भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 344, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 344

२८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा वा ममैव— लावण्यकान्तिपरिपूरितदिङ्मुखेऽस्मिन् स्मेरेऽधुना तव मुखे तरलायताक्षि । अथवा, जैसे मेरा ही— हे चञ्चल और दीर्घ नेत्रों वाली ! लावण्य और कान्ति से दिशाओं को भर देने वाले तुम्हारे इस मुख के इस समय कुछ विकसित होने पर यह समुद्र जो क्षोभ नहीं लोचनम् स स मां मथ्नीयादित्याद्यर्थसम्भावनात् । न च पुनरपीति पूर्वामिति भूय इति च शब्दैरयमाकृष्टोऽर्थः । पुनरर्थस्य भूयोर्थस्य च कर्तृभेदेऽपि समुद्रैक्य- मात्रेणाप्युपपत्तेः । यथा पृथ्वी पूर्वं कार्तवीर्येण जिता पुनरपि जामदग्न्ये- नेति । पूर्वा निद्रा च सिद्धा राजपुत्राद्यवस्थायामपीति सिद्धं रूपकध्वनिरेवा- यमिति । शब्दव्यापारं निनैवार्थसौन्दर्यबलाद्रूपणाप्रतिपत्तेः । यथा च— ज्योत्स्नापूरप्रसरधवले सैकतेऽस्मिन्सरय्वा वाद्द्यूतं सुचिरमभवत्सिद्धयूनोः कयोश्चित् । एकोऽवादीत्प्रथमनिहतं केशिनं कंसमन्यो मत्वा तत्त्वं कथय भवता को हतस्तत्र पूर्वम् ॥ इति केचिदुदाहरणमत्र पठन्ति, तदसत्; भवतेत्यनेन शब्दबलेनात्र त्वं वासुदेव इत्यर्थस्य स्फुटीकृतत्वात् । लावण्यं संस्थानमुग्धिमा, कान्तिः प्रभा ताभ्यां परिपूरितानि संविभक्तानि होगा वह वह मुझे मथन करेगा, इत्यादि । ऐसा नहीं कह सकते कि यह अर्थ 'फिर भी' 'पहली' और 'फिर से' इन शब्दों से लाया गया है क्यों कि कर्तृभेद होने पर भी समुद्र के एक होने से 'फिर' इस अर्थ की उपपत्ति हो जायगी । जैसे पृथ्वी को पहले कार्तवीर्य ने जीता, फिर जामदग्न्य ने भी । राजपुत्रादि अवस्था में भी पहली निद्रा सिद्ध है, इस प्रकार यह 'रूपक ध्वनि'१ ही है यह बात सिद्ध हुई । क्यों कि शब्दव्यापार के बिना ही अर्थसौन्दर्य के बल से रूपणा की प्रतिपत्ति (अभेद का ज्ञान) होता है । और जैसे— 'चांदनी के प्रवाह से सफेद सरयू के इस सैकत में किन्ही सिद्ध युवक-युवति की देर तक बहसबाजी चलती रही, एक ने कहा कि केशी को पहले मारा, दूसरे ने कहा कि कंस को, ठीक समझ कर कहिए कि आपने उनमें पहले किसको मारा ।' कुछ लोग इस उदाहरण को यहां पढ़ते हैं, वह ठीक नहीं, क्यों कि 'आपने' इस शब्द के बल से यहां 'तुम वासुदेव हो' यह अर्थ स्फुट कर दिया गया है । लावण्य अर्थात् संस्थानमुग्धिमा, कान्ति अर्थात् प्रभा, इनसे परिपूरित-संविभक्त— १. इस उदाहरण में सन्देह और उत्प्रेक्षा के सङ्कररूप वाच्य अलङ्कार से भगवान् वासुदेव से वर्तमान राजा का अभेदारोपरूप रूपक का ध्वनि यह सिद्धान्त पक्ष है । व्यतिरेक अलङ्कार का

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 344, कुल 680 में से · BharatKosha