ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २५७ ध्वन्यालोकः शब्दशक्त्युद्द्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यध्वनिव्यवहारः । तत्र वक्रोक्त्यादि- वाच्यालङ्कारव्यवहार एव । यथा— दृष्ट्या केशव गोपरागहतया किञ्चिन्न दृष्टं मया तेनैव स्खलितास्मि नाथ पतितां किं नाम नालम्बसे । शब्दशक्त्युद्भव अनुरणन रूप ध्वनि का व्यवहार नहीं होता है । वहां वक्रोक्ति आदि वाच्य अलङ्कार का व्यवहार होता है । जैसे— हे केशव, गौओं की ( उड़ाई हुई ) धूल से दृष्टि के ढँप जाने के कारण मैंने कुछ नहीं देखा और गिर पड़ी हूँ, हे नाथ, गिरी हुई मुझे क्यों नहीं आलम्बन करते हो ? लोचनम् द्वितीयाभिधाव्यापारसद्भावावेदकं प्रमाणमस्ति, यथा—‘तस्या विना’ इत्यादौ, तत्र तावत्सर्वथा ‘चमहिअ’ इत्यन्ते । सोऽर्थोऽभिधेय एवेति स्फुटमदः । यत्रा- प्यभिधाया एकत्र नियमहेतुः प्रकरणादिर्विद्यते तेन द्वितीयस्मिन्नर्थे नाभिधा सङ्क्रामति, तत्र द्वितीयोऽर्थोऽसावाक्षिप्त इत्युच्यते; तत्रापि यदि पुनस्तादृ- क्शब्दो विद्यते येनासौ नियामकः प्रकरणादिरपहतशक्तिः सम्पाद्यते । अत एव साभिधाशक्तिर्बाधितापि सती प्रतिप्रसूतेव तत्रापि न ध्वनेर्विषय इति तात्पर्यम् । चशब्दोऽपिशब्दार्थे भिन्नक्रमः आक्षिप्तोऽप्याक्षिप्ततया झटिति सम्भावयितुमारब्धोऽपीत्यर्थः । न त्वसावाक्षिप्तः, किं तु शब्दान्तरेणान्येना- भिधायाः प्रतिप्रसवनादभिहितस्वरूपः सम्पन्नः । पुनर्ग्रहणेन प्रतिप्रसवं व्याख्यातं सूचयति । तेनैवकार आक्षिप्ताभासं निराकरोतीत्यर्थः । हे केशव, गोधूलिहृतया दृष्ट्या न किञ्चिद् दृष्टं मया तेन कारणेन स्खलि- तास्मि मार्गे । तां पतितां सतीं मां किं नाम कः खलु हेतुर्यन्नालम्बसे हस्तेन । सद्भाव का आवेदक प्रमाण है जैसे—तस्या विना०—इत्यादि में, वहाँ सर्वथा ‘चमहिअ०' तक । वह अर्थ अभिधेय ही है, यह बात स्पष्ट है। जहाँ भी एक जगह प्रकरण आदि अभिधा का नियमहेतु है, उसके कारण दूसरे अर्थ में अभिधा सङ्क्रान्त नहीं होती है, वहाँ दूसरा वह अर्थ ‘आक्षिप्त’ कहा जाता है, और वहाँ पर भी यदि फिर उस प्रकार का शब्द है जिससे वह नियामक प्रकरण आदि अपहतशक्ति कर दिया जाता है, अतएव वह अभिधाशक्ति बाधित होकर भी प्रतिप्रसूत की भाँति हो जाती है, वहाँ भी ध्वनि का विषय नहीं है, यह तात्पर्य है। ‘और’ ( ‘च’ ) शब्द ‘भी’ ( ‘अपि’ ) शब्द के अर्थ में भिन्नक्रम है, अर्थात् आक्षिप्त भी, आक्षिप्त रूप भी झटिति सम्भावना किया जाता हुआ भी । ‘फिर’ ( ‘पुनः’ ) ग्रहण से व्याख्यात ‘प्रतिप्रसव’ को सूचित करता है । अर्थात् इससे ‘एवकार’ ( ‘ही’ का प्रयोग ) आक्षिप्ताभास का निराकरण करता है । ‘हे केशव गौओं की ( उड़ाई हुई ) धूल से दृष्टि के अवरुद्ध ( हृत ) हो जाने से मैंने कुछ नहीं देखा, इस कारण मार्ग में गिर पड़ी हूँ । उस पतिता ( गिरी हुई ) मुझे १७ ध्व०