भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 680 में से

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पृष्ठ 343

द्वितीय उद्योतः २८३ ध्वन्यालोकः यथा— प्राप्तश्रीरेष कस्मात्पुनरपि मयि तं मन्थखेदं विदध्या- न्निद्रामप्यस्य पूर्वामनलसमनसो नैव सम्भावयामि । सेतुं बध्नाति भूयः किमिति च सकलद्वीपनाथानुयात- स्त्वय्यायाते वितर्कानिति दधत इवाभाति कम्पः पयोधेः ॥ जैसे— जब कि इसे लक्ष्मी प्राप्त हो गई है तब फिर यह क्यों मुझमें मन्थन का कष्ट करेगा ? आलस्य-रहित मन वाले इसकी पहली निद्रा की भी सम्भावना नहीं ही करता हूँ, क्या समस्त द्वीपनाथों से अनुगत यह फिर से सेतु बनाएगा ? इस प्रकार तुम्हारे आने पर वितर्कों को मानों धारण करते हुए समुद्र का कम्प प्रतीत होता है। लोचनम् मुदाहरणेषु योज्यम् । उदाहरति—प्राप्तेति । कस्मिंश्चिदनन्तबलसमुदायवति नरपतौ समुद्रपरिसरवर्तिनि पूर्णचन्द्रोदयतदीयबलावगाहनादिना निमित्तेन पयोधेस्तावत्कम्पो जातः । सोऽनेन सन्देहेनोत्प्रेक्ष्यत इति ससन्देहोत्प्रेक्षयोः सङ्करात्सङ्करालङ्कारो वाच्यः । तेन च वासुदेवरूपता तस्य नृपतेर्ध्वन्यते । यद्यपि चात्र व्यतिरेको भाति, तथापि स पूर्ववासुदेवस्वरूपात्, नाद्यतनात् । अद्यतनत्वे भगवतोऽपि प्राप्तश्रीकत्वेनानालस्येन सकलद्वीपाधिपतिविजयित्वेन च वर्तमानत्वात् । न च सन्देहोत्प्रेक्षानुपपत्तिबलाद्रूपकस्याक्षेपः, येन वाच्यालङ्कारोपस्कार- कत्वं व्यङ्ग्यस्य भवेत् । यो योऽसम्प्राप्तलक्ष्मीको निर्व्याजविजिगीषाक्रान्तः बैठें, उदाहरणों में घटाना चाहिए । उदाहरण देते हैं—जब कि इसे०—। किसी अनन्त बलसमुदायसम्पन्न राजा के समुद्रतट पर उपस्थित होने पर पूर्ण चन्द्रोदय अथवा उसकी सेना के अवगाहन आदि के कारण समुद्र का कम्पन उत्पन्न हुआ । वह (कम्पन) इस सन्देह से उत्प्रेक्षित हुआ है, इसलिए ससन्देह और उत्प्रेक्षा के सङ्कर होने से सङ्क- रालङ्कार वाच्य है । उससे राजा का वासुदेव—( श्रीकृष्ण ) रूपत्व ध्वनित होता है । यद्यपि यहां ‘व्यतिरेक’ (अलङ्कार) प्रतीत होता है, तथापि वह पूर्व वासुदेव के स्वरूप से न कि अद्यतन (वर्तमान वासुदेव के स्वरूप) से । क्योंकि सम्प्रति भगवान् भी लक्ष्मी को प्राप्त करने से, अनालस्य और समस्त द्वीपाधिपतियों के विजयी रूप से वर्तमान हैं। ससन्देह और उत्प्रेक्षा अलङ्कार दोनों अनुपपन्न हो जायेंगे, इस प्रकार ( उनकी अनुपपत्ति के बल से ) ‘रूपक’ का आक्षेप होगा, जिससे व्यङ्ग्य का उपस्कारकत्व बन जायगा, यह नहीं ( कह सकते ), क्योंकि इस अर्थ का सम्भावन करेंगे कि जिसे जिसे लक्ष्मी प्राप्त न होगी और निर्व्याज विजिगीषा ( विजय करने की इच्छा ) से आक्रान्त