ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २५९ ध्वन्यालोकः सामर्थ्याक्षिप्तं सदलङ्कारान्तरं शब्दशक्त्या प्रकाशते स सर्व एव ध्वनेर्विषयः । यथा— ‘अत्रान्तरे कुसुमसमययुगमुपसंहरन्नजृम्भत ग्रीष्माभिधानः फुल्ल- मल्लिकाधवलाट्टहासो महाकालः' । यथा च— उन्नतः प्रोल्लसद्धारः कालागुरुमलीमसः । पयोधरभरस्तन्व्याः कं न चक्रेऽभिलाषिणम् ॥ आक्षिप्त होता हुआ अलङ्कारान्तर शब्दशक्ति से प्रकाशित होता है, वह सभी 'ध्वनि' का विषय है । जैसे— 'इस बीच, दो पुष्पसमयों (वसन्त के महीनों) को उपसंहार करता हुआ विकसित मल्लिकाओं के, अट्टालिकाओं को धवलित करने वाले हास से युक्त ग्रीष्म नाम का महाकाल जम्भाई लिया।' और जैसे— उन्नत, प्रोल्लसित होते हुए हार से (व्यङ्ग्य मेघ के पक्ष में प्रोल्लसित होती हुई धारा—जलधारा से) युक्त और कालागुरु की भांति मलिन, तन्वी के पयोधर भार (स्तनभार, व्यङ्ग्य मेघ अर्थ में मेघभार) ने किसको अभिलाषी (सकाम) नहीं बनाया ? लोचनम् मासद्वयं तदुपसंहरन् । धवलानि हृद्यान्यट्टान्यापणा येन तादृक् फुल्लमल्लि- कानां हासो विकासः सितिमा यत्र । फुल्लमल्लिका एव धवलाट्टहासोऽस्येति तु व्याख्याने 'जलदभुजगञ्जम्' इत्येतत्तुल्यमेतत्स्यात् । महांश्चासौ दिनदैर्ध्यदुर- तिवाहतायोगात्कालः समयः । अत्र ऋतुवर्णनप्रस्तावनियन्त्रिताभिधाशक्तयः, अत एव 'अवयवप्रसिद्धेः समुदायप्रसिद्धिर्बलीयसी' इति न्यायमपाकुर्वन्तो महा- उपसंहार करता हुआ। धवल अर्थात् हृद्य अट्ट अर्थात् आपण (अट्टालिकाएं) हैं जिससे, उस प्रकार का विकसित मल्लिकाओं (जूही के फूलों) का हास अर्थात् विकास (सितिमा) है जहाँ। 'विकसित मल्लिका ही हैं इसका धवल अट्टहास' यह व्याख्यान करने पर 'जलदभुजगञ्ज०' के सदृश यह हो जायगा। दिनों के बड़े होने और दुरतिवाह होने के कारण महान् काल अर्थात् समय। यहाँ ऋतुवर्णन के प्रस्ताव के कारण अभिधाशक्ति के नियन्त्रित हो जाने से, इसी लिए 'अवयव-प्रसिद्धि से समुदाय-प्रसिद्धि बलवान् होती है' इस न्याय को निराकरण करते हुए 'महाकाल' प्रभृति शब्द इसी