ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 345, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २८५ ध्वन्यालोकः क्षोभं यदेति न मनागपि तेन मन्ये सुव्यक्तमेव जलराशिरयं पयोधिः ॥ इत्येवंविधे विषयेऽनुरणनरूपरूपकाश्रयेण काव्यचारुत्वव्यवस्था- नाद्रूपकध्वनिरिति व्यपदेशो न्याय्यः । प्राप्त करता है इससे स्पष्ट ही है कि यह जलराशि है (अर्थात् जडराशि है) । इस प्रकार के विषय में अनुरणनरूप रूपक के आश्रयण से काव्य के चारुत्व के व्यवस्थित होने के कारण 'रूपकध्वनि' यह व्यपदेश ठीक है । लोचनम् हृद्यानि सम्पादितानि दिङ्मुखानि येन । अधुना कोपकालुष्यादनन्तरं प्रसादोन्मुख्येन । स्मेरे ईषद्विहसनशीले तरलायते प्रसादान्दोलनविकाससुन्दरे अक्षिणी यस्यास्तस्या आमन्त्रणम् । अथ चाधुना न एति, वृत्ते तु क्षणान्तरे क्षोभमगमत् । कोपकषायपाटलं स्मेरं च तव मुखं सन्ध्यारुणपूर्णशशधरमण्ड- लमेवेति भाव्यं क्षोभेण चलचित्ततया सहृदयस्य । न चैति तत्सुव्यक्तमन्वर्थ- तायं जलराशिर्जाड्यसञ्चयः । जलादयः शब्दा भावार्थप्रधाना इत्युक्तं प्राक् । तत्र च क्षोभो मदनविकारात्मा सहृदयस्य त्वन्मुखावलोकनेन भवतीत्यत्य- भिधाया विश्रान्ततया रूपकं ध्वन्यमानमेव । वाच्यालङ्कारश्चात्र श्लेषः, स च न अर्थात् हृद्य, बनाया है दिशाओं को जिसने । अभी अर्थात् कोपकालुष्य से, अनन्तर प्रसन्नता के प्रति उन्मुखता के कारण । स्मेर अर्थात् कुछ विहसनशील और तरलायत अर्थात् प्रसन्नता के आन्दोलनजनित विकास से सुन्दर आंखें जिसकी हैं, उसका यह आमन्त्रण (संबोधन) है । और इस समय (क्षोभ) प्राप्त नहीं करता, अभी क्षणभर पहले क्षोभ प्राप्त किया । कोपकषायपाटल और स्मेर तुम्हारा मुख सन्ध्यारुण और पूर्ण चन्द्रमण्डल ही है । चलचित्त होने के कारण सहृदय व्यक्ति को क्षोभ वाजिब है, लेकिन वह (समुद्र को) नहीं हुआ इसलिये यह स्पष्ट हो गया कि यह (समुद्र) जलराशि है, अर्थात् यथार्थ रूप से जाड्यराशि है । यह पहले कह चुके हैं कि 'जल' आदि शब्द भावार्थप्रधान (जाड्य आद्यर्थक हैं। यहां सहृदय व्यक्ति को तुम्हारे मुख के अव- लोकन से मदनविकार रूप क्षोभ होता है; इतने में अभिधा के विश्रान्त हो जाने के कारण 'रूपक' ध्वन्यमान ही है । यहां वाच्य अलङ्कार श्लेष है, पर वह व्यञ्जक नहीं व्यङ्ग्यत्व यहां वास्तविक नहीं है यह भी बात हुई । तीसरी शङ्का के अनुसार ससन्देह और उत्प्रेक्षा के बल से रूपक का आक्षेप है । इसके उत्तर में लोचनकार लिखते हैं कि अर्थ यह करेंगे कि जो जो लक्ष्मी को न प्राप्त किया एवं विजयेच्छा से युक्त है वह वह मुझे मन्थन करेगा । इस प्रकार ससन्देह और उत्प्रेक्षा की अनुपपत्ति नहीं होगी । इस प्रकार यह रूपकध्वनि का उदाहरण है । नवीन आचार्यों के अनुसार यह कविप्रौढोक्तिसिद्ध अलङ्कार से अलङ्कार व्यङ्ग्य का उदाहरण है ।