ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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द्वितीय उद्योतः २६१ लोचनम् यते, ततश्च द्वितीयोऽर्थोऽभिधीयत एव न ध्वन्यते, तदनन्तरं तु तस्य द्विती- यार्थस्य प्रतिपन्नस्य प्रथमार्थेन प्राकरणिकेन साकं या रूपणा सा तावद्भात्येव, न चान्यतः शब्दादिति सा ध्वननव्यापारात् । तत्राभिधाशक्तेः कस्याश्चिदप्य- नाशङ्कनीयत्वात् । तस्यां च द्वितीया शब्दशक्तिर्मूलम् । तया विना रूपणाया अनुत्थानात् । अत एवालङ्कारध्वनिरयमिति युक्तम् । वक्ष्यते च 'असम्बद्धार्था- भिधायित्वं मा प्रसाङ्क्षीत्' इत्यादि । पूर्वत्र तु सलेशपदेनैवासम्बद्धता निरा- कृता । 'येन ध्वस्त' इत्यत्रासम्बद्धता नैव भाति । 'तस्या विनापि' इत्यत्रा- पिशब्देन 'श्लाघ्या' इत्यत्राधिकशब्देन 'भ्रमिम्' इत्यादौ च रूपकेणासम्बद्धता उससे दूसरी अभिधा ही प्रतिप्रसूत होती है, और तब दूसरा अर्थ अभिहित ही होता है, ध्वनित नहीं होता है । तत्पश्चात् प्रतिपन्न उस दूसरे अर्थ का पहले प्राकरणिक अर्थ के साथ जो रूपणा है वह प्रतीत होती ही है, वह अन्य शब्द से नहीं है, अतः वह ध्वनन व्यापार से ( प्रतिपन्न ) होती है । क्योंकि उसमें किसी भी अभिधाशक्ति की आशङ्का नहीं की जा सकती । उस ( रूपणा ) में दूसरी शब्दशक्ति मूल है, क्योंकि उसके बिना रूपणा का उत्थान नहीं होगा । इस लिए यह अलङ्कारध्वनि है यह ठीक है । और कहेंगे 'असम्बद्ध अर्थ का अभिधान करने वाला होना प्रसक्त न हो' इत्यादि । पहले में तो 'सलेश' इस पद से ही ( वाक्य की ) असम्बद्धार्थता का निराकरण कर दिया है । 'येन ध्वस्त०' इस ( पद्य ) में असम्बद्धार्थता प्रतीत नहीं होती । 'तस्या विनापि०' इसमें 'अपि' शब्द से, 'श्लाघ्याशेष०' इसमें 'अधिक' शब्द से और—'भ्रमिम्०' इत्यादि में रूपक से असम्बद्धता का निराकरण कर दिया है, यह तात्पर्य है । 'पयोभिः' १. जहां एक शब्द से दो अर्थों का ज्ञान होता है वहां मुख्यतः 'श्लेष' अलङ्कार का प्रसंग होता है, किन्तु जब ध्वननव्यापार आदि सामर्थ्य से आक्षिप्त होकर अलङ्कारान्तर शब्द-शक्ति से प्रकाशित होता है वह सभी शब्दशक्तिमूल ध्वनि का विषय होता है । इसके उदाहरण में आचार्य ने 'अत्रान्तरे ०', 'प्रोत्फुल्ल०' और 'दत्तानन्दाः०' ये तीन उद्धरण दिए हैं । लोचनकार लिखते हैं कि प्रथम उदाहरण में यद्यपि दूसरा शिवरूप अर्थ रूढ है और ग्रीष्म के पक्ष का अर्थ यौगिक है, क्योंकि 'महान् चासौ कालः ( समयः )' के अनुसार अर्थ किया गया है । और नियम यह है कि योग से रूढि बलीयसी होती है ( योगाद् रूढिर्बलीयसी = अवयवशक्तेः समुदायशक्ति- र्बलीयसी ), ऐसी स्थिति में मुख्यता दूसरे अर्थ को मिलनी चाहिए । किन्तु यहां ऋतुवर्णन का प्रसंग होने से अभिधाशक्ति का ग्रीष्म के पक्ष में ही नियमन हो जाता है और 'महाकाल' आदि शब्द इसी अर्थका अभिधान करके कृतकार्य हो जाते हैं । तत्पश्चात् दूसरे का ज्ञान ध्वनन व्यापार से ही होता है । इस प्रसंग में लोचनकार ने जिन चार मतों की चर्चा की है उनका स्पष्टीकरण यह है— प्रथम मत वालों का कहना है कि पहले ज्ञाता को अभिधाशक्ति से द्वितीय अर्थ का ग्रहण हुआ रहता है तभी वह प्रकरण के कारण अभिधाशक्ति के नियंत्रित हो जाने पर ध्वनन व्यापार से उस अर्थ का वह ज्ञान करता है । यदि पहले से उस द्वितीय अप्रस्तुत अर्थ में अभिधाशक्ति से वह अर्थ ज्ञाता को विदित नहीं हुआ होता तो उसे प्रस्तुत में द्वितीय अर्थ का भान ही नहीं हो सकता, इसी-