काम को नष्ट करने वाले जिसने बलि को जीतने वाले विष्णु के शरीर को पुराकाल में अर्थात् त्रिपुरदाह के अवसर में अस्त्र

द्वितीय उद्योतः २५३ ध्वन्यालोकः नन्वलङ्कारान्तरप्रतिभायामपि श्लेषव्यपदेशो भवतीति दर्शितं भट्टोद्भटेन, तत्पुनरपि शब्दशक्तिमूलो ध्वनिर्निरवकाश इत्याशङ्क्येदमुक्तम् ‘आक्षिप्तः’ इति । तदयमर्थः—यत्र शब्दशक्त्या साक्षादलङ्कारान्तरं वाच्यं सत्प्रतिभासते स सर्वः श्लेषविषयः । यत्र तु शब्दशक्त्या सामर्थ्याक्षिप्तं वाच्यव्यतिरिक्तं व्यङ्ग्यमेवालङ्कारान्तरं प्रकाशते स ध्वनेर्विषयः । शब्दशक्त्या साक्षादलङ्कारान्तरप्रतिभा यथा— तस्या विनापि हारेण निसर्गादेव हारिणौ । जनयामासतुः कस्य विस्मयं न पयोधरौ ॥ ( शङ्का करते हैं कि ) यह उद्भट ने दिखाया है कि अलङ्कारान्तर की प्रतिभा में भी ‘श्लेष’ का ही व्यपदेश होता है, तब तो फिर शब्दशक्तिमूल ध्वनि का कोई स्थान नहीं रह गया ! यह आशङ्का करके यह कहा है ‘आक्षिप्त’ ( अर्थात् आक्षेप- सामर्थ्य से प्राप्त ) । तो यह अर्थ है—जहां शब्दशक्ति से साक्षात् अलङ्कारान्तर वाच्य होता हुआ प्रतीत होता है, वह सब श्लेष का विषय है । और जहां शब्दशक्ति द्वारा सामर्थ्य से आक्षिप्त और वाच्य से अतिरिक्त व्यङ्ग्य ही अलङ्कारान्तर प्रकाशित होता है, वह ध्वनि का विषय है। शब्दशक्ति द्वारा साक्षात् अलङ्कारान्तर की प्रतिभा; जैसे— उसके दोनों पयोधर हार के बिना भी स्वभाव से ही हारी ( हार धारण करने वाले, परिहार यह कि मनोहर ) किसके विस्मय को उत्पन्न नहीं किए ? लोचनम् कृतः शरत्वं नीतः। उद्द्वृत्ता भुजङ्गा एव हारा वलयाश्च यस्य, मन्दाकिनीं च योऽधारयत् , यस्य च ऋषयः शशिमच्छन्द्रयुक्तं शिर आहुः, हर इति च यस्य नाम स्तुत्याहुः, स भगवान्स्वयमेवान्धकासुरस्य विनाशकारी त्वां सर्वदा सर्वकालमुमाया धवो वल्लभः पायादिति । अत्र वस्तुमात्रं द्वितीयं प्रतीतं नालङ्कार इति श्लेषस्यैव विषयः । आक्षिप्तशब्दस्य कारिकागतस्य व्यव- च्छेद्यं दर्शयितुं चोद्येनोपक्रमते—नन्वलङ्कारेत्यादिना । तस्या विनापीति । अपिशब्दोऽयं विरोधमाचक्षाणोऽर्थद्वयेऽप्यभिधाशक्तिं अर्थात् बाण बनाया, उद्द्वृत्त ( लिपटे हुए ) भुजङ्ग ही हैं हार और वलय जिसके, मन्दा- किनी को जिसने धारण किया, ऋषिलोग जिसके सिर को ‘चन्द्रयुक्त’ बतलाते हैं और ‘हर’ यह जिसका स्तुत्य नाम उच्चारण करते हैं, वह भगवान् स्वयमेव अन्धक असुर के विनाशकारी, उमा के प्रिय सर्वदा तुम्हारी रक्षा करें।’ यहां दूसरा प्रतीत वस्तुमात्र अलङ्कार नहीं है, श्लेष का ही विषय है । कारिका में आए हुए ‘आक्षिप्त’ शब्द व्यवच्छेद्य दिखलाने के लिए पहले से उपक्रम करते हैं—शङ्का करते हैं—इत्यादि से । उसके दोनों०—। यह ‘भी’ शब्द विरोध का अभिधान करता हुआ दोनों अर्थों में

२५४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र शृङ्गारव्यभिचारी विस्मयाख्यो भावः साक्षाद्विरोधालङ्कारश्च प्रतिभासत इति विरोधच्छायानुग्राहिणः श्लेषस्यायं विषयः, न त्वनुस्वा- नोपमव्यङ्ग्यस्य ध्वनेः । अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य तु ध्वनेर्वाच्येन श्लेषेण विरोधेन वा व्यञ्जितस्य विषय एव । यथा ममैव — श्लाघ्याशेषतनुं सुदर्शनकरः सर्वाङ्गलीलाजित- त्रैलोक्यां चरणारविन्दललितेनाक्रान्तलोको हरिः । यहां शृङ्गार का व्यभिचारी विस्मय नाम का भाव और साक्षात् विरोध अलङ्कार प्रतिभासित हो रहे हैं, इस प्रकार विरोध की छाया के अनुग्राहक श्लेष का यह विषय है, न कि अनुस्वानसदृशव्यङ्ग्यरूप ध्वनि का। वाच्य श्लेष अथवा विरोध से व्यञ्जित अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि का तो विषय ही है। जैसे, मेरा ही— जिनका केवल हाथ ही देखने में सुन्दर है ( अथवा हाथ में सुदर्शन चक्र धारण करने वाले ), जिन्होंने अपने चरणारविन्द से (अथवा चरण के विक्षेप से) तीन लोकों लोचनम् नियच्छति हरतो हृदयमवश्यमिति हारिणौ । हारो विद्यते ययोस्तौ हारिणा- विति । अत एव विस्मयशब्दोऽस्यैवार्थस्योपोलकः । अपिशब्दाभावे तु न तत एवार्थद्वयस्याभिधा स्यात् , स्वसौन्दर्यादेव स्तनयोर्विस्मयहेतुत्वोपपत्तेः । विस्मयाख्यो भाव इति दृष्टान्ताभिप्रायेणोपात्तम् । यथा विस्मयः शब्देन प्रतिभाति विस्मय इत्यनेन शब्देन तथा विरोधोऽपि प्रतिभात्यपीत्यनेन शब्देन । ननु किं सर्वथात्र ध्वनिनीस्तीत्याशङ्क्याह—अलक्ष्येति । विरोधेन वेति । वाग्रहणेन श्लेषविरोधसङ्करालङ्कारोऽयमिति दर्शयति, अनुग्रहयोगादेक- तरत्यागग्रहणनिमित्ताभावो हि वाशब्देन सूच्यते । सुदर्शनं चक्रं करे यस्य । भी अभिधाशक्ति को अर्पित करता है, हृदय को अवश्य हरण करते हैं, इसलिए हारी हैं और जिन दोनों के हार है अतएव हारी । इसी लिए 'विस्मय' शब्द इसी अर्थ का उपोद्वलक है । 'भी' शब्द के अभाव में तो उसीसे दोनों अर्थों का अभिधान नहीं होता, बल्कि स्वगत सौन्दर्य से ही स्तनों का विस्मयहेतुत्व उपपन्न हो जाता । 'विस्मय नाम का भाव' यह दृष्टान्त के अभिप्राय से उपादान किया है। जैसे विस्मय 'विस्मय' शब्द से प्रतीत होता है, 'उस प्रकार विरोध भी' 'भी' ( 'अपि' ) इस शब्द से प्रतीत होता है । क्या सर्वथा यहाँ ध्वनि नहीं है ? यह आशङ्का करके कहते हैं— अलक्ष्य०— । अथवा विरोध से— । 'अथवा' ( वा' ) ग्रहण से 'यह श्लेष और विरोध का सङ्कर अलङ्कार' है, यह दिखाते हैं, अनुग्रह के योग से ( अर्थात् अनुग्राह्यानुग्राहकभाव के कारण ) किसी एक के त्याग और ग्रहण के निमित्त का अभाव 'वा' शब्द से सूचित किया है । सुदर्शन चक्र जिसके हाथ में है । व्यतिरेक-पक्ष में सुदर्शन अर्थात् श्लाघ्य

