ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
द्वितीय उद्योतः २६३ ध्वन्यालोकः एषूदाहरणेषु शब्दशक्त्या प्रकाशमाने सत्यप्राकरणिकेऽर्थान्तरे वाक्यस्यासम्बद्धार्थाभिधायित्वं मा प्रसाङ्क्षीदित्यप्राकरणिकप्राकरणि- कार्थयोरुपमानोपमेयभावः कल्पयितव्यः सामर्थ्यादित्यर्थाक्षिप्तोऽयं श्लेषो न शब्दोपारूढ इति विभिन्न एव श्लेषादनुस्वानोपमव्यङ्ग्यस्य इन उदाहरणों में अप्राकरणिक अर्थान्तर के शब्दशक्ति द्वारा प्रकाशित होने पर यह बात न प्रसक्त हो कि 'वाक्य असम्बद्ध अर्थ का अभिधान करने वाला है' इसलिए अप्राकरणिक और प्राकरणिक अर्थ के उपमानोपमेय भाव की कल्पना करनी चाहिए । 'सामर्थ्य के कारण इस प्रकार यह श्लेष आक्षिप्त रूप में उपस्थित होता है, न कि शब्दनिष्ठ होता है, इसलिए श्लेष से अनुस्वानोपमव्यङ्ग्य ध्वनि का विषय अलग ही लोचनम् असम्बद्धार्थाभिधायित्वमिति । असंवेद्यमानमेवेत्यर्थः । उपमानोपमेयभाव इति । तेनोपमारूपेण व्यतिरेचननिह्नवादयो व्यापारमात्ररूपा एवात्रास्वाद- प्रतीतेः प्रधानं विश्रान्तिस्थानं, न तूपमेयादीति सर्वत्रालङ्कारध्वनौ मन्तव्यम् । सामर्थ्यादिति । ध्वननव्यापारादित्यर्थः । असम्बद्ध अर्थ का अभिधान करने वाला होना—। अर्थात् जो संवेद्यमान ही नहीं । उपमानोपमेयभाव¹—। उस उपमा रूप से व्यापारमात्र रूप ही व्यतिरेचन, निह्नव आदि आस्वादप्रतीति के प्रधान विश्रान्तिस्थान हैं, न कि उपमेय आदि । यह सब अलङ्कारध्वनि में मानना चाहिए । सामर्थ्यवश—। अर्थात् ध्वननव्यापार से । अभिधाव्यापार से द्वितीयशब्द की उपस्थिति होती है वह श्लेष आदि का विषय है, और जहां ध्वनन व्यापार से होती है वहां शब्दशक्तिमूल ध्वनि है । तीसरे मतवाले कहते हैं कि द्वितीय अर्थ का बोध सादृश्यादि अर्थसामर्थ्य के कारण (प्रतिप्रसूत ) पुनः उत्पन्न द्वितीय अभिधाशक्ति से ही होता है, अतः वह अभिहित ही होता हैं, न कि ध्वनित । तब दोनों प्राकरणिक और अप्राकरणिक अर्थों का परस्पर अभेद या उपमानोपमेय भाव प्रतीत होता है वह ध्वनन व्यापार का विषय है । वहां किसी अभिधाशक्ति की प्रवृत्ति सम्भव नहीं । दूसरी शब्दशक्ति के उस उपमानोपमेयभाव या रूपणा ( परस्पर अभेद ) में मूल होने के कारण वह शब्दशक्तिमूल ध्वनि का विषय है । आलङ्कारिकों ने सर्वथा शब्दशक्तिमूल ध्वनि को स्वीकार किया है । द्वितीय अप्राकरणिक अर्थ में व्यञ्जना व्यापार की ही प्रवृत्ति उन्हें मान्य है । जहां तक उपमेयोपमान भाव आदि के व्यङ्ग्य होने की बात है और उसके आधार पर 'शब्दशक्तिमूल ध्वनि' की कल्पना है, वह तो निःसन्देह ठीक है, किन्तु द्वितीय अप्राकरणिक अर्थ को लेकर उसे अभिधाशक्ति का विषय न मानकर व्यञ्जना का विषय मानना और शब्दशक्तिमूल ध्वनि की कल्पना करना विवादास्पद है । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृताध्यापक श्री कान्तानाथशास्त्री तैलङ्ग ने 'नागरीप्रचारिणी पत्रिका' में शब्द शक्तिमूल ध्वनि का जोरदार खण्डन किया है । १. उपमानोपमेयभाव' उपलक्षण है, अतः रूपणा आदि भी इस प्रकार व्यञ्जित होते हैं । 'उपमा' को कल्पनीय न कह कर यहां 'उपमानोपमेय भाव' आदि को कल्पनीय कहने का अभिप्राय
२६४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
ध्वनेर्विषयः । अन्येऽपि चालङ्काराः शब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपव्यङ्ग्ये
ध्वनौ सम्भवन्त्येव । तथा हि विरोधोऽपि शब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपो
दृश्यते । यथा स्थाण्वीश्वराख्यजनपदवर्णने भट्टबाणस्य—
'यत्र च मातङ्गगामिन्यः शीलवत्यश्च गौर्यो विभववताश्च श्यामाः
पद्मरागिण्यश्च धवलद्विजशुचिवदना मदिरामोदिश्वसनाश्च प्रमदाः' ।
है । और भी अन्य अलङ्कार शब्दशक्तिमूल-अनुस्वानरूप-व्यङ्ग्य ध्वनि में हो सकते
ही हैं । जैसा कि विरोध भी शब्दशक्तिमूल-अनुस्वानरूप देखा जाता है । जैसे, 'स्था-
ण्वीश्वर' नाम के जनपद के वर्णन में भट्टबाण का—
'जहां गज की चाल चलने वाली और शीलवती ( 'मातङ्ग' अर्थात् चाण्डाल,
मातङ्गगामिनी अर्थात् चाण्डाल का गमन करने वाली और शीलवती यह विरोध है,
'गजगामिनी' इस अर्थ से उस विरोध का परिहार हो जाता है ), गौरवर्ण और विभव
में रत अर्थात् ऐश्वर्यसम्पन्न ( विरोध यह कि जो गौरी अर्थात् पार्वती है वह विभव
अर्थात् शिव-भिन्न में रत अर्थात् अनुरागयुक्त कैसे होगी ), श्यामा (जवान ) और
पद्मराग वाली ( श्याम वर्ण और कमल के समान राग वाली यह विरोध है ), निर्मल
द्विजों अर्थात् दांतों से युक्त पवित्र मुख वाली ( विरोध में निर्मल द्विजों अर्थात् ब्राह्मणों
के समान पवित्र मुख वाली ) और मदिरा की गन्ध से युक्त श्वास वाली ( विरोध
यह कि जो निर्मल ब्राह्मण के समान पवित्र मुख वाली है वह मदिरा की गन्ध से युक्त
श्वास वाली कैसे है ? ) स्त्रियां हैं ।
लोचनम्
मातङ्गेति । मातङ्गवद्गच्छन्ति तान् शबरांश्च गच्छन्तीति विरोधः । विभवेषु
रताः विगतमहादेवे स्थाने च रताः । पद्मरागरत्नयुक्ताः पद्मसदृशलौहित्ययु-
क्ताश्च । धवलैर्द्विजैर्दन्तैः शुचि निर्मलं वदनं यासां धवलद्विजवदुत्कृष्टविप्र-
मातङ्ग— । मातङ्ग के समान गमन करती हैं और उन शबरों अर्थात् चाण्डालों
का गमन करती हैं यह विरोध है । विभवों में रत और विगतमहादेव स्थान में रत ।
पद्मरागरत्न से युक्त और पद्म के सदृश लौहित्य से युक्त । धवल द्विज अर्थात् दांतों से
शुचि अर्थात् निर्मल मुख है जिनका और धवल द्विज के समान अर्थात् उत्कृष्ट विप्र के
यह हैं कि दोनों अर्थों को वहां व्यापार रूप उपमेयभाव ही आस्वादप्रतीति के प्रधान विश्रा- न्तिस्थान हैं, न कि उपमेय आदि हैं जैसा कि 'उपमा' में उपमेय आस्वाद प्रतीति का विश्रान्ति स्थान होता है । उपमा के रूप में व्यतिरेचन ( जो 'व्यतिरेक' अलङ्कार में व्यापार है ) और निह्नव ( जो 'अपह्नुति अलङ्कार में व्यापार है ) आदि भी आस्वादप्रतीति के चरम विश्रान्ति स्थान हैं । अलङ्कारध्वनि में सर्वत्र यही प्रकार है ।
