ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 322, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें२६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा वा— दत्तानन्दाः प्रजानां समुचितसमयाकृष्टसृष्टैः पयोभिः पूर्वाह्णे विप्रकीर्णा दिशि दिशि विरमत्यह्नि संहारभाजः । दीप्तांशोर्दीर्घदुःखप्रभवभवभयोदन्वदुत्तारनावो गावो वः पावनानां परमपरिमितं प्रीतिमुत्पादयन्तु ॥ अथवा, जैसे— समुचित समय ( सूर्यकिरणों के पक्ष में ग्रीष्म काल और गौओं के पक्ष में दोहन से पूर्वकाल ) में आकृष्ट ( समुद्र से खींचे हुए, दूसरे पक्ष में अयन में चढ़ाए हुए ) और अर्पित जल ( पक्षान्तर में दूध ) के द्वारा प्रजाओं को आनन्द देने वाली, दिन के आरम्भ में फैली हुई ( पक्षान्तर में चरने के लिए चारों ओर फैली हुई ) और दिन के विराम लेने के समय ( अर्थात् सन्ध्याकाल में ) एकत्र हो जाने वाली ( सूर्य की किरणें सन्ध्या काल में सिमट जाती हैं और गायें बाहर से चर कर एक जगह आ जाती हैं ), प्रबल दुःख के कारणभूत संसार के भय रूप समुद्र के पार उतारने में नौका रूप, पवित्र पदार्थों से श्रेष्ठ, सूर्य की किरणें ( गौओं के समान ) आप लोगों के अपरिमित आनन्द उत्पन्न करें। लोचनम् निराकृतेति तात्पर्यम् । पयोभिरिति पानीयैः क्षीरैश्च । संहारो ध्वंसः, एकत्र ढौकनं च । गावो रश्मयः सुरभयश्च । अर्थात् पानी, और क्षीर । संहार अर्थात् ध्वंस, एक जगह जुट जाना । गौ अर्थात् ( सूर्य की ) किरणें और सुरभि ( गाय ) । लिए वह शब्दशक्तिमूल या अभिधासहकृत ध्वनि कहा जाता है। शब्दशक्ति या अभिधा उसके मूल में रहती है और व्यञ्जना व्यापार से वह ध्वन्यर्थ विदित होता है अतः उसे 'शब्दशक्तिमूल ध्वनि' कहते हैं। दूसरे मत वाले लोग कहते हैं कि ग्रीष्म का भीषण देवता विशेष के साथ सादृश्य रूप अर्थ- सामर्थ्य के सहकारी होने के कारण दूसरी अभिधा शक्ति को ही ध्वनन व्यापार रूप कहते हैं। दूसरे मत वालों का कहना है कि जब भी किसी शब्द के अर्थ की प्रतीति होती है, वह अभिधा शक्ति से ही होती है। जैसे शब्दश्लेष या सभङ्गश्लेष में ( 'सर्वदोमाधवः' ) दोनों अर्थों के लिए दो प्रकार के शब्द हैं, उसी प्रकार अर्थश्लेष या अभङ्गश्लेष में भी 'शक्तिभेदात् शब्दभेदः' के अनुसार द्वितीय शब्द वहां लाया जाता है तब उसका द्वितीय अर्थ अभिधाशक्ति से बोध करते हैं। 'श्वेतो धावति' जैसे प्रश्नोत्तर के प्रसंग में भी द्वितीय शब्द की अभिधाव्यापार से उपस्थिति होती है। किन्तु जहां प्रकरण के कारण ध्वनन व्यापार से द्वितीय शब्द की उपस्थिति होती है और तब अभिधा से अर्थ का बोध होता है वहां यद्यपि शब्दान्तर के बल से उसका अर्थान्तर ज्ञात होता है, तथापि उस अर्थान्तर को प्रतीयमानमूल होने के कारण प्रतीयमान ही कहते हैं। इस प्रकार जहाँ