भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 680 में से

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पृष्ठ 323

द्वितीय उद्योतः २६३ ध्वन्यालोकः एषूदाहरणेषु शब्दशक्त्या प्रकाशमाने सत्यप्राकरणिकेऽर्थान्तरे वाक्यस्यासम्बद्धार्थाभिधायित्वं मा प्रसाङ्क्षीदित्यप्राकरणिकप्राकरणि- कार्थयोरुपमानोपमेयभावः कल्पयितव्यः सामर्थ्यादित्यर्थाक्षिप्तोऽयं श्लेषो न शब्दोपारूढ इति विभिन्न एव श्लेषादनुस्वानोपमव्यङ्ग्यस्य इन उदाहरणों में अप्राकरणिक अर्थान्तर के शब्दशक्ति द्वारा प्रकाशित होने पर यह बात न प्रसक्त हो कि 'वाक्य असम्बद्ध अर्थ का अभिधान करने वाला है' इसलिए अप्राकरणिक और प्राकरणिक अर्थ के उपमानोपमेय भाव की कल्पना करनी चाहिए । 'सामर्थ्य के कारण इस प्रकार यह श्लेष आक्षिप्त रूप में उपस्थित होता है, न कि शब्दनिष्ठ होता है, इसलिए श्लेष से अनुस्वानोपमव्यङ्ग्य ध्वनि का विषय अलग ही लोचनम् असम्बद्धार्थाभिधायित्वमिति । असंवेद्यमानमेवेत्यर्थः । उपमानोपमेयभाव इति । तेनोपमारूपेण व्यतिरेचननिह्नवादयो व्यापारमात्ररूपा एवात्रास्वाद- प्रतीतेः प्रधानं विश्रान्तिस्थानं, न तूपमेयादीति सर्वत्रालङ्कारध्वनौ मन्तव्यम् । सामर्थ्यादिति । ध्वननव्यापारादित्यर्थः । असम्बद्ध अर्थ का अभिधान करने वाला होना—। अर्थात् जो संवेद्यमान ही नहीं । उपमानोपमेयभाव¹—। उस उपमा रूप से व्यापारमात्र रूप ही व्यतिरेचन, निह्नव आदि आस्वादप्रतीति के प्रधान विश्रान्तिस्थान हैं, न कि उपमेय आदि । यह सब अलङ्कारध्वनि में मानना चाहिए । सामर्थ्यवश—। अर्थात् ध्वननव्यापार से । अभिधाव्यापार से द्वितीयशब्द की उपस्थिति होती है वह श्लेष आदि का विषय है, और जहां ध्वनन व्यापार से होती है वहां शब्दशक्तिमूल ध्वनि है । तीसरे मतवाले कहते हैं कि द्वितीय अर्थ का बोध सादृश्यादि अर्थसामर्थ्य के कारण (प्रतिप्रसूत ) पुनः उत्पन्न द्वितीय अभिधाशक्ति से ही होता है, अतः वह अभिहित ही होता हैं, न कि ध्वनित । तब दोनों प्राकरणिक और अप्राकरणिक अर्थों का परस्पर अभेद या उपमानोपमेय भाव प्रतीत होता है वह ध्वनन व्यापार का विषय है । वहां किसी अभिधाशक्ति की प्रवृत्ति सम्भव नहीं । दूसरी शब्दशक्ति के उस उपमानोपमेयभाव या रूपणा ( परस्पर अभेद ) में मूल होने के कारण वह शब्दशक्तिमूल ध्वनि का विषय है । आलङ्कारिकों ने सर्वथा शब्दशक्तिमूल ध्वनि को स्वीकार किया है । द्वितीय अप्राकरणिक अर्थ में व्यञ्जना व्यापार की ही प्रवृत्ति उन्हें मान्य है । जहां तक उपमेयोपमान भाव आदि के व्यङ्ग्य होने की बात है और उसके आधार पर 'शब्दशक्तिमूल ध्वनि' की कल्पना है, वह तो निःसन्देह ठीक है, किन्तु द्वितीय अप्राकरणिक अर्थ को लेकर उसे अभिधाशक्ति का विषय न मानकर व्यञ्जना का विषय मानना और शब्दशक्तिमूल ध्वनि की कल्पना करना विवादास्पद है । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृताध्यापक श्री कान्तानाथशास्त्री तैलङ्ग ने 'नागरीप्रचारिणी पत्रिका' में शब्द शक्तिमूल ध्वनि का जोरदार खण्डन किया है । १. उपमानोपमेयभाव' उपलक्षण है, अतः रूपणा आदि भी इस प्रकार व्यञ्जित होते हैं । 'उपमा' को कल्पनीय न कह कर यहां 'उपमानोपमेय भाव' आदि को कल्पनीय कहने का अभिप्राय