द्वितीय उद्योतः २६५ ध्वन्यालोकः अत्र हि वाच्यो विरोधस्तच्छायानुग्राही वा श्लेषोऽयमिति न शक्यं वक्तुम् । साक्षाच्छब्देन विरोधादलङ्कारस्याप्रकाशितत्वात् । यत्र हि साक्षाच्छब्दावेदितो विरोधादलङ्कारस्तत्र हि श्लिष्टोक्तौ वाच्यालङ्कारस्य विरोधस्य श्लेषस्य वा विषयत्वम् । यथा तत्रैव— 'समवाय इव विरोधिनां पदार्थानाम् । तथाहि—सन्निहितबाला- न्धकारापि भास्वन्मूर्तिः' इत्यादौ । यहाँ विरोध वाच्य है और अथवा यह श्लेष उसकी छाया का अनुग्राहक है, यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि साक्षात् शब्द द्वारा विरोध-अलङ्कार प्रकाशित नहीं है। जहां विरोध-अलङ्कार साक्षात् शब्द से आवेदित होता है, वहां श्लिष्ट उक्ति में वाच्यालङ्कार विरोध अथवा श्लेष का विषय होता है। जैसे, वहीं पर— 'विरोधी पदार्थों के समवाय की भांति, जैसे कि सन्निहित है बाल रूप अन्धकार जिसके ऐसी सूर्य की मूर्ति (यह विरोध हुआ) अन्धकार रूप काले बालों से युक्त भी चमकती हुई मूर्तिवाले थे।' लोचनम् वच्छुचि वदनं च यासाम् । यत्र हीति । यस्यां श्लेषोक्तौ काव्यरूपायां, तत्र यो विरोधः श्लेषो वेति सङ्करः तस्य विषयत्वम् । स विषयो भवतीत्यर्थः । कस्य ? वाच्यालङ्कारस्य वाच्यालङ्कृतेः वाच्यालङ्कृतित्वस्येत्यर्थः । तत्रैव विरोधे श्लेषे वा वाच्यालङ्कारत्वं सुवचमिति यावत् । बालेषु केशेष्वन्धकारः कार्ण्यं, बालः प्रत्यग्रश्चान्धकारस्तमः । ननु मातङ्गेत्यादावपि धर्मद्वये यश्चकारः स विरोधद्योतक एव । अन्यथा प्रतिधर्मं सर्वधर्मान्ते वा न कश्चिद्वा चकारः स्यात् यदि समुच्चयार्थः स्यादित्य- भिपायेणोदाहरणान्तरमाह—यथेति । शरणं गृहमक्षयरूपमगृहं कथम् । यो न समान शुचि मुख है जिनका । जिस काव्यरूप श्लेषोक्ति में, वहाँ विरोध अथवा श्लेष का सङ्कर है उसका विषय है, अर्थात् वह विषय होता है। किसका ? वाच्यालङ्कार का अर्थात् वाच्यालङ्कृति का, वाच्यालङ्कृतित्व का । वहीं विरोध में अथवा श्लेष में वाच्यालङ्कारत्व सुतरां कहा जा सकता है। बालों अर्थात् केशों के कारण अन्धकार अर्थात् कृष्णमा और प्रत्यग्र अन्धकार अर्थात् तमस् । मातङ्ग०—। इत्यादि स्थल में भी जो दो धर्मों में 'और' (चकार) है वह विरोध का द्योतक ही है, यदि ऐसा नहीं तो प्रति धर्म में अथवा सभी धर्मों के अन्त में अथवा कहीं भी 'और' (चकार) नहीं होता, यदि समुच्चय के अर्थ में होता, इस अभिप्राय से दूसरा उदाहरण कहते हैं—जैसे—। शरण अर्थात् गृह अक्षय रूप अगृह कैसे ? जो धीश (बुद्धियों का स्वामी) नहीं, वह बुद्धियों का स्वामी (धियामीश) कैसे ? जो हरि
२६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा वा ममैव— सर्वैकशरणमक्षयमधीशमीशं धियां हरिं कृष्णम् । चतुरात्मानं निष्क्रियमरिमथनं नमत चक्रधरम् ॥ अत्र हि शब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपो विरोधः स्फुटमेव प्रतीयते । एवंविधो व्यतिरेकोऽपि दृश्यते । यथा ममैव— खं येऽत्युज्ज्वलयन्ति लूनतमसो ये वा नखोद्भासिनो ये पुष्णन्ति सरोरुहश्रीमपि क्षिप्ताब्जभासश्च ये । ये मूर्धस्ववभासिनः क्षितिभृतां ये चामराणां शिरां- अथवा जैसे, मेरा ही— सब का एक मात्र शरण, अविनाशी ( 'शरण' और 'क्षय' दोनों गृहवाची हैं, अतः विरोध यह है कि जो सबका एक मात्र शरण अर्थात् गृह है वह क्षय अर्थात् गृह से रहित कैसे है ? ), अधीश, बुद्धियों के ईश ( विरोध यह है कि जो बुद्धियों के ईश अर्थात् धीश है वह अधीश अर्थात् बुद्धियों के ईश अर्थात् स्वामी नहीं कैसे हैं ? ) हरि ( विष्णु ) कृष्ण ( विरोध यह है जो हरि अर्थात् हरित वर्ण के हैं वह कृष्ण वर्ण के कैसे हैं ? ) सर्वज्ञस्वरूप, निष्क्रिय ( चतुरात्मा अर्थात् पराक्रमयुक्त हैं और निष्क्रिय कैसे हैं ? यह विरोध है ) और अरियों के मथन करने वाले, चक्रधारी ( विरोध यह जो अर वालों अर्थात् चक्रवालों का मथन करने वाले हैं वह चक्रधारी कैसे हैं ? ) हैं । यहां शब्दशक्तिमूल अनुस्वान रूप विरोध स्पष्ट ही प्रतीत होता है । इस प्रकार का 'व्यतिरेक' ( अलङ्कार ) भी देखा जाता है । जैसे मेरा ही— ( सूर्य के ) जो अन्धकार का नाश करने वाले ( किरणरूप ) पाद आकाश को उज्ज्वल करते हैं और जो ( चरणरूप ) पादनखों से शोभित ( व्यतिरेक यह कि आकाश को उद्भासित या उज्ज्वल नहीं करते हैं ), जो ( किरणरूप पाद ) कमलों की शोभा बढ़ाते हैं और जो ( चरणरूप पाद ) कमलों की शोभा को तिरस्कृत करते हैं, जो ( किरणरूप पाद ) क्षितिभृत् अर्थात् ( पर्वतों के शिखरों पर आक्रमण लोचनम् धीशः स कथं धियामीशः । यो हरिः कपिलः स कथं कृष्णः । चतुरः पराक्रम- युक्तो यस्यात्मा स कथं निष्क्रियः । अरीणामरयुक्तानां यो नाशयिता स कथं चक्रं बहुमानेन धारयति । विरोध इति । विरोधनमित्यर्थः । प्रतीयत इति । अर्थात् कपिल है वह कृष्ण कैसे ? चतुर अर्थात् पराक्रमयुक्त जिसकी आत्मा है वह निष्क्रिय कैसे है ? अरियों अर्थात् अर ( चक्र )—युक्तों का जो नाश करने वाला है वह कैसे चक्र को बहुमानपूर्वक धारण करता है ? विरोध अर्थात् विरोधन । प्रतीत होता है—। भाव यह कि कोई स्पष्ट नहीं कहता है । नखों से उद्भासित हैं, जो ख अर्थात्
द्वितीय उद्योतः २६७ ध्वन्यालोकः स्याक्रामन्त्युभयेऽपि ते दिनपतेः पादाः श्रिये सन्तु वः ॥ एवमन्येऽपि शब्दशक्तिमूलानुरवानरूपव्यङ्ग्यध्वनिप्रकाराः सन्ति ते सहृदयैः स्वयमनुसर्तव्याः । इह तु ग्रन्थविस्तरभयान्न तत्प्रपञ्चः कृतः । अर्थशक्त्युद्भवस्त्वन्यो यत्रार्थः स प्रकाशते । यस्तात्पर्येण वस्त्वन्यद्व्यनक्त्युक्तिं विना स्वतः ॥ २२ ॥ यत्रार्थः स्वसामर्थ्यादर्थान्तरमभिव्यनक्ति शब्दव्यापारं विनैव सोऽर्थशक्त्युद्भवो नामानुरवानोपमव्यङ्ग्यो ध्वनिः । करते हैं अथवा ) राजाओं के सिर पर अवभासित होते हैं और जो ( चरणरूप पाद देवताओं के भी शिरों पर आक्रमण करते हैं, इस प्रकार सूर्य के दोनों पाद ( किरणरूप और चरणरूप ) आप लोगों का कल्याण करें । इस प्रकार शब्दशक्तिमूल अनुरवानरूपव्यङ्ग्य ध्वनि के दूसरे भी प्रकार हैं, उन्हें सहृदय लोग स्वयं अनुसरण करें । यहां ग्रन्थ के विस्तार के भय से उनका प्रपञ्च नहीं किया है। अर्थशक्त्युद्भव अन्य ( ध्वनि ) है, जहां वह अर्थ प्रकाशित होता है जो उक्ति के बिना तात्पर्य रूप से स्वतः अन्य वस्तु को प्रकाशित करता है ॥ २२ ॥ जहां अर्थ शब्द व्यापार के बिना ही अपने सामर्थ्य से अर्थान्तर को अभिव्यक्त करता है, वह ‘अर्थशक्त्युद्भव’ नाम का अनुरवानोपमव्यङ्ग्य ध्वनि है। जैसे— लोचनम् स्फुटं नोच्यते केनचिदिति भावः । नखैरुद्भासन्ते येऽवश्यं खे गगने न उद्भा- सन्ते । उभये रश्म्यात्मानोऽङ्गुलीपाष्र्ण्यवयवविरूपाश्चेत्यर्थः ॥ २१ ॥ एवं शब्दशक्त्युद्भवं ध्वनिमुक्त्वाऽर्थशक्त्युद्भवं दर्शयति—अर्थेति । अन्य इति शब्दशक्त्युद्भवात् । स्वतस्तात्पर्येणेत्यभिधाव्यापारनिराकरणपरमिदं पदं ध्वन- नव्यापारमाह न तु तात्पर्यशक्तिम् । सा हि वाच्यार्थप्रतीतावेवोपक्षीणेत्युक्तं प्राक् । अनेनैवाशयेन वृत्तौ व्याचष्टे—यत्रार्थः स्वसामर्थ्यादिति । स्वत इति आकाश में उद्भासित नहीं हैं । दोनों ( पाद ) अर्थात् किरणरूप और अङ्गुलि, पार्ष्णि आदि अवयवों वाले ॥ २१ ॥ इस प्रकार शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि को कह कर अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि को दर्शाते हैं—अर्थ०—। अन्य अर्थात् शब्दशक्त्युद्भव से ( अन्य ) । ‘स्वतः तात्पर्यंरूप से’ इस अभिधाव्यापार के निराकरण में तात्पर्य वाला यह पद ध्वननव्यापार को कहता है न कि तात्पर्यशक्ति को । क्यों कि वह ( तात्पर्यशक्ति ) वाच्यार्थ की प्रतीति में ही उपक्षीण हो जाती है, यह पहले कह चुके हैं । इसी अभिप्राय से वृत्ति में व्याख्यान करते हैं— जहां अर्थ अपनी सामर्थ्य से—। ‘स्वतः’ इस शब्द की ‘अपनी’ ( ‘स्व’ ) शब्द से
२६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा— एवंवादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरधोमुखी । लीलाकमलपत्राणि गणयामास केवलम् ॥ अत्र हि लीलाकमलपत्रगणनमुपसर्जनीकृतस्वरूपं शब्दव्यापारं विनैवार्थान्तरं व्यभिचारिभावलक्षणं प्रकाशयति । न चायमलक्ष्यक्रम- व्यङ्ग्यस्यैव ध्वनेर्विषयः । यतो यत्र साक्षाच्छब्दनिवेदितेभ्यो विभा- वानुभावव्यभिचारिभ्यो रसादीनां प्रतीतिः, स तस्य केवलस्य मार्गः । यथा कुमारसम्भवे मधुप्रसङ्गे वसन्तपुष्पाभरणं वहन्त्या देव्या आगम- इस प्रकार देवर्षि ( मण्डल ) कह रहे थे और पिता की बगल में ( बैठी ) नीचे मुंह किए पार्वती लीलाकमल के पत्तों की गणना करने लगी । यहां लीला कमल के पत्तों का गगन ( यह अर्थ ) अपने स्वरूप को गुणीभूत करने शब्दव्यापार के बिना ही व्यभिचारी भाव रूप अर्थान्तर को प्रकाशित करता है। यह अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ही ध्वनि का विषय नहीं है। क्यों कि जहां साक्षात् शब्द द्वारा निवेदित विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों से रस आदि की प्रतीति होती है वह केवल उसका मार्ग है। जैसे 'कुमारसम्भव' में वसन्त के फूलों का आभरण धारण किए देवी ( पार्वती ) का आगमन आदि वर्णन और कामदेव के शर-सन्धान लोचनम् शब्दः स्वशब्देन व्याख्यातः । उक्तिं विनेति व्याचष्टे—शब्दव्यापारं विनैवेति । उदाहरति—यथा एवमिति । अर्थान्तरमिति लज्जात्मकम् । साक्षादिति । व्यभि- चारिणां यत्रालक्ष्यक्रमतया व्यवधिवन्ध्यैव प्रतिपत्तिः स्वविभावादिबलात्तत्र साक्षाच्छब्दनिवेदितत्वं विवक्षितमिति न पूर्वापरविरोधः । पूर्वं ह्युक्तं व्यभि- चारिणामपि भावत्वान्न स्वशब्दतः प्रतिपत्तिरित्यादि विस्तरतः । एतदुक्तं भवति—यद्यपि रसभावादिरर्थो ध्वन्यमान एव भवति न वाच्यः कदाचिदपि, व्याख्या की है। 'उक्ति के बिना' इसकी व्याख्या करते हैं—शब्दव्यापार के बिना ही—। उदाहरण देते हैं—जैसे, इस प्रकार०—। अर्थान्तर लज्जारूप अर्थान्तर । साक्षात्—। व्यभिचारी भावों की जहां अलक्ष्यक्रम रूप से व्यवधानरहित ही प्रतीति अपने विभाव के बल से होती है वहाँ साक्षात् शब्द द्वारा निवेदितत्व विवक्षित है अतः पूर्वापरविरोध नहीं है। क्यों कि पहले विस्तार से कहा है कि व्यभिचारी भावों की भी भाव होने के कारण स्वशब्द से प्रतीति नहीं होती है, इत्यादि । यह कहा गया—यद्यपि रस, भाव आदि अर्थ ध्वन्यमान ही होता है, कभी भी वाच्य नहीं होता है, तथापि
: द्वितीय उद्योतः २६९ ध्वन्यालोकः नादिवर्णनं मनोभवशरसन्धानपर्यन्तं शम्भोश्च परिवृत्तधैर्यस्य चेष्टा- विशेषवर्णनादि साक्षाच्छब्दनिवेदितम् । इह तु सामर्थ्याक्षिप्तव्यभिचारि- मुखेन रसप्रतीतिः । तस्मादयमन्यो ध्वनेः प्रकारः । पर्यन्त समाप्त धैर्य वाले शङ्कर के चेष्टा विशेष के वर्णन आदि साक्षात् शब्द द्वारा निवेदन किया है। यहाँ सामर्थ्य से आक्षिप्त व्यभिचारी के द्वारा रस की प्रतीति होती है । इस लिए यह ध्वनि का अन्य प्रकार है । लोचनम् तथापि न सर्वोऽलदयक्रमस्य विषयः । यत्र हि विभावातुभावेभ्यः स्थायिग- तेभ्यो व्यभिचारिगतेभ्यश्च पूर्णेभ्यो झटित्येव रसव्यक्तिस्तत्रास्त्वलदयक्रमः । यथा— निर्वाणभूयिष्ठमथास्य वीर्यं सन्धुक्षयन्तीव वपुर्गुणेन । अनुप्रयाता वनदेवताभिरदृश्यत स्थावरराजकन्या ॥ इत्यादौ सम्पूर्णालम्बनोद्दीपनविभावतायोग्यस्वभाववर्णनम् । प्रतिग्रहीतुं प्रणयिप्रियत्वात्त्रिलोचनस्तामुपचक्रमे च । संमोहनं नाम च पुष्पधन्वा धनुष्यमोघं समधत्त बाणम् ॥ इत्यनेन विभावतोपयोग उक्तः । हरस्तु किञ्चित्परिवृत्तधैर्यश्चन्द्रोदयारम्भ इवाम्बुराशिः । उमामुखे बिम्बफलाधरोष्ठे व्यापारयामास विलोचनानि ॥ अत्र हि भगवत्याः प्रथममेव तत्प्रवणत्वात्तस्य चेदानीं तदुन्मुखीभूतत्वात् सब (रस, भावादि) अलक्ष्यक्रम का विषय नहीं होता है । जहाँ स्थायिगत और व्यभिचारिगत पूर्ण विभावों और अनुभावों से झटिति रस की अभिव्यक्ति हो जाती है वहाँ अलक्ष्यक्रम होता है । जैसे— 'तदनन्तर इनके (शिव जी) के निर्वाण-प्रधान वीर्य को अपने शरीर के गुण से मानों विनष्ट करती हुई, वनदेवताओं द्वारा अनुसरण की जाती हुई, स्थावरराज (हिमालय) की कन्या (पार्वती) दिखाई पड़ीं।' इत्यादि में सम्पूर्ण आलम्बन-उद्दीपन विभाव रूप के योग्य स्वभाव का वर्णन है। 'अपने भक्त के प्रेमी होने के कारण त्रिलोचन (शिव जी) ने उस (माला) को ग्रहण करने के लिए उपक्रम किया और पुष्पों के धनुषवाले कामदेव ने संमोहन नाम का अमोघ बाण धनुष पर रखा ।' इसके द्वारा विभाव रूप का उपयोग कहा । 'चन्द्रोदय के आरम्भ में समुद्र की भाँति कुछ विचलित धैर्य वाले शिवजी ने बिम्बफल की भाँति अधरोष्ठ वाले पार्वती के मुख में अपने नेत्रों को व्यापारित किया।' यहाँ भगवती (पार्वती) के पहले से ही शिव में आसक्त होने के कारण और अब
