ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् कालप्रभृतयः शब्दा एतमेवार्थमभिधाय कृतकृत्या एव । तदनन्तरमर्थावगति- र्ध्वननव्यापारादेव शब्दशक्तिमूलात् । अत्र केचिन्मन्यन्ते—'यत एतेषां शब्दानां पूर्वमर्थान्तरेऽभिधान्तरं दृष्टं ततस्तथाविधेऽर्थान्तरे दृष्टतदभिधाशक्तेरेव प्रतिपत्तुर्नियन्त्रिताभिधाशक्तिकेभ्य एतेभ्यः प्रतिपत्तिर्ध्वननव्यापारादेवेति शब्दशक्तिमूलत्वं व्यङ्ग्यत्वं चेत्यविरुद्धम्' इति । अन्ये तु—'साभिधैव द्वितीया अर्थसामर्थ्यं ग्रीष्मस्य भीषणदेवताविशेष- सादृश्यात्मकं सहकारित्वेन यतोऽवलम्बते ततो ध्वननव्यापाररूपोच्यते' इति । एके तु—'शब्दश्लेषे तावद्भेदे सति शब्दस्य, अर्थश्लेषेऽपि शक्तिभेदाच्छ- ब्दभेद इति दर्शने द्वितीयः शब्दस्तत्रानीयते । स च कदाचिदभिधाव्यापा- रात् यथोभयोत्तरदानाय 'श्वेतो धावति' इति; प्रश्नोत्तरादौ वा तत्र वाच्या- लङ्कारता । यत्र तु ध्वननव्यापारादेव शब्द आनीतः, तत्र शब्दान्तरबलादपि तदर्थान्तरं प्रतिपन्नं प्रतीयमानमूलत्वात्प्रतीयमानमेव युक्तम्' इति । इतरे तु-'द्वितीयपक्षव्याख्याने यदर्थसामर्थ्यं तेन द्वितीयाभिधैव प्रतिप्रसू- अर्थ का अभिधान करके कृतकृत्य ही हो जाते हैं । तत्पश्चात् अर्थ का ज्ञान शब्दशक्तिमूल ध्वननव्यापार से ही होता है । यहाँ कुछ लोग मानते हैं—'जिस कारण इन शब्दों का पहले अर्थ में अभिधा देखी गई है, उस कारण उस प्रकार के अर्थान्तर में, उसी प्रतिपत्ता को, जिसने उनकी अभिधाशक्ति का दर्शन किया है, नियन्त्रित अभिधाशक्ति वाले इन (शब्दों) से ध्वनन व्यापार द्वारा ही ज्ञान होता है, इस प्रकार शब्दशक्तिमूलत्व और व्यङ्ग्यत्व दोनों ठीक हैं' । दूसरे तो (मानते हैं)—'वह दूसरी अभिधा ही सहकारी रूप से ग्रीष्म के भीषण देवता विशेष रूपसादृश्यात्मक अर्थ सामर्थ्य को जिस कारण अवलम्बन करती है, उस कारण ध्वनन रूप कही जाती है' । कुछेक लोग तो (मानते हैं)—'शब्दश्लेष में शब्द के भेद होने पर और अर्थश्लेष में भी 'शक्तिभेद से शब्द का भेद होता है' इस दर्शन (सिद्धान्त) के अनुसार दूसरा शब्द वहाँ लाया जाता है । वह (दूसरा शब्द) कभी अभिधा व्यापार से (लाया जाता है), जैसे—दोनों के उत्तर देने के लिये 'श्वेतो धावति' (कौन इधर दौड़ता है, और कैसा गुण वाला इधर दौड़ता है ? इन दोनों प्रश्नों के उत्तर देने के लिए एक ही वाक्य का प्रयोग किया 'श्वेतो धावति' अर्थात् श्वा-कुत्ता-इधर दौड़ता है और उजला दौड़ता है)। अथवा प्रश्न और उत्तर आदि में (श्लेष) वाच्यालङ्कार हो जाता है । परन्तु, जहाँ ध्वनन व्यापार से ही शब्द लाया गया है, वहाँ शब्दान्तर के बल से भी प्रतिपन्न वह अर्थान्तर प्रतीयमानमूल होने के कारण प्रतीयमान ही ठीक है।' इतर लोग तो (मानते हैं)—'दूसरे पक्ष के व्याख्यान में जो अर्थसामर्थ्य है