द्वितीय उद्योतः २५५ ध्वन्यालोकः बिभ्राणां मुखमिन्दुरूपमखिलं चन्द्रात्मचक्षुर्दध- त्स्थाने यां स्वतनोरपश्यदधिकां सा रुक्मिणी वोऽवतात् ॥ अत्र वाच्यतयैव व्यतिरेकच्छायानुग्राही श्लेषः प्रतीयते । यथा च— भ्रमिमरतिमलसहृदयतां प्रलयं मूर्च्छां तमः शरीरसादम् । मरणं च जलदभुजगं प्रसह्य कुरुते विषं वियोगिनीनाम् ॥ यथा वा— का आक्रमण किया है और जो चन्द्र के रूप में नेत्र धारण करते हैं वह हरि भगवान् विष्णु प्रशंसनीय समस्त शरीर वाली, समस्त अङ्गों की लीलामात्र से त्रैलोक्य को जीत लेने वाली और समग्र चन्द्र रूप मुख को धारण करने वाली जिस रुक्मिणी को अपने शरीर से उचित ही अधिक देखा, वह ( रुक्मिणी ) आपलोगों की रक्षा करे । यहां वाच्यरूप से ही व्यतिरेक की छाया का अनुग्राहक श्लेष प्रतीत होता है । और जैसे— जलदरूप भुजग से उत्पन्न विष ( जल और जहर, क्योंकि दोनों 'विष' के वाच्य हैं ) वियोगिनियों के चक्कर, औदासीन्य, दिली नाकामी, बेचैनी, मूर्च्छा, अन्धेरा, शरीर का ऐंठन और मरण हठपूर्वक कर डालता है । अथवा जैसे— लोचनम् व्यतिरेकपदे सुदर्शनौ श्लाघ्यौ करावेव यस्य । चरणारविन्दस्य ललितं त्रिभु- वनाक्रमणक्रीडनम् । चन्द्ररूपं चक्षुर्धारयन् । वाच्यतयैवेति । स्वतनोरधिका- मिति शब्देन व्यतिरेकस्योक्तत्वात् । भुजगशब्दार्थपर्यालोचनाबलादेव विष- शब्दो जलमभिधायापि न विरन्तुमुत्सहते, अपि तु द्वितीयमर्थं हालाहललक्ष- णमाह । तदभिधानेन विनाभिधाया एवासमाप्तत्वात् । भ्रमिप्रभृतीनां तु मरणान्तानां साधारण एवार्थः । निराशीकृतत्वेन खण्डितानि यानि मानसानि दोनों हाथ ही हैं जिसके । चरणारविन्द का त्रिभुवन के आक्रमण का ललित खेल । चन्द्र रूप चक्षु को धारण करता हुआ । वाच्य रूप से ही—। क्योंकि 'अपने शरीर से अधिक' यह कहने से व्यतिरेक उक्त हो गया है । 'भुजग' शब्द के अर्थ की पर्यालोचना के बल से ही 'विष' शब्द 'जल' का अभिधान करके भी विराम लेने के लिए उत्साहित नहीं होता, अपितु हालाहल रूप दूसरे अर्थ को भी अभिधान करता है । क्योंकि उसके अभिधान के बिना अभिधा समाप्त ही नहीं होती । चक्कर आदि से लेकर मरण तक का शब्दों का अर्थ साधारण ही है । निराश होने के कारण खण्डित जो मानस अर्थात्

२५६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः चमहिअमाणसकञ्चणपङ्कअनिम्महिअपरिमला जस्स। अखण्डिअदाणपसारा बाहुप्पलिहा ण्विअ गइन्दा॥ (खण्डितमानसकाञ्चनपङ्कजनिर्मथितपरिमला यस्य। अखण्डितदानप्रसरा बाहुपरिघा इव गजेन्द्राः॥ इति छाया) अत्र रूपकच्छायानुग्राही श्लेषो वाच्यतयैवावभासते। स चाक्षिप्तोऽलङ्कारो यत्र पुनः शब्दान्तरेणाभिहितस्वरूपस्तत्र न निराश शत्रुओं के मानसरूपी सुवर्ण कमल को निर्मथित् करने वाले अपने यश रूप सौरभ से युक्त और निरन्तर दान देने वाले जिस (राजा) के बाहुदण्ड मानसरोवर के सुवर्ण कमलों को खण्डित करने से (उनके) सौरभ से सने और निरन्तर दान- जल प्रवाहित करने वाले हाथियों के समान हैं। यहां रूपक की छाया का अनुग्राहक श्लेष वाच्यरूप से ही अवभासित होता है। और वह आक्षिप्त अलङ्कार जहां फिर शब्दान्तर से अभिहित हो जाता है वहां लोचनम् शत्रुहृदयानि तान्येव काञ्चनपङ्कजानि। ससारत्वात् तैर्हेतुभूतैः। णिम्महिअ- परिमला इति। प्रसृतप्रतापसारा अखण्डितवितरणप्रसरा बाहुपरिघा एव यस्य गजेन्द्रा इति। गजेन्द्रशब्दवशाच्च महिअशब्दः परिमलशब्दो दानशब्दश्च त्रोट- नसौरभमदलक्षणानर्थान्प्रतिपाद्यापि न परिसमाप्ताभिधाव्यापारा भवन्तीत्युक्त- रूपं द्वितीयमप्यर्थमभिदधत्येव। एवमाक्षिप्तशब्दस्य व्यवच्छेद्यं प्रदर्श्यैवकारस्य व्यवच्छेद्यं दर्शयितुमाह— स चेति। उभयार्थप्रतिपादनशक्तशब्दप्रयोगे, यत्र तावदेकतरविषयनियमन- कारणमभिधाया नास्ति, यथा—'येन ध्वस्तमनोभवेन' इति। यत्र वा प्रत्युत शत्रुके हृदय वहीं है सुवर्ण कमल। सारयुक्त होने के कारण हेतुभूत उनसे। निर्मथित करने वाले परिमल से युक्त—। जिनके प्रताप बल फैल चुके हैं, अखण्डित दान-प्रसर वाले जिसके बाहुदण्ड ही गजेन्द्र अर्थात् हाथी हैं। 'गजेन्द्र' शब्द के कारण 'चमहिअ' ('खण्डित') शब्द, 'परिमल' शब्द और 'दान' शब्द 'तोड़ना' 'सौरभ' और 'मद' रूप अर्थों को प्रतिपादन करके भी परिसमाप्त अभिधाव्यापार वाले नहीं होते, इस लिए उक्त रूप दूसरे अर्थ का अभिधान करते ही हैं। इस प्रकार 'आक्षिप्त' शब्द के व्यवच्छेद्य को दिखा कर 'एव' कार ('ही') का व्यवच्छेद्य दिखलाने के लिए कहते हैं—और वह—। दो अर्थों के प्रतिपादन में शक्त (समर्थ) शब्द के प्रयोग करने पर, जहां किसी एक विषय में अभिधा के नियमन का कारण नहीं है, जैसे—'येन ध्वस्तमनोभवेन०'—। अथवा जहाँ दूसरे अभिधाव्यापार के

द्वितीय उद्योतः २५७ ध्वन्यालोकः शब्दशक्त्युद्द्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यध्वनिव्यवहारः । तत्र वक्रोक्त्यादि- वाच्यालङ्कारव्यवहार एव । यथा— दृष्ट्या केशव गोपरागहतया किञ्चिन्न दृष्टं मया तेनैव स्खलितास्मि नाथ पतितां किं नाम नालम्बसे । शब्दशक्त्युद्भव अनुरणन रूप ध्वनि का व्यवहार नहीं होता है । वहां वक्रोक्ति आदि वाच्य अलङ्कार का व्यवहार होता है । जैसे— हे केशव, गौओं की ( उड़ाई हुई ) धूल से दृष्टि के ढँप जाने के कारण मैंने कुछ नहीं देखा और गिर पड़ी हूँ, हे नाथ, गिरी हुई मुझे क्यों नहीं आलम्बन करते हो ? लोचनम् द्वितीयाभिधाव्यापारसद्भावावेदकं प्रमाणमस्ति, यथा—‘तस्या विना’ इत्यादौ, तत्र तावत्सर्वथा ‘चमहिअ’ इत्यन्ते । सोऽर्थोऽभिधेय एवेति स्फुटमदः । यत्रा- प्यभिधाया एकत्र नियमहेतुः प्रकरणादिर्विद्यते तेन द्वितीयस्मिन्नर्थे नाभिधा सङ्क्रामति, तत्र द्वितीयोऽर्थोऽसावाक्षिप्त इत्युच्यते; तत्रापि यदि पुनस्तादृ- क्शब्दो विद्यते येनासौ नियामकः प्रकरणादिरपहतशक्तिः सम्पाद्यते । अत एव साभिधाशक्तिर्बाधितापि सती प्रतिप्रसूतेव तत्रापि न ध्वनेर्विषय इति तात्पर्यम् । चशब्दोऽपिशब्दार्थे भिन्नक्रमः आक्षिप्तोऽप्याक्षिप्ततया झटिति सम्भावयितुमारब्धोऽपीत्यर्थः । न त्वसावाक्षिप्तः, किं तु शब्दान्तरेणान्येना- भिधायाः प्रतिप्रसवनादभिहितस्वरूपः सम्पन्नः । पुनर्ग्रहणेन प्रतिप्रसवं व्याख्यातं सूचयति । तेनैवकार आक्षिप्ताभासं निराकरोतीत्यर्थः । हे केशव, गोधूलिहृतया दृष्ट्या न किञ्चिद् दृष्टं मया तेन कारणेन स्खलि- तास्मि मार्गे । तां पतितां सतीं मां किं नाम कः खलु हेतुर्यन्नालम्बसे हस्तेन । सद्भाव का आवेदक प्रमाण है जैसे—तस्या विना०—इत्यादि में, वहाँ सर्वथा ‘चमहिअ०' तक । वह अर्थ अभिधेय ही है, यह बात स्पष्ट है। जहाँ भी एक जगह प्रकरण आदि अभिधा का नियमहेतु है, उसके कारण दूसरे अर्थ में अभिधा सङ्क्रान्त नहीं होती है, वहाँ दूसरा वह अर्थ ‘आक्षिप्त’ कहा जाता है, और वहाँ पर भी यदि फिर उस प्रकार का शब्द है जिससे वह नियामक प्रकरण आदि अपहतशक्ति कर दिया जाता है, अतएव वह अभिधाशक्ति बाधित होकर भी प्रतिप्रसूत की भाँति हो जाती है, वहाँ भी ध्वनि का विषय नहीं है, यह तात्पर्य है। ‘और’ ( ‘च’ ) शब्द ‘भी’ ( ‘अपि’ ) शब्द के अर्थ में भिन्नक्रम है, अर्थात् आक्षिप्त भी, आक्षिप्त रूप भी झटिति सम्भावना किया जाता हुआ भी । ‘फिर’ ( ‘पुनः’ ) ग्रहण से व्याख्यात ‘प्रतिप्रसव’ को सूचित करता है । अर्थात् इससे ‘एवकार’ ( ‘ही’ का प्रयोग ) आक्षिप्ताभास का निराकरण करता है । ‘हे केशव गौओं की ( उड़ाई हुई ) धूल से दृष्टि के अवरुद्ध ( हृत ) हो जाने से मैंने कुछ नहीं देखा, इस कारण मार्ग में गिर पड़ी हूँ । उस पतिता ( गिरी हुई ) मुझे १७ ध्व०