२७० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यत्र च शब्दव्यापारसहायोऽर्थोऽर्थान्तरस्य व्यञ्जकत्वेनोपादीयते स नास्य ध्वनेर्विषयः । यथा— सङ्केतकालमनसं विटं ज्ञात्वा विदग्धया । और जहाँ शब्दव्यापार की सहायता से अर्थ अर्थान्तर के व्यञ्जक रूप से उपादान किया जाता है वह इस ध्वनि का विषय नहीं है । जैसे— विदग्धा ( नायिका ) ने यह जान कर कि विट संकेत (के स्थान पर पहुँचने का) लोचनम् प्रणयिप्रियतया च पक्षपातस्य सूचितस्य गाढीभावादृत्यात्मनः स्थायिभाव- स्यौत्सुक्यावेगचापल्यहर्षादेश्च व्यभिचारिणः साधारणीभूतोऽनुभाववर्गः प्रका- शित इति विभावानुभावचर्वणैव व्यभिचारिचर्वणायां पर्यवस्यति । व्यभिचा- रिणां पारतन्त्र्यादेव स्रक्सूत्रकल्पस्थायिचर्वणाविश्रान्तेरलक्ष्यक्रमत्वम् । इह तु पद्मद्लगणनमधोमुखत्वं चान्यथापि कुमारीणां सम्भाव्यत इति झटिति न लज्जायां विश्रमयति हृदयं, अपि तु प्राग्वृत्ततपश्चर्यादिवृत्तान्तानुस्मरणेन तत्र प्रतिपत्तिं करोतीति क्रमव्यङ्ग्यतैव । रसस्त्वत्रापि दूरत एव व्यभिचारिस्वरूपे पर्यालोच्यमाने भातीति तदपेक्षयाऽलक्ष्यक्रमतैव । लज्जापेक्षया तु तत्र लक्ष्यक्र- मत्त्वम् । अमुमेव भावमेवंशब्दः केवलशब्दश्च सूचयति । 'उक्तिं विने'ति यदुक्तं तद्व्यवच्छेद्यं दर्शयितुमुपक्रमते—यत्र चेति । चशब्द- स्तुशब्दस्यार्थे । अस्येति । अलक्ष्यक्रमस्तु तत्रापि स्यादेवेति भावः । उदाहरति- सङ्केतेति । उन ( शिवजी ) के इन ( पार्वती ) के प्रति उन्मुख होने के कारण और भक्त के प्रेमी होने के कारण सूचित पक्षपात के गाढ़ होने से रति रूप स्थायी भाव का और औत्सुक्य, वेग, चापल्य, हर्ष आदि व्यभिचारी का साधारणीभूत अनुभाव वर्ग को प्रकाशित किया है, इस प्रकार विभाव-अनुभाव की चर्वणा ही व्यभिचारी की चर्वणा में पर्यवसित होती है । व्यभिचारी भावों के परतन्त्र होने के कारण ही माला के सूत्र के समान स्थायी की चर्वणा में विश्रान्ति होने से अलक्ष्यक्रमत्व है । परन्तु यहाँ कमल के पत्तों को गिनना और नीचे मुख करना कुमारियों के अन्यथा भी सम्भव हैं, इस प्रकार झटिति हृदय को लज्जा में विश्राम नहीं मिलता है, अपितु ( हृदय ) पहले सम्पन्न हुए तपश्चर्या आदि वृत्तान्त के अनुस्मरण से उस ( लज्जा ) में प्रतिपत्ति करता है, इस प्रकार क्रमव्यङ्ग्यता ही है । किन्तु रस यहाँ भी दूर पर व्यभिचारी के स्वरूप के पर्यालोचन करने पर प्रतीत होता है, इस लिए उसकी अपेक्षा से अलक्ष्यक्रमत्व ही है । लज्जा की अपेक्षा से लक्ष्यक्रमत्व है । इसी भाव को 'इस प्रकार' और 'केवल' शब्द सूचित करते हैं । 'उक्ति के बिना' यह जो कहा है उसका व्यवच्छेद्य दिखाने के लिए उपक्रम करते हैं—और जहाँ—। 'और' शब्द 'परन्तु' शब्द के अर्थ में है । इस (ध्वनि) का—। भाव यह कि अलक्ष्यक्रम तो वहाँ पर भी होगा ही । उदाहरण देते हैं—सङ्केत ०—।
द्वितीय उद्योतः २७१ ध्वन्यालोकः हसन्नेत्रार्पिताकूतं लीलापद्मं निमीलितम् ॥ अत्र लीलाकमलनिमीलनस्य व्यञ्जकत्वमुक्त्यैव निवेदितम् । तथा च- शब्दार्थशक्त्या क्षिप्तोऽपि व्यङ्ग्योऽर्थः कविना पुनः । समय जानना चाहता है, हँसते हुए नेत्र द्वारा अभिप्राय प्रकट करते हुए (अपने हाथ में स्थित) लीलाकमल को निमीलित कर दिया । यहाँ लीलाकमल के निमीलन का व्यञ्जकत्व उक्ति द्वारा ही निवेदन किया गया है । और उस प्रकार— शब्दार्थ की शक्ति से आक्षिप्त भी व्यङ्ग्य अर्थ जहाँ कवि के द्वारा पुनः अपनी उक्ति से आविष्कृत किया जाता है, वह ध्वनि का अन्य ही अलङ्कार है ! लोचनम् व्यञ्जकत्वमिति । प्रदोषसमयं प्रतीति शेषः । उक्त्यैवेति । आद्यपादत्रयेणे- त्यर्थः । यद्यपि चात्र शब्दान्तरसन्निधानेऽपि प्रदोषार्थं प्रति न कस्यचिद्- भिधाशक्तिः पदस्येति व्यञ्जकत्वं न विघटितं, तथापि शब्देनैवोक्तमयमर्थोऽर्था- न्तरस्य व्यञ्जक इति । ततश्च ध्वनेर्यद्गोप्यमानतोदितचारुत्वात्मकं प्राणितं तदपहस्तितम् । यथा कश्चिदाह—'गम्भीरोऽहं न मे कृत्यं कोऽपि वेद न सूचितम् । किञ्चिद् ब्रवीमि' इति । तेन गाम्भीर्यसूचनार्थः प्रत्युत आविष्कृत एव । अत एवाह—व्यञ्जकत्वमिति उक्त्यैवेति च ॥ २२ ॥ प्रक्रान्तप्रकारद्वयोपसंहारं तृतीयप्रकारसूचनं चैकेनैव यत्नेन करोमीत्याश- येन साधारणमवतरणपदं प्रक्षिपति वृत्तिकृत्—तथा चेति । तेन चोक्तप्रकार- व्यञ्जकत्व—। प्रदोषसमय अर्थात् सन्ध्याकाल के प्रति व्यञ्जकत्व । उक्तिद्वारा ही—। अर्थात् पहले के तीनों पादों से । यद्यपि यहाँ शब्दान्तर के सन्निधान होने पर भी किसी पद का 'प्रदोष' (या सन्ध्याकाल) इस अर्थ के प्रति अभिधाशक्ति नहीं है, इस कारण व्यञ्जकत्व विघटित नहीं होता है तथापि 'यह अर्थ अर्थान्तर का व्यञ्जक है' यह बात शब्द से ही कही गई है । इस कारण ध्वनि का जो 'गोप्यमानता से उत्पन्न चारुत्वरूप प्राण है, उसका निराकरण कर दिया है। जैसा कि कोई कहता है—'मैं गम्भीर हूँ, बिना बताए मेरा काम कोई भी नहीं जानता, (इस लिए) कुछ कहता हूँ' । इस (कथन) से गाम्भीर्य-सूचन का अर्थ प्रत्युत प्रकट कर दिया है । इसी लिए कहा है— 'व्यञ्जकत्व' और 'उक्ति से ही' । प्रक्रान्त दोनों प्रकारों का उपसंहार और तीसरे प्रकार का सूचन एक ही यत्न से करता हूँ, इस आशय से वृत्तिकार साधारण अवतरण पद को देते हैं—और उस प्रकार—। अर्थात् उन उक्त दोनों प्रकारों (शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल ध्वनि) के
२७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ःध्वन्यालोकः यत्राविष्क्रियते स्वोक्त्या सान्यैवालङ्कृतिर्ध्वनेः ॥ २३ ॥ शब्दशक्त्यार्थशक्त्या शब्दार्थशक्त्या वाक्षिप्तोऽपि व्यङ्ग्योऽर्थः कविना पुनर्यत्र स्वोक्त्या प्रकाशीक्रियते सोऽस्मादनुस्वानोपमव्यङ्ग्याद्- ध्वनेरन्य एवालङ्कारः । अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य वा ध्वनेः सति सम्भवे स तादृगन्योऽलङ्कारः । तत्र शब्दशक्त्या यथा— वत्से मा गा विषादं श्वसनमुरुजवं सन्त्यजोर्ध्वप्रवृत्तं कम्पः को वा गुरुस्ते भवतु बलभिदा जृम्भितेनात्र याहि । शब्दशक्ति, अर्थशक्ति अथवा शब्दार्थशक्ति से आक्षिप्त भी व्यङ्ग्य अर्थ कवि के द्वारा पुनः जहाँ अपनी उक्ति से प्रकाशित किया जाता है वह इस अनुस्वानोपम- व्यङ्ग्य ध्वनि से अन्य ही अलङ्कार है । अथवा अलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य ध्वनि के सम्भव होने पर वह उस प्रकार का अन्य अलङ्कार है । उनमें शब्दशक्ति से, जैसे— वत्से, विषाद् मत अनुभव कर ( विषाद् अर्थात् विष भक्षण करने वाले शिव के पास न जा ), वेग से ऊपर की दीर्घ श्वास न ले ( वायु और अग्नि को छोड़ ), अधिक कम्पित क्यों है ? ( जलपति वरुण अथवा ब्रह्मा तेरे गुरु हैं ) बल तोड़ देने वाले जृम्भित को रोक ( ऐश्वर्य-मदमत्त इन्द्र को जाने दे ), इस प्रकार भय-शमन के लोचनम् द्वयेनायमपि तृतीयः प्रकारो मन्तव्य इत्यर्थः । शब्दश्चार्थश्च शब्दार्थौ चेत्येक- शेषः । सान्यैवेति । न ध्वनिरसौ, अपि तु