ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २५५ ध्वन्यालोकः बिभ्राणां मुखमिन्दुरूपमखिलं चन्द्रात्मचक्षुर्दध- त्स्थाने यां स्वतनोरपश्यदधिकां सा रुक्मिणी वोऽवतात् ॥ अत्र वाच्यतयैव व्यतिरेकच्छायानुग्राही श्लेषः प्रतीयते । यथा च— भ्रमिमरतिमलसहृदयतां प्रलयं मूर्च्छां तमः शरीरसादम् । मरणं च जलदभुजगं प्रसह्य कुरुते विषं वियोगिनीनाम् ॥ यथा वा— का आक्रमण किया है और जो चन्द्र के रूप में नेत्र धारण करते हैं वह हरि भगवान् विष्णु प्रशंसनीय समस्त शरीर वाली, समस्त अङ्गों की लीलामात्र से त्रैलोक्य को जीत लेने वाली और समग्र चन्द्र रूप मुख को धारण करने वाली जिस रुक्मिणी को अपने शरीर से उचित ही अधिक देखा, वह ( रुक्मिणी ) आपलोगों की रक्षा करे । यहां वाच्यरूप से ही व्यतिरेक की छाया का अनुग्राहक श्लेष प्रतीत होता है । और जैसे— जलदरूप भुजग से उत्पन्न विष ( जल और जहर, क्योंकि दोनों 'विष' के वाच्य हैं ) वियोगिनियों के चक्कर, औदासीन्य, दिली नाकामी, बेचैनी, मूर्च्छा, अन्धेरा, शरीर का ऐंठन और मरण हठपूर्वक कर डालता है । अथवा जैसे— लोचनम् व्यतिरेकपदे सुदर्शनौ श्लाघ्यौ करावेव यस्य । चरणारविन्दस्य ललितं त्रिभु- वनाक्रमणक्रीडनम् । चन्द्ररूपं चक्षुर्धारयन् । वाच्यतयैवेति । स्वतनोरधिका- मिति शब्देन व्यतिरेकस्योक्तत्वात् । भुजगशब्दार्थपर्यालोचनाबलादेव विष- शब्दो जलमभिधायापि न विरन्तुमुत्सहते, अपि तु द्वितीयमर्थं हालाहललक्ष- णमाह । तदभिधानेन विनाभिधाया एवासमाप्तत्वात् । भ्रमिप्रभृतीनां तु मरणान्तानां साधारण एवार्थः । निराशीकृतत्वेन खण्डितानि यानि मानसानि दोनों हाथ ही हैं जिसके । चरणारविन्द का त्रिभुवन के आक्रमण का ललित खेल । चन्द्र रूप चक्षु को धारण करता हुआ । वाच्य रूप से ही—। क्योंकि 'अपने शरीर से अधिक' यह कहने से व्यतिरेक उक्त हो गया है । 'भुजग' शब्द के अर्थ की पर्यालोचना के बल से ही 'विष' शब्द 'जल' का अभिधान करके भी विराम लेने के लिए उत्साहित नहीं होता, अपितु हालाहल रूप दूसरे अर्थ को भी अभिधान करता है । क्योंकि उसके अभिधान के बिना अभिधा समाप्त ही नहीं होती । चक्कर आदि से लेकर मरण तक का शब्दों का अर्थ साधारण ही है । निराश होने के कारण खण्डित जो मानस अर्थात्