२५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः एकस्त्वं विषमेषु खिन्नमनसां सर्वाबलानां गति- र्गोप्यैवं गदितः सलेशमवताद्गोष्ठे हरिर्वश्चिरम् ॥ एवञ्जातीयकः सर्व एव भवतु कामं वाच्यश्लेषस्य विषयः । यत्र तु क्योंकि ऊँच-खालों (विषम) में खिन्न मन वाले सभी अबलों के एक तुम्हीं गति हो, इस प्रकार गोपी के द्वारा गोष्ठ (गौशाला) में लेश के साथ कहे गए हरि (कृष्ण) आपलोगों की रक्षा करें । इस प्रकार का सभी चाहे जितना वाच्य श्लेष का विषय हो । जहां सामर्थ्य से लोचनम् यतस्त्वमेवैकोऽतिशयेन बलवान्निम्नोन्नतेषु सर्वेषामबलानां बालवृद्धाङ्गनादीनां खिन्नमनसां गन्तुमशक्नुवतां गतिरालम्बनाभ्युपाय इत्येवंविधेऽर्थे यद्यप्येते प्रकरणेन नियन्त्रिताभिधाशक्तयः शब्दास्तथापि द्वितीयेऽर्थे व्याख्यास्यमानेऽ- भिधाशक्तिर्निरुद्धा सती सलेशमित्यनेन प्रत्युज्जीविता । अत्र सलेशं ससूच- नमित्यर्थः, अल्पीभवनं हि सूचनमेव । हे केशव ! गोप स्वामिन् ! रागहृतया दृष्ट्येति । केशवगेन उपरागेण हृतया दृष्ट्येति वा सम्बन्धः । स्खलितास्मि खण्डितचरित्रा जातास्मि । पतितामिति भर्तृभावं मां प्रति । एक इत्यसा- धारणसौभाग्यशाली त्वमेव । यतः सर्वासामबलानां मदनविधुरमनसामीर्ष्या- कालुष्यनिरासेन सेव्यमानः सन् गतिः जीवितरक्षोपाय इत्यर्थः । एवं श्लेषा- लङ्कारस्य विषयमवस्थाप्य ध्वनेराह—यत्र त्विति । कुसुमसमयात्मकं यद्युगं क्यों नहीं, अर्थात् क्या कारण है कि हाथ से अवलम्बन नहीं करते हो ? क्यों कि तुम्हीं एक अतिशय करके बलवान् हो, निम्नोन्नत (ऊंच-खाल) स्थानों में सभी बाल, वृद्ध, अङ्गना आदि सभी खिन्न मन वाले अर्थात् गमन करने में असमर्थ अबलों की गति अर्थात् आलम्बन के उपाय हो ।' इस प्रकार के अर्थ में यद्यपि ये शब्द प्रकरण के द्वारा नियन्त्रित अभिधाशक्ति वाले हैं, तथापि व्याख्यान किए जाने वाले दूसरे अर्थ में अभिधाशक्ति निरुद्ध होकर 'सलेश' इसके द्वारा पुनः उज्जीवित कर दी गई । यहाँ सलेश अर्थात् सूचन, क्यों कि अल्प होना सूचन ही है। 'हे केशव, गोप, स्वामिन्, राग के कारण हरी हुई दृष्टि से'—। अथवा सम्बन्ध यह कि केशव में गए उपराग के कारण हरी हुई (हृत) दृष्टि से । स्खलित हो गई हूँ (गिर पड़ी हूँ) अर्थात् मेरा चरित्र खण्डित हो चुका है । पतिता अर्थात् मेरे प्रति भर्तृभाव । एक अर्थात् असाधारण सौभाग्यशाली तुम्हीं हो । क्यों कि सभी मदन से विधुर मन वाली अबलाओं के ईर्ष्या- कालुष्य का निरास-पूर्वक सेवा किए गए होते हुए (तुम) गति अर्थात् जीवितरक्षा का उपाय हो । इस प्रकार श्लेष अलङ्कार का विषय अवस्थापन करके ध्वनि का विषय कहते हैं—जहां—। पुष्पसमय रूप जो युग अर्थात् (वसन्त के) दो महीने उनका

द्वितीय उद्योतः २५९ ध्वन्यालोकः सामर्थ्याक्षिप्तं सदलङ्कारान्तरं शब्दशक्त्या प्रकाशते स सर्व एव ध्वनेर्विषयः । यथा— ‘अत्रान्तरे कुसुमसमययुगमुपसंहरन्नजृम्भत ग्रीष्माभिधानः फुल्ल- मल्लिकाधवलाट्टहासो महाकालः' । यथा च— उन्नतः प्रोल्लसद्धारः कालागुरुमलीमसः । पयोधरभरस्तन्व्याः कं न चक्रेऽभिलाषिणम् ॥ आक्षिप्त होता हुआ अलङ्कारान्तर शब्दशक्ति से प्रकाशित होता है, वह सभी 'ध्वनि' का विषय है । जैसे— 'इस बीच, दो पुष्पसमयों (वसन्त के महीनों) को उपसंहार करता हुआ विकसित मल्लिकाओं के, अट्टालिकाओं को धवलित करने वाले हास से युक्त ग्रीष्म नाम का महाकाल जम्भाई लिया।' और जैसे— उन्नत, प्रोल्लसित होते हुए हार से (व्यङ्ग्य मेघ के पक्ष में प्रोल्लसित होती हुई धारा—जलधारा से) युक्त और कालागुरु की भांति मलिन, तन्वी के पयोधर भार (स्तनभार, व्यङ्ग्य मेघ अर्थ में मेघभार) ने किसको अभिलाषी (सकाम) नहीं बनाया ? लोचनम् मासद्वयं तदुपसंहरन् । धवलानि हृद्यान्यट्टान्यापणा येन तादृक् फुल्लमल्लि- कानां हासो विकासः सितिमा यत्र । फुल्लमल्लिका एव धवलाट्टहासोऽस्येति तु व्याख्याने 'जलदभुजगञ्जम्' इत्येतत्तुल्यमेतत्स्यात् । महांश्चासौ दिनदैर्ध्यदुर- तिवाहतायोगात्कालः समयः । अत्र ऋतुवर्णनप्रस्तावनियन्त्रिताभिधाशक्तयः, अत एव 'अवयवप्रसिद्धेः समुदायप्रसिद्धिर्बलीयसी' इति न्यायमपाकुर्वन्तो महा- उपसंहार करता हुआ। धवल अर्थात् हृद्य अट्ट अर्थात् आपण (अट्टालिकाएं) हैं जिससे, उस प्रकार का विकसित मल्लिकाओं (जूही के फूलों) का हास अर्थात् विकास (सितिमा) है जहाँ। 'विकसित मल्लिका ही हैं इसका धवल अट्टहास' यह व्याख्यान करने पर 'जलदभुजगञ्ज०' के सदृश यह हो जायगा। दिनों के बड़े होने और दुरतिवाह होने के कारण महान् काल अर्थात् समय। यहाँ ऋतुवर्णन के प्रस्ताव के कारण अभिधाशक्ति के नियन्त्रित हो जाने से, इसी लिए 'अवयव-प्रसिद्धि से समुदाय-प्रसिद्धि बलवान् होती है' इस न्याय को निराकरण करते हुए 'महाकाल' प्रभृति शब्द इसी