श्लेषादिरलङ्कार इत्यर्थः । अथवा ध्वनिशब्देनालक्ष्यक्रमः तस्यालङ्कार्यस्याङ्गिनः स व्यङ्ग्योऽर्थोऽन्यो वाच्यमात्रा- लङ्कारापेक्षया द्वितीयो लोकोत्तरश्चालङ्कार इत्यर्थः । एवमेव वृत्तौ द्विधा व्याख्या- स्यति । विषमत्तीति विषादः । ऊर्ध्वप्रवृत्तमग्निमित्यत्र चार्थो मन्तव्यः । कम्पोऽपा- म्पतिः को ब्रह्मा वा तव गुरुः । बलभिदा इन्द्रेण जृम्भितेन ऐश्वर्यमदमत्तेनेत्यर्थः । साथ यह तीसरा प्रकार भी मानना चाहिए । शब्द, अर्थ, और शब्दार्थ, यह 'एकशेष' है । वह अन्य ही—। अर्थात् वह ध्वनि नहीं है, अपितु श्लेष आदि अलङ्कार है । अथवा, ध्वनि शब्द से अलक्ष्यक्रम ( उक्त ), है, उस अलङ्कार्य का वह व्यङ्ग्य अर्थ अन्य अर्थात् वाच्य अलङ्कार की अपेक्षा दूसरा वह लोकोत्तर अलङ्कार है । इसी प्रकार 'वृत्ति में दो प्रकार से व्याख्या करेंगे । विष भक्षण करते हैं, ( विषमत्ति ) विषाद ( अर्थात् शिव ) । ऊर्ध्वप्रवृत्त ( ऊपर की ओर बढ़ा हुआ ), यहाँ 'अग्नि' अर्थ मन्तव्य है । कम्प अर्थात् अपांपति ( जलपति वरुण ), अथवा क अर्थात् ब्रह्मा तुम्हारे गुरु हैं । बलभिद् अर्थात् इन्द्र, जृम्भित अर्थात् ऐश्वर्यमदमत्त । और अङ्गों की ऐंठन रूप जम्भाई आयासकारी
द्वितीय उद्योतः २७३ ध्वन्यालोकः प्रत्याख्यानं सुराणामिति भयशमनच्छद्मना कारयित्वा यस्मै लक्ष्मीमदाद्धः स दहतु दुरितं मन्थमूढां पयोधिः ॥ अर्थशक्त्या यथा— अम्बा शेतेऽत्र वृद्धा परिणतवयसामग्रणीरत्र तातो व्याज से देवताओं को निराकरण करा के 'इनके (विष्णु के) पास गमन कर' इस प्रकार (कह कर) समुद्र ने मन्थन से डरी हुई लक्ष्मी को जिसे (विष्णु को) अर्पित किया वह (विष्णु भगवान्) आप लोगों के दुरित नाश करें । अर्थशक्ति से, जैसे— यहाँ बूढ़ी माँ सोती है, बूढ़ों में भी बूढ़ा बाप यहाँ सोता है, और घर के सारे लोचनम् जृम्भितं च गात्रसंमर्दनात्मकं बलं भिनत्ति आयासकारित्वात् । प्रत्याख्यान- मिति वचसैवात्र द्वितीयोऽर्थोऽभिधीयत इति निवेदितम् । कारयित्वेति । सा हि कमला पुण्डरीकाक्षमेव हृदये निधायोत्थितेति स्वयमेव देवान्तराणां प्रत्याख्यानं करोति । स्वभावसुकुमारतया तु मन्दरान्दोलितजलधितरङ्गभङ्गप- र्याकुलीकृतां तेन प्रतिबोधयता तत्समर्थाचरणमन्यत्र दोषोद्घाटनेन अत्र याहीति चाभिनयविशेषेण सकलगुणादरदर्शकेन कृतम् । अत एव मन्थमूढामित्याह । इत्युक्तप्रकारेण भयनिवारणव्याजेन सुराणां प्रत्याख्यानं मन्थमूढां लक्ष्मीं कार- यित्वा पयोधिर्यस्मै तामदात्स वो युष्माकं दुरितं दहत्विति सम्बन्धः । अम्बेति । अत्रैकैकस्य पदस्य व्यञ्जकत्वं सहृदयैः सुकल्प्यमिति स्वकण्ठेन नोक्तम् । व्याजशब्दोऽत्र स्वोक्तिः । एवमुपसंहारव्याजेन प्रकारद्वयं सोदाहरणं होने के कारण बल तोड़ देती है । 'निराकरण' ('प्रत्याख्यान') इसके द्वारा वचन से ही दूसरा अर्थ अभिधान किया है, यह निवेदन किया । करा के—। क्यों कि वह कमला (लक्ष्मी) पुण्डरीकाक्ष (विष्णु) को ही हृदय में रख कर निकली है, अतः स्वयमेव वह इतर देवताओं का प्रत्याख्यान करती है । स्वभावतः सुकुमार होने के कारण मन्दरपर्वत से आन्दोलित समुद्र के तरङ्ग-भङ्गों से पर्याकुल हुई (लक्ष्मी) को शिक्षा देते हुए और अन्यत्र दोष के उद्घाटन द्वारा 'यहाँ (अर्थात् विष्णु में) गमन करो' इस समग्र गुणों के प्रति आदर दिखाने वाले अभिनय विशेष से उसके समर्थ आचरण किया है । इसी लिए 'मन्थमूढा' अर्थात् (समुद्र के) 'मन्थन से डरी हुई' यह कहा है । सम्बन्ध यह है कि इस उक्त प्रकार से भय-निवारण के व्याज से देवताओं का प्रत्याख्यान मन्थन से डरी हुई लक्ष्मी के करा के समुद्र ने जिसके लिए उसे अर्पित किया वह (विष्णु) आपलोगों के दुरित का नाश करें । यहां बूढ़ी—। यहाँ एक-एक पद का व्यञ्जकत्व सहृदयों द्वारा सहज ही कल्पनीय है, इस लिए अपने कण्ठ से नहीं कहा है । 'व्याज' शब्द यहाँ (कवि की) अपनी उक्ति १८ ध्व०
२७४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः निःशेषागारकर्मश्रमशिथिलतनुः कुम्भदासी तथात्र । अस्मिन् पापाहमेका कतिपयदिवसप्रोषितप्राणनाथा पान्थायेत्थं तरुण्या कथितमवसरव्याहृतिव्याजपूर्वम् ॥ उभयशक्त्या यथा—'दृष्ट्या केशवगोपरागहृतया' इत्यादौ ॥२३॥ प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः । अर्थोऽपि द्विविधो ज्ञेयो वस्तुनोऽन्यस्य दीपकः ॥ २४ ॥ कामों से थक कर ढीली पनभरिन यहाँ सोती है, कुछ ही दिनों से जिसके प्राणनाथ परदेश चले गए हैं ऐसी मैं पापिन अकेली यहाँ सोती हूँ । इस प्रकार तरुणी ने पथिक से अवसर के कथन के व्याज से कहा । उभयशक्ति से, जैसे—'दृष्ट्या केशवगोपरागहृतया०' इत्यादि में ॥ २३ ॥ अन्य वस्तु का दीपक अर्थ भी दो प्रकार का जानना चाहिए—प्रौढ़ उक्तिमात्र से निष्पन्न शरीर वाला और स्वतः सम्भवी ॥ २४ ॥ लोचनम् निरूप्य तृतीयं प्रकारमाह—उभयेति । शब्दशक्तिस्तावद्गोपरागादिशब्दश्लेष- वशात् । अर्थशक्तिस्तु प्रकरणवशात् । यावदत्र राधारमणस्याखिलतरुणीजन- च्छन्नानुरागगरिमास्पदत्वं न विदितं तावदर्थान्तरस्याप्रतीतेः, सलेशमिति चात्र स्वोक्तिः ॥ २३ ॥ एवमर्थशक्त्युद्भवस्य सामान्यलक्षणं कृतम् । श्लेषाद्यलङ्कारेभ्यश्चास्य विभक्तो विषय उक्तः । अधुनास्य प्रभेदनिरूपणं करोति—प्रौढोक्तीत्यादिना । योऽर्थान्तरस्य दीपको व्यञ्जकोऽर्थ उक्तः सोऽपि द्विविधः । न केवलमनुस्वा- नोपमो द्विविधः, यावत्तद्भेदो यो द्वितीयः सोऽपि व्यञ्जकार्थद्वैविध्यद्वारेण द्विविध है । इस प्रकार उपसंहार के व्याज से दोनों प्रकारों को सोदाहरण निरूपण कर के तीसरा प्रकार कहते हैं—उभय०—। 'गोपराग' आदि श्लेष के कारण शब्दशक्ति है, और अर्थशक्ति प्रकरण के कारण है, क्यों कि जब तक राधारमण ( श्रीकृष्ण ) का समस्त तरुणियों में छिपे ढंग से अनुराग-गरिमा का स्थानभूत होना विदित नहीं होता है तब तक अर्थान्तर की प्रतीति नहीं होती है । 'सलेशं' यह ( कवि की ) अपनी उक्ति है ॥२३॥ इस प्रकार अर्थशक्त्युद्भव का सामान्य लक्षण किया और श्लेष आदि अलङ्कारों से इसका विषय विभक्त कहा । अब इसके प्रभेद का निरूपण करते हैं—अन्यवस्तु० इत्यादि द्वारा । जो अर्थान्तर का दीपक अर्थात् व्यञ्जक अर्थ कहा है, वह भी दो प्रकार का है । न केवल अनुस्वानोपम दो प्रकार का है, उसका जो दूसरा भेद है, वह भी व्यञ्जक अर्थ के द्वैविध्य के द्वारा दो प्रकार का है, यह 'भी' ( 'अपि' ) शब्द का अर्थ
