ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ः ध्वन्यालोकः इत्यादिषूपमागर्भत्वेऽपि सति वाच्यालङ्कारमुखेनैव चारुत्वं व्यव- तिष्ठते न व्यङ्ग्यालङ्कारतात्पर्येण । तस्मात्तत्र वाच्यालङ्कारमुखेनैव का- व्यव्यपदेशो न्याय्यः । यत्र तु व्यङ्ग्यपरत्वेनैव वाच्यस्य व्यवस्थानं तत्र व्यङ्ग्य-मुखेनैव व्यपदेशो युक्तः । इत्यादि के उपमा से गर्भित होने पर भी वाच्य अलङ्कार के प्रकार से ही चारुत्व व्यवस्थित होता है व्यङ्ग्य अलङ्कार के तात्पर्य से नहीं । इस लिए वहां वाच्य अल- ङ्कार के प्रकार से ही काव्यव्यपदेश उचित है । परन्तु जहां व्यङ्ग्यपर रूप से ही वाच्य का व्यवस्थान हो वहाँ व्यङ्ग्य के प्रकार से ही व्यपदेश ठीक है । लोचनम् सत्स्वास्ते सुभगं काव्यशब्दव्यपदेशभागपि शब्दसन्दर्भमात्रम्; तथा तैः क्रियते यथादरणीयतां प्रतिपद्यत इति दीपकस्यैव प्राधान्यं नोपमायाः । एवं तु कारिकार्थमुदाहरणेन प्रदर्श्यास्या एव कारिकाया व्यवच्छेद्यबलेन योऽर्थोऽभि- मतो यत्र तत्परत्वं स ध्वनेर्मार्ग इत्येवंरूपस्तं व्याचष्टे—यत्र त्विति । तत्र च वाच्यालङ्कारेण कदाचिद्व्यङ्ग्यमलङ्कारान्तरं, यदि वा वाच्यालङ्कारस्य सद्भावमात्रं न व्यञ्जकता, वाच्यालङ्कारस्याभाव एव वेति त्रिधा विकल्पः । एतच्च यथायोग- व्यपदेश को धारण करने वाला भी शब्दसन्दर्भमात्र सुभग है; उस प्रकार उनके द्वारा किया जाता है अर्थात् आदरणीयता को प्राप्त करता है, इस प्रकार दीपक का ही प्राधान्य है, उपमा का नहीं । इस प्रकार कारिका के अर्थ को उदाहरण द्वारा प्रदर्शित करके इसी कारिका का व्यवच्छेद्य के बल से जो अर्थ अभिमत है कि 'जहां तात्पर्य है, वह ध्वनि का मार्ग है' उसकी व्याख्या करते हैं—परन्तु जहां—। वहां तीन प्रकार का विकल्प है१—वाच्य अलङ्कार से कभी व्यङ्ग्य अलङ्कारान्तर, अथवा वाच्य अलङ्कार का सद्भावमात्र है, व्यञ्जकता नहीं है, या वाच्य अलङ्कार का अभाव है । इसे जैसा १ प्रस्तुत यह है कि व्यङ्ग्य अलङ्कार से ही व्यपदेश होता है । अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि में कभी अलङ्कार से अलङ्कार व्यङ्ग होता है, कभी वाच्य अलङ्कार का सद्भावमात्र होता है और कभी वह भी नहीं होता । अन्तिम दो स्थितियों में वस्तुध्वनि का सद्भाव माना जाता है, अर्थात् वहां वस्तुमात्र व्यञ्जक होता है । ग्रन्थकार ने इन्हीं बातों को आगे के उदाहरणों में निर्देश किया है । आगे के आचार्यों ने अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि में अलङ्कार से अलङ्कार, अलङ्कार से वस्तु, वस्तु से वस्तु और वस्तु से अलङ्कार की ध्वनियोंको स्वतःसम्भवी, कविप्रौढोक्तिसिद्ध और कविनिबद्धवक्तृ- प्रौढोक्तिसिद्ध के तीन भागों में विभक्त करके १२ भेद किए हैं । प्रस्तुत ग्रन्थ के वक्ष्यमाण उदाहरणों का अध्ययन करते हुए इन भेदों का भी ध्यान रखना चाहिए ।