२६० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् कालप्रभृतयः शब्दा एतमेवार्थमभिधाय कृतकृत्या एव । तदनन्तरमर्थावगति- र्ध्वननव्यापारादेव शब्दशक्तिमूलात् । अत्र केचिन्मन्यन्ते—'यत एतेषां शब्दानां पूर्वमर्थान्तरेऽभिधान्तरं दृष्टं ततस्तथाविधेऽर्थान्तरे दृष्टतदभिधाशक्तेरेव प्रतिपत्तुर्नियन्त्रिताभिधाशक्तिकेभ्य एतेभ्यः प्रतिपत्तिर्ध्वननव्यापारादेवेति शब्दशक्तिमूलत्वं व्यङ्ग्यत्वं चेत्यविरुद्धम्' इति । अन्ये तु—'साभिधैव द्वितीया अर्थसामर्थ्यं ग्रीष्मस्य भीषणदेवताविशेष- सादृश्यात्मकं सहकारित्वेन यतोऽवलम्बते ततो ध्वननव्यापाररूपोच्यते' इति । एके तु—'शब्दश्लेषे तावद्भेदे सति शब्दस्य, अर्थश्लेषेऽपि शक्तिभेदाच्छ- ब्दभेद इति दर्शने द्वितीयः शब्दस्तत्रानीयते । स च कदाचिदभिधाव्यापा- रात् यथोभयोत्तरदानाय 'श्वेतो धावति' इति; प्रश्नोत्तरादौ वा तत्र वाच्या- लङ्कारता । यत्र तु ध्वननव्यापारादेव शब्द आनीतः, तत्र शब्दान्तरबलादपि तदर्थान्तरं प्रतिपन्नं प्रतीयमानमूलत्वात्प्रतीयमानमेव युक्तम्' इति । इतरे तु-'द्वितीयपक्षव्याख्याने यदर्थसामर्थ्यं तेन द्वितीयाभिधैव प्रतिप्रसू- अर्थ का अभिधान करके कृतकृत्य ही हो जाते हैं । तत्पश्चात् अर्थ का ज्ञान शब्दशक्तिमूल ध्वननव्यापार से ही होता है । यहाँ कुछ लोग मानते हैं—'जिस कारण इन शब्दों का पहले अर्थ में अभिधा देखी गई है, उस कारण उस प्रकार के अर्थान्तर में, उसी प्रतिपत्ता को, जिसने उनकी अभिधाशक्ति का दर्शन किया है, नियन्त्रित अभिधाशक्ति वाले इन (शब्दों) से ध्वनन व्यापार द्वारा ही ज्ञान होता है, इस प्रकार शब्दशक्तिमूलत्व और व्यङ्ग्यत्व दोनों ठीक हैं' । दूसरे तो (मानते हैं)—'वह दूसरी अभिधा ही सहकारी रूप से ग्रीष्म के भीषण देवता विशेष रूपसादृश्यात्मक अर्थ सामर्थ्य को जिस कारण अवलम्बन करती है, उस कारण ध्वनन रूप कही जाती है' । कुछेक लोग तो (मानते हैं)—'शब्दश्लेष में शब्द के भेद होने पर और अर्थश्लेष में भी 'शक्तिभेद से शब्द का भेद होता है' इस दर्शन (सिद्धान्त) के अनुसार दूसरा शब्द वहाँ लाया जाता है । वह (दूसरा शब्द) कभी अभिधा व्यापार से (लाया जाता है), जैसे—दोनों के उत्तर देने के लिये 'श्वेतो धावति' (कौन इधर दौड़ता है, और कैसा गुण वाला इधर दौड़ता है ? इन दोनों प्रश्नों के उत्तर देने के लिए एक ही वाक्य का प्रयोग किया 'श्वेतो धावति' अर्थात् श्वा-कुत्ता-इधर दौड़ता है और उजला दौड़ता है)। अथवा प्रश्न और उत्तर आदि में (श्लेष) वाच्यालङ्कार हो जाता है । परन्तु, जहाँ ध्वनन व्यापार से ही शब्द लाया गया है, वहाँ शब्दान्तर के बल से भी प्रतिपन्न वह अर्थान्तर प्रतीयमानमूल होने के कारण प्रतीयमान ही ठीक है।' इतर लोग तो (मानते हैं)—'दूसरे पक्ष के व्याख्यान में जो अर्थसामर्थ्य है

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द्वितीय उद्योतः २६१ लोचनम् यते, ततश्च द्वितीयोऽर्थोऽभिधीयत एव न ध्वन्यते, तदनन्तरं तु तस्य द्विती- यार्थस्य प्रतिपन्नस्य प्रथमार्थेन प्राकरणिकेन साकं या रूपणा सा तावद्भात्येव, न चान्यतः शब्दादिति सा ध्वननव्यापारात् । तत्राभिधाशक्तेः कस्याश्चिदप्य- नाशङ्कनीयत्वात् । तस्यां च द्वितीया शब्दशक्तिर्मूलम् । तया विना रूपणाया अनुत्थानात् । अत एवालङ्कारध्वनिरयमिति युक्तम् । वक्ष्यते च 'असम्बद्धार्था- भिधायित्वं मा प्रसाङ्क्षीत्' इत्यादि । पूर्वत्र तु सलेशपदेनैवासम्बद्धता निरा- कृता । 'येन ध्वस्त' इत्यत्रासम्बद्धता नैव भाति । 'तस्या विनापि' इत्यत्रा- पिशब्देन 'श्लाघ्या' इत्यत्राधिकशब्देन 'भ्रमिम्' इत्यादौ च रूपकेणासम्बद्धता उससे दूसरी अभिधा ही प्रतिप्रसूत होती है, और तब दूसरा अर्थ अभिहित ही होता है, ध्वनित नहीं होता है । तत्पश्चात् प्रतिपन्न उस दूसरे अर्थ का पहले प्राकरणिक अर्थ के साथ जो रूपणा है वह प्रतीत होती ही है, वह अन्य शब्द से नहीं है, अतः वह ध्वनन व्यापार से ( प्रतिपन्न ) होती है । क्योंकि उसमें किसी भी अभिधाशक्ति की आशङ्का नहीं की जा सकती । उस ( रूपणा ) में दूसरी शब्दशक्ति मूल है, क्योंकि उसके बिना रूपणा का उत्थान नहीं होगा । इस लिए यह अलङ्कारध्वनि है यह ठीक है । और कहेंगे 'असम्बद्ध अर्थ का अभिधान करने वाला होना प्रसक्त न हो' इत्यादि । पहले में तो 'सलेश' इस पद से ही ( वाक्य की ) असम्बद्धार्थता का निराकरण कर दिया है । 'येन ध्वस्त०' इस ( पद्य ) में असम्बद्धार्थता प्रतीत नहीं होती । 'तस्या विनापि०' इसमें 'अपि' शब्द से, 'श्लाघ्याशेष०' इसमें 'अधिक' शब्द से और—'भ्रमिम्०' इत्यादि में रूपक से असम्बद्धता का निराकरण कर दिया है, यह तात्पर्य है । 'पयोभिः' १. जहां एक शब्द से दो अर्थों का ज्ञान होता है वहां मुख्यतः 'श्लेष' अलङ्कार का प्रसंग होता है, किन्तु जब ध्वननव्यापार आदि सामर्थ्य से आक्षिप्त होकर अलङ्कारान्तर शब्द-शक्ति से प्रकाशित होता है वह सभी शब्दशक्तिमूल ध्वनि का विषय होता है । इसके उदाहरण में आचार्य ने 'अत्रान्तरे ०', 'प्रोत्फुल्ल०' और 'दत्तानन्दाः०' ये तीन उद्धरण दिए हैं । लोचनकार लिखते हैं कि प्रथम उदाहरण में यद्यपि दूसरा शिवरूप अर्थ रूढ है और ग्रीष्म के पक्ष का अर्थ यौगिक है, क्योंकि 'महान् चासौ कालः ( समयः )' के अनुसार अर्थ किया गया है । और नियम यह है कि योग से रूढि बलीयसी होती है ( योगाद् रूढिर्बलीयसी = अवयवशक्तेः समुदायशक्ति- र्बलीयसी ), ऐसी स्थिति में मुख्यता दूसरे अर्थ को मिलनी चाहिए । किन्तु यहां ऋतुवर्णन का प्रसंग होने से अभिधाशक्ति का ग्रीष्म के पक्ष में ही नियमन हो जाता है और 'महाकाल' आदि शब्द इसी अर्थका अभिधान करके कृतकार्य हो जाते हैं । तत्पश्चात् दूसरे का ज्ञान ध्वनन व्यापार से ही होता है । इस प्रसंग में लोचनकार ने जिन चार मतों की चर्चा की है उनका स्पष्टीकरण यह है— प्रथम मत वालों का कहना है कि पहले ज्ञाता को अभिधाशक्ति से द्वितीय अर्थ का ग्रहण हुआ रहता है तभी वह प्रकरण के कारण अभिधाशक्ति के नियंत्रित हो जाने पर ध्वनन व्यापार से उस अर्थ का वह ज्ञान करता है । यदि पहले से उस द्वितीय अप्रस्तुत अर्थ में अभिधाशक्ति से वह अर्थ ज्ञाता को विदित नहीं हुआ होता तो उसे प्रस्तुत में द्वितीय अर्थ का भान ही नहीं हो सकता, इसी-