द्वितीय उद्योतः २७५ ध्वन्यालोकः अर्थशक्त्युद्द्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्ये ध्वनौ यो व्यञ्जकोऽर्थ उक्तस्त- स्यापि द्वौ प्रकारौ—कवेः कविनिबद्धस्य वा वक्तुः प्रौढोक्तिमात्रनि- ष्पन्नशरीर एकः, स्वतःसम्भवी च द्वितीयः। कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरो यथा— सज्जेहि सुरहिमासो ण दाव अप्पेइ जुइजणलक्खमुहे। अहिणवसहारमुहे णवपल्लवपत्तले अणङ्गस्स शरे॥ अर्थशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि में जो व्यञ्जक अर्थ कहा है उसके भी दो प्रकार हैं—कवि की अथवा कविनिबद्ध वक्ता की प्रौढ़ उक्तिमात्र से निष्पन्न शरीर वाला एक और स्वतः सम्भवी दूसरा। कवि की प्रौढ़ उक्तिमात्र से निष्पन्न शरीर वाला, जैसे—वसन्तमास युवतिजनों को लक्ष्य करने वाले मुखों (अग्रभाग अर्थात् बाण के फल) से युक्त, नये पल्लवों के (पंखों से) युक्त, नये सहकार प्रभृति (कामदेव के बाणों) को तैयार कर रहा है, (अभी प्रहार करने के लिए उन्हें कामदेव के) अर्पित नहीं कर रहा है। लोचनम् इत्यपिशब्दस्यार्थः। प्रौढोक्तेरप्यवान्तरभेदमाह—कवेरिति। तेनैते त्रयो भेदा भवन्ति। प्रकर्षेण ऊढः सम्पादयितव्येन वस्तुना प्राप्तस्तत्कुशलः प्रौढः। उक्ति- रपि समर्पयितव्यवस्त्वर्पणोचिता प्रौढेत्युच्यते। सजयति सुरभिमासो न तावदर्पयति युवतिजनलक्ष्यमुखान्। अभिनवसहकारमुखान्नवपल्लवपत्रलाननङ्गस्य शरान्॥ अत्र वसन्तश्चेतनोऽनङ्गस्य सखा सजयति केवलं न तावदर्पयतीत्येवंवि- धया समर्पयितव्यवस्त्वर्पणकुशलयोक्त्या सहकारोद्भैदिनी वसन्तदशा यत उक्ता अतो ध्वन्यमानं मन्मथोन्माथस्यारम्भं क्रमेण गाढगाढीभविष्यन्तं व्यनक्ति। अन्यथा वसन्ते सपल्लवसहकारोद्गम इति वस्तुमात्रं न व्यञ्जकं है। प्रौढोक्ति का भी अवान्तर भेद कहते हैं—कवि की—। इस कारण ये तीन भेद होते हैं। प्रकर्ष से ऊढ अर्थात् सम्पादयितव्य वस्तु से प्राप्त, उसका कुशल प्रौढ है। समर्पयितव्य वस्तु के अर्पण में उचित उक्ति भी 'प्रौढ' कहलाती है। यहां 'चेतन, कामदेव का सखा वसन्त केवल तैयार कर रहा है, अर्पित नहीं कर रहा है' समर्पयितव्य वस्तु के अर्पण में कुशल इस प्रकार की उक्ति द्वारा आम्र (सहकार) पैदा करने वाली वसन्त की स्थिति जिस कारण कही गई है उस कारण ध्वनित होते हुए और क्रम से गाढ-गाढतर होते हुए मन्मथोन्माथ के आरम्भ को व्यक्त करती है, अन्यथा 'वसन्त में पल्लवसहित सहकार का उद्गम' यह वस्तुमात्र व्यञ्जक नहीं होगा।
२७६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरो यथोदाहृतमेव—‘शिख-
रिणि’ इत्यादि ।
यथा वा—
साअरविइण्णजोव्वणहत्थालम्बं समुण्णमन्तेहिम् ।
अब्भुट्ठाणं विअ मम्महस्स दिण्णं तुह थणेहिम् ॥
स्वतः सम्भवी य औचित्येन बहिरपि सम्भाव्यमानसद्भावो न
कवि द्वारा निबद्ध वक्ता की प्रौढ़ उक्तिमात्र से निष्पन्न शरीर वाला, जैसे उदाहृत
है—‘शिखरिणि०’ इत्यादि ।
अथवा, जैसे—
आदर के साथ यौवन द्वारा हस्तावलम्ब दिए जाने पर उठते हुए तुम्हारे स्तनों
ने कामदेव को ( स्वागत में ) अभ्युत्थान-सा प्रदान किया है ।
स्वतः सम्भवी वह है औचित्य से बाहर भी सद्भाव जिसका सम्भावित हो रहा
लोचनम्
स्यात् । एषा च कवेरेवोक्तिः प्रौढा । शिखरिणीति । अत्र लोहितं बिम्बफलं
शुको दशतीति न व्यञ्जकता काचित् । यदा तु कविनिबद्धस्य साभिलाषस्य
तरुणस्य वक्तुरित्थं प्रौढोक्तिस्तदा व्यञ्जकत्वम् ।
सादरवितीर्णयौवनहस्तालम्बं समुन्नमद्भ्याम् ।
अभ्युत्थानमिव मन्मथस्य दत्तं तव स्तनाभ्याम् ॥
स्तनौ तावदिह प्रधानभूतौ ततोऽपि गौरवितः कामस्ताभ्यामभ्युत्थानेनो-
पचर्यते । यौवनं चानयोः परिचारकभावेन स्थितमित्येवंविधेनोक्तिवैचित्र्येण
त्वदीयस्तनावलोकनप्रवृद्धमन्मथावस्थः को न भवतीति भङ्ग्या स्वाभिप्राय-
यह कवि की ही उक्ति प्रौढ है । शिखरिणि० । यहां लाल बिम्बफल को शुक काटता है,
यह कोई व्यञ्जकत्व नहीं है । परन्तु जब कवि द्वारा निबद्ध साभिलाष तरुण वक्ता की
इस प्रकार प्रौढ उक्ति होगी, तब व्यञ्जकत्व होगा ।
‘( नायिका के ) दोनों स्तन यहां प्रधानभूत हैं, उनसे भी अधिक गौरव वाला काम-
देव उनके द्वारा अभ्युत्थानपूर्वक उपचारित हो रहा है, और यौवन इन दोनों ( स्तनों )
के परिचारक रूप में स्थित है’ इस प्रकार के उक्तिवैचित्र्य द्वारा ‘तुम्हारे स्तनों के अव-
लोक से प्रवृद्ध कामावस्था वाला कौन नहीं हो जाता है, इस ढङ्ग ( भङ्गी ) से अपने
अभिप्राय का ध्वनन किया है । ‘जवानी के कारण तुम्हारे स्तन उन्नत हो गए हैं’ इस
द्वितीय उद्योतः २७७ ध्वन्यालोकः केवलं भणितिवशेनैवाभिनिष्पन्नशरीरः । यथोदाहृतम् 'एवंवादिनि' इत्यादि । यथा वा— सिहिपिञ्छकण्णपूरा जाआ वाहस्स गव्विरी भमइ । मुत्ताफलरइअपसाहणाणं मज्झे सवत्तीणम् ॥ २४ ॥ है, न केवल उक्ति द्वारा ही जिसका शरीर अभिनिष्पन्न है। जैसे, उदाहृत है—'एवं वादिनि०' इत्यादि । अथवा जैसे— मोर-पंखों के कनफूल पहने व्याध की पत्नी मुक्ताफलों के गहने पहनी हुई अपनी सौतों के बीच गर्वीली होकर घूमती है ॥ २४ ॥ लोचनम् ध्वननं कृतम् । तव तारुण्येनोन्नतौ स्तनावेति हि वचने न व्यञ्जकता । न केवलमिति । उक्तिवैचित्र्यं तावत्सर्वथोपयोगि भवतीति भावः । शिखिपिच्छकर्णपूरा जाया व्याधस्य गर्विणी भ्रमति । मुक्ताफलरचितप्रसाधनानां मध्ये सपत्नीनाम् ॥ शिखिमात्रमारणमेव तदासक्तस्य कृत्यम् । अन्यासु त्वासक्तो हस्तिनोऽ- प्यमारयदिति हि वचनेनोक्तमुत्तमसौभाग्यम् । रचितानि विविधभङ्गीभिः प्रसाधनानीति तासां सम्भोगव्यग्रिमाभावात्तद्विरचनशिल्पकौशलमेव परमिति दौर्भाग्यातिशय इदानीमिति प्रकाशितम् । गर्वश्च बाल्याविवेकादिनापि भव- तीति नात्र स्वोक्तिसद्भावः शङ्क्यः । एष चार्थो यथा यथा वर्ण्यते आस्तां वा वर्णना, बहिरपि यदि प्रत्यक्षादिनावलोक्यते तथा तथा सौभाग्यातिशयं व्याधवध्वा द्योतयति ॥ २४ ॥ कथन में व्यञ्जकता नहीं है। न केवल—। भाव यह कि उक्तिवैचित्र्य सब प्रकार से उपयोगी होता है । उसमें आसक्त नायक का केवल मोरों का मारना ही कार्य रह गया और दूसरी सौतों में आसक्त वह हाथियों को भी मार डालता था, इस कथन से ( अपना ) उत्तम सौभाग्य अभिहित किया । विविध भङ्गियों से जिनके प्रसाधन बनाए गए हैं, इससे प्रकाशित किया कि सम्भोग की व्यग्रता न होने के कारण प्रसाधन के बनाने का शिल्प- कौशल ही ज्यादा था, इस प्रकार अब उनका अतिशय दुर्भाग्य है । गर्व तो बाल्य के कारण अविवेक आदि से भी उत्पन्न होता है इसलिए यहां अपनी उक्ति के सद्भाव की शङ्का नहीं करनी चाहिए । यह अर्थ जैसे जैसे वर्णन करते हैं अथवा वर्णना हो भी, यदि बाहर भी प्रत्यक्ष आदि द्वारा देखा जाता है उस-उस प्रकार व्याधवधू का अतिशय सौभाग्य द्योतन करता है ॥ २४ ॥
