भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

२५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः एकस्त्वं विषमेषु खिन्नमनसां सर्वाबलानां गति- र्गोप्यैवं गदितः सलेशमवताद्गोष्ठे हरिर्वश्चिरम् ॥ एवञ्जातीयकः सर्व एव भवतु कामं वाच्यश्लेषस्य विषयः । यत्र तु क्योंकि ऊँच-खालों (विषम) में खिन्न मन वाले सभी अबलों के एक तुम्हीं गति हो, इस प्रकार गोपी के द्वारा गोष्ठ (गौशाला) में लेश के साथ कहे गए हरि (कृष्ण) आपलोगों की रक्षा करें । इस प्रकार का सभी चाहे जितना वाच्य श्लेष का विषय हो । जहां सामर्थ्य से लोचनम् यतस्त्वमेवैकोऽतिशयेन बलवान्निम्नोन्नतेषु सर्वेषामबलानां बालवृद्धाङ्गनादीनां खिन्नमनसां गन्तुमशक्नुवतां गतिरालम्बनाभ्युपाय इत्येवंविधेऽर्थे यद्यप्येते प्रकरणेन नियन्त्रिताभिधाशक्तयः शब्दास्तथापि द्वितीयेऽर्थे व्याख्यास्यमानेऽ- भिधाशक्तिर्निरुद्धा सती सलेशमित्यनेन प्रत्युज्जीविता । अत्र सलेशं ससूच- नमित्यर्थः, अल्पीभवनं हि सूचनमेव । हे केशव ! गोप स्वामिन् ! रागहृतया दृष्ट्येति । केशवगेन उपरागेण हृतया दृष्ट्येति वा सम्बन्धः । स्खलितास्मि खण्डितचरित्रा जातास्मि । पतितामिति भर्तृभावं मां प्रति । एक इत्यसा- धारणसौभाग्यशाली त्वमेव । यतः सर्वासामबलानां मदनविधुरमनसामीर्ष्या- कालुष्यनिरासेन सेव्यमानः सन् गतिः जीवितरक्षोपाय इत्यर्थः । एवं श्लेषा- लङ्कारस्य विषयमवस्थाप्य ध्वनेराह—यत्र त्विति । कुसुमसमयात्मकं यद्युगं क्यों नहीं, अर्थात् क्या कारण है कि हाथ से अवलम्बन नहीं करते हो ? क्यों कि तुम्हीं एक अतिशय करके बलवान् हो, निम्नोन्नत (ऊंच-खाल) स्थानों में सभी बाल, वृद्ध, अङ्गना आदि सभी खिन्न मन वाले अर्थात् गमन करने में असमर्थ अबलों की गति अर्थात् आलम्बन के उपाय हो ।' इस प्रकार के अर्थ में यद्यपि ये शब्द प्रकरण के द्वारा नियन्त्रित अभिधाशक्ति वाले हैं, तथापि व्याख्यान किए जाने वाले दूसरे अर्थ में अभिधाशक्ति निरुद्ध होकर 'सलेश' इसके द्वारा पुनः उज्जीवित कर दी गई । यहाँ सलेश अर्थात् सूचन, क्यों कि अल्प होना सूचन ही है। 'हे केशव, गोप, स्वामिन्, राग के कारण हरी हुई दृष्टि से'—। अथवा सम्बन्ध यह कि केशव में गए उपराग के कारण हरी हुई (हृत) दृष्टि से । स्खलित हो गई हूँ (गिर पड़ी हूँ) अर्थात् मेरा चरित्र खण्डित हो चुका है । पतिता अर्थात् मेरे प्रति भर्तृभाव । एक अर्थात् असाधारण सौभाग्यशाली तुम्हीं हो । क्यों कि सभी मदन से विधुर मन वाली अबलाओं के ईर्ष्या- कालुष्य का निरास-पूर्वक सेवा किए गए होते हुए (तुम) गति अर्थात् जीवितरक्षा का उपाय हो । इस प्रकार श्लेष अलङ्कार का विषय अवस्थापन करके ध्वनि का विषय कहते हैं—जहां—। पुष्पसमय रूप जो युग अर्थात् (वसन्त के) दो महीने उनका