२६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा वा— दत्तानन्दाः प्रजानां समुचितसमयाकृष्टसृष्टैः पयोभिः पूर्वाह्णे विप्रकीर्णा दिशि दिशि विरमत्यह्नि संहारभाजः । दीप्तांशोर्दीर्घदुःखप्रभवभवभयोदन्वदुत्तारनावो गावो वः पावनानां परमपरिमितं प्रीतिमुत्पादयन्तु ॥ अथवा, जैसे— समुचित समय ( सूर्यकिरणों के पक्ष में ग्रीष्म काल और गौओं के पक्ष में दोहन से पूर्वकाल ) में आकृष्ट ( समुद्र से खींचे हुए, दूसरे पक्ष में अयन में चढ़ाए हुए ) और अर्पित जल ( पक्षान्तर में दूध ) के द्वारा प्रजाओं को आनन्द देने वाली, दिन के आरम्भ में फैली हुई ( पक्षान्तर में चरने के लिए चारों ओर फैली हुई ) और दिन के विराम लेने के समय ( अर्थात् सन्ध्याकाल में ) एकत्र हो जाने वाली ( सूर्य की किरणें सन्ध्या काल में सिमट जाती हैं और गायें बाहर से चर कर एक जगह आ जाती हैं ), प्रबल दुःख के कारणभूत संसार के भय रूप समुद्र के पार उतारने में नौका रूप, पवित्र पदार्थों से श्रेष्ठ, सूर्य की किरणें ( गौओं के समान ) आप लोगों के अपरिमित आनन्द उत्पन्न करें। लोचनम् निराकृतेति तात्पर्यम् । पयोभिरिति पानीयैः क्षीरैश्च । संहारो ध्वंसः, एकत्र ढौकनं च । गावो रश्मयः सुरभयश्च । अर्थात् पानी, और क्षीर । संहार अर्थात् ध्वंस, एक जगह जुट जाना । गौ अर्थात् ( सूर्य की ) किरणें और सुरभि ( गाय ) । लिए वह शब्दशक्तिमूल या अभिधासहकृत ध्वनि कहा जाता है। शब्दशक्ति या अभिधा उसके मूल में रहती है और व्यञ्जना व्यापार से वह ध्वन्यर्थ विदित होता है अतः उसे 'शब्दशक्तिमूल ध्वनि' कहते हैं। दूसरे मत वाले लोग कहते हैं कि ग्रीष्म का भीषण देवता विशेष के साथ सादृश्य रूप अर्थ- सामर्थ्य के सहकारी होने के कारण दूसरी अभिधा शक्ति को ही ध्वनन व्यापार रूप कहते हैं। दूसरे मत वालों का कहना है कि जब भी किसी शब्द के अर्थ की प्रतीति होती है, वह अभिधा शक्ति से ही होती है। जैसे शब्दश्लेष या सभङ्गश्लेष में ( 'सर्वदोमाधवः' ) दोनों अर्थों के लिए दो प्रकार के शब्द हैं, उसी प्रकार अर्थश्लेष या अभङ्गश्लेष में भी 'शक्तिभेदात् शब्दभेदः' के अनुसार द्वितीय शब्द वहां लाया जाता है तब उसका द्वितीय अर्थ अभिधाशक्ति से बोध करते हैं। 'श्वेतो धावति' जैसे प्रश्नोत्तर के प्रसंग में भी द्वितीय शब्द की अभिधाव्यापार से उपस्थिति होती है। किन्तु जहां प्रकरण के कारण ध्वनन व्यापार से द्वितीय शब्द की उपस्थिति होती है और तब अभिधा से अर्थ का बोध होता है वहां यद्यपि शब्दान्तर के बल से उसका अर्थान्तर ज्ञात होता है, तथापि उस अर्थान्तर को प्रतीयमानमूल होने के कारण प्रतीयमान ही कहते हैं। इस प्रकार जहाँ

द्वितीय उद्योतः २६३ ध्वन्यालोकः एषूदाहरणेषु शब्दशक्त्या प्रकाशमाने सत्यप्राकरणिकेऽर्थान्तरे वाक्यस्यासम्बद्धार्थाभिधायित्वं मा प्रसाङ्क्षीदित्यप्राकरणिकप्राकरणि- कार्थयोरुपमानोपमेयभावः कल्पयितव्यः सामर्थ्यादित्यर्थाक्षिप्तोऽयं श्लेषो न शब्दोपारूढ इति विभिन्न एव श्लेषादनुस्वानोपमव्यङ्ग्यस्य इन उदाहरणों में अप्राकरणिक अर्थान्तर के शब्दशक्ति द्वारा प्रकाशित होने पर यह बात न प्रसक्त हो कि 'वाक्य असम्बद्ध अर्थ का अभिधान करने वाला है' इसलिए अप्राकरणिक और प्राकरणिक अर्थ के उपमानोपमेय भाव की कल्पना करनी चाहिए । 'सामर्थ्य के कारण इस प्रकार यह श्लेष आक्षिप्त रूप में उपस्थित होता है, न कि शब्दनिष्ठ होता है, इसलिए श्लेष से अनुस्वानोपमव्यङ्ग्य ध्वनि का विषय अलग ही लोचनम् असम्बद्धार्थाभिधायित्वमिति । असंवेद्यमानमेवेत्यर्थः । उपमानोपमेयभाव इति । तेनोपमारूपेण व्यतिरेचननिह्नवादयो व्यापारमात्ररूपा एवात्रास्वाद- प्रतीतेः प्रधानं विश्रान्तिस्थानं, न तूपमेयादीति सर्वत्रालङ्कारध्वनौ मन्तव्यम् । सामर्थ्यादिति । ध्वननव्यापारादित्यर्थः । असम्बद्ध अर्थ का अभिधान करने वाला होना—। अर्थात् जो संवेद्यमान ही नहीं । उपमानोपमेयभाव¹—। उस उपमा रूप से व्यापारमात्र रूप ही व्यतिरेचन, निह्नव आदि आस्वादप्रतीति के प्रधान विश्रान्तिस्थान हैं, न कि उपमेय आदि । यह सब अलङ्कारध्वनि में मानना चाहिए । सामर्थ्यवश—। अर्थात् ध्वननव्यापार से । अभिधाव्यापार से द्वितीयशब्द की उपस्थिति होती है वह श्लेष आदि का विषय है, और जहां ध्वनन व्यापार से होती है वहां शब्दशक्तिमूल ध्वनि है । तीसरे मतवाले कहते हैं कि द्वितीय अर्थ का बोध सादृश्यादि अर्थसामर्थ्य के कारण (प्रतिप्रसूत ) पुनः उत्पन्न द्वितीय अभिधाशक्ति से ही होता है, अतः वह अभिहित ही होता हैं, न कि ध्वनित । तब दोनों प्राकरणिक और अप्राकरणिक अर्थों का परस्पर अभेद या उपमानोपमेय भाव प्रतीत होता है वह ध्वनन व्यापार का विषय है । वहां किसी अभिधाशक्ति की प्रवृत्ति सम्भव नहीं । दूसरी शब्दशक्ति के उस उपमानोपमेयभाव या रूपणा ( परस्पर अभेद ) में मूल होने के कारण वह शब्दशक्तिमूल ध्वनि का विषय है । आलङ्कारिकों ने सर्वथा शब्दशक्तिमूल ध्वनि को स्वीकार किया है । द्वितीय अप्राकरणिक अर्थ में व्यञ्जना व्यापार की ही प्रवृत्ति उन्हें मान्य है । जहां तक उपमेयोपमान भाव आदि के व्यङ्ग्य होने की बात है और उसके आधार पर 'शब्दशक्तिमूल ध्वनि' की कल्पना है, वह तो निःसन्देह ठीक है, किन्तु द्वितीय अप्राकरणिक अर्थ को लेकर उसे अभिधाशक्ति का विषय न मानकर व्यञ्जना का विषय मानना और शब्दशक्तिमूल ध्वनि की कल्पना करना विवादास्पद है । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृताध्यापक श्री कान्तानाथशास्त्री तैलङ्ग ने 'नागरीप्रचारिणी पत्रिका' में शब्द शक्तिमूल ध्वनि का जोरदार खण्डन किया है । १. उपमानोपमेयभाव' उपलक्षण है, अतः रूपणा आदि भी इस प्रकार व्यञ्जित होते हैं । 'उपमा' को कल्पनीय न कह कर यहां 'उपमानोपमेय भाव' आदि को कल्पनीय कहने का अभिप्राय

२६४ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
ध्वनेर्विषयः । अन्येऽपि चालङ्काराः शब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपव्यङ्ग्ये
ध्वनौ सम्भवन्त्येव । तथा हि विरोधोऽपि शब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपो
दृश्यते । यथा स्थाण्वीश्वराख्यजनपदवर्णने भट्टबाणस्य—
'यत्र च मातङ्गगामिन्यः शीलवत्यश्च गौर्यो विभववताश्च श्यामाः
पद्मरागिण्यश्च धवलद्विजशुचिवदना मदिरामोदिश्वसनाश्च प्रमदाः' ।
है । और भी अन्य अलङ्कार शब्दशक्तिमूल-अनुस्वानरूप-व्यङ्ग्य ध्वनि में हो सकते
ही हैं । जैसा कि विरोध भी शब्दशक्तिमूल-अनुस्वानरूप देखा जाता है । जैसे, 'स्था-
ण्वीश्वर' नाम के जनपद के वर्णन में भट्टबाण का—
'जहां गज की चाल चलने वाली और शीलवती ( 'मातङ्ग' अर्थात् चाण्डाल,
मातङ्गगामिनी अर्थात् चाण्डाल का गमन करने वाली और शीलवती यह विरोध है,
'गजगामिनी' इस अर्थ से उस विरोध का परिहार हो जाता है ), गौरवर्ण और विभव
में रत अर्थात् ऐश्वर्यसम्पन्न ( विरोध यह कि जो गौरी अर्थात् पार्वती है वह विभव
अर्थात् शिव-भिन्न में रत अर्थात् अनुरागयुक्त कैसे होगी ), श्यामा (जवान ) और
पद्मराग वाली ( श्याम वर्ण और कमल के समान राग वाली यह विरोध है ), निर्मल
द्विजों अर्थात् दांतों से युक्त पवित्र मुख वाली ( विरोध में निर्मल द्विजों अर्थात् ब्राह्मणों
के समान पवित्र मुख वाली ) और मदिरा की गन्ध से युक्त श्वास वाली ( विरोध
यह कि जो निर्मल ब्राह्मण के समान पवित्र मुख वाली है वह मदिरा की गन्ध से युक्त
श्वास वाली कैसे है ? ) स्त्रियां हैं ।
लोचनम्
मातङ्गेति । मातङ्गवद्गच्छन्ति तान् शबरांश्च गच्छन्तीति विरोधः । विभवेषु
रताः विगतमहादेवे स्थाने च रताः । पद्मरागरत्नयुक्ताः पद्मसदृशलौहित्ययु-
क्ताश्च । धवलैर्द्विजैर्दन्तैः शुचि निर्मलं वदनं यासां धवलद्विजवदुत्कृष्टविप्र-
मातङ्ग— । मातङ्ग के समान गमन करती हैं और उन शबरों अर्थात् चाण्डालों
का गमन करती हैं यह विरोध है । विभवों में रत और विगतमहादेव स्थान में रत ।
पद्मरागरत्न से युक्त और पद्म के सदृश लौहित्य से युक्त । धवल द्विज अर्थात् दांतों से
शुचि अर्थात् निर्मल मुख है जिनका और धवल द्विज के समान अर्थात् उत्कृष्ट विप्र के