२७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अर्थशक्तेरलङ्कारो यत्राप्यन्यः प्रतीयते । अनुस्वानोपमव्यङ्ग्यः स प्रकारोऽपरो ध्वनेः ॥ २५ ॥ वाच्यालङ्कारव्यतिरिक्तो यत्रान्योऽलङ्कारोऽर्थसामर्थ्यात्प्रतीयमानो- ऽवभासते सोऽर्थशक्त्युद्भवो नामानुस्वानरूपव्यङ्ग्योऽन्यो ध्वनिः॥२५॥ तस्य प्रविरलविषयत्वमाशङ्क्येदमुच्यते— रूपकादिरलङ्कारवर्गो यो वाच्यतां श्रितः । स सर्वो गम्यमानत्वं बिभ्रद् भूम्ना प्रदर्शितः ॥ २६ ॥ अर्थशक्ति से जहां भी अन्य अलङ्कार प्रतीत होता है वह अनुस्वानोपमव्यङ्ग्य ध्वनि का अन्य प्रकार है ॥ २५ ॥ वाच्य अलङ्कार से अतिरिक्त जहां अन्य अलङ्कार अर्थसामर्थ्य से प्रतीत होता हुआ अवभासित होता है वह अर्थशक्त्युद्भव नाम का अनुस्वानरूप व्यङ्ग्य अन्य ध्वनि है ॥ २५ ॥ उसके प्रविरलविषय होने की आशङ्का करके यह कहते हैं— रूपक आदि अलङ्कारवर्ग जो वाच्यता का आश्रयण करता है वह सब गम्यमान रूप में बहुत विस्तार से दिखाया गया है । ॥ २६ ॥ लोचनम् एवमर्थशक्त्युद्भवो द्विभेदो वस्तुमात्रस्य व्यञ्जनीयत्वे वस्तुध्वनिरूपतया निरूपितः । इदानीं तस्यैवालङ्काररूपे व्यञ्जनीयेऽलङ्कारध्वनित्वमपि भवती- त्याह—अर्थेत्यादि । न केवलं शब्दशक्तेरलङ्कारः प्रतीयते पूर्वोक्तनीत्या यावद्- र्थशक्तेरपि । यदि वा न केवलं यत्र वस्तुमात्रं प्रतीयते यावदलङ्कारोऽपीत्यपि- शब्दार्थः । अन्यशब्दं व्याचष्टे—वाच्येति ॥ २५ ॥ आशङ्क्येति । शब्दशक्त्या श्लेषाद्यलङ्कारो भासत इति सम्भाव्यमेतत् । इस प्रकार अर्थशक्त्युद्भव दो प्रकार का होता है, वस्तुमात्र के व्यञ्जनीय होने पर वस्तुध्वनि रूप से वह निरूपण किया गया, अब उसी के अलङ्कार रूप के व्यञ्जनीय होने पर अलङ्कार-ध्वनित्व भी होता है, यह कहते हैं—अर्थ० इत्यादि । न केवल शब्दशक्ति से अलङ्कार प्रतीत होता है बल्कि पूर्वोक्त नीति से अर्थशक्ति से भी (अलङ्कार प्रतीत होता है ) । यदि वा 'भी' ( 'अपि' ) शब्द का अर्थ है कि न केवल जहां वस्तु- मात्र प्रतीत होता है बल्कि अलङ्कार भी । 'अन्य' शब्द की व्याख्या करते हैं— वाच्य० ॥ २५ ॥ आशङ्का करके—। शब्दशक्ति से श्लेष आदि अलङ्कार भासित होता है, यह तो
द्वितीय उद्योतः २७९
ध्वन्यालोकः
अन्यत्र वाच्यत्वेन प्रसिद्धो यो रूपकादिरलङ्कारः सोऽन्यत्र प्रती-
यमानतया बाहुल्येन प्रदर्शितस्तत्रभवद्भिर्भट्टोद्भटादिभिः । तथा च
अन्यत्र वाच्यरूप से प्रसिद्ध जो रूपक आदि अलङ्कार है वह अन्यत्र प्रतीयमान
रूप से बहुलतया, आदरणीय उद्भट आदि आचार्यों द्वारा दिखाया गया है। जैसा कि
लोचनम्
अर्थशक्त्या तु कोऽलङ्कारो भातीत्याशङ्काबीजम् । सर्व इति प्रदर्शित इति च
पदेनासम्भावनात्र मिथ्यैवेत्याह ।
उपमानेन तत्त्वं च भेदं च वदतः पुनः ।
ससन्देहं वचः स्तुत्यै ससन्देहं विदुर्यथा ॥ इति ।
तस्याः पाणिरयं नु मारुतचलत्पत्राङ्गुलिः पल्लवः ।
इत्यादावुपमा रूपकं वा ध्वन्यते । अतिशयोक्तेश्च प्रायशः सर्वालङ्कारेषु
ध्वन्यमानत्वम् । अलङ्कारान्तरस्येति । यत्रालङ्कारोऽप्यलङ्कारान्तरं ध्वनति तत्र
वस्तुमात्रेणालङ्कारो ध्वन्यत इति कियदिदमसम्भाव्यमिति तात्पर्येणालङ्कारा-
न्तरशब्दो वृत्तिकृता प्रयुक्तो न तु प्रकृतोपयोगी; न ह्यलङ्कारेणालङ्कारो ध्वन्यत
इति प्रकृतमदः, अर्थशक्त्युद्भवे ध्वनौ वस्त्विवालङ्कारोऽपि व्यङ्ग्य इत्येतावतः
प्रकृतत्वात् । तथा चोपसंहारग्रन्थे 'तेऽलङ्काराः परां छायां यान्ति ध्वन्यङ्गतां
गताः' इत्यत्र श्लोके वृत्तिकृत् 'ध्वन्यङ्गता चोभाभ्यां प्रकाराभ्याम्' इत्युपक्रम्य
सम्भाव्य है, परन्तु अर्थशक्ति से कौन-सा अलङ्कार प्रतीत होता है ! यह आशङ्का का
बीज है । 'सर्व' और 'दिखाया गया है' इन दोनों से 'यहां असम्भावना मिथ्या ही है'
यह कहते हैं ।
उपमान के साथ ( उपमेय का ) अभेद और पुनः भेद कहते हुए कवि के ससन्देह
वचन को स्तुति के लिए ससन्देह मानते हैं। जैसे—
उस ( नायिका का ) यह हाथ है या हवा से चञ्चल पत्तों की उंगलियों वाला
पल्लव है ।
इत्यादि में उपमा अथवा रूपक ध्वनित होता है । और अतिशयोक्ति प्रायः सभी
अलङ्कारों में ध्वनित होती है । अलङ्कारान्तर का—। जहां अलङ्कार भी अलङ्कारान्तर
को ध्वनित करता है वहां वस्तुमात्र रूप से अलङ्कार ध्वनित होता है, यह कितना
असम्भाव्य ही है, इस तात्पर्य से वृत्तिकार ने 'अलङ्कारान्तर' शब्द का प्रयोग किया है,
न कि प्रकृत में ( वह शब्द ) उपयोगी है; क्योंकि यह प्रकृत नहीं कि अलङ्कार से
अलङ्कार ध्वनित होता है, बल्कि इतना ही प्रकृत है कि अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि में वस्तु
की भांति अलङ्कार भी व्यङ्ग्य होता है । जैसा कि उपसंहार ग्रन्थ में 'वे अलङ्कार
ध्वनि का अङ्ग होकर अधिक छाया प्राप्त करते हैं' इस स्थल में वृत्तिकार 'ध्वनि का
अङ्गत्व दो प्रकारों से' यह उपक्रम करके 'वहां यह प्रकरण से व्यङ्ग्य होने के कारण
२८० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ससन्देहादिषूपमारूपकातिशयोक्तीनां प्रकाशमानत्वं प्रदर्शितमित्य- लङ्कारान्तरस्यालङ्कारान्तरे व्यङ्ग्यत्वं न यत्नप्रतिपाद्यम् ॥ २६ ॥ इयत्पुनरुच्यत एव— अलङ्कारान्तरस्यापि प्रतीतौ यत्र भासते । तत्परत्वं न वाच्यस्य नासौ मार्गो ध्वनेर्मतः ॥ २७ ॥ अलङ्कारान्तरेषु त्वनुरणनरूपालङ्कारप्रतीतौ सत्यामपि यत्र वाच्य- स्य व्यङ्ग्यप्रतिपादनौन्मुख्येन चारुत्वं न प्रकाशते नासौ ध्वनेर्मार्गः । ससन्देह आदि ( अलङ्कारों ) में उपमा, रूपक और अतिशयोक्ति का प्रकाशित होना दिखाया गया है । इस प्रकार अलङ्कारान्तर का अलङ्कारान्तर में व्यङ्ग्य होना यत्नप्रतिपाद्य नहीं है ॥ २६ ॥ इतना तो फिर कहते ही हैं— अलङ्कारान्तर की भी प्रतीति में जहां वाच्य का तत्परत्व नहीं भासित होता है वह मार्ग ध्वनि का नहीं माना गया है ॥ २७ ॥ परन्तु अलङ्कारान्तरों में अनुरणनरूप अलङ्कार की प्रतीति के होने पर भी जहाँ वाच्य का व्यङ्ग के प्रतिपादन के औन्मुख्य से चारुत्व जाहिर नहीं होता है वह ध्वनि का लोचनम् 'तत्रेह प्रकरणाद्व्यङ्ग्यत्वेनेत्यवगन्तव्यम्' इति वक्ष्यति । अन्तरशब्दो वोभय- त्रापि विशेषपर्यायः; वैषयिकी सप्तमी, न तु प्राग्व्याख्यायामिव निमित्तसप्तमी । तदयमर्थः-वाच्यालङ्कारविशेषविषये व्यङ्ग्यालङ्कारविशेषो भातीत्युद्भटादिभि- रुक्तमेवेत्यर्थशक्त्यालङ्कारो व्यज्यत इति तैरुपगतमेव । केवलं तेऽलङ्कारलक्षण- कारत्वाद्वाच्यालङ्कारविशेषविषयत्वेनाहुरिति भावः ॥ २६ ॥ ननु पूर्वै रेव यदिदमुक्तं किमर्थं तव यत्न इत्याशङ्क्याह—इयदिति । अस्मा- यह जानना चाहिए' यह कहेंगे । अथवा 'अनन्तर' शब्द दोनों स्थलों में 'विशेष' अर्थ का वाचक है, सप्तमी वैषयिकी अर्थात् विषयरूप अर्थ की वाचिका है, न कि पहले की व्याख्या के समान निमित्तसप्तमी है । तो अर्थ यह है—वाच्य अलङ्कारविशेष के विषय में व्यङ्ग्य अलङ्कारविशेष प्रतीत होता है यह उद्भट आदि ने कहा ही है, अर्थात् अर्थ- शक्ति से अलङ्कार व्यञ्जित होता है यह उन्होंने माना ही है । भाव यह कि केवल उन्होंने अलङ्कार-लक्षणकार होने के नाते वाच्य अलङ्कारविशेष के विषयरूप से कहा है ॥ २६ ॥ यह आशङ्का करके कि जब कि प्राचीनों ने ही यह कह दिया है तो तुम्हारा यत्न किसलिए ? ( उत्तर में ) कहते हैं—इतना—। 'हम भी' यह वाक्यशेष है । 'पुनः'
३. तृतीय उद्योत: पद, वाक्य, वर्ण, संघटना एवं प्रबन्ध-व्यञ्जकता विचार
द्वितीय उद्योतः २८१ ध्वन्यालोकः तथा च दीपकादावलङ्कारे उपमाया गम्यमानत्वेऽपि तत्परत्वेन चारु- त्वस्याव्यवस्थनान्न ध्वनिव्यपदेशः । यथा— चन्दमऊएहि णिसा णलिनी कमलेहि कुसुमगुच्छेहि लआ । हंसेहि सरअसोहा कव्वकहा सज्जनेहि करइ गरुई ॥ (चन्द्रमयूखैर्निशा नलिनी कमलैः कुसुमगुच्छैर्लता । हंसैश्शारदशोभा काव्यकथा सज्जनैः क्रियते गुर्वी ॥ इति छाया ) मार्ग नहीं है। जैसा कि दीपक आदि अलङ्कार में उपमा के गम्यमान होने पर भी तत्पर रूप से चारुत्व के न होने पर ध्वनि व्यपदेश नहीं होता । जैसे— चन्द्रकिरणों से रात्रि, कमलों से नलिनी, फूल के गुच्छों से लता, शरत्काल की शोभा हंसों से और काव्यकथा सज्जनों से गौरवान्वित की जाती है । लोचनम् भिरिति वाक्यशेषः । पुनःशब्दस्तदुक्ताद्विशेषद्योतकः । चन्दमऊ इति । चन्द्रम- यूखादीनां न निशादिना विना कोऽपि परभागलाभः । सज्जनानामपि काव्यकथां विना कीदृशी साधुजनता । चन्द्रमयूखैश्च निशाया गुरुकीकरणं भास्वरत्वसेव्यत्वादि यत्क्रियते; कमलैर्नलिन्याः शोभापरिमललक्ष्म्यादि, कुसु- मगुच्छैर्लताया अभिगम्यत्वमनोहरत्वादि, हंसैः शारदशोभायाः श्रुतिसुखकर- त्वमनोहरत्वादि, तत्सर्वं काव्यकथायाः सज्जनैरित्येतावानयमर्थो गुरुः क्रियत इति दीपकबलाच्चकास्ति । कथाशब्द इदमाह—आसतां तावत्काव्यस्य केचन सूक्ष्मा विशेषाः, सज्जनैर्विना काव्यमित्येष शब्दोऽपि ध्वंसते । तेषु तु शब्द उस कहे हुए से विशेष का द्योतक है । चन्द्रकिरणों—। चन्द्रकिरण आदि का रात्रि आदि के बिना कोई महत्त्व लाभ नहीं है, सज्जनों की भी काव्यकथा के बिना कैसी साधुजनता ? चन्द्रकिरणों से रात्रि का जो गुरुकीकरण अर्थात् भास्वर होना और सेव्य होना आदि किया जाता है कमलों से नलिनी की शोभा, परिमल, लक्ष्मी आदि जो होती है, फूल के गुच्छों से लता का जो अभिगम्यत्व, मनोहरत्व आदि जो होता है और हंसों से शरत्काल की शोभा का श्रुतिसुखकर होना और मनोहर होना आदि जो होता है वह सब कुछ काव्यकथा का सज्जनों से सम्पन्न होता है, इतना अर्थ 'गौरवा- न्वित किया जाता है' इस दीपक के बल से प्रकाशित होता है । 'कथा' शब्द यह कहता है—काव्य के कोई सूक्ष्म विशेष हों, ( किन्तु ) सज्जनों के बिना 'काव्य' यह शब्द भी नष्ट होता है । उन सज्जनों के विद्यमान रहने पर केवल 'काव्य' शब्द के
२८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ः ध्वन्यालोकः इत्यादिषूपमागर्भत्वेऽपि सति वाच्यालङ्कारमुखेनैव चारुत्वं व्यव- तिष्ठते न व्यङ्ग्यालङ्कारतात्पर्येण । तस्मात्तत्र वाच्यालङ्कारमुखेनैव का- व्यव्यपदेशो न्याय्यः । यत्र तु व्यङ्ग्यपरत्वेनैव वाच्यस्य व्यवस्थानं तत्र व्यङ्ग्य-मुखेनैव व्यपदेशो युक्तः । इत्यादि के उपमा से गर्भित होने पर भी वाच्य अलङ्कार के प्रकार से ही चारुत्व व्यवस्थित होता है व्यङ्ग्य अलङ्कार के तात्पर्य से नहीं । इस लिए वहां वाच्य अल- ङ्कार के प्रकार से ही काव्यव्यपदेश उचित है । परन्तु जहां व्यङ्ग्यपर रूप से ही वाच्य का व्यवस्थान हो वहाँ व्यङ्ग्य के प्रकार से ही व्यपदेश ठीक है । लोचनम् सत्स्वास्ते सुभगं काव्यशब्दव्यपदेशभागपि शब्दसन्दर्भमात्रम्; तथा तैः क्रियते यथादरणीयतां प्रतिपद्यत इति दीपकस्यैव प्राधान्यं नोपमायाः । एवं तु कारिकार्थमुदाहरणेन प्रदर्श्यास्या एव कारिकाया व्यवच्छेद्यबलेन योऽर्थोऽभि- मतो यत्र तत्परत्वं स ध्वनेर्मार्ग इत्येवंरूपस्तं व्याचष्टे—यत्र त्विति । तत्र च वाच्यालङ्कारेण कदाचिद्व्यङ्ग्यमलङ्कारान्तरं, यदि वा वाच्यालङ्कारस्य सद्भावमात्रं न व्यञ्जकता, वाच्यालङ्कारस्याभाव एव वेति त्रिधा विकल्पः । एतच्च यथायोग- व्यपदेश को धारण करने वाला भी शब्दसन्दर्भमात्र सुभग है; उस प्रकार उनके द्वारा किया जाता है अर्थात् आदरणीयता को प्राप्त करता है, इस प्रकार दीपक का ही प्राधान्य है, उपमा का नहीं । इस प्रकार कारिका के अर्थ को उदाहरण द्वारा प्रदर्शित करके इसी कारिका का व्यवच्छेद्य के बल से जो अर्थ अभिमत है कि 'जहां तात्पर्य है, वह ध्वनि का मार्ग है' उसकी व्याख्या करते हैं—परन्तु जहां—। वहां तीन प्रकार का विकल्प है१—वाच्य अलङ्कार से कभी व्यङ्ग्य अलङ्कारान्तर, अथवा वाच्य अलङ्कार का सद्भावमात्र है, व्यञ्जकता नहीं है, या वाच्य अलङ्कार का अभाव है । इसे जैसा १ प्रस्तुत यह है कि व्यङ्ग्य अलङ्कार से ही व्यपदेश होता है । अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि में कभी अलङ्कार से अलङ्कार व्यङ्ग होता है, कभी वाच्य अलङ्कार का सद्भावमात्र होता है और कभी वह भी नहीं होता । अन्तिम दो स्थितियों में वस्तुध्वनि का सद्भाव माना जाता है, अर्थात् वहां वस्तुमात्र व्यञ्जक होता है । ग्रन्थकार ने इन्हीं बातों को आगे के उदाहरणों में निर्देश किया है । आगे के आचार्यों ने अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि में अलङ्कार से अलङ्कार, अलङ्कार से वस्तु, वस्तु से वस्तु और वस्तु से अलङ्कार की ध्वनियोंको स्वतःसम्भवी, कविप्रौढोक्तिसिद्ध और कविनिबद्धवक्तृ- प्रौढोक्तिसिद्ध के तीन भागों में विभक्त करके १२ भेद किए हैं । प्रस्तुत ग्रन्थ के वक्ष्यमाण उदाहरणों का अध्ययन करते हुए इन भेदों का भी ध्यान रखना चाहिए ।