भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 680 में से

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पृष्ठ 316

२५६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः चमहिअमाणसकञ्चणपङ्कअनिम्महिअपरिमला जस्स। अखण्डिअदाणपसारा बाहुप्पलिहा ण्विअ गइन्दा॥ (खण्डितमानसकाञ्चनपङ्कजनिर्मथितपरिमला यस्य। अखण्डितदानप्रसरा बाहुपरिघा इव गजेन्द्राः॥ इति छाया) अत्र रूपकच्छायानुग्राही श्लेषो वाच्यतयैवावभासते। स चाक्षिप्तोऽलङ्कारो यत्र पुनः शब्दान्तरेणाभिहितस्वरूपस्तत्र न निराश शत्रुओं के मानसरूपी सुवर्ण कमल को निर्मथित् करने वाले अपने यश रूप सौरभ से युक्त और निरन्तर दान देने वाले जिस (राजा) के बाहुदण्ड मानसरोवर के सुवर्ण कमलों को खण्डित करने से (उनके) सौरभ से सने और निरन्तर दान- जल प्रवाहित करने वाले हाथियों के समान हैं। यहां रूपक की छाया का अनुग्राहक श्लेष वाच्यरूप से ही अवभासित होता है। और वह आक्षिप्त अलङ्कार जहां फिर शब्दान्तर से अभिहित हो जाता है वहां लोचनम् शत्रुहृदयानि तान्येव काञ्चनपङ्कजानि। ससारत्वात् तैर्हेतुभूतैः। णिम्महिअ- परिमला इति। प्रसृतप्रतापसारा अखण्डितवितरणप्रसरा बाहुपरिघा एव यस्य गजेन्द्रा इति। गजेन्द्रशब्दवशाच्च महिअशब्दः परिमलशब्दो दानशब्दश्च त्रोट- नसौरभमदलक्षणानर्थान्प्रतिपाद्यापि न परिसमाप्ताभिधाव्यापारा भवन्तीत्युक्त- रूपं द्वितीयमप्यर्थमभिदधत्येव। एवमाक्षिप्तशब्दस्य व्यवच्छेद्यं प्रदर्श्यैवकारस्य व्यवच्छेद्यं दर्शयितुमाह— स चेति। उभयार्थप्रतिपादनशक्तशब्दप्रयोगे, यत्र तावदेकतरविषयनियमन- कारणमभिधाया नास्ति, यथा—'येन ध्वस्तमनोभवेन' इति। यत्र वा प्रत्युत शत्रुके हृदय वहीं है सुवर्ण कमल। सारयुक्त होने के कारण हेतुभूत उनसे। निर्मथित करने वाले परिमल से युक्त—। जिनके प्रताप बल फैल चुके हैं, अखण्डित दान-प्रसर वाले जिसके बाहुदण्ड ही गजेन्द्र अर्थात् हाथी हैं। 'गजेन्द्र' शब्द के कारण 'चमहिअ' ('खण्डित') शब्द, 'परिमल' शब्द और 'दान' शब्द 'तोड़ना' 'सौरभ' और 'मद' रूप अर्थों को प्रतिपादन करके भी परिसमाप्त अभिधाव्यापार वाले नहीं होते, इस लिए उक्त रूप दूसरे अर्थ का अभिधान करते ही हैं। इस प्रकार 'आक्षिप्त' शब्द के व्यवच्छेद्य को दिखा कर 'एव' कार ('ही') का व्यवच्छेद्य दिखलाने के लिए कहते हैं—और वह—। दो अर्थों के प्रतिपादन में शक्त (समर्थ) शब्द के प्रयोग करने पर, जहां किसी एक विषय में अभिधा के नियमन का कारण नहीं है, जैसे—'येन ध्वस्तमनोभवेन०'—। अथवा जहाँ दूसरे अभिधाव्यापार के

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