यह हैं कि दोनों अर्थों को वहां व्यापार रूप उपमेयभाव ही आस्वादप्रतीति के प्रधान विश्रा- न्तिस्थान हैं, न कि उपमेय आदि हैं जैसा कि 'उपमा' में उपमेय आस्वाद प्रतीति का विश्रान्ति स्थान होता है । उपमा के रूप में व्यतिरेचन ( जो 'व्यतिरेक' अलङ्कार में व्यापार है ) और निह्नव ( जो 'अपह्नुति अलङ्कार में व्यापार है ) आदि भी आस्वादप्रतीति के चरम विश्रान्ति स्थान हैं । अलङ्कारध्वनि में सर्वत्र यही प्रकार है ।

द्वितीय उद्योतः २६५ ध्वन्यालोकः अत्र हि वाच्यो विरोधस्तच्छायानुग्राही वा श्लेषोऽयमिति न शक्यं वक्तुम् । साक्षाच्छब्देन विरोधादलङ्कारस्याप्रकाशितत्वात् । यत्र हि साक्षाच्छब्दावेदितो विरोधादलङ्कारस्तत्र हि श्लिष्टोक्तौ वाच्यालङ्कारस्य विरोधस्य श्लेषस्य वा विषयत्वम् । यथा तत्रैव— 'समवाय इव विरोधिनां पदार्थानाम् । तथाहि—सन्निहितबाला- न्धकारापि भास्वन्मूर्तिः' इत्यादौ । यहाँ विरोध वाच्य है और अथवा यह श्लेष उसकी छाया का अनुग्राहक है, यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि साक्षात् शब्द द्वारा विरोध-अलङ्कार प्रकाशित नहीं है। जहां विरोध-अलङ्कार साक्षात् शब्द से आवेदित होता है, वहां श्लिष्ट उक्ति में वाच्यालङ्कार विरोध अथवा श्लेष का विषय होता है। जैसे, वहीं पर— 'विरोधी पदार्थों के समवाय की भांति, जैसे कि सन्निहित है बाल रूप अन्धकार जिसके ऐसी सूर्य की मूर्ति (यह विरोध हुआ) अन्धकार रूप काले बालों से युक्त भी चमकती हुई मूर्तिवाले थे।' लोचनम् वच्छुचि वदनं च यासाम् । यत्र हीति । यस्यां श्लेषोक्तौ काव्यरूपायां, तत्र यो विरोधः श्लेषो वेति सङ्करः तस्य विषयत्वम् । स विषयो भवतीत्यर्थः । कस्य ? वाच्यालङ्कारस्य वाच्यालङ्कृतेः वाच्यालङ्कृतित्वस्येत्यर्थः । तत्रैव विरोधे श्लेषे वा वाच्यालङ्कारत्वं सुवचमिति यावत् । बालेषु केशेष्वन्धकारः कार्ण्यं, बालः प्रत्यग्रश्चान्धकारस्तमः । ननु मातङ्गेत्यादावपि धर्मद्वये यश्चकारः स विरोधद्योतक एव । अन्यथा प्रतिधर्मं सर्वधर्मान्ते वा न कश्चिद्वा चकारः स्यात् यदि समुच्चयार्थः स्यादित्य- भिपायेणोदाहरणान्तरमाह—यथेति । शरणं गृहमक्षयरूपमगृहं कथम् । यो न समान शुचि मुख है जिनका । जिस काव्यरूप श्लेषोक्ति में, वहाँ विरोध अथवा श्लेष का सङ्कर है उसका विषय है, अर्थात् वह विषय होता है। किसका ? वाच्यालङ्कार का अर्थात् वाच्यालङ्कृति का, वाच्यालङ्कृतित्व का । वहीं विरोध में अथवा श्लेष में वाच्यालङ्कारत्व सुतरां कहा जा सकता है। बालों अर्थात् केशों के कारण अन्धकार अर्थात् कृष्णमा और प्रत्यग्र अन्धकार अर्थात् तमस् । मातङ्ग०—। इत्यादि स्थल में भी जो दो धर्मों में 'और' (चकार) है वह विरोध का द्योतक ही है, यदि ऐसा नहीं तो प्रति धर्म में अथवा सभी धर्मों के अन्त में अथवा कहीं भी 'और' (चकार) नहीं होता, यदि समुच्चय के अर्थ में होता, इस अभिप्राय से दूसरा उदाहरण कहते हैं—जैसे—। शरण अर्थात् गृह अक्षय रूप अगृह कैसे ? जो धीश (बुद्धियों का स्वामी) नहीं, वह बुद्धियों का स्वामी (धियामीश) कैसे ? जो हरि

२६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा वा ममैव— सर्वैकशरणमक्षयमधीशमीशं धियां हरिं कृष्णम् । चतुरात्मानं निष्क्रियमरिमथनं नमत चक्रधरम् ॥ अत्र हि शब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपो विरोधः स्फुटमेव प्रतीयते । एवंविधो व्यतिरेकोऽपि दृश्यते । यथा ममैव— खं येऽत्युज्ज्वलयन्ति लूनतमसो ये वा नखोद्भासिनो ये पुष्णन्ति सरोरुहश्रीमपि क्षिप्ताब्जभासश्च ये । ये मूर्धस्ववभासिनः क्षितिभृतां ये चामराणां शिरां- अथवा जैसे, मेरा ही— सब का एक मात्र शरण, अविनाशी ( 'शरण' और 'क्षय' दोनों गृहवाची हैं, अतः विरोध यह है कि जो सबका एक मात्र शरण अर्थात् गृह है वह क्षय अर्थात् गृह से रहित कैसे है ? ), अधीश, बुद्धियों के ईश ( विरोध यह है कि जो बुद्धियों के ईश अर्थात् धीश है वह अधीश अर्थात् बुद्धियों के ईश अर्थात् स्वामी नहीं कैसे हैं ? ) हरि ( विष्णु ) कृष्ण ( विरोध यह है जो हरि अर्थात् हरित वर्ण के हैं वह कृष्ण वर्ण के कैसे हैं ? ) सर्वज्ञस्वरूप, निष्क्रिय ( चतुरात्मा अर्थात् पराक्रमयुक्त हैं और निष्क्रिय कैसे हैं ? यह विरोध है ) और अरियों के मथन करने वाले, चक्रधारी ( विरोध यह जो अर वालों अर्थात् चक्रवालों का मथन करने वाले हैं वह चक्रधारी कैसे हैं ? ) हैं । यहां शब्दशक्तिमूल अनुस्वान रूप विरोध स्पष्ट ही प्रतीत होता है । इस प्रकार का 'व्यतिरेक' ( अलङ्कार ) भी देखा जाता है । जैसे मेरा ही— ( सूर्य के ) जो अन्धकार का नाश करने वाले ( किरणरूप ) पाद आकाश को उज्ज्वल करते हैं और जो ( चरणरूप ) पादनखों से शोभित ( व्यतिरेक यह कि आकाश को उद्भासित या उज्ज्वल नहीं करते हैं ), जो ( किरणरूप पाद ) कमलों की शोभा बढ़ाते हैं और जो ( चरणरूप पाद ) कमलों की शोभा को तिरस्कृत करते हैं, जो ( किरणरूप पाद ) क्षितिभृत् अर्थात् ( पर्वतों के शिखरों पर आक्रमण लोचनम् धीशः स कथं धियामीशः । यो हरिः कपिलः स कथं कृष्णः । चतुरः पराक्रम- युक्तो यस्यात्मा स कथं निष्क्रियः । अरीणामरयुक्तानां यो नाशयिता स कथं चक्रं बहुमानेन धारयति । विरोध इति । विरोधनमित्यर्थः । प्रतीयत इति । अर्थात् कपिल है वह कृष्ण कैसे ? चतुर अर्थात् पराक्रमयुक्त जिसकी आत्मा है वह निष्क्रिय कैसे है ? अरियों अर्थात् अर ( चक्र )—युक्तों का जो नाश करने वाला है वह कैसे चक्र को बहुमानपूर्वक धारण करता है ? विरोध अर्थात् विरोधन । प्रतीत होता है—। भाव यह कि कोई स्पष्ट नहीं कहता है । नखों से उद्भासित हैं, जो ख अर्थात्

द्वितीय उद्योतः २६७ ध्वन्यालोकः स्याक्रामन्त्युभयेऽपि ते दिनपतेः पादाः श्रिये सन्तु वः ॥ एवमन्येऽपि शब्दशक्तिमूलानुरवानरूपव्यङ्ग्यध्वनिप्रकाराः सन्ति ते सहृदयैः स्वयमनुसर्तव्याः । इह तु ग्रन्थविस्तरभयान्न तत्प्रपञ्चः कृतः । अर्थशक्त्युद्भवस्त्वन्यो यत्रार्थः स प्रकाशते । यस्तात्पर्येण वस्त्वन्यद्व्यनक्त्युक्तिं विना स्वतः ॥ २२ ॥ यत्रार्थः स्वसामर्थ्यादर्थान्तरमभिव्यनक्ति शब्दव्यापारं विनैव सोऽर्थशक्त्युद्भवो नामानुरवानोपमव्यङ्ग्यो ध्वनिः । करते हैं अथवा ) राजाओं के सिर पर अवभासित होते हैं और जो ( चरणरूप पाद देवताओं के भी शिरों पर आक्रमण करते हैं, इस प्रकार सूर्य के दोनों पाद ( किरणरूप और चरणरूप ) आप लोगों का कल्याण करें । इस प्रकार शब्दशक्तिमूल अनुरवानरूपव्यङ्ग्य ध्वनि के दूसरे भी प्रकार हैं, उन्हें सहृदय लोग स्वयं अनुसरण करें । यहां ग्रन्थ के विस्तार के भय से उनका प्रपञ्च नहीं किया है। अर्थशक्त्युद्भव अन्य ( ध्वनि ) है, जहां वह अर्थ प्रकाशित होता है जो उक्ति के बिना तात्पर्य रूप से स्वतः अन्य वस्तु को प्रकाशित करता है ॥ २२ ॥ जहां अर्थ शब्द व्यापार के बिना ही अपने सामर्थ्य से अर्थान्तर को अभिव्यक्त करता है, वह ‘अर्थशक्त्युद्भव’ नाम का अनुरवानोपमव्यङ्ग्य ध्वनि है। जैसे— लोचनम् स्फुटं नोच्यते केनचिदिति भावः । नखैरुद्भासन्ते येऽवश्यं खे गगने न उद्भा- सन्ते । उभये रश्म्यात्मानोऽङ्गुलीपाष्र्ण्यवयवविरूपाश्चेत्यर्थः ॥ २१ ॥ एवं शब्दशक्त्युद्भवं ध्वनिमुक्त्वाऽर्थशक्त्युद्भवं दर्शयति—अर्थेति । अन्य इति शब्दशक्त्युद्भवात् । स्वतस्तात्पर्येणेत्यभिधाव्यापारनिराकरणपरमिदं पदं ध्वन- नव्यापारमाह न तु तात्पर्यशक्तिम् । सा हि वाच्यार्थप्रतीतावेवोपक्षीणेत्युक्तं प्राक् । अनेनैवाशयेन वृत्तौ व्याचष्टे—यत्रार्थः स्वसामर्थ्यादिति । स्वत इति आकाश में उद्भासित नहीं हैं । दोनों ( पाद ) अर्थात् किरणरूप और अङ्गुलि, पार्ष्णि आदि अवयवों वाले ॥ २१ ॥ इस प्रकार शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि को कह कर अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि को दर्शाते हैं—अर्थ०—। अन्य अर्थात् शब्दशक्त्युद्भव से ( अन्य ) । ‘स्वतः तात्पर्यंरूप से’ इस अभिधाव्यापार के निराकरण में तात्पर्य वाला यह पद ध्वननव्यापार को कहता है न कि तात्पर्यशक्ति को । क्यों कि वह ( तात्पर्यशक्ति ) वाच्यार्थ की प्रतीति में ही उपक्षीण हो जाती है, यह पहले कह चुके हैं । इसी अभिप्राय से वृत्ति में व्याख्यान करते हैं— जहां अर्थ अपनी सामर्थ्य से—। ‘स्वतः’ इस शब्द की ‘अपनी’ ( ‘स्व’ ) शब्द से

२६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा— एवंवादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरधोमुखी । लीलाकमलपत्राणि गणयामास केवलम् ॥ अत्र हि लीलाकमलपत्रगणनमुपसर्जनीकृतस्वरूपं शब्दव्यापारं विनैवार्थान्तरं व्यभिचारिभावलक्षणं प्रकाशयति । न चायमलक्ष्यक्रम- व्यङ्ग्यस्यैव ध्वनेर्विषयः । यतो यत्र साक्षाच्छब्दनिवेदितेभ्यो विभा- वानुभावव्यभिचारिभ्यो रसादीनां प्रतीतिः, स तस्य केवलस्य मार्गः । यथा कुमारसम्भवे मधुप्रसङ्गे वसन्तपुष्पाभरणं वहन्त्या देव्या आगम- इस प्रकार देवर्षि ( मण्डल ) कह रहे थे और पिता की बगल में ( बैठी ) नीचे मुंह किए पार्वती लीलाकमल के पत्तों की गणना करने लगी । यहां लीला कमल के पत्तों का गगन ( यह अर्थ ) अपने स्वरूप को गुणीभूत करने शब्दव्यापार के बिना ही व्यभिचारी भाव रूप अर्थान्तर को प्रकाशित करता है। यह अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ही ध्वनि का विषय नहीं है। क्यों कि जहां साक्षात् शब्द द्वारा निवेदित विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों से रस आदि की प्रतीति होती है वह केवल उसका मार्ग है। जैसे 'कुमारसम्भव' में वसन्त के फूलों का आभरण धारण किए देवी ( पार्वती ) का आगमन आदि वर्णन और कामदेव के शर-सन्धान लोचनम् शब्दः स्वशब्देन व्याख्यातः । उक्तिं विनेति व्याचष्टे—शब्दव्यापारं विनैवेति । उदाहरति—यथा एवमिति । अर्थान्तरमिति लज्जात्मकम् । साक्षादिति । व्यभि- चारिणां यत्रालक्ष्यक्रमतया व्यवधिवन्ध्यैव प्रतिपत्तिः स्वविभावादिबलात्तत्र साक्षाच्छब्दनिवेदितत्वं विवक्षितमिति न पूर्वापरविरोधः । पूर्वं ह्युक्तं व्यभि- चारिणामपि भावत्वान्न स्वशब्दतः प्रतिपत्तिरित्यादि विस्तरतः । एतदुक्तं भवति—यद्यपि रसभावादिरर्थो ध्वन्यमान एव भवति न वाच्यः कदाचिदपि, व्याख्या की है। 'उक्ति के बिना' इसकी व्याख्या करते हैं—शब्दव्यापार के बिना ही—। उदाहरण देते हैं—जैसे, इस प्रकार०—। अर्थान्तर लज्जारूप अर्थान्तर । साक्षात्—। व्यभिचारी भावों की जहां अलक्ष्यक्रम रूप से व्यवधानरहित ही प्रतीति अपने विभाव के बल से होती है वहाँ साक्षात् शब्द द्वारा निवेदितत्व विवक्षित है अतः पूर्वापरविरोध नहीं है। क्यों कि पहले विस्तार से कहा है कि व्यभिचारी भावों की भी भाव होने के कारण स्वशब्द से प्रतीति नहीं होती है, इत्यादि । यह कहा गया—यद्यपि रस, भाव आदि अर्थ ध्वन्यमान ही होता है, कभी भी वाच्य नहीं होता है, तथापि

: द्वितीय उद्योतः २६९ ध्वन्यालोकः नादिवर्णनं मनोभवशरसन्धानपर्यन्तं शम्भोश्च परिवृत्तधैर्यस्य चेष्टा- विशेषवर्णनादि साक्षाच्छब्दनिवेदितम् । इह तु सामर्थ्याक्षिप्तव्यभिचारि- मुखेन रसप्रतीतिः । तस्मादयमन्यो ध्वनेः प्रकारः । पर्यन्त समाप्त धैर्य वाले शङ्कर के चेष्टा विशेष के वर्णन आदि साक्षात् शब्द द्वारा निवेदन किया है। यहाँ सामर्थ्य से आक्षिप्त व्यभिचारी के द्वारा रस की प्रतीति होती है । इस लिए यह ध्वनि का अन्य प्रकार है । लोचनम् तथापि न सर्वोऽलदयक्रमस्य विषयः । यत्र हि विभावातुभावेभ्यः स्थायिग- तेभ्यो व्यभिचारिगतेभ्यश्च पूर्णेभ्यो झटित्येव रसव्यक्तिस्तत्रास्त्वलदयक्रमः । यथा— निर्वाणभूयिष्ठमथास्य वीर्यं सन्धुक्षयन्तीव वपुर्गुणेन । अनुप्रयाता वनदेवताभिरदृश्यत स्थावरराजकन्या ॥ इत्यादौ सम्पूर्णालम्बनोद्दीपनविभावतायोग्यस्वभाववर्णनम् । प्रतिग्रहीतुं प्रणयिप्रियत्वात्त्रिलोचनस्तामुपचक्रमे च । संमोहनं नाम च पुष्पधन्वा धनुष्यमोघं समधत्त बाणम् ॥ इत्यनेन विभावतोपयोग उक्तः । हरस्तु किञ्चित्परिवृत्तधैर्यश्चन्द्रोदयारम्भ इवाम्बुराशिः । उमामुखे बिम्बफलाधरोष्ठे व्यापारयामास विलोचनानि ॥ अत्र हि भगवत्याः प्रथममेव तत्प्रवणत्वात्तस्य चेदानीं तदुन्मुखीभूतत्वात् सब (रस, भावादि) अलक्ष्यक्रम का विषय नहीं होता है । जहाँ स्थायिगत और व्यभिचारिगत पूर्ण विभावों और अनुभावों से झटिति रस की अभिव्यक्ति हो जाती है वहाँ अलक्ष्यक्रम होता है । जैसे— 'तदनन्तर इनके (शिव जी) के निर्वाण-प्रधान वीर्य को अपने शरीर के गुण से मानों विनष्ट करती हुई, वनदेवताओं द्वारा अनुसरण की जाती हुई, स्थावरराज (हिमालय) की कन्या (पार्वती) दिखाई पड़ीं।' इत्यादि में सम्पूर्ण आलम्बन-उद्दीपन विभाव रूप के योग्य स्वभाव का वर्णन है। 'अपने भक्त के प्रेमी होने के कारण त्रिलोचन (शिव जी) ने उस (माला) को ग्रहण करने के लिए उपक्रम किया और पुष्पों के धनुषवाले कामदेव ने संमोहन नाम का अमोघ बाण धनुष पर रखा ।' इसके द्वारा विभाव रूप का उपयोग कहा । 'चन्द्रोदय के आरम्भ में समुद्र की भाँति कुछ विचलित धैर्य वाले शिवजी ने बिम्बफल की भाँति अधरोष्ठ वाले पार्वती के मुख में अपने नेत्रों को व्यापारित किया।' यहाँ भगवती (पार्वती) के पहले से ही शिव में आसक्त होने के कारण और अब

२७० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यत्र च शब्दव्यापारसहायोऽर्थोऽर्थान्तरस्य व्यञ्जकत्वेनोपादीयते स नास्य ध्वनेर्विषयः । यथा— सङ्केतकालमनसं विटं ज्ञात्वा विदग्धया । और जहाँ शब्दव्यापार की सहायता से अर्थ अर्थान्तर के व्यञ्जक रूप से उपादान किया जाता है वह इस ध्वनि का विषय नहीं है । जैसे— विदग्धा ( नायिका ) ने यह जान कर कि विट संकेत (के स्थान पर पहुँचने का) लोचनम् प्रणयिप्रियतया च पक्षपातस्य सूचितस्य गाढीभावादृत्यात्मनः स्थायिभाव- स्यौत्सुक्यावेगचापल्यहर्षादेश्च व्यभिचारिणः साधारणीभूतोऽनुभाववर्गः प्रका- शित इति विभावानुभावचर्वणैव व्यभिचारिचर्वणायां पर्यवस्यति । व्यभिचा- रिणां पारतन्त्र्यादेव स्रक्सूत्रकल्पस्थायिचर्वणाविश्रान्तेरलक्ष्यक्रमत्वम् । इह तु पद्मद्लगणनमधोमुखत्वं चान्यथापि कुमारीणां सम्भाव्यत इति झटिति न लज्जायां विश्रमयति हृदयं, अपि तु प्राग्वृत्ततपश्चर्यादिवृत्तान्तानुस्मरणेन तत्र प्रतिपत्तिं करोतीति क्रमव्यङ्ग्यतैव । रसस्त्वत्रापि दूरत एव व्यभिचारिस्वरूपे पर्यालोच्यमाने भातीति तदपेक्षयाऽलक्ष्यक्रमतैव । लज्जापेक्षया तु तत्र लक्ष्यक्र- मत्त्वम् । अमुमेव भावमेवंशब्दः केवलशब्दश्च सूचयति । 'उक्तिं विने'ति यदुक्तं तद्व्यवच्छेद्यं दर्शयितुमुपक्रमते—यत्र चेति । चशब्द- स्तुशब्दस्यार्थे । अस्येति । अलक्ष्यक्रमस्तु तत्रापि स्यादेवेति भावः । उदाहरति- सङ्केतेति । उन ( शिवजी ) के इन ( पार्वती ) के प्रति उन्मुख होने के कारण और भक्त के प्रेमी होने के कारण सूचित पक्षपात के गाढ़ होने से रति रूप स्थायी भाव का और औत्सुक्य, वेग, चापल्य, हर्ष आदि व्यभिचारी का साधारणीभूत अनुभाव वर्ग को प्रकाशित किया है, इस प्रकार विभाव-अनुभाव की चर्वणा ही व्यभिचारी की चर्वणा में पर्यवसित होती है । व्यभिचारी भावों के परतन्त्र होने के कारण ही माला के सूत्र के समान स्थायी की चर्वणा में विश्रान्ति होने से अलक्ष्यक्रमत्व है । परन्तु यहाँ कमल के पत्तों को गिनना और नीचे मुख करना कुमारियों के अन्यथा भी सम्भव हैं, इस प्रकार झटिति हृदय को लज्जा में विश्राम नहीं मिलता है, अपितु ( हृदय ) पहले सम्पन्न हुए तपश्चर्या आदि वृत्तान्त के अनुस्मरण से उस ( लज्जा ) में प्रतिपत्ति करता है, इस प्रकार क्रमव्यङ्ग्यता ही है । किन्तु रस यहाँ भी दूर पर व्यभिचारी के स्वरूप के पर्यालोचन करने पर प्रतीत होता है, इस लिए उसकी अपेक्षा से अलक्ष्यक्रमत्व ही है । लज्जा की अपेक्षा से लक्ष्यक्रमत्व है । इसी भाव को 'इस प्रकार' और 'केवल' शब्द सूचित करते हैं । 'उक्ति के बिना' यह जो कहा है उसका व्यवच्छेद्य दिखाने के लिए उपक्रम करते हैं—और जहाँ—। 'और' शब्द 'परन्तु' शब्द के अर्थ में है । इस (ध्वनि) का—। भाव यह कि अलक्ष्यक्रम तो वहाँ पर भी होगा ही । उदाहरण देते हैं—सङ्केत ०—।

द्वितीय उद्योतः २७१ ध्वन्यालोकः हसन्नेत्रार्पिताकूतं लीलापद्मं निमीलितम् ॥ अत्र लीलाकमलनिमीलनस्य व्यञ्जकत्वमुक्त्यैव निवेदितम् । तथा च- शब्दार्थशक्त्या क्षिप्तोऽपि व्यङ्ग्योऽर्थः कविना पुनः । समय जानना चाहता है, हँसते हुए नेत्र द्वारा अभिप्राय प्रकट करते हुए (अपने हाथ में स्थित) लीलाकमल को निमीलित कर दिया । यहाँ लीलाकमल के निमीलन का व्यञ्जकत्व उक्ति द्वारा ही निवेदन किया गया है । और उस प्रकार— शब्दार्थ की शक्ति से आक्षिप्त भी व्यङ्ग्य अर्थ जहाँ कवि के द्वारा पुनः अपनी उक्ति से आविष्कृत किया जाता है, वह ध्वनि का अन्य ही अलङ्कार है ! लोचनम् व्यञ्जकत्वमिति । प्रदोषसमयं प्रतीति शेषः । उक्त्यैवेति । आद्यपादत्रयेणे- त्यर्थः । यद्यपि चात्र शब्दान्तरसन्निधानेऽपि प्रदोषार्थं प्रति न कस्यचिद्- भिधाशक्तिः पदस्येति व्यञ्जकत्वं न विघटितं, तथापि शब्देनैवोक्तमयमर्थोऽर्था- न्तरस्य व्यञ्जक इति । ततश्च ध्वनेर्यद्गोप्यमानतोदितचारुत्वात्मकं प्राणितं तदपहस्तितम् । यथा कश्चिदाह—'गम्भीरोऽहं न मे कृत्यं कोऽपि वेद न सूचितम् । किञ्चिद् ब्रवीमि' इति । तेन गाम्भीर्यसूचनार्थः प्रत्युत आविष्कृत एव । अत एवाह—व्यञ्जकत्वमिति उक्त्यैवेति च ॥ २२ ॥ प्रक्रान्तप्रकारद्वयोपसंहारं तृतीयप्रकारसूचनं चैकेनैव यत्नेन करोमीत्याश- येन साधारणमवतरणपदं प्रक्षिपति वृत्तिकृत्—तथा चेति । तेन चोक्तप्रकार- व्यञ्जकत्व—। प्रदोषसमय अर्थात् सन्ध्याकाल के प्रति व्यञ्जकत्व । उक्तिद्वारा ही—। अर्थात् पहले के तीनों पादों से । यद्यपि यहाँ शब्दान्तर के सन्निधान होने पर भी किसी पद का 'प्रदोष' (या सन्ध्याकाल) इस अर्थ के प्रति अभिधाशक्ति नहीं है, इस कारण व्यञ्जकत्व विघटित नहीं होता है तथापि 'यह अर्थ अर्थान्तर का व्यञ्जक है' यह बात शब्द से ही कही गई है । इस कारण ध्वनि का जो 'गोप्यमानता से उत्पन्न चारुत्वरूप प्राण है, उसका निराकरण कर दिया है। जैसा कि कोई कहता है—'मैं गम्भीर हूँ, बिना बताए मेरा काम कोई भी नहीं जानता, (इस लिए) कुछ कहता हूँ' । इस (कथन) से गाम्भीर्य-सूचन का अर्थ प्रत्युत प्रकट कर दिया है । इसी लिए कहा है— 'व्यञ्जकत्व' और 'उक्ति से ही' । प्रक्रान्त दोनों प्रकारों का उपसंहार और तीसरे प्रकार का सूचन एक ही यत्न से करता हूँ, इस आशय से वृत्तिकार साधारण अवतरण पद को देते हैं—और उस प्रकार—। अर्थात् उन उक्त दोनों प्रकारों (शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल ध